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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 656 में से

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पृष्ठ 459

क्री०ख०-अ०७९ ] * भगवान् शिवका गौरी तथा गणोंसहित त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें गमन * ४५७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] आप सभीके दर्शनसे मैं सन्तुष्ट हुआ हूँ और मुझे अत्यन्त प्रसन्नता भी हो रही है। इस समय आप सभी मुझे परिवारसहित रहनेका कोई स्थान प्रदान करें ॥ ९ ॥ महान् पुण्यके फलीभूत होनेपर ही आपका दर्शन होता है, जो समस्त प्रकारके पापोंको विनष्ट करनेवाला है। यहाँपर रहकर मैं जगदीश्वरका श्रेष्ठ ध्यान करूँगा ॥ १० ॥ ब्रह्माजी बोले— त्रिशूली भगवान् शंकरके ये वचन सुनकर वे सभी महर्षि कहने लगे—'हे देव! आप तो सभीके ईश्वर हैं, फिर आपको स्थान देनेवाला दूसरा दाता और कौन हो सकता है ? ॥ ११ ॥ कल्पवृक्षकी कौन-सी कामना हो सकती है ? और वह कामना किस दूसरेके द्वारा पूरी की जा सकती है? क्षीरसागरके जलको पीनेकी तृष्णा क्या छोटे सरोवरके जलसे शान्त हो सकती है ? ॥ १२ ॥ यह पृथिवी आपका ही एक रूप है। वह सदैव आपके वशवर्तिनी है। आप समस्त लोकोंके स्वामी हैं। आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा आप करें ॥ १३ ॥ हे देवेश्वर ! हम आपके रहनेके लिये आपको सुन्दर आश्रम दिखलाते हैं। वह स्थान विविध प्रकारके वृक्षों तथा लताओंसे घिरा हुआ है। वहींपर रमणीय वापी तथा सरोवरका जल उपलब्ध है, उसमें जलजन्तु तथा अनेक पक्षी स्थित हैं। वहाँपर वृक्षोंकी घनी छाया है और वह दूर-दूरतक फैला हुआ है। उस स्थानपर स्वादिष्ट कन्द-मूल तथा फल प्राप्त हैं, वहाँ भूमिपर कोमल-कोमल घास उगी हुई है। हे त्रिनेत्र भगवान् शंकर ! यदि आपकी इच्छा हो तो आप यहाँपर निवास करें और हम सभीकी रक्षा करें' ॥ १४-१५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर भगवान् महादेव गंगा तथा गौरी और गणोंके साथ वहाँपर निवास करने लगे। हे मुने ! उस आश्रममण्डलको भगवान् शिवने कैलाससे भी अधिक रुचिकर माना। भगवान् शिवका आश्रय पा करके गौतम आदि महर्षिगण संतापरहित होकर विविध प्रकारके तप करने लगे। गंगा तथा गौरीके साथ अवस्थित भगवान् शिवने भी वहाँ तपस्या प्रारम्भ कर दी ॥ १६-१८ ॥ महात्मा भगवान् शिवके गण उनके लिये सभी प्रकारकी सामग्री जुटाते थे। एक दिनकी बात है, देवी

[दायाँ स्तम्भ] गौरी भगवान् सदाशिवसे पूछने लगीं— ॥ १९ ॥ हे शंकर ! आप ही इस विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं। इसका पालन-पोषण करनेवाले हैं और इसका संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप पृथ्‍वी, जल, अग्नि इत्यादि रूपोंसे अष्टमूर्तिस्वरूप हैं और मूर्तिसे रहित अर्थात् निराकार भी आप ही हैं। आप सर्वेश्वर हैं और सभीको तृप्त करनेवाले हैं। आप सर्वश्रेष्ठतम हैं, सभीकी सब प्रकारकी कामनाकी पूर्ति करनेवाले भी आप ही हैं। हे देव! आप आठों प्रकारके कर्मोंका फल प्रदान करनेवाले और सब प्रकारके अर्थोंके ज्ञाता हैं ॥ २०-२१ ॥ फिर आपसे श्रेष्ठतम और कौन है, जिसका आप ध्यान करते हैं, उसे मुझे बतलायें। देवता, मुनि, नाग, यक्ष, मनुष्य तथा राक्षस और सम्पूर्ण विश्व जिनकी सत्तापर निर्भर है, फिर उन आपसे भी श्रेष्ठ कोई है क्या? तैंतीस करोड़ देवताओं तथा सिद्धों और साधकोंद्वारा आपकी ही पूजा की जाती है ॥ २२-२३ ॥ ब्रह्माजी बोले— पार्वतीजीका यह वचन सुनकर भगवान् शिव कहने लगे— शिवजी बोले— देवि ! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। हे अनघे ! तुम्हारे कथनसे मैं बहुत सन्तुष्ट हुआ हूँ। हे देवि ! तुम सावधान होकर सुनो। मैं विस्तारसे तुम्हें बताता हूँ। हे सुरेश्वरी ! मैं जिनका ध्यान करता हूँ, उन्हें आजतक तुम क्यों नहीं जान पायी ? ॥ २४-२५ ॥ मैं तुम्हारी प्रसन्नताके लिये, लोकोंके कल्याणके लिये तथा [जीवोंको] संसार-सागरसे पार करनेके लिये उन (परमात्मा)-के स्वरूपका वर्णन करता हूँ॥ २६ ॥ जो ईश्वर सभी प्राणियोंमें [अन्तरात्मारूपमें] गूढ़ भावसे स्थित हैं, इस विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं, जो अनन्त सिरवाले, अनन्त ऐश्वर्यवाले, अनन्त चरणोंवाले हैं, स्वराट् हैं, अनन्त कानोंवाले, अनन्त नेत्रोंवाले तथा अनन्त नामोंवाले हैं। तीनों गुणोंसे अतीत हैं। अनन्त स्वरूप धारण करनेवाले हैं। जो देव वेदोंकी सृष्टि करनेवाले और अखिल अर्थोंको प्रदान करनेवाले हैं। जो अनन्त शक्तिसे सम्पन्न हैं, विश्वकी आत्मा हैं। सब प्रकारकी उपमाओंसे रहित हैं, पुरातन हैं। शेषनाग, चन्द्रमा, समुद्र, आकाश, नारायण, भारत अर्थात् नर