भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 656 में से

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पृष्ठ 460

४५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ऋषिके अवतार अर्जुन तथा मुनि वेदव्यासजीसे भी जिनकी उपमा नहीं दी जा सकती, जिनसे अनन्त जीव उसी प्रकार उत्पन्न होते हैं, जैसे मेघोंसे जलकी धारा निकलती है और जैसे अग्निसे चिनगारियाँ निकलती हैं, जिन प्रभुने ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदिको सत्त्व, रज तथा तमोगुण प्रदान किये हैं और फिर जिन्होंने उन तीनों देवोंको सृष्टि, पालन तथा संहार करनेकी आज्ञा प्रदान की है, वे ही देव तीनों गुणोंका विभाग करनेवाले होनेसे 'गुणेश' इस नामसे प्रसिद्ध हैं। उन्हीं इन परमात्मा गुणेशका, जो परसे भी परतर हैं, सर्वसमर्थ हैं, परब्रह्मस्वरूप हैं, मैं रात-दिन ध्यान किया करता हूँ॥ २७-३३॥ गौरीजी बोलीं—मैं आपके कथनसे सन्तुष्ट हूँ। लेकिन मुझे विश्वास कैसे हो सकता है? मैं उन गुणेशका प्रत्यक्ष दर्शन कैसे करूँ तथा कैसे उनका भजन करूँ? हे विभो! हे शंकर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो उस उपायको बताइये॥ ३४१/२॥ ब्रह्माजी बोले—गौरीके इन वचनोंको सुनकर महेश्वर पुनः उनसे बोले॥ ३५॥ शिवजी बोले—हे देवि! जबतक तुम अनन्य मनसे एकाग्रचित्त होकर तपस्याद्वारा उनकी आराधना नहीं करोगी, तबतक वे प्रभु कैसे तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन देंगे?॥ ३६॥ देवी बोलीं—हे विभो! हे देवेश! हे अनघ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो यह मुझे सत्य-सत्य बतलाइये कि किस प्रकारसे मुझे तपस्या करनी होगी और किस उपायके द्वारा उनका दर्शन होगा?॥ ३७॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे भगवान् विनायकके प्रति देवीका आदर-भाव देखकर भगवान् शिवने देवी गिरिजाको वह उपाय बतलाया, जिससे कि उनपर गुणवल्लभ गुणेश प्रसन्न हो सकें॥ ३८॥ तदनन्तर भगवान् शिवने देवी गिरिजाको भगवान् विनायकका एक अक्षरवाला मन्त्र भलीभाँति प्रदान किया और कहा—'तुम बारह वर्षतक तपस्या करो। तदनन्तर तुम्हारे ऊपर विभु विनायक प्रसन्न होंगे॥ ३९॥ तब भगवान् गुणेश तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन देंगे, इसमें कोई संशय नहीं है।' तब देवी पार्वतीने प्रसन्न होकर गिरीश भगवान् शंकरको प्रणाम किया और वे उसी समय तपस्याके लिये जीर्णापुरके उत्तरमें स्थित अत्यन्त मनोहर लेखनाद्रि पर्वतपर चली गयीं और वहाँ मन्त्र- जप तथा ध्यानमें संलग्न हो गयीं॥ ४०-४१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें '[भगवान् शिवके द्वारा] गौरीजीको मन्त्रोपदेश' नामक उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७९॥ अस्सीवाँ अध्याय पार्वतीजीका लेखनाद्रिपर्वतपर बारह वर्षतक तपस्या करना, प्रसन्न हुए भगवान् गुणेशका प्रकट होकर दर्शन देना, गौरीका उन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वर माँगना और गणेशजीका उन्हें आश्वासन देना, पार्वतीजीद्वारा सिद्धिक्षेत्रमें प्रासाद तथा गणेशप्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना, पुनः त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें आकर भगवान् शिवको सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदित करना, शिव-पार्वती दोनोंका प्रसन्न होना ब्रह्माजी बोले—वहाँ पहुँचकर देवी पार्वतीने एक अत्यन्त रमणीय वन देखा, जो अनेक प्रकारके पुष्पों तथा [नदियों एवं सरोवरोंके] जलोंसे युक्त था। देवी पार्वती वहाँ पद्मासन लगाकर बैठ गयीं, उन्होंने अपनी दृष्टि नासिकाके अग्रभागपर स्थिर कर रखी थी॥ १॥ वे पूर्वकी ओर मुख करके गुणेशके ध्यानमें निरत हो गयीं और उनके एकाक्षर मन्त्रके जपमें उसी प्रकार परायण हो गयीं, जैसे कि शुष्क वृक्ष निश्चल भावसे स्थित रहता है॥ २॥ वे न तो फल, न जल, न मूल, न पत्र, न कन्द और न वायुका ही आहार ले रही थीं। वे निश्चल होकर परम शान्तिकी स्थितिको प्राप्त हो गयी थीं॥ ३॥