भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 461, कुल 656 में से

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पृष्ठ 461

क्री०ख०-अ०८० ] * पार्वतीजीका लेखनाद्रिपर्वतपर बारह वर्षतक तपस्या करना * ४५९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

इसी प्रकार साधनामें स्थित रहते हुए उनके बारह वर्ष व्यतीत हो गये। तदनन्तर प्रसन्न होकर कृपा करनेके लिये गुणवल्लभ विभु गुणेश साक्षात् प्रकट हुए॥ ४॥ उन्होंने मुकुट तथा कुण्डल धारण कर रखा था, उनकी दस भुजाएँ थीं, उन्होंने त्रिशूल धारण कर रखा था, उनके मस्तकपर चन्द्रमा सुशोभित हो रहा था, शंख-चक्र तथा मोतियोंकी मालासे वे विभूषित थे ॥ ५ ॥ उन्होंने अक्षमाला तथा कमलको धारण कर रखा था। मस्तकपर कस्तूरीका तिलक लगाया हुआ था। उनके मुखका मध्यभाग नारायणके मुखके समान, दक्षिण भाग शिवके मुखके समान और बायाँ भाग ब्रह्माके मुखके समान था। वे प्रभु शेषनागके ऊपर पद्मासन लगाकर बैठे हुए थे। शेषनागके फणोंके मण्डलकी छाया उनपर हो रही थी, उनका वर्ण कुन्द पुष्प एवं कर्पूरके समान धवल था ॥ ६-७॥ वे विनायक उन जगदम्बा पार्वतीसे बोले—'हे वरानने ! आप रात-दिन जिनका ध्यान करती रहती हैं और गुणेश-गुणेश—इस नामका जप किया करती हैं, वही मैं आपकी निष्ठा, भक्ति और कठिन तपस्याको देखकर आपके समक्ष प्रकट हुआ हूँ। मैं आपके ऊपर प्रसन्न हूँ, [अतः] अपने यथार्थ स्वरूपको बताऊँगा ॥ ८-९ ॥ तैंतीस करोड़ देवताओंमें मुझसे अधिक कोई श्रेष्ठ नहीं है। सत्त्वादि तीनों गुणोंमें विभेद करनेके कारण लोग मुझे 'गुणेश' इस नामसे जानते हैं॥ १० ॥ सत्त्वादि तीनों गुणोंके कारण मैं [ब्रह्मा-विष्णु- शिवरूप] त्रिविध शरीरवाला हूँ। मैं आपकी तपस्यासे अतिसन्तुष्ट हूँ। आपके मनमें जो भी कामना हो, उसे मुझसे वरके रूपमें आप माँग लें ॥ ११ ॥ हे महेश्वरि ! इस त्रिलोकीमें जो कुछ असाध्य भी होगा, उसे मैं प्रदान करूँगा।' उनके इस प्रकारके वचनको सुनकर अत्यन्त प्रसन्नताके कारण गद्गद वाणीवाली उन गौरीने अपने नेत्रोंको खोला तो सामने स्थित प्रभु विनायकको देखा। उन्होंने उन गुणेश, त्रिगुणेश तथा त्रिविध शरीरवाले प्रभुको प्रणाम किया ॥ १२-१३ ॥ तदनन्तर वे बोलीं—आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया है, मेरी निष्ठा धन्य हो गयी, मेरी तपस्या धन्य हो गयी, मेरा मन्त्र जपना सफल हो गया, मेरे स्वामी शंकर भी आज धन्य हो गये हैं, जो कि आपके चरणकमलका मुझे दर्शन हुआ है॥ १४॥ आज मुझे परम सिद्धिकी प्राप्ति हो गयी, जो कि आपका मैंने प्रत्यक्ष दर्शन किया है। अब मैं किसी अन्य वरकी कामना नहीं करती हूँ, फिर भी मैं आपकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करूँगी। अतः [हे देव!] आप मेरे पुत्ररूपमें उत्पन्न होइये और आप मुझे प्रीति प्रदान करनेवाले होवें, मुझे आपका निरन्तर दर्शन प्राप्त होता रहे और मैं आपकी सेवा-पूजा करती रहूँ ॥ १५-१६ ॥ देवी गौरीका ऐसा वचन सुनकर गुणेश विनायक अत्यन्त आनन्दित हुए और वे उन गिरिजासे बोले—'मैं आपका पुत्र बनूँगा, मैं आपकी मनोकामना पूर्ण करूँगा और दूसरे लोगोंको भी उनका अभीष्ट प्रदान करूँगा।' उनसे इस प्रकार कहकर भगवान् गुणेश क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये ॥ १७-१८ ॥ जब देवी पार्वतीने दूसरे ही क्षण वहाँ उन गुणेशको नहीं देखा, तो उन्होंने समझा कि मुझे क्षणभरका जो दर्शन मिला था, वह क्या एक सुखद सपना था ? ॥ १९ ॥ ईश्वर (शिवजी)-के उपदेशसे मैंने सम्पूर्ण अर्थोंको प्रदान करनेवाले देव गुणेशका दर्शन किया था, किंतु अब मैं उनके वियोगको सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ। ऐसा कहकर देवी पार्वतीने भगवान् गुणेशकी प्रतिमा बनाकर आदरपूर्वक उसकी स्थापना की। उन्होंने एक मन्दिर बनवाया, जिसमें चार दरवाजे थे और वह बड़ा ही सुन्दर था ॥ २०-२१ ॥ देवी पार्वतीने उस प्रतिमाका 'गिरिजानन्दन' यह सुन्दर नाम रखकर उसे प्रतिष्ठापित किया और कहा कि यह स्थान 'सिद्धिक्षेत्र' इस नामसे विख्यात होगा तथा यहाँ अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंको निश्चित ही सिद्धिकी प्राप्ति होगी। इसमें संशय नहीं है। उस स्थानको इस प्रकारका वर प्रदानकर और मन्दिरमें उन विनायककी यथाविधि पूजा करके उन्होंने उनकी प्रदक्षिणा की और उन्हें प्रणाम करके ब्राह्मणोंका पूजन किया। उन ब्राह्मणोंको

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