भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 435, कुल 656 में से

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पृष्ठ 435

क्री०ख०-अ०६८ ] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३३ बाण निकालकर उन्हें घण्टास्त्र और खगास्त्रके मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके धनुषको कानतक खींचकर छोड़ दिया। अत्यन्त वेगवाले और सुनहरे पंखोंवाले वे दोनों बाण मेघके समान गर्जना करते हुए वायुवेगसे चले और उन्होंने सहसा सूर्यमण्डलको आच्छादित कर दिया ॥ २३-२६ ॥ [उस समय] घण्टास्त्रसे महान् घण्टानाद होने लगा, जो सबको विमोहित कर देनेवाला था। तब उस घण्टा- नादको सुनकर सभी सैनिक उठकर खड़े हो गये ॥ २७॥ तब [निद्रास्त्रके प्रभावसे मुक्त] सिद्धियाँ और सभी वीर हाथोंमें शस्त्र धारणकर युद्ध करने लगे। भगवान् विनायकने दूसरा बाण देवान्तककी सेनाको लक्ष्य करके छोड़ा। तब उस खगास्त्र [नामक बाण]-से महान् बलसम्पन्न अनेक प्रकारके रूपोंवाले पक्षी प्रकट हो गये। हे मुने ! उनके पंखोंकी वायुके वेगसे वह गन्धर्वास्त्र वैसे ही नष्ट हो गया, जैसे सूर्यके सारथी अरुणके उदय (अरुणोदय) होनेपर अन्धकार नष्ट हो जाता है। तदनन्तर उन पक्षियोंने सभी दैत्य सैनिकोंका भक्षण कर लिया ॥ २८-३०॥ कुछ दैत्य उन पक्षियोंके पंखोंके आघातसे मर गये, तो कुछ उनकी चोंचोंके अग्रभागसे क्षत-विक्षत हो गये तथा कुछ दैत्य भयसे प्राण त्यागकर गिर गये ॥ ३१ ॥ उस समय दैत्यसेनाओंमें सब ओर महान् हाहाकार होने लगा। तब देवान्तकने क्रोधित होकर खड्गास्त्रका प्रयोग किया ॥ ३२ ॥ उसकी ध्वनि सुनकर सागर-जैसी विशाल सेना और दिशाओंको धारण करनेवाले हाथी क्षुब्ध हो उठे। उस अस्त्रसे असंख्य खड्ग निकल आये ॥ ३३ ॥ उस समय दोनों सेनाओंके टकरानेसे वे खड्ग अग्निके समान दाहक हो उठे। तब उस अग्निसे जलकर देवता धरतीपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥ [उस अस्त्रके प्रभावसे] कुछ पक्षी मारे गये और कुछ अग्निदग्ध हो गये तथा अन्य पक्षी अन्तर्धान हो गये। उस समय उन असंख्य खड्गोंकी प्रभासे दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं, और उस (प्रभा)-ने सैनिकोंके नेत्रोंकी ज्योतिका हरण कर लिया। [उस समय] खड्गोंकी वृष्टिसे मारे गये देवता पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३५-३६ ॥ उनमेंसे कुछ देवताओंकी भुजाएँ कट गयी थीं, तो कुछके मस्तक और कुछके हाथ कट गये थे। अन्य देवता पेट, घुटने और पीठपर खड्गके प्रहारसे आहत होकर मर गये और देवताओंके मृत शरीरोंपर गिर पड़े। इस प्रकार अष्टसिद्धियोंद्वारा निर्मित सम्पूर्ण सेना [उस अस्त्रद्वारा] विनष्ट हो गयी ॥ ३७-३८ ॥ उस समय दसों दिशाओंमें रक्तकी नदियाँ बहने लगीं और उनमें शव बहने लगे। तब विनायकने उस दैत्यके अद्भुत पराक्रमको देखकर [अपने तरकससे] एक सुदृढ़ बाणको निकालकर उसे वज्रास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और महान् गर्जना करते हुए उसे दैत्यसेनामें छोड़ दिया ॥ ३९-४० ॥ उस बाणके शब्दसे पर्वत और वृक्ष [टूटकर] पृथ्वीपर गिर पड़े। उस अस्त्रसे निकली अग्निके संयोगसे दिशाएँ जलने लगीं। उस अस्त्रने अपने तेजसे सूर्यमण्डलको आच्छादित कर लिया। उसके तेजसे कुछ पक्षी दग्ध होकर मर गये ॥ ४१-४२ ॥ उस वज्रास्त्रसे खड्गास्त्र सहसा हजारों टुकड़ोंमें टूट गया। तदनन्तर उस वज्रास्त्रने अनेक वज्रोंके द्वारा दैत्यसेनाको जला डाला ॥ ४३ ॥ वज्रकी धार [-के स्पर्शमात्र]-से हजारों दैत्य मर जा रहे थे। दैत्यगण जहाँ-जहाँ [भागकर] जाते थे, वहाँ-वहाँ वह वज्रास्त्र जाकर उनपर गिरता था ॥ ४४ ॥ उसने दैत्योंके मस्तकों, पैरों, हाथों, कन्धों और जंघाओंको चूर-चूर कर डाला। पृथ्वीका भेदनकर जो दैत्य [पातालमें] चले गये थे, उनको भी उस वज्रास्त्रने मार डाला। इस प्रकार तीक्ष्ण [धारवाले] सहस्रों वज्रोंद्वारा सभी दैत्य मार डाले गये। तदनन्तर वे सभी वज्र सब ओरसे देवान्तककी ओर चले ॥ ४५-४६ ॥ तब उसने भी एक बाण लेकर उसे प्रयत्नपूर्वक रौद्रास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसे धनुषपर चढ़ाकर तथा [कानतक] खींचकर शत्रुसेनापर छोड़ दिया। [भगवान्] शिवके मंगलमय नामसे अंकित उस बाणने आकाश और दिशाओं-विदिशाओंको भी निनादित कर दिया। प्रलयकालीन अग्निके सदृश वह बाण अग्निकणोंका

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