भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 434, कुल 656 में से

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पृष्ठ 434

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४३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 रात्रिका आरम्भ होते ही जैसे बालक अस्त-व्यस्त | षोडश उपचारोंद्वारा उसका पूजन किया और उसके रूपसे सो जाते हैं, वैसे ही वे सिद्धियाँ भी वहाँ | सम्मुख साष्टांग प्रणाम किया ॥ १५१/२ ॥ लज्जारहित होकर सो गयी थीं ॥ ६ ॥ | तदनन्तर दिव्य वस्त्र धारण किये हुए और अनेक देवान्तकने जब [विनायक और देवसेनाकी] यह | प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित देवान्तकने उस देवीकी स्थिति देखी तो उसने हर्ष प्रकट करते हुए गर्जना की। | गोदमें बैठकर भयंकर गर्जना की। वह देवी भी उसके तदनन्तर उस बलशालीने महान् देवसेनाके चारों ओर | साथ उड़कर आकाशमें स्थित हो गयी ॥ १६-१७ ॥ वीर सैनिकोंसे युक्त बहुत-से गुल्मों* (सैनिक टुकड़ियों)- | वह देवी (शक्ति) अनेक प्रकारके शस्त्र धारण की को स्थापित कर दिया ॥ ७१/२ ॥ | हुई थी और वह देवान्तक भी धनुष-बाण धारण किये [तदुपरान्त] उसने भूमिका संस्कार करके एक त्रिकोण | हुए था। उस समय उस रौद्रकेतुपुत्र देवान्तकने परम कुण्डका निर्माण किया। तत्पश्चात् रक्तसे भरे हुए सौ कलशोंको | प्रसन्न होकर उस शक्तिसे कहा—'यह कश्यपका पुत्र प्रयत्नपूर्वक मँगवाया और स्नानकर अनेक प्रेतोंसे युक्त | बालक होते हुए भी पहलेसे ही बहुत बलवान् है; अब आसनपर पद्मासन लगाकर आदरपूर्वक बैठ गया ॥ ८-९ ॥ | इस समय मेरा उस दुष्टके प्रति क्या कर्तव्य हो सकता उसने सैकड़ों दैत्योंको मारकर विशाल मांसराशि | है?' ॥ १८-१९ ॥ एकत्र की और विधिपूर्वक अग्निस्थापन करके उस दैत्य | [तब उस शक्तिने कहा—] 'मैं अभी तुम्हारे देवान्तकने अभिचार-कर्म करना प्रारम्भ किया ॥ १० ॥ | सामने ही [उसकी] सम्पूर्ण सेनाका नाश किये देती हूँ।' उसने दिगम्बर (वस्त्रहीन) होकर मन्त्र पढ़ते हुए | जब वह दैत्येन्द्रसे इस प्रकार कह रही थी, तभी मांसकी आहुतियाँ देना प्रारम्भ किया। एक हजार आहुतियाँ | काशिराजने उसके वचनोंको सुन लिया ॥ २० ॥ देनेके अनन्तर उसने बलिदान देकर पूर्णाहुति की। तब | तदनन्तर राजाने विनायकके पास जाकर उन्हें उसने कुण्डके मध्य भागमें एक शक्तिको देखा, जो क्षुधातुर | आदरपूर्वक बोधित करते हुए कहा— ॥ २०१/२ ॥ थी। उसने उसे खानेके लिये नरमांस और पीनेके लिये उन | काशिराज बोले—[हे प्रभो!] आप तो भूत, [रक्तसे भरे हुए सौ] कलशोंको दिया ॥ ११-१२ ॥ | वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता हैं, फिर भी आप उस तब भी अतृप्त जानकर उसने उसे अन्य प्रेतोंको | दैत्यरचित गान्धर्वी मायाको क्यों नहीं जान पा रहे हैं? अर्पित किया, तब वह भयंकर शक्ति [उस कुण्डसे] | और आप उसमें आसक्त क्यों हो जा रहे हैं? देवान्तकने बाहर आयी। उसके बाल आकाशका स्पर्श कर रहे थे | अभिचार-कर्मके द्वारा राक्षसी-सदृश इस मायाका निर्माण और नेत्र विशाल गड्ढोंके समान थे। रक्तवर्ण और | किया है। वह आपकी सेनाका नाश कर डालेगी, अतः अतीव भयंकर मुखवाली उस शक्तिने दसों दिशाओंको | आप सावधानचित्त हो जाइये ॥ २१-२२१/२ ॥ प्रतिध्वनित करते हुए अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कहा— | ब्रह्माजी कहते हैं—तब काशिराजके इस प्रकारके 'रक्त-मांससे मैं तृप्त हो गयी हूँ, अब तुम्हें कोई भय | वचन सुनकर सावधान हुए चित्तवाले सर्वव्यापक भगवान् नहीं है' ॥ १३-१४१/२ ॥ | विनायकने ज्ञानदृष्टिसे देखकर जान लिया कि यह सब तब उस दैत्यने भी उसे प्रणामकर भक्तिभावसे | मायाद्वारा रचित है। तब उन्होंने [अपने तरकससे] दो


  • महाभारत (आदिपर्व २।१९-२०)-में गुल्मकी परिभाषा इस प्रकार दी गयी है— एको रथो गजश्चैको नरः पञ्च पदातयः। त्रयश्च तुरगास्तज्ज्ञैः पत्तिरित्याभिधीयते ॥ पत्तिं तु त्रिगुणामेतामाहुः सेनामुखं बुधाः। त्रीणि सेनामुखान्येको गुल्म इत्यभिधीयते ॥ अर्थात् एक रथ, एक हाथी, पाँच पैदल सैनिक और तीन घोड़े—इन्हींको सेनाके मर्मज्ञ विद्वानोंने 'पत्ति' कहा है। इसी पत्तिकी तिगुनी संख्याको विद्वान् पुरुष 'सेनामुख' कहते हैं और तीन सेनामुखोंको एक 'गुल्म' कहा जाता है। इस प्रकार एक गुल्ममें ९ हाथी, ९ रथ, २६ घुड़सवार और ४५ पैदल सैनिक होते हैं।