श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 433, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०६८ ] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अन्धकार छा जानेपर भी वे दोनों परस्पर युद्ध करते | गण्डस्थलको फाड़ डाला ॥ २९-३० ॥ रहे ॥ २१-२२ ॥ | सिंहोंके गर्जन, हाथियोंके चिंघाड़ और दैत्योंके क्रोधित होकर उन दोनोंने एक-दूसरेकी बाणवृष्टिको | अनेक प्रकारके शब्दोंसे तीनों लोक काँपने लगे तथा अपनी शरवर्षाद्वारा काट डाला। इस प्रकार उन दोनोंने | सभी देवता आश्चर्यचकित हो गये ॥ ३१ ॥ सैकड़ों बार एक-दूसरेकी बाणवृष्टिका निवारण किया। | वे सिंह उछल-उछलकर हाथियोंके कुम्भस्थलपर तदनन्तर उस दैत्य देवान्तकने एक सौ आठ बार | गिर रहे थे। इस प्रकार सिंहसमूहोंके द्वारा वे सभी हाथी महामन्त्र (अघोरमन्त्र)-का जप करके शीघ्र ही एक | मार डाले गये। [सिंहोंद्वारा मारे गये वे हाथी] इन्द्रद्वारा बाणको वारणास्त्रसे अभिमन्त्रित किया ॥ २३-२४ ॥ | वज्र-प्रहारसे गिराये गये पर्वतोंकी भाँति सुशोभित हो रहे उसे छोड़नेपर करोड़ोंकी संख्यामें हाथी उत्पन्न हो | थे। तदनन्तर वे सिंह दसों दिशाओंमें जाकर दैत्योंका गये, जो चार दाँतोंवाले, पर्वतके समान [विशाल] एवं | भक्षण करने लगे ॥ ३२-३३ ॥ मेरु और मन्दराचलको भी चूर्ण कर देनेवाले थे ॥ २५ ॥ | तब सम्पूर्ण सेनाके मारे जानेपर देवान्तक चिन्तित जिनके मदके प्रवाहसे चारों ओर नदियाँ प्रवाहित | हो उठा। 'यह कश्यपका पुत्र बालक होते हुए भी होने लगीं तथा जिनके चिंघाड़मात्रसे तीनों लोक वैसे | बलवान् दिखायी दे रहा है, अतः अब मैं इसे निश्चित ही निनादित हो रहे थे, जैसे कि वर्षाकालमें बादलोंके | ही यमलोकका दर्शन कराऊँगा'—ऐसा कहकर दैत्यराजने गरजनेसे ॥ २६१/२ ॥ | पुनः एक बाणको अभिमन्त्रित किया ॥ ३४-३५ ॥ हे महामुने ! वे हाथी देवताओंकी सेनाको निरन्तर | तदनन्तर शार्दूलोंको उत्पन्न करनेवाले उस बाणको नष्ट कर रहे थे। वे दसों दिशाओंमें भाग रहे देवसैनिकोंका | धनुषपर चढ़ाकर उसने कानतक धनुषको खींचकर उसे पीछा कर रहे थे। वे पैरोंसे कुचलकर, सूँडके द्वारा और | देवताओंकी सेनापर छोड़ दिया। आकाश और दिशाओंको दाँतोंके अग्रभागसे वीरोंको मार डाल रहे थे ॥ २७-२८ ॥ | निनादित करता हुआ वह बाण शीघ्र ही [देवसेनामें] सेनाको इस प्रकारसे नष्ट होता हुआ देखकर | गया। उसके पंखकी वायुसे टूटकर वृक्षसमूह गिर पड़े। भगवान् विनायकने सिंहास्त्रका प्रयोग किया, तब सैकड़ों- | तब [उस बाणसे] अनेक शार्दूलसमूह प्रकट हो गये। हजारोंकी संख्यामें सिंह उत्पन्न हो गये। उनके सिंहनादसे | उन शार्दूलोंने सिंहोंका भक्षण कर डाला। तदनन्तर वे हाथी पृथ्वीपर गिर पड़े। तब उन सिंहोंने हाथियोंके | सब शार्दूल अन्तर्हित हो गये ॥ ३६-३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'अस्त्रयुद्धका वर्णन' नामक सड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६७ ॥ अड़सठवाँ अध्याय विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ब्रह्माजी कहते हैं—तदनन्तर दैत्य देवान्तकने दो | तब भगवान् विनायकने अपने समक्ष ताल और बाणोंको आदरपूर्वक अभिमन्त्रित किया। उसने एक | मृदंग [बजाकर] गान करते हुए गन्धर्वों और अनेक बाणको निद्रास्त्रसे तथा दूसरेको गन्धर्वास्त्रसे अभिमन्त्रित | प्रकारके विचित्र नृत्य करती हुई अप्सराओंको देखा। किया ॥ १ ॥ | उस समय उनके हाथोंसे शस्त्र गिर गये और उन्हें इसका उसने बायें घुटनेको आगेकर और धनुषकी डोरीको | पता भी न चला ॥ ३-४ ॥ खींचकर उन दोनों बाणोंको छोड़ दिया। उनके शब्दसे | वे [गायन और वादनकी] मनोहर ध्वनिसे मोहित सहसा तीनों लोक काँपने लगे। उनमेंसे एक बाण सेनामें | हो गये थे और उन्हें अपने कर्तव्यका भी ज्ञान न रहा। और दूसरा देवाधिदेव विनायकके निकट गिरा ॥ २१/२ ॥ | निद्रास्त्रसे विमोहित होकर सभी सैनिक भी सो गये ॥ ५ ॥