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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 656 में से

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पृष्ठ 432

४३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सड़सठवाँ अध्याय विनायक और देवान्तकका युद्ध

ब्रह्माजी कहते हैं—उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको जानकर विनायक अपने मनमें महान् आश्चर्य करने लगे। तब वे क्रोधित तथा युद्धके लिये उद्यत होकर सिंहपर सवार हुए। तदनन्तर उन्होंने अपने गर्जनसे आकाश और दिशाओंको ध्वनित करते हुए सभी लोगोंके मनको और पर्वतोंको भी कम्पायमान कर दिया॥ १-२॥ वे बड़े वेगसे देवान्तकके समीप गये। तब वह दैत्य देवान्तक उनसे हँसकर कहने लगा—॥ ३॥ दैत्य बोला—शुष्क तालुवाले हे बालक ! तुम तो अभी मक्खन खानेमें ही समर्थ हो, कैसे तुम युद्धके लिये चले आये? तुम यहाँ मत रुको, जाओ और माताका स्तनपान करो। हे बालक ! तुम तो अदिति [-के गर्भ]- से कश्यपद्वारा उत्पन्न हो, फिर इस प्रकारकी मूर्खताको कैसे प्राप्त हो रहे हो, जो आज देवान्तकसे युद्ध करनेकी इच्छा कर रहे हो? मुझे देखकर तो काल भी भयभीत हो जाता है, तुम व्यर्थ ही मरनेकी इच्छा कर रहे हो। तुम्हारा शरीर अत्यन्त कोमल है, अतः तुम तो मेरे लिये एक ग्रासमात्र होओगे॥ ४-६॥ ब्रह्माजी कहते हैं—दैत्य [देवान्तक]-के इस प्रकारके वचन सुनकर क्रोधसे अरुण नेत्रोंवाले विनायकने मुखसे अग्निका-सा वमन करते हुए हँसकर कहा—॥ ७॥ भगवान् [विनायक] बोले—तुम मद्यपानके कारण उन्मत्त और सन्निपातसे ग्रस्त हो, इसीलिये मूर्खतावश असम्बद्ध, युक्तिहीन प्रलाप कर रहे हो ॥ ८॥ अग्निकी छोटी-सी चिनगारी भी वायुसे प्रेरित होकर सब कुछ जला डालती है। अरे दैत्याधम ! तुम्हारे वाक्यसे प्रेरित होकर ही मैं तुम्हें मार डालूँगा, तुम मुझे नहीं जानते हो। अब तुम ऐसी बुद्धिका त्याग कर दो कि मेरा अन्त करनेवाला कोई नहीं है। मैं सनातन ब्रह्म हूँ और तुम्हारे वधके लिये ही अवतीर्ण हुआ हूँ॥ ९-१०॥ शिवजीद्वारा प्राप्त वरदानके अहंकारसे तुमने सबको पीड़ित किया है। उस वरदानकी अवधि आ गयी है। बुद्धिहीन होनेके कारण तुम इसे समझ नहीं पा रहे हो। हे दुर्मते ! त्रैलोक्यको पीड़ा देनेसे तुम्हारे द्वारा जो पाप हुआ है, उसे कहना व्यर्थ है, अब तुम अपने पुरुषार्थका प्रदर्शन करो॥ ११-१२॥ शक्तिके गुह्यांगसे निकलनेवाला तुम्हारे अतिरिक्त कौन ऐसा होगा, जो अपना मुख दिखलायेगा ! यदि तुम युद्ध करनेकी इच्छा रखते हो तो मुझपर प्रहार करो और मेरे प्रहारको सहन करो। तुम अपनी मूर्खताके वशमें होकर कल होनेवाली अपनी मृत्युकी आज ही इच्छा कर रहे हो॥ १३ १/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं—उस दैत्यसे इस प्रकार कहकर भगवान् विनायकने [अपने] धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी॥ १४॥ भगवान् विनायकने उस [देवान्तक]-को नरान्तककी गति अर्थात् मृत्यु देनेकी इच्छासे अपने धनुषकी टंकार की, जिससे तीनों लोक कम्पित हो उठे॥ १५॥ उन्होंने धनुषकी प्रत्यंचाको कानतक खींचकर उस दैत्यपर बाण छोड़ा, परंतु दैत्यद्वारा सैकड़ों टुकड़े कर दिये जानेपर वह बाण भूमिपर गिर पड़ा॥ १६॥ तदनन्तर दैत्यने धनुषको प्रत्यंचायुक्त करके बहुत- से बाणोंका प्रहार किया, उसके धनुषकी टंकारसे पर्वत और दिशाएँ गूँज उठीं। तब विघ्नराज विनायकने हुंकार- मात्रसे उन बाणोंको गिरा दिया और पुनः उस दैत्याधिपतिपर बहुत-से बाणोंसे प्रहार किया॥ १७-१८॥ उन देवाधिदेवने एक बाणसे उसका मुकुट और दो बाणोंसे दोनों कानोंके कुण्डल भूमिपर गिरा दिये तथा दो बाणोंसे उसकी दोनों भुजाएँ काट डालीं॥ १९॥ उन्होंने एक बाणसे उसके ललाटपर प्रहार किया, तब वह दैत्य क्रोधान्वित होकर दाँतोंको चबाने लगा। उसने अपनी आँखें फैलाकर विनायकपर और भी बहुत- से बाण छोड़े, जिनसे आकाश और दिशाएँ आच्छादित हो गयीं ॥ २० १/२ ॥ उन बाणोंको भगवान् विनायकने आकाशमें ही एक ही बाणसे काट डाला और क्षणमात्रमें स्वयं एक बाणमय मण्डपका निर्माण किया। उस समय घोर

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