श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 422, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
उसे आपने [अकेले ही] मार डाला। हे सुरेश्वर! हम लोगोंके पुण्य अत्यधिक थे, इसीलिये हम आपके विराट् स्वरूपको देख सके' ॥ ३९ ॥ ब्रह्माजी बोले—जब काशिराज इस प्रकार कह रहे थे, तभी पुरवासी भी कहने लगे—'हे विभो! आप धन्य हैं। अहो! आप बालकका रूप धारण करके हम सभीको भ्रमित करते रहे। आपने अपनी कीर्तिका विस्तार करनेके लिये ये सभी कृत्य किये हैं।' [ऐसा कहकर] पुरवासियोंने परमभक्तिसे उन विभुका पूजन किया और
[दायाँ स्तम्भ]
इस प्रकार प्रार्थना करने लगे— ॥ ४०-४१ ॥ 'हे देव! हमें आप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये और कभी भी आपका हमसे वियोग न हो—ऐसा कीजिये।' तदुपरान्त उन नागरिकों और काशिराजने ब्राह्मणोंको भाँति-भाँतिके दान किये और उनसे प्रार्थना की कि ऐसे ही हमारी विजय होती रहे। उस समय नगरवासियोंने काशिराजको उपहार अर्पित किये और काशिराजने भी उन्हें उपहारादिसे सन्तुष्ट किया ॥ ४२-४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'दैत्यदमन एवं विराड्दर्शन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥
बासठवाँ अध्याय
नरान्तकके सिरको लेकर उसके माता-पिताका देवान्तकके पास जाना और देवान्तकका
काशिराजकी नगरीपर आक्रमण करना
[बायाँ स्तम्भ]
ब्रह्माजी बोले—रौद्रकेतु विप्रकी भार्या, जिसका नाम शारदा था, वह अपनी सखियोंके साथ कौतूहलपूर्वक वितर्दी (आँगनमें बने चबूतरे)-पर बैठी हुई थी ॥ १ ॥ अचानक उन सबके साथ उसने आँगनमें गिरे हुए नरान्तकके सिरको देखा, जिसके दोनों कानोंमें कुण्डल सुशोभित हो रहे थे ॥ २ ॥ उस सिरके गिरनेसे वहाँ पर्वतशिखरके गिरनेके सदृश ध्वनि हुई, जिससे वह सम्पूर्ण नगर गूँज उठा। वह सिर उसी प्रकार श्यामल और शोभाहीन हो गया था, जैसे हिमपातसे प्रभावित कमल ॥ ३ ॥ उस आघातसे व्याकुल शारदा और रौद्रकेतु दोनों भयभीत हो गये, तदनन्तर सावधान होनेपर नरान्तकके सिरको देखकर वे दोनों अत्यन्त रुदन करने लगे ॥ ४ ॥ वे दोनों अपनी छाती पीटते हुए धरतीपर लोटने लगे और मूर्च्छित हो गये। तदनन्तर एक मुहूर्तके बाद जब वे पुनः चेतनायुक्त हुए तो माता शारदा उस सिरको अपने हृदयसे लगाकर अत्यन्त शोकाकुल हो उठी। वह विह्वल होकर वैसे ही करुण क्रन्दन करने लगी, जैसे मृतवत्सा गौ क्रन्दन करती है ॥ ५-६ ॥
[दायाँ स्तम्भ]
शारदा कहने लगी— [हे पुत्र!] तुम्हारा शरीर वीरोचित शोभासे परिपूर्ण रहता था, तुम सदैव युद्धके लिये उत्सुक रहते थे। [युद्धमें जाते समय] तुमने मुझसे कुछ कहा भी नहीं। अब तो कुछ बोलो ॥ ७ ॥ [हे वत्स!] तुम्हारा पूरा शरीर कहाँ गया ? तुम तो केवल सिरमात्रसे ही आये हो। तुम अकेले क्यों आये हो ? तुम्हारी महान् सेना कहाँ है ? तुम्हारे साथ जल लेकर चलनेवाले और छत्र तथा चँवर धारण करनेवाले कहाँ गये ? जिसे देखकर श्रेष्ठ सुन्दरियाँ विरहरूपी अग्निसे [संतप्त होकर] म्लान हो जाया करती थीं; तुम्हारा वह रूप अस्ताचलगामी सूर्यकी भाँति म्लान कैसे हो गया ? ॥ ८-९ १/२ ॥ मेरे द्वारा अथवा तुम्हारे पुत्रवत्सल पिताद्वारा तुम्हारा क्या अपराध किया गया है ? रुदन करते हुए हम दोनोंके आँसुओंको पोंछकर तुम हमसे क्यों नहीं बोल रहे हो ? ॥ १० १/२ ॥ हे पुत्र! तुम [कभी तो] अत्यन्त मूल्यवान् बिस्तरसे युक्त पलंगपर शयन करते थे और इस समय कहाँ सो रहे हो—यह देखकर मेरा मन अत्यन्त खिन्न