श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 423, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०६२ ] * नरान्तकके सिरको लेकर उसके माता-पिताका देवान्तकके पास जाना * ४२१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हो रहा है। तुम्हारे बिना हम दोनों किसीको मुँह दिखानेयोग्य भी नहीं रह गये हैं ॥ ११-१२ ॥ ब्रह्माजी बोले-शारदाके शोकपूर्ण वचनोंको सुनकर रौद्रकेतु भी शोकाकुल हो उठे और कहने लगे- 'हे प्रिय पुत्र ! तुम अपने विषयमें कुछ बताये बिना कहाँ चले गये ? ॥ १३ ॥ प्रतिदिन जो होता था और जो भविष्यकी योजना होती थी-उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको तथा अपने स्थानके विषयमें हमें तुम बताया करते थे; इस समय क्यों नहीं बोल रहे हो ? ॥ १४॥ यदि तुम युद्धमें [शत्रुके] सम्मुख लड़ते हुए रक्त- धाराओंसे पवित्र होकर स्वर्गलोकको चले गये हो तो बिना मुझसे पूछे और मुझे त्यागकर क्यों चले गये ? तुम्हारा तो अपने माता-पिताके प्रति पुत्रभाव था, उसे शत्रुतामें कैसे परिणत कर दिया ? ॥ १५१/२ ॥ जब तुम सेवकके हाथसे अपने हाथमें तलवार ग्रहण करते थे, तो पर्वतों और काननोंसहित पृथ्वी और स्वर्ग काँपने लगते थे; ऐसे तुमको किसने [पृथ्वीपर] गिरा दिया, कालकी इस विपरीत गतिको हम नहीं जानते ॥ १६-१७ ॥ लोकमें प्रारब्ध ही बलवान् है, पुरुषार्थ निरर्थक है। मेरे वंश और इस लोकका आभूषणरूप नरान्तक न जाने कहाँ चला गया ? जो कालके लिये भी काल, शत्रुरूपी हाथीके लिये सिंह और राजाओंरूपी रूईका दाह करनेके लिये अग्निके समान था; जिसका प्रताप सूर्यके समान था-ऐसे तुम दात्र (लकड़ी काटनेका उपकरण)-से काटे गये वृक्षकी भाँति दो खण्डोंमें कैसे विभक्त हो गये ?' ॥ १८-१९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी !] इस तरह अनेक प्रकारसे शोक करके रौद्रकेतु और शारदा नरान्तकके सिरको लेकर देवान्तकके पास गये ॥ २०१/२ ॥ उन दोनों (माता-पिता)-को उस स्थितिमें देखकर देवान्तक त्वरापूर्वक भद्रासनसे उठकर उनके गले लगकर छोटे भाईकी मृत्युपर रुदन करने लगा। तब उसके परिवारके जो काल और यमके समान [दुर्धर्ष] दैत्य थे, वे भी नरान्तकके सिरको देखकर उच्च स्वरसे विलाप करने लगे ॥ २१-२२१/२ ॥ देवान्तक माताके हाथसे नरान्तकका सिर लेकर उसे अपने हृदयसे लगाकर भ्रातृस्नेहसे दुखी होकर कुररी पक्षीके समान क्रन्दन करने लगा ॥ २३१/२ ॥ देवान्तक कहने लगा-हम दोनों साथ-साथ भोजन करते थे, एक साथ जल पीते थे, साथ-साथ खेलते थे और एक साथ सोते तथा एक साथ उठते थे। हम दोनोंने साथ-साथ तप किया, साथ-साथ जप किया, [अब] तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गये ? ॥ २४१/२ ॥ जिस तुम्हें देखकर मनुष्य और देवता दसों दिशाओंमें पलायन कर जाते थे, वही तुम किस बलवान् दुष्टद्वारा मार डाले गये ? मैंने तो पृथ्वी और रसातलका ही राज्य तुम्हें निवेदित किया था, तो भी हे भ्रातृवत्सल (भाईके प्रति प्रेम रखनेवाले) ! तुम मुझे छोड़कर स्वर्ग कैसे चले गये ? ॥ २५-२६१/२ ॥ जिसके धनुषके टंकारकी ध्वनिसे सम्पूर्ण जड़- चेतन काँपने लगते थे, असंख्य राजागण जिसके भवनके द्वारदेशमें [किंकरोंकी भाँति] शोभा पाते थे; वही तुम माता-पिता और सुन्दर स्त्रीको छोड़कर कैसे चले गये ? ॥ २७-२८ ॥ देवान्तकका इस प्रकारका क्रन्दन श्रवणकर वीर लोग वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने बलपूर्वक उसका हाथ पकड़कर तर्कोंद्वारा समझाते हुए उसे क्रन्दन करनेसे रोका ॥ २९ ॥ लोगोंने कहा-हे राजन् ! किसी वीरके युद्धमें मारे जानेपर वीर लोग शोक नहीं करते हैं, अपितु वह जिसके द्वारा मारा गया है, उसके पास जाकर उसका बलपूर्वक वध करते हैं ॥ ३० ॥ सम्पूर्ण प्राणियोंके देहधारणके साथ ही उनकी मृत्यु भी प्रादुर्भूत होती है। हे राजन् ! वह मृत्यु आज हो या सौ वर्ष बाद; अपनी हो या दूसरेकी, परन्तु होगी अवश्य, इसमें सन्देह नहीं है। फिर ऐसी स्थितिमें क्या शोक करना है ? ॥ ३११/२ ॥ तब वह धर्मज्ञ असुर देवान्तक उन लोगोंके