श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 430, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
छाछठवाँ अध्याय देवान्तकका अघोरमन्त्रसे हवनकर दिव्य अश्व पाना और उसपर आरूढ़ हो रणक्षेत्रमें जाना तथा सिद्धियोंकी सम्पूर्ण सेनाका संहार कर डालना
ब्रह्माजी कहते हैं—शारदा और रौद्रकेतुने अपने पुत्र देवान्तकको रातमें अकेले [लौटा हुआ] देखकर उसका आलिंगनकर उससे बातें की ॥ १ ॥ उस समय वह अपना मुख ढक ले रहा था तथा लज्जासे युक्त एवं अत्यन्त विह्वल था। वह कुछ भी बोल नहीं रहा था और प्रबल वायुके झोंकेसे कम्पायमान वृक्षकी भाँति काँप रहा था ॥ २ ॥ [देवान्तकके] पिताने कहा—तुम अपने विषयमें क्यों नहीं बता रहे हो? मूककी भाँति क्यों चुप हो ? तुम्हारी अभिलषित वस्तु यदि तीनों लोकोंके लिये दुर्लभ हो, तो उसे भी मैं अपने प्रयत्नसे उपलब्ध करा दूँगा ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—पिताकी वाणीरूपा सुधाका पानकर पुत्र देवान्तकने सावधानचित्त होकर माताके निकट स्थित पितासे निःशंक होकर कहा ॥ ४ ॥ पुत्र (देवान्तक)-ने कहा—मैं आपकी आज्ञा लेकर ही विनायकसे युद्ध करने गया था। वहाँ मैंने अपने सर्पतुल्य असंख्य विषैले बाणोंसे बहुत-से देवताओंको नष्ट कर दिया और कश्यपपुत्र विनायककी सेनाको मारकर रक्तकी नदियाँ बहा दीं। तभी देवसेनाके रक्षणार्थ एक महान् कृत्या मेरे निकट आ गयी। उसका मुख गुफाके सदृश था और [ऊँचाईमें] वह आकाशका स्पर्श कर रही थी। उसके केश बड़े भयंकर थे और पातालतक व्याप्त चरणोंवाली उस कृत्याके स्तन पर्वतके समान [विशाल] थे ॥ ५-७॥ हे तात ! [मेरे द्वारा] खड्गका प्रहार किये जानेपर भी उसे तनिक भी व्यथा नहीं हुई और उसने मेरी सम्पूर्ण सेनाको अपने गुफासदृश गर्भाशयमें रख लिया ॥ ८॥ उसने मेरे सम्पूर्ण शस्त्रों और बाणसमूहोंका भक्षण कर लिया और मुझे [भी] अपने गर्भाशयमें रख विनायकदेवके पास चली गयी ॥ ९ ॥
उसके गर्भाशयकी स्निग्धताके कारण मैं वहाँसे स्खलित होकर भूमिपर गिर पड़ा। महान् अन्धकार होनेके कारण किसीको ज्ञात न हो सका और मैं वहाँसे भागकर नदीके जलमें स्नानकर घर आ गया। हे तात ! इसीलिये मैं लज्जित और नीचे मुख किये हुए हूँ ॥ १०१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—तब पुत्रके इस प्रकारके वचन सुनकर रौद्रकेतुने उससे कहा—'तुम चिन्ता न करो, मैं तुमसे एक उपाय कहता हूँ' ॥ १११/२ ॥ तदनन्तर [शुभ] मुहूर्त देखकर उसने उसको बीजसहित अघोर महामन्त्र प्रदान किया। उसके बाद पिता रौद्रकेतुने उससे पुनः कहा—' [हे पुत्र!] शिवका ध्यानकर और उनका सम्यक् रूपसे पूजनकर उत्तम अनुष्ठान करो। जपका दशांश हवन, हवनका दशांश तर्पण और तर्पणका दशांश ब्राह्मण-भोजन कराओ। इससे शिवके प्रसन्न होनेसे हवनकुण्डसे एक अश्व निकलेगा। उस अश्वपर आरूढ़ होकर तुम युद्धके लिये जाओ तो तुम्हें निश्चय ही विजयकी प्राप्ति होगी' ॥ १२-१४१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—तब पिताके इस प्रकारके वचनको सुनकर पुत्र देवान्तकने प्रसन्नतापूर्वक उससे कहा— [हे तात !] आपने [शिवजीके मन्त्रका] सम्यक् रूपसे उपदेश दिया, अब आप [उसको सिद्ध करनेकी] विधि भी मुझे बतलाइये ॥ १५१/२ ॥ तब लोगोंको हटाकर वे दोनों घरके मध्य भागमें चले गये। वहाँ उन दोनोंने लाल रंगके वस्त्र धारण किये और लाल चन्दन लगाया। तत्पश्चात् लाल रंगके पुष्प लाकर उनसे शिवकी पूजा की ॥ १६-१७॥ इस प्रकार उन दोनोंने बहुत दिनोंतक अत्यन्त आदरपूर्वक [मन्त्रका] अनुष्ठान किया। अनुष्ठान समाप्त हो जानेपर उन्होंने आदरपूर्वक कुण्डका निर्माण किया। वह कुण्ड सभी लक्षणोंसे युक्त, मेखला और योनिसे
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