श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 429, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०६५ ] * विनायकका बुद्धिको युद्धके लिये भेजना * ४२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनमेंसे कुछ दैत्य कहने लगे—हे देवान्तक! दौड़ो- दौड़ो; हम मरे जा रहे हैं ॥ ५-६ ॥ इस प्रकारका कोलाहल सुनकर देवान्तक उस शक्तिके सम्मुख गया और शीघ्र ही अपने धनुषपर डोरी चढ़ाकर अपना हस्तलाघव दिखाते हुए उस शक्तिके अंगोंपर सर्पसदृश विषैले बाणोंसे प्रहार करने लगा। उसके द्वारा शक्तिकी ओर चलाये गये बाणसमूहोंसे सूर्य आच्छादित-से हो गये। तब उस शक्तिने अपने विशाल मुखको फैलाकर उन बाणोंको कमलनालकी भाँति निगल लिया ॥ ७-८ १/२ ॥ उस समय उस दैत्यके सारे तरकस खाली हो गये, परंतु उस शक्तिकी तृप्ति वैसे ही नहीं हुई, जैसे राक्षसोंकी मनुष्योंसे तृप्ति नहीं होती ॥ ९ १/२ ॥ देवान्तकको क्षीण शक्तिवाला देखकर वह शक्ति दैत्यसेनाके पास गयी। उसने उनमेंसे कुछ दैत्योंका भक्षण कर लिया और कुछ दैत्योंको अपने हाथके प्रहारसे नीचे गिरा दिया। कुछको अपने मुखमें डाल लिया और कुछको पटककर चूर्ण कर डाला ॥ १०-११ ॥ उसने असंख्य दैत्यसमूहोंका भक्षण कर लिया, उन्हें चूर-चूर कर डाला और उन्हें मार डाला। कुछ दैत्योंको अपने चरणोंके प्रहारसे चूर-चूर करती हुई वह देवान्तकके पास गयी और उससे कहा—'तुम मेरे गर्भाशयमें प्रविष्ट हो जाओ, जहाँ तुम्हारे दैत्य माताके गर्भमें स्थित [शिशु]-की भाँति शयन कर रहे हैं। जिन दैत्योंका मेरे द्वारा भक्षण कर लिया गया, वे मर गये और मेरे उदरमें जाकर पच गये हैं' ॥ १२-१३ १/२ ॥ तब मल-मूत्रकी गन्धसे व्याकुल वह देवान्तक उस शक्तिसे भयभीत होकर शीघ्र ही पलायन कर गया, [परंतु] जहाँ-जहाँ वह जाकर छिपता, वहाँ- वहाँ वह शक्ति पहुँच जाती थी। इस प्रकार वह स्वर्गादि ऊर्ध्वलोकों, पातालादि अधोलोकों और दसों दिशाओंमें भ्रमण करता रहा ॥ १४-१५ ॥ तभी उस शक्तिने उसकी शिखा पकड़कर उसे अपने गर्भाशयमें रख लिया। तदनन्तर उस शक्तिके साथ बुद्धि विनायकके पास गयी ॥ १६ ॥ स्तनोंके आघातसे दोनों ओरके वृक्षोंको गिराती हुई और मदके प्रभावसे घूमती हुई आँखोंवाली उस शक्तिको आगे करके बुद्धिने भगवान् विनायकको प्रणाम किया ॥ १७ ॥ जिस प्रकार बादल जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार स्वेदवर्षा करती हुई उस मन्दगामिनी विकराल शक्तिको देखकर भगवान् विनायकने उसे वहाँसे दूर हटाया। जब उसे वहाँसे हटाया गया तो वह दैत्य देवान्तक उसके गर्भाशयसे भूमिपर गिर पड़ा। उस समय वह अत्यधिक दुर्गन्धयुक्त हो गया था, अतः दूतोंने उसको बाहर निकाल दिया ॥ १८-१९ ॥ तदनन्तर चेतना प्राप्त करके देवान्तक स्नानकर, चुपचाप घर चला गया। उस समय वह लज्जाके कारण नीचे मुख किये, चिन्तित, उदास और अत्यन्त दुखी था। बुद्धिके द्वारा निवेदन किये जानेपर उस शक्तिने भगवान् विनायकको प्रणाम किया। उसे देखकर कुछ लोग हँसने लगे, कुछ भयभीत हो गये, कुछ कान्तिहीन हो गये और कुछ गिर पड़े ॥ २०-२१ ॥ तब उस (शक्ति)-ने उन (भगवान् विनायक)-से कहा—मैंने शीघ्रतापूर्वक दैत्यवाहिनीका भक्षण कर लिया और वह पापी देवान्तक भी मेरे द्वारा [गर्भाशयमें] स्थित कर लिया गया। हे देव ! हे दयानिधे ! अब आप मेरे निवासहेतु [कोई] स्थान प्रदान करें ॥ २२ १/२ ॥ भगवान् विनायकने कहा—हे दैत्यनाशिनि ! तुम्हें धोखा देकर वह दैत्य देवान्तक अपने घर चला गया है। मैंने यह जान लिया है कि तुम्हारा पराक्रम इन्द्रादि देवताओंसे भी बढ़कर है। तुम मेरे मुखमें प्रवेश कर जाओ और वहीं विश्राम करो। मैं उस (देवान्तक)- का नियमन करूँगा, तुम्हें इस विषयमें चिन्ता करना उचित नहीं है ॥ २३-२४ १/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—भगवान् विनायकके इस प्रकारके वचन सुनकर वह शक्ति उनके मुखको देखकर उसमें प्रवेश कर गयी और सभी लोकोंके निवास-स्थान देवाधिदेव विनायकके उदरमें जाकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ वैसे ही सो गयी, जैसे माताकी गोदमें शिशु सो जाता है ॥ २५-२६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'बुद्धिविजयवर्णन' नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६५ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_15_1_Front