श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 465, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०८२] * शंकरद्वारा गौरीपुत्र गुणेशकी महिमाका कथन * ४६३ अमंगलोंका विनाश करनेवाले कल्याणकारी प्रभु शंकर पुनः पार्वतीजीसे बोले- ॥ ६-७॥ हे देवि! गुणोंसे अतीत परमात्मा ही तुम्हारे पुत्र रूपमें अवतरित हुए हैं। तुमने अपने महान् तपस्यानुष्ठानसे साक्षात् विभुका दर्शन किया है ॥ ८ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब शिवजीने ब्राह्मणोंको आमन्त्रितकर गणपतिपूजन, मातृकापूजन, पुण्याहवाचन करके आभ्युदयिक श्राद्ध किया और बालकको घृत एवं मधुका प्राशन कराया। तदनन्तर भूमिको अभिमन्त्रण करनेके पश्चात् देवी पार्वती ने उस शिशुको अपना स्तनपान कराया ॥ ९-१० ॥ भगवान् शिवने गौतम आदि महर्षियोंकी पूजा करके उन्हें अनेक प्रकारके दान दिये। तब उनकी अनुमति पा करके वे महर्षिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर शंकरजीसे बोले- ॥ ११ ॥ ये अनादिसिद्ध, अखिलेश्वर, सभी लोकोंकी सृष्टि करनेवाले और चराचर जगत्के गुरुके भी गुरु आपके पुत्रके रूपमें प्रकट हुए हैं। ये मायाके अधिष्ठाता तथा वेद-वेदान्तादि शास्त्रोंके लिये भी अगोचर हैं। ये सूर्यके मध्याकाशमें स्थित रहनेपर शुभ मुहूर्तमें अवतीर्ण हुए हैं। ये आपके यशका विस्तार करेंगे ॥ १२-१३ ॥ भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको सोमवारके दिन स्वाति नक्षत्रमें, सिंह लग्नमें तथा पाँच शुभग्रहोंके उत्तम योगमें ये पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ १४ ॥ ये श्रीसम्पन्न, पराक्रमशाली, अद्भुत कर्म करनेवाले महान् बलसे सम्पन्न और समस्त लोकों तथा भक्तोंको अत्यन्त सुख प्रदान करनेवाले होंगे। हे शम्भो ! आप ग्यारहवें दिन इनका शुभ नामकरण-संस्कार करें ॥ १५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे सभी मुनिगण अपने-अपने स्थानोंकी ओर चले गये। भगवान् शिव बालकको पार्वतीकी सुन्दर शय्यापर रखकर सभी लोगोंको विदा करके प्रसन्नताके साथ भवनसे बाहर चले आये ॥ १६-१७ ॥ उसी समय शेषनाग वहाँपर आये और उन्होंने अपने फणोंकी छाया बालकपर की। मेघोंने वर्षा करके भूमिको धूलिरहित बना दिया। मालती पुष्पकी गन्धसे समन्वित सुखद वायु प्रवाहित होने लगी। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गन्धर्वोंके समूह गायन करने लगे। चारण उन प्रभुकी स्तुति करने लगे ॥ १८-१९ ॥ तदनन्तर मुनिगणोंने विनायककी मिट्टीकी एक उत्तम मूर्ति बनायी। एक सुन्दर मण्डप बनाया, उसे कदलीवृक्षों तथा पुष्पोंसे सजाया। तदनन्तर पद्मासनमें बैठकर उन्होंने परम श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की और वे सभी 'गुणेश-गुणेश' इस नाम-मन्त्रका प्रसन्नतासे निरन्तर जप करने लगे ॥ २०-२१ ॥ उन्होंने एक दिन-रातका उपवास किया तथा रात्रिमें जागरण किया। यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन ब्राह्मणों (मुनियों)-ने व्रतका पारण किया ॥ २२ ॥ इसी प्रकारसे उन्होंने दस दिनोंतक बड़े ही आदरपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन देव गुणेशकी प्रसन्नताके लिये घर-घर महोत्सव किया ॥ २३ ॥ ग्यारहवें दिनकी बात है, उन सभी मुनिजनोंको भगवान् शिवने आमन्त्रित किया और वे सभी भगवान् शिवके पुत्रका नामकरण-संस्कार करनेके लिये वहाँ आये। भगवान् शिवने भलीभाँति उनका मान-सम्मान किया, तब उन मुनियोंने उस बालकका सभीका ईश्वर होनेके कारण 'गुणेश' यह नाम रखा। जो अत्यन्त उत्तम, शुभकारक और सब प्रकारके विघ्नोंका नाश करनेवाला है ॥ २४-२५ ॥ भगवान् शिवने भी उन मुनिजनोंसे कहा कि आप लोगोंने बहुत अच्छा नाम रखा है। तदनन्तर शंकरने यह वरदान दिया कि सभी कर्मोंके आरम्भमें यह प्रथमपूज्य होगा। अनेक प्रकारके दानोंके देनेसे पूजित हुए वे सभी मुनिगण भगवान् शंकरसे आज्ञा लेकर अपने-अपने आश्रमोंको चले आये ॥ २६-२७ ॥ घरके भीतर स्थित देवी पार्वती ने स्वयं भी देवताओंका पूजन किया। तबसे लेकर वह चतुर्थी तिथि गुणेशकी तिथिके रूपमें प्रसिद्ध हो गयी, जो अनेक प्रकारके वर प्रदान करनेवाली है। अपने कल्याणकी प्राप्तिके लिये उस चतुर्थी तिथिको महान् उत्सव मनाना चाहिये।