भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 466

४६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- भगवान् गुणेशकी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर यथाविधि उसका पूजन करना चाहिये॥ २८-२९॥ सुन्दर मण्डप बनाना चाहिये। उपवास करके रात्रिमें जागरण करना चाहिये। मोदक, अपूप तथा लड्डुओं और खीरका नैवेद्य लगाकर प्रभु गुणेशका पूजन करना चाहिये॥ ३०॥ दूसरे दिन यथाविधि इक्कीस ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करे। उन्हें प्रणाम करे, तदनन्तर स्वयं भी भोजन करे। जो इस चतुर्थी तिथिको भगवान् गुणेशकी मिट्टीकी प्रतिमा बनाकर उनका पूजन नहीं करता है, वह बार-बार विघ्नोंके द्वारा बाधित होता है। इसीके साथ ही वह विविध रोगोंसे भी पीड़ित होता है। पतित व्यक्तिकी भाँति ऐसे व्यक्तिका कभी भी दर्शन नहीं करना चाहिये॥ ३१-३३॥ यदि कदाचित् ऐसे व्यक्तिका दर्शन हो जाय तो 'गुणेश' इस नामका मनमें स्मरण करना चाहिये। गणेशचतुर्थीकी महिमाका यथार्थरूपसे वर्णन करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ। तथापि मैं उनके कर्मोंका यथामति निरूपण करता हूँ॥ ३४१/२॥ सिन्धुदैत्यके दूत गुप्तरूपसे भगवान् शंकरके स्थानपर निवास कर रहे थे। उन दूतोंने जा करके वहाँका सम्पूर्ण समाचार उस सिन्धु दैत्यको बतलाया। उस समय दैत्य सिन्धु बहुत-से योद्धाओंसे घिरा हुआ बैठा था। उसने अप्सराओंके नृत्य तथा गन्धर्वोंके गानका आयोजन किया हुआ था॥ ३५-३६१/२॥ दूत बोले—दक्षिण दिशाके दण्डकारण्यमें त्रिसन्ध्या नामक क्षेत्रमें हमलोग रह रहे थे। वहाँ रहते हुए हमने शिव नामवाले भगवान्‌को तथा अट्ठासी हजार मुनियोंके बहुत-से आश्रमोंको देखा॥ ३७-३८॥ एक दिनकी बात है, [शिवकी पत्नी] देवी पार्वतीने एक बालकको जन्म दिया। उसकी छः भुजाएँ थीं। वह लावण्यका खजाना था। तीनों लोकोंमें उसके समान कोई नहीं था और वह तेजसे उज्ज्वल था॥ ३९॥ अत्यन्त महान् उत्सवोंके साथ दस दिन बीत जानेपर ग्यारहवें दिन मुनिश्रेष्ठोंने तथा भगवान् शंकरने उस बालकका 'गुणेश' यह नाम रखा॥ ४०॥ उस समय वहाँ हो रहे वाद्योंके निनादसे हम लोग बधिर-से होकर वहाँ स्थित थे। यदि हम उस समय उसे सहसा पहुँचकर मारनेके लिये जाते तो वहाँ जो सात करोड़ गण थे, वे हमें मार डालते। उनमेंसे एक-एक गणका ऐसा बल-पराक्रम था कि वह पर्वतको उखाड़नेमें भी समर्थ था। तब फिर शीघ्र ही आपके पास आकर इस समाचारको कौन बतलाता ?॥ ४१-४२॥ ब्रह्माजी बोले—जब दूत इस प्रकार बोल ही रहे थे कि उस समय एक आकाशवाणी सुनायी पड़ी कि 'अरे दैत्य सिन्धु! तुम्हें मारनेवाला कहीं उत्पन्न हो चुका है, अतः तुम सावधान हो जाओ'॥ ४३॥ सिन्धु बोला—यहाँ कौन है, जो ऐसे दुष्ट वचन बोल रहा है, मारो, मार डालो॥ ४३१/२॥ ब्रह्माजी बोले—तब कुछ दैत्य तो उछल-कूद करते हुए गिर पड़े, और कुछ दौड़ते हुए पलायित हो गये। उसी समय वह दैत्य भी महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो गया और भूमिपर गिर पड़ा। वह अत्यन्त चिन्तित, म्लान मुखवाला, उत्साहरहित और हतप्रभ हो गया॥ ४४-४५॥ जब मुहूर्तभरका समय बीत जानेपर उसे चेतना आयी तो वह लड़खड़ाती आवाजमें बोला—'तीनों लोकोंका कण्टक तो मैं हूँ, फिर मेरे लिये यह नया कंटक कौन आ गया ? ॥ ४६॥ बकरा सिंहको कैसे मार सकता है अथवा मच्छर क्या कभी हाथीको मार सकता है? मैंने तैंतीस करोड़ देवताओंको क्षणभरमें जीत लिया था॥ ४७॥ इस प्रकारके पराक्रमवाले मेरी मृत्यु किसके हाथोंमें हो सकती है? आकाशवाणी जो हुई, वह झूठी है, अथवा यदि वह सत्य भी हो तो मैं अपने उस शत्रुको खानेके लिये दौड़ पडूँगा'॥ ४८॥ ऐसा कहकर वह आधे क्षणमें [उठकर] भद्रासनपर बैठ गया। उसकी उस प्रकारकी बात सुनकर सभी वीर उसके पास चले आये और कहने लगे—आप तो कालके भी काल हैं, फिर आपकी मृत्यु कैसे हो सकती है? अथवा आपको कोई मारनेवाला हो तो उसे हम मार