भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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पृष्ठ 467

क्री०ख०-अ०८३] * पार्वतीको पुत्रकी प्राप्ति होनेपर हिमवान्‌का शिशुके दर्शनके लिये आना * ४६५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 डालेंगे, चाहे वह स्वर्गमें हो, भूमिपर हो, पातालमें हो | अनेक प्रकारकी माया करके शत्रु‌का विनाशकर मुझे अथवा आकाशमें रह रहा हो। आप हमें आज्ञा प्रदान | समाचार दें॥ ५२१/२॥ करें, हम लोग जायँगे। तब दैत्यराज सिन्धुने उन दैत्योंसे | ब्रह्माजी बोले— इस प्रकार दैत्यराजकी आज्ञा प्राप्तकर कहा— ॥ ४९-५१॥ | वे असंख्य दैत्य वहाँसे निकल पड़े और त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें आप-जैसे मित्रों तथा सेवकोंकी वचनसुधाका | पहुँचकर गुप्तरूपसे वहाँ निवास करने लगे। उनके मनमें पानकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। आप लोग शीघ्र | यही विचार था कि गौरीका पुत्र गुणेश जहाँ-कहीं भी वहाँ जायँ, जहाँ मेरा वह शत्रु रहता है। आप लोग | होगा, उसे हम मायासे मार डालेंगे॥ ५३-५४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दैत्यवीरोंके त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें गमनका वर्णन' नामक बयासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८२॥ तिरासीवाँ अध्याय पार्वतीको पुत्रकी प्राप्ति होनेपर हिमवान्‌का शिशुके दर्शनके लिये आना और उसे अनेक प्रकारसे आभूषणोंसे अलंकृतकर उसका 'हेरम्ब' यह नाम रखना, फिर हिमालयका प्रस्थान, गृध्रासुरद्वारा बालक हेरम्बका हरणकर आकाशमें ले चलना, पार्वतीका शोक, बालक हेरम्बद्वारा गृध्रासुरका वध ब्रह्माजी बोले— हे ब्रह्मन् व्यासजी! वह बालक | लगा रहता है॥ ५१/२॥ गुणेश शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिन-प्रतिदिन बढ़ने | ब्रह्माजी बोले— पिताके इस प्रकारके वचनोंको लगा। पार्वतीको सुन्दर पुत्रकी प्राप्ति हुई है—यह | सुननेके पश्चात् पार्वतीजीने उन्हें बैठनेके लिये सुन्दर आसन समाचार जानकर पार्वतीके पिता हिमालय भी बहुत सारे | प्रदान किया। आसनपर बैठनेके अनन्तर गिरिवर हिमालय अनमोल रत्नोंसे समन्वित अलंकारोंको लेकर वहाँ गये। | पुनः अपनी पुत्रीसे कहने लगे—'मैंने देवर्षि नारदजीके मुखसे पिता हिमालयको अपने आँगनमें आया देखकर [उनकी] | सुना है कि तुम्हें परम अद्भुत पुत्रकी प्राप्ति हुई है, इसी कारण पुत्री पार्वतीजी दौड़कर उनके पास गयीं॥ १-२॥ | मैं सभी प्रकारके विघ्नोंका हरण करनेवाले उस मंगलमय बहुत समयके बाद आये हुए पिताका गौरीने | बालकको देखनेके लिये आया हूँ'॥ ६-७१/२॥ आनन्दपूर्वक आलिंगन किया। आनन्दके कारण उन | ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर पार्वतीजीने बालकको दोनों पिता-पुत्रीकी आँखोंसे आँसू निकल पड़े, तदनन्तर | लाकर पिताकी गोदमें बैठाया। तब पिता हिमवान्‌ने उसे गौरीने अपने पिता हिमालयसे कहा—॥ ३॥ | नाना प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित किया और फिर वे गौरी बोली— हे निर्दय पिताजी! आप इतने | उसकी महिमाको बतलाने लगे॥ ८१/२॥ निष्ठुर क्यों हो गये हैं, आप न तो कभी मेरा समाचार | वे हिमालय बोले— यह महान्‌ मायासम्पन्न ही लेते हैं और न अपना समाचार ही भेजते हैं ?॥ ४॥ | बालक इस पृथ्वीको उसी प्रकार निष्कंटक बना देगा, हिमवान् बोले— हे गौरी ! तुम सत्य ही कह रही | जैसे कि चन्द्रमा अपनी किरणोंसे इस पृथिवीको शीतल हो। तुम्हारे बिना मेरे प्राण तो कण्ठमें आकर रुक गये | बना देता है। यह सभी देवताओंको अपने-अपने हैं, अतः हे हरप्रिये! तुम्हें देखनेकी अभिलाषावाला मैं | स्थानपर प्रतिष्ठित करेगा॥ ९-१०॥ यहाँ आया हूँ। जैसे गौका मन हर समय अपने बछड़ेपर | यह तुम्हारे चरणोंकी सेवा करेगा और इसके लगा रहता है, वैसे ही मेरा मन भी निरन्तर तुममें ही | चरणोंकी सेवा मुनीश्वर करेंगे। सभी स्थावर तथा जंगम