श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 468, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] प्राणी इसीके रूप हैं। यह ब्रह्मा आदि देवोंके लिये सदा ध्येय है। यह हजार नेत्रोंवाला, हजार चरणोंवाला तथा सभी ब्रह्माण्डोंके कारणोंका भी कारण है॥ ११-१२॥ यह हजार मुखवाला, अनन्त मूर्तियोंवाला तथा समष्टि और व्यष्टिरूप है। मैंने तीनों लोकोंमें इस प्रकारका तेजोमय बालक कहीं भी नहीं देखा है॥ १३॥ मैं इसके चरणकमलका दर्शनकर उसमें वैसे ही तल्लीन हो गया, जैसे कि जलमें छोड़ा गया जल क्षणभरमें ही तन्मय अर्थात् उसी रूपवाला हो जाता है। हे शुभे! इसके पालन-पोषणका प्रयत्न करो, यह पुरातन निधि है॥ १४ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर पर्वतराज हिमालयने उसके मस्तकपर मुकुट पहनाया, दोनों भुजाओंपर बाजूबन्द धारण कराये, हृदयदेशमें कमलकी आकृतिका आभूषण पहनाया, दोनों कानोंमें रत्नजटित कुण्डल पहनाये, कमरमें करधनी धारण करवायी और पैरोंमें छोटी घण्टियोंसे युक्त बहुमूल्य नूपुरोंको धारण करवाया। इस प्रकार विविध आभूषणोंसे सुसज्जितकर हिमवान्ने उसका 'हेरम्ब' यह नाम रखा। यह नाम महान् विघ्नोंका हरण करनेवाला तथा भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाला है॥ १५-१७॥ तदनन्तर भोजन करनेके उपरान्त पुत्री पार्वतीकी अनुमति प्राप्तकर पर्वतराज हिमालयने अपने स्थानको प्रस्थान कर दिया। एक दिनकी बात है, बालक हेरम्ब अपने भवनमें खेल रहे थे, उसी समय गृध्रासुर नामक एक असुर गीधका रूप धारणकर वहाँ आया। वह महान् बलवान् तथा अत्यन्त पराक्रमसम्पन्न था। उसके पंखोंकी हवासे पर्वतोंके समूह चूर-चूर हो जाते थे और उसके पंजोंके आघातसे विशाल पर्वतशिखर तथा वृक्ष भी गिरकर टूट जाते थे॥ १८-१९ १/२॥ उस समय गृध्रासुरने [हेरम्बको उठा लिया और] अपने पंखोंकी छायासे बालक हेरम्बको आच्छादित करके आकाशमें उड़ने लगा॥ २०॥ उसने अपने पंखोंकी फड़फड़ाहटसे उठी हुई धूलके द्वारा सभीके नेत्रोंको आच्छादित कर दिया था। [उसके पंखोंसे होनेवाली] महान् ध्वनिसे लोगोंके कान
[दायाँ स्तम्भ] बधिर हो गये। तदनन्तर उस महान् गृध्रासुरने अपनी चोंचके द्वारा बालक हेरम्बको वैसे ही पकड़ लिया, जैसे कि गरुड़ सर्पको पकड़ लेता है और वह आकाशमार्गमें दूरतक चला गया॥ २१-२२॥ बालकके पराक्रमको न जानता हुआ वह दुष्ट असुर आकाशमें भ्रमण करने लगा। तभी गिरिपुत्री पार्वतीने देखा कि मेरा बालक कहाँ चला गया!॥ २३॥ जब उन्होंने आँगनमें बालकको नहीं देखा तो वे शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं और कहने लगीं— किस दुष्ट दुरात्माने मेरे बालकका हरण कर लिया है? तदनन्तर उन्होंने ऊपर आकाशमें गृध्रके मुखमें अपने बालकको देखा। वे मूर्च्छित होकर भूमिमें गिर पड़ीं और 'दौड़ो-दौड़ो'—इस प्रकारसे कहने लगीं॥ २४-२५॥ हे सुरेश्वर! बिना पुत्रके मेरे प्राण निकल जायँगे। क्यों मेरे ऊपर यह आकाश गिर पड़ा है? जगदीश्वर शंकर क्यों मुझपर ही इस प्रकारसे निष्ठुर हो गये हैं? मैंने तो बारह वर्षोंतक निराहार रहकर व्रत किया था। तब वे करुणासागर स्वयंप्रकाश प्रभु मेरे घरमें अवतरित हुए थे, आज वे ही निधिरूप मुझ अभागिनके पापसंचयके फलस्वरूप चले गये हैं, मेरे बालकके चले जानेपर मेरा जो आत्यन्तिक सुख है, वह सर्वथा चला गया है॥ २६-२८ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे उन पार्वतीको शोकमें पड़ा देखकर उनकी सखियाँ भी दुखी हो गयीं। तब उन्होंने अपने बुद्धिबलसे युक्तियोंके द्वारा उनका समाधान किया कि—'[हे देवि!] वह बालक आदि और अन्तसे रहित है, अतः उसके लिये आपको शोक नहीं करना चाहिये॥ २९-३०॥ आपके तपस्यारूपी महान् अनुष्ठानके फलस्वरूप वे स्वयंप्रकाशस्वरूप आपके यहाँ अवतरित हुए हैं। बतलाओ तो सही, क्या कहीं कोई मिट्टीकी मूर्ति सजीव हुई है? हे शुभे! आप स्वस्थ हो जायँ, क्षणभरमें ही आप अपने पुत्रको देखेंगी, वह बालक कालका भी काल है, वह आपके स्नेहवश शीघ्र ही आयेगा'॥ ३१-३२॥ जिस समय सखियाँ इस प्रकारसे कह रही थीं, उसी समय उस बलवान् बालकने अपनी मुट्ठीमें उस