भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 656 में से

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पृष्ठ 476

४७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 समय हाहाकारकी ध्वनि करती हुई पार्वती दौड़ते हुए अपने पुत्रके पास आयीं ॥ २५-२६॥ वे मुनिगण उनसे कहने लगे—आपके पुत्रने दैत्यका वध कर दिया है। तब पार्वतीने अपने बालकको हिमवान् पर्वतके समान निश्चल बैठा हुआ देखा। तदनन्तर पार्वतीने बालकको उठाकर अपनी गोदमें रखकर उसे प्रसन्नतापूर्वक स्तनपान कराया और महर्षि मरीचिके वचनोंका स्मरण किया तथा महेश्वरकी प्रशंसा की ॥ २७-२८ ॥ भगवान् जिसकी सदा रक्षा करते हैं, उसे जो मारनेकी इच्छा करता है, निश्चय ही वह उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जैसे दीपकके पास जानेवाला पतंगा नष्ट हो जाता है ॥ २९ ॥ तदनन्तर सभी मुनिगण तथा स्त्रियाँ अपने-अपने स्थानोंको चले गये। इसके बाद कुछ गण वहाँ आये और पार्वतीके पुत्रको सुरक्षित देखकर कहने लगे कि माता आप अत्यन्त धन्य हैं, जो कि आपका यह पुत्र असुरसे बच गया। निश्चित ही दुष्ट लोग ही विनष्ट होते हैं। साधु पुरुष कभी भी कोई कष्ट नहीं प्राप्त करते ॥ ३०-३१॥ तदनन्तर पार्वतीने उन सभी गणों तथा स्त्रियोंको भी शर्करा प्रदानकर जानेकी आज्ञा प्रदान की। प्रसन्न होकर पार्वती अपने पुत्रको लेकर अपने भवनमें चली गयीं ॥ ३२ ॥ जो भक्तिमान् पुरुष इस पवित्र आख्यानका श्रवण करता है, उसे कभी कहीं कोई भी बाधा नहीं प्राप्त होती और वह सर्वत्र निर्भय होकर रहता है ॥ ३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकका भूमि-उपवेशन-वर्णन' नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८६ ॥ सतासीवाँ अध्याय बालक विनायकद्वारा शतमाहिषा नामक राक्षसी और कमठासुरका वध, इस आख्यानके श्रवण और श्रावणका माहात्म्य ब्रह्माजी बोले—व्योमासुरकी बहन उसकी मृत्युके दुःखद समाचारसे अत्यन्त दुखी हो गयी। वह अमावस्याके दिन सायंकालके समय उत्पन्न हुई थी। उत्पन्न होते ही वह भूखसे अत्यन्त व्याकुल हो गयी। उसने उसी समय सौ महान् बलशाली भैंसोंको खा डाला था। उसके बाल अत्यन्त विकराल थे और ओष्ठ अत्यन्त लम्बे थे। उसकी नाक ताड़ वृक्षके समान लम्बी थी और उसका मुख एक विशाल गुफाके समान था ॥ १-२ ॥ उसके दाँत हलके समान मोटे एवं लम्बे, नेत्र कूपके समान अत्यन्त गहरे थे तथा बड़े-बड़े कानोंके द्वारा वह आच्छादित थी। उसके स्तन अतिदीर्घ थे, स्वरूप महाभयावह था और उस दुष्टाके केश भूतलका स्पर्श करते थे ॥ ३ ॥ उसके बाहु विशाल थे। नाभि अत्यन्त गहरी थी। उसकी त्वचा मगरमच्छके समान कर्कश थी। उत्पन्न होते ही सौ भैंसे खा जानेके कारण उस समय लोगोंने उस दुष्ट मनोभाववाली राक्षसीका 'शतमाहिषा' यह सार्थक नाम रखा। अपने बन्धुओंका हित करनेवाली वह शतमाहिषा अपने भाईका वध करनेवालेको मारनेकी दृष्टिसे वहाँ आयी ॥ ४-५ ॥ उस समय वह अत्यन्त सुरूपवान्, मनोहर तथा सुलक्षण अंगोंवाली बनकर आयी। उसने अनेक आभूषण धारण कर रखे थे। उसका वर्ण गौर था, अवस्था उसकी सोलह वर्षकी-सी थी, सोलह शृंगार करके वह अपने कटाक्षद्वारा सबको मोहित कर रही थी। इस प्रकारकी सुन्दर युवती बनकर वह शतमाहिषा मनमें दूषित भाव रखकर पार्वतीके शुभ भवनमें गयी ॥ ६-७ ॥ वहाँ पहुँचते ही सबसे पहले उसने देवी पार्वतीको विनयपूर्वक प्रणाम किया और बड़े-ही आदरभावसे वह उनसे कहने लगी कि आज मैं धन्य हो गयी, कृतार्थ हो गयी। आज मैंने अपना अभीष्ट फल प्राप्त कर लिया है, जो कि मैं जगन्माता, सर्वदेवमयी, कल्याणी, सबके