भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 656 में से

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पृष्ठ 475

क्री०ख०-अ०८६ ] * महर्षियोंद्वारा पार्वतीपुत्रका भूमि-उपवेशन नामक संस्कार सम्पन्न करना * ४७३ प्रकारकी उपहार-सामग्री लेकर वहाँ आये। साथ ही शिवके गण, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी वहाँ आयीं ॥ ४ ॥ तदनन्तर गौरी उन विप्रोंसे बोलीं- हे श्रेष्ठ द्विजो ! आप सभी मुनियोंसे विचार-विमर्श करके इस बालकका उपवेशन-संस्कार सम्पन्न करें। तब वे सभी मुनि बोले- आज बृहस्पतिवार है, त्रयोदशी तिथि है और रेवती नक्षत्र है, इसलिये आज ही उपवेशन-संस्कार-सम्बन्धी महोत्सव सम्पन्न करनेयोग्य है ॥ ५-६ ॥ तदनन्तर महर्षि गृत्समदने तुरन्त भूमिपर विविध प्रकारके रत्नसमूहोंको रखकर शीघ्र ही रत्नोंके द्वारा चौकका निर्माण किया। गणेश-पूजन करनेके अनन्तर उन्होंने पुण्याहवाचन किया। तदनन्तर दिव्य वस्त्रोंसे सुसज्जित किये हुए उस चौकपर पार्वतीके पुत्रको बैठाया और फिर सौभाग्यशालिनी स्त्रियोंके द्वारा बड़े ही आदरपूर्वक उसका नीराजन करवाया। वह बालक रत्नोंके आभासमूहमें स्थित था और नाना प्रकारके अलंकारोंसे प्रकाशित हो रहा था ॥ ७-९॥ उस समय दिव्य वाद्य बजाये जा रहे थे, तभी सभी जनोंने शिव-पार्वतीको तथा उनके पुत्रको श्रद्धाभक्तिपूर्वक विविध प्रकारकी भेंट-सामग्री प्रदान की ॥ १० ॥ तदनन्तर देवी पार्वती ने रत्न, वस्त्र तथा सुवर्ण आदि प्रदानकर ब्राह्मणोंकी पूजा की और उन सभीके द्वारा आशीर्वादके रूपमें प्राप्त अक्षतोंको उस बालकके ऊपर छोड़ा। माता भवानीने कन्याओंसहित मुनिपत्नियोंका पूजन किया। वे मुनिपत्नियां बोलीं- हे गिरिजा ! तुमसे अधिक धन्य अन्य कहीं कोई स्त्री नहीं है। इस प्रकारका सभी शुभ लक्षणोंसे समन्वित पुत्र भी कहीं किसीका नहीं है॥ ११-१२१/२॥ ब्रह्माजी बोले-वे मुनिपत्नियां इस प्रकार कह ही रही थीं कि उसी समय व्योमासुर नामक एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा। वह महान् दुष्ट व्योमासुर नाना प्रकारकी माया करनेमें पारंगत था, उसके कान आकाशतक व्याप्त थे। तीनों लोकोंमें उसके समान बलशाली कोई भी नहीं था ॥ १३-१४॥ वहाँ दरवाजेके समीप एक आमका वृक्ष था, जिसमें अनेक डालियाँ लगी थीं। वह आमका वृक्ष सैकड़ों हाथियोंके लिये भी अभेद्य था और प्रलयकालीन वायुके द्वारा भी न तोड़े जानेयोग्य था ॥ १५ ॥ वह व्योमासुर अपनी मायाके बलसे उस आमके वृक्षमें उसी प्रकार प्रविष्ट हो गया, जैसे कि किसी सीधे- सादे व्यक्तिको प्रारब्धवश भूत लग जाता है ॥ १६ ॥ प्रलयकालीन आँधीके समान उसने उस आमके वृक्षको हिला डाला। वृक्ष टूटकर कहीं गिर न जाय, इस भयसे वहाँ आये हुए मुनिगण भयभीत हो गये और कहने लगे- यह महान् वृक्ष हवाके चले बिना ही कैसे काँप रहा है? तभी उन्होंने उस वृक्षसे निकलते हुए 'कट-कट' शब्दको सुना ॥ १७-१८ ॥ सभी स्त्रियाँ, शिवगण तथा वे मुनिगण वहाँसे पलायित हो गये। पार्वती भी घबड़ाहटके मारे अपने बालकको भुलाकर स्वयं भी भाग चलीं ॥ १९ ॥ इसी बीच वह आमका वृक्ष बालकके ऊपर गिरा। तब बालकने अपने दोनों हाथोंसे उसपर आघात किया। जिससे सैकड़ों टुकड़े होकर वह वृक्ष भूमिपर गिर पड़ा। वह वृक्ष उसी प्रकार चूर्ण-चूर्ण हुआ, जैसे कि पत्थरके ऊपर रखी हुई सुपारी घनके द्वारा चोट करनेपर टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। उस समय उस वृक्षकी शाखाएँ, जो कि पल्लवोंसे समन्वित थीं, आकाशमें उड़ने लगीं ॥ २०-२१ ॥ वृक्षकी शाखाओंके गिरनेसे ऋषियोंके कुछ आश्रम भग्न हो गये। पल्लवोंसे युक्त कुछ शाखाएँ वहाँसे भाग रहे लोगोंपर भी गिरीं ॥ २२ ॥ तदनन्तर वह दुष्ट व्योमासुर अपने मुखको खोलकर रक्त वमन करता हुआ प्राणहीन होकर नीचे गिर पड़ा। गिरनेसे उसके सैकड़ों टुकड़े हो गये। तदनन्तर वे सभी लोग तथा स्त्रियाँ वहाँ आयीं उन्होंने बालकको पूर्वकी भाँति निःशंक होकर बैठा हुआ देखा ॥ २३-२४ ॥ वह सुमेरुपर्वतके समान निश्चल तथा स्वस्थ था। यह देखकर सभीको बड़ा ही विस्मय हुआ कि इस पाँच मासकी अवस्थावाले बालकने खेल-खेलमें वृक्षसहित उस महान् बल-पराक्रमशाली दैत्यको अपने हाथके आघातसे सैकड़ों टुकड़ोंमें खण्डित कर दिया ! उसी