श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 474, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- हाथोंकी रक्षा करें और हाथमें कमल लिये हुए अरिनाशन अंगुलियों और नखोंकी रक्षा करें ॥ २७ ॥ विश्वव्यापी मयूरेश सभी अंगोंकी सदा रक्षा करें और जिन स्थानोंका उल्लेख नहीं किया गया है, उनकी भी रक्षा सदा धूम्रकेतु करें। आमोद आगेसे रक्षा करें, प्रमोद पीछेसे रक्षा करें, बुद्धीश पूर्वमें रक्षा करें और सिद्धिदायक आग्नेय दिशामें रक्षा करें ॥ २८-२९ ॥ उमापुत्र दक्षिण दिशामें रक्षा करें, नैर्ऋत्यकोणमें गणेश्वर रक्षा करें, विघ्नहर्ता पश्चिम दिशामें एवं गजकर्णक वायव्य दिशामें रक्षा करें ॥ ३० ॥ निधिपति उत्तर दिशामें रक्षा करें, ईशनन्दन ईशानदिशामें रक्षा करें, इलानन्दन दिवामें रक्षा करें तथा रात्रि और सन्ध्याकालोंमें विघ्नहृत् रक्षा करें। राक्षस, असुर, वेताल ग्रह, भूत, पिशाचसे और सत्त्व-रज-तम गुणोंसे स्मृतिकी पाशांकुशधर रक्षा करें ॥ ३१-३२ ॥ ज्ञान, धर्म, लक्ष्मी, लज्जा, कीर्ति, दया, कुल, शरीर, धन-धान्य, गृह, स्त्री-पुत्र तथा मित्रोंकी एवं पौत्रोंकी सर्वदा रक्षा सभी प्रकारके अस्त्र धारण करनेवाले मयूरेश करें। कपिल भेड़-बकरोंकी रक्षा करें और विकट गाय [हाथी]-घोड़ोंकी रक्षा करें ॥ ३३-३४ ॥ जो विद्वान् भूर्जपत्रमें इसे लिख करके कण्ठमें धारण करता है, उसको यक्ष, राक्षस तथा पिशाचोंसे भय नहीं होता है। जो तीनों सन्ध्या-कालोंमें इसका जप करता है, उसका शरीर हीरेकी भाँति कठोर हो जाता है। जो व्यक्ति यात्राकालमें इसका पाठ करता है, उसे निर्विघ्नतापूर्वक फल प्राप्त होता है ॥ ३५-३६ ॥ जो युद्धकालमें इसका पाठ करता है, वह निश्चितरूपसे विजय प्राप्त करता है। मारण, उच्चाटन, आकर्षण, स्तम्भन तथा मोहनादि कर्मके लिये यदि साधक इक्कीस दिनपर्यन्त प्रतिदिन सात बार इसका जप करे तो वह उन-उन वांछित फलोंको प्राप्त कर लेता है, इसमें भी संशय नहीं है। जो इक्कीस दिनतक इस मन्त्रका इक्कीस बार पाठ करता है, वह राजाके द्वारा वधके लिये आदेशप्राप्त और कारागारमें बन्द किये गये व्यक्तिको भी शीघ्र ही मुक्त करा लेता है ॥ ३७-३९ ॥ राजाके दर्शनके समय जो व्यक्ति इस मन्त्रका तीन बार पाठ करता है, वह राजाको वशमें करके मन्त्रियोंको तथा राजसभाको जीत लेता है ॥ ४० ॥ यह गणेशकवच सब प्रकारसे रक्षा करनेवाला है और सभी प्रकारकी मनोकामनाको पूर्ण करनेवाला है। इस गणेशकवचको महर्षि कश्यपने मुद्गल ऋषिसे कहा और उन्होंने महर्षि माण्डव्यसे कहा और माण्डव्यने इस सर्वसिद्धिप्रद कवचको कृपा करके मुझसे कहा है। इस शुभ कवचको श्रद्धावान्को ही देना चाहिये, भक्तिहीन व्यक्तिको कभी भी नहीं देना चाहिये। इस कवचके द्वारा इस (बालक)-की रक्षा की गयी है, इस कारणसे राक्षस, असुर, वेताल, दैत्य, दानव आदिसे होनेवाली किसी प्रकारकी भी बाधा इसे नहीं हो सकती है ॥ ४१-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गणेशकवचवर्णन' नामक पचासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८५ ॥ छियासीवाँ अध्याय गौतम आदि महर्षियोंद्वारा पार्वतीपुत्रका भूमि-उपवेशन नामक संस्कार सम्पन्न किया जाना, बालकके वधकी इच्छासे व्योमासुरका वहाँ आना, बालकद्वारा व्योमासुरका वध ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर गौरीने उन महर्षि मरीचिकी गोदसे पुत्रको उठा लिया और उन्हें नमस्कार करके तथा उनसे अनुमति लेकर वे अत्यन्त हर्षित होकर अपने भवनमें चली गयीं ॥ १ ॥ वे महर्षि भी उनसे अनुमति प्राप्तकर भगवान् शिवको प्रणामकर अपने आश्रमको गये। तदनन्तर गौरीने एक शुभ दिनमें उत्तम मुहूर्तमें गौतम आदि महर्षियोंको आमन्त्रितकर बुलाया और बालकका उपवेशन संस्कार करवाया। पार्वतीजीने उन ब्राह्मणोंको बैठाकर पहले स्वयं उन्हें प्रणाम किया, फिर बालकसे उन द्विजजनोंको प्रणाम करवाया ॥ २-३ ॥ उस समय सभी देवगण अपने हाथोंमें विविध