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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 656 में से

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पृष्ठ 473

क्री०ख०-अ०८५ ] * महर्षि मरीचिका पार्वतीपुत्रका दर्शन करनेके लिये आना * ४७१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

मुनि मरीचि बोले—हे देवि! मेरा मन निरन्तर आत्मचिन्तनमें लगा रहता है, मैं कहीं आता-जाता नहीं हूँ। किंतु अकस्मात् ही आपका पुत्र मेरे ध्यानमें आ गया। इसीलिये मैं आपके पुत्रके, आपके तथा भगवान् शिवके दर्शनकी अभिलाषासे यहाँ आया हूँ॥ ६१/२॥ ब्रह्माजी बोले—महर्षि मरीचिके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर गौरी पार्वतीका मन अत्यन्त प्रसन्न हो गया और उन्होंने अपने पुत्र विनायकको उनकी गोदमें बैठा दिया। फिर वे उनसे कहने लगीं—आज आपका दर्शनकर मेरा महान् भाग्य सफल हो गया है। आज मुझे परम पुण्यकी प्राप्ति हुई है और भविष्यमें भी शुभ ही होगा॥ ७-८१/२॥ मुनि बोले—हे गौरी! आपका यह पुत्र मुझे परब्रह्मस्वरूप प्रतीत होता है। मूलाधार आदि षट्चक्रोंके भेदनमें जो योगनिष्ठ महर्षि निरन्तर संलग्न रहते हैं और मात्र वायुका सेवन करते हुए जिन परमात्माकी उपासना करते रहते हैं, वे ही आपके पुत्रके रूपमें अवतरित हुए हैं॥ ९-१०॥ सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों गुणोंके भेदसे जो ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवके नामसे तीन विग्रह धारणकर सृष्टि, पालन तथा संहार—इन तीन क्रियाओंको सम्पन्न करते हैं और जिनकी सत्तासे ही शेषनाग भी इस पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण किये रहते हैं, वे ही परमात्मा आपके पुत्ररूपमें अवतरित हुए हैं॥ ११॥ ये ही अणुरूप तथा स्थूलरूप हैं और सत्ताईस तत्त्वोंके भी कर्ता हैं। यह चराचर सम्पूर्ण जगत् इन्हींका रूप है। ये सभी प्रकारके कर्म करनेवाले हैं॥ १२॥ ये सत्ययुगमें दस भुजाओंवाले तथा सिंहपर आरूढ़ रहते हैं, तब इनका नाम 'विनायक' होता है। त्रेतायुगमें इनकी छः भुजाएँ और इनका वाहन मोर होता है। इनकी आभा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल होती है और तब इनका नाम 'मयूरेश' होता है। उस समय ये अनेकों दैत्योंका वध करते हैं। द्वापरयुगमें ये देव चार भुजाओंवाले और रक्तवर्णवाले होते हैं। इस युगमें इनका 'गजानन' यह नाम प्रसिद्ध है। कलियुगमें ये धूम्र वर्णवाले रहते हैं, इनकी दो भुजाएँ रहती हैं, ये सभी दैत्योंका वध करते

हैं और 'धूम्रकेतु' इस नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त होते हैं। हे गौरी! आपको दैत्योंसे सदा ही इनकी रक्षा करनी चाहिये॥ १३-१५१/२॥ पार्वतीजी बोलीं—हे मुनिसत्तम! यह गणेश अत्यन्त चंचल है; यह बाल्यावस्थामें ही असुरोंका संहार कर रहा है। आगे चलकर यह न जाने क्या करेगा? दैत्य अनेक प्रकारके रूपोंवाले, दुष्ट, खल स्वभाववाले और सज्जनों तथा देवताओंसे द्रोह करनेवाले हैं। अतः रक्षाके लिये इसके कण्ठमें आप कुछ बाँध दीजिये॥ १६-१७१/२॥ मुनि बोले—हे पार्वति! सत्ययुगमें आठ भुजावाले सिंहारूढ विनायकका, त्रेतायुगमें छः भुजावाले सिद्धिप्रदायक तथा मयूरवाहन विनायकका, द्वापरमें रक्त वर्णवाले सुगन्धित द्रव्यके लेपसे विभूषित चार भुजाओंवाले प्रभु गजाननका और कलियुगमें उज्ज्वल वर्णवाले, सुन्दर दो भुजाओंसे युक्त तथा सर्वदा सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाले गणेशका ध्यान करना चाहिये॥ १८-१९॥ परात्पर परमात्मा विनायक शिखाकी रक्षा करें, अति सुन्दर शरीरवाले सुमहोट्कट मस्तककी रक्षा करें॥ २०॥ कश्यपपुत्र ललाटकी रक्षा करें, महोदर भ्रूयुगोंकी रक्षा करें, भालचन्द्र दोनों नेत्रोंकी रक्षा करें और गजानन कोमल ओष्ठोंकी रक्षा करें॥ २१॥ गणक्रीड जिह्वाकी रक्षा करें, गिरिजासुत चिबुककी रक्षा करें, विनायक वाणीकी रक्षा करें तथा दुर्मुख दाँतोंकी रक्षा करें। पाशपाणि कानोंकी रक्षा करें, नासिकाकी रक्षा चिन्तितार्थ करें, गणेश मुखकी रक्षा करें एवं भगवान् गणंजय कण्ठकी रक्षा करें॥ २२-२३॥ गजस्कन्ध स्कन्धोंकी रक्षा करें, विघ्नविनाशन स्तनोंकी रक्षा करें, गणनाथ हृदयकी रक्षा करें और महान् हेरम्ब जठरकी रक्षा करें॥ २४॥ धराधर पार्श्वोंकी रक्षा करें, मंगलमय विघ्नहर पृष्ठकी रक्षा करें और महाबल वक्रतुण्ड लिंग तथा गुह्यदेशकी सदा रक्षा करें। गणक्रीड जानु तथा जंघोंकी रक्षा करें, मंगलमूर्तिमान् ऊरूकी रक्षा करें और महाबुद्धिमान् एकदन्त चरणों तथा गुल्फोंकी सदा रक्षा करें॥ २५-२६॥ क्षिप्रप्रसादन बाहुओंकी रक्षा करें, आशाप्रपूरक