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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 656 में से

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पृष्ठ 472

४७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मुनिपत्नियाँ अत्यन्त चिन्तित हो उठीं और चिल्लाने लगीं | वृक्षोंको चूर-चूर करता हुआ गिर पड़ा। यह देखकर कि निश्चित ही इस विनायकने इस बच्चेको मार डाला है। | सभी स्त्रियाँ अत्यन्त भयभीत हो गयीं और वे अपने- कुछ स्त्रियाँ दौड़ती हुई उनके पास गयीं, किंतु वे उन | अपने बालकोंको लेकर शीघ्र ही उसी प्रकार दौड़ पड़ीं, दोनोंको छुड़ानेमें समर्थ नहीं हो सकीं। तदनन्तर वे सभी | जैसे कि भेड़ियोंके समूहको देखकर गायें और बकरियाँ पुरुष तथा स्त्रियाँ उन मंगलमयी पार्वतीसे कहने लगीं— | भयभीत होकर दौड़ पड़ती हैं। तदनन्तर पार्वती ने भी 'तुम इसे छुड़ा डालो। यह विनायक निश्चित ही इस | अपने पुत्रको पकड़कर उसके ऊपर मिट्टी घुमाकर उसे मुनिपुत्र को मार डालेगा।' तदनन्तर पार्वती ने विनायकसे | स्तनपान कराया और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा शान्तिकर्म कहा—'इस बालकको छोड़ दो-छोड़ दो ॥ ५४-५६ ॥ | करवाकर तथा उन्हें अनेक प्रकारके दान देकर बहुत- अगर कहीं यह मर गया तो तपोबलसे सम्पन्न | से आशीर्वाद ग्रहण किये ॥ ६०-६२ ॥ मुनिगण हमें शाप दे डालेंगे। इस ब्रह्माण्डगोलकमें | मैं तो इन असुरोंकी मायाको नहीं जानती हूँ, कितने प्राणदानसे अधिक पुण्य और कोई नहीं है। उन मुनियोंके | ही असुर मेरे बालकको मारनेके लिये आते रहते हैं, किंतु शापसे तुम्हारी महान् शक्ति लुप्त हो जायगी' ॥ ५७१/२ ॥ | वे महान् दुष्ट असुर इसके द्वारा मृत्युको प्राप्त हो जाते ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे पार्वती जब | हैं। यदि ईश्वर अनुकूल हो तो व्यक्तिको मारनेमें कौन विनायकको मना कर रही थीं, उसी समय क्षणभरमें | समर्थ हो सकता है? ॥ ६३१/२ ॥ नेत्रोंके मार्गसे उस असुरके प्राण बुद्बुदकी भाँति निकल | ब्रह्माजी बोले—देवी पार्वतीके ऐसे वचनोंको पड़े। तब सभीने उस मृत दैत्यको देखा, वह दस | सुनकर वे सभी मुनिपत्नियाँ वापस चली गयीं। तब उन योजन विस्तारवाला था ॥ ५८-५९ ॥ | शिवगणोंने उस असुरको दूर फेंक दिया और स्नान उसका मुख अत्यन्त विकराल था। वह बड़े-बड़े | करनेके अनन्तर वे अपने स्थानको चले गये ॥ ६४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालासुरके वधका वर्णन' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८४ ॥

पचासीवाँ अध्याय महर्षि मरीचिका पार्वतीपुत्रका दर्शन करनेके लिये आना, मरीचिद्वारा देवी पार्वतीसे विनायकके परब्रह्मस्वरूपका प्रतिपादन, बालककी रक्षाके लिये महर्षिका गणेशकवच बतलाना, गणेशकवचका माहात्म्य तथा उसकी उपदेश-परम्परा ब्रह्माजी बोले—विनायकके पाँचवें मासके आरम्भ | करके पार्वती ने अपनी सखियोंके सहित उनके चरणोंमें होनेपर मुनियोंके मुखसे देवी पार्वतीके महान् बलशाली | विनम्र प्रणाम किया ॥ २-३ ॥ पुत्रका समाचार सुनकर महर्षि मरीचि उसको देखनेके | उन्हें आसनपर विराजमान करके भक्ति-श्रद्धापूर्वक लिये आये ॥ १ ॥ | उनके चरणोंका प्रक्षालन किया और उस पवित्र जलका महर्षि मरीचि भूत-भविष्य तथा वर्तमान तीनों | प्रसन्नतापूर्वक पान करनेके साथ ही उससे अपने सारे कालोंके ज्ञाता थे। मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णमें | घरका भी सेचनकर उसे पवित्र किया ॥ ४ ॥ उनकी समान दृष्टि थी। वे वेद एवं शास्त्रोंके तत्त्वको | देवी पार्वती ने सोलह उपचारोंके द्वारा भगवद्बुद्धिसे जाननेवाले थे। यह अपना है, यह पराया है—इस | उनका पूजन किया और वे प्रसन्नतापूर्वक बोलीं— प्रकारकी भेददृष्टिसे वे परे थे। वे मनसे ही जगत्की | आज आपके दुर्लभ चरणोंका मुझे भाग्यवश दर्शन सृष्टि, पालन और संहार करनेमें समर्थ थे। उनका दर्शन | प्राप्त हुआ है ॥ ५ ॥