भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 656 में से

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पृष्ठ 471

क्री०ख०-अ०८४ ] * बालक हेरम्बकी बाल-लीलामें दैत्योंके वधका आख्यान * ४६९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 योजन विस्तारवाला हो गया॥ ३१ ॥ उसके गिरनेसे कुछ सखियाँ चूर-चूर हो गयी थीं और कितनी ही सेविकाएँ भी चूर-चूर हो गयीं। उस समय भगवान् शिवके गण भी उस प्रकारके विडालको देखने वहाँ आये। वे बालकके बल-पराक्रमको देखकर परम आश्चर्य करने लगे और कहने लगे कि कहाँ तो यह अनेक प्रकारकी माया करनेवाला दुष्ट दैत्य और कहाँ बालकका चरण-प्रहार ? ॥ ३२-३३॥ जो दैत्य इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी सर्वथा अवध्य थे, उन्हें यह बालक लीलामें ही मार गिरा रहा है! ऐसा कहकर उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे शिवगण अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ३४ ॥ कुछ बलवान् गणोंने उस दैत्यको कमरसे पकड़कर खींचते हुए बाहर ले जाकर छोड़ा। तदनन्तर वे देवी पार्वती अपने भवनके अन्दर गयीं ॥ ३५ ॥ चौथे मासमें सूर्यके उत्तरायण होनेपर मुनिपत्नियाँ विविध प्रकारके सौभाग्य-द्रव्योंको लेकर पार्वतीके मंगलमय भवनमें आयीं, उनमेंसे कुछ अपने बालकोंको साथ लायी थीं और कुछ अकेले ही आयी थीं। तब देवी पार्वती ने आसन आदि प्रदानकर उनका सत्कार किया ॥ ३६-३७ ॥ अपने बालकको गोदमें पकड़े हुए ही पार्वती ने उन मुनिपत्नियोंको नमस्कार किया। वे सभी हरिद्रा तथा कुंकुमके द्वारा परस्पर एक-दूसरेका पूजन करने लगीं ॥ ३८ ॥ उस समय उन मुनिपत्नियोंने अपने चलनेवाले बालकोंको तथा जो अभी ठीकसे चलना नहीं जानते थे, उन शिशुओंको भूमिपर बैठाया हुआ था। तब देवी पार्वतीका बालक भी उन बालकोंके साथ क्रीडा करने लगा। उस पार्वतीपुत्रकी शोभासे वे सभी बालक ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसे चन्द्रमाके द्वारा अन्य तारे सुशोभित होते हैं। यह दृश्य देखकर वे मुनिपत्नियाँ गिरिपुत्री पार्वतीसे इस प्रकार कहने लगीं- ॥ ३९-४० ॥ हे गौरी ! भगवान् शिवके द्वारा प्रदत्त इस तेजस्वी पुत्रको पाकर तुम धन्य हो। तुम्हारे बालकका सान्निध्य पाकर हमारे बालक भी प्रकाशमान-से दिखायी देते हैं ॥ ४१ ॥ पारसमणिका संयोग प्राप्तकर लोहा भी अपने लोहत्वको समाप्तकर सुवर्ण हो जाता है। इस प्रकार कौतुकसम्पन्न वे सभी मुनिपत्नियाँ हलदी, कुमकुम, ईंखके टुकड़े, चन्दन, गुंजक, तिल, गुड़, ताड़पत्र तथा विविध सुगन्धित द्रव्योंसे परस्पर एक-दूसरेका पूजन करने लगीं। कोई-कोई शरीरमें तथा मुखमण्डलमें हलदीका उबटन लगा रही थीं ॥ ४२-४३ १/२ ॥ उसी बीच बालासुर नामका महान् दैत्य समान अवस्थावाला बालक बनकर उन बालकोंके साथ क्रीडा करनेके लिये वहाँ आ पहुँचा। वह पार्वतीपुत्रके साथ मनोविनोदके रूपमें युद्ध-सा करता हुआ, वैसे ही क्रीड़ा करने लगा, जैसे कोई सियार सिंहके साथ और जैसे कोई महिष हाथीके साथ खेलता हो। वे दोनों कठोर बनकर गलेसे गलेको रगड़ते हुए भूमिपर गिर रहे थे ॥ ४४-४६ ॥ तदनन्तर उस दुष्ट असुरने अपने दोनों पैरोंसे गजाननके मस्तकपर प्रहार किया और वह अपने दोनों हाथोंसे बालक विनायकके बालोंको पकड़कर जोरसे खींचने लगा। इतना ही नहीं, वह दुष्ट उसी प्रकारकी ध्वनि करने लगा, जैसे रात्रिमें वृद्ध सियार चिल्लाता है। उन दोनोंको वैसी स्थितिमें देखकर वे गिरिजा उन मुनिपत्नियोंसे कहने लगीं। यह बलवान् बालक किस ऋषिका है, जो मेरे पुत्रको मार रहा है ? यह दुष्ट गधेकी भाँति प्रहर-प्रहरमें चिल्ला रहा है ॥ ४७-४९॥ तदनन्तर बालकोंका ऐसा स्वभाव ही होता है, यह समझकर पार्वती उस ओरसे उदासीन हो गयीं। वे दोनों अत्यन्त प्रिय बालक बार-बार लोट-पोट करने लगे ॥ ५० ॥ वे दोनों बालक एक-दूसरेके सिरके बालोंको सभी ओरसे पकड़कर खींच रहे थे। स्वयं हँस भी रहे थे और अन्य बालकों तथा मुनियोंकी स्त्रियोंको हँसा भी रहे थे। बालक विनायक जान रहे थे कि यह महान् दैत्य है, फिर भी वे उसके साथ खेल रहे थे। तदनन्तर उस दुष्ट बालासुरने अपने दोनों हाथोंसे गणनायक गणेशके कण्ठदेशको इस प्रकार कसकर पकड़ा, ताकि उनके प्राण निकल जायँ। तब विनायकने भी उसी प्रकारसे उस बालासुरको पकड़ा। अब तो असुरकी साँस रुकने लगी ॥ ५१-५३ ॥ उस दैत्यपुत्र (बालरूप दैत्य) को विह्वल देखकर वे

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