भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 656 में से

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पृष्ठ 470

४६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जब उन चूहोंके प्राण पूरी तरह नहीं निकले थे, | देवी पार्वती अपने बालकको लेकर शय्यापर सोयी थीं। उससे पूर्व ही भगवान् शिवके गण उन्हें फेंकनेके लिये | उस समय उनकी जो सेविकाएँ थीं, उनमेंसे कुछ तो सो बाहर ले गये। गणेशजीके हाथोंका आघात लगनेके | गयी थीं और कुछ दूसरे कार्योंमें लगी हुई थीं॥ १९-२०॥ फलस्वरूप वे दोनों मोक्षको प्राप्त हुए॥ ९॥ | कुछ सेविकाएँ भवनके द्वारपर बैठकर वार्तालाप दस योजन विस्तारवाले तथा महान् भयंकर उन | कर रही थीं। उसी समय क्रूर नामक असुर विडालका दोनों असुरोंके देह जब बाहर गिरे तो उन्हें देखकर | रूप धारणकर देवी पार्वतीके घरमें प्रविष्ट हुआ॥ २१॥ शिवके गणों, पार्वती तथा उनकी सखियोंका उस समय | वह महाबली दुष्ट असुर लोगोंकी नजर बचाता महान् कोलाहल होने लगा॥ १०१/२ ॥ | हुआ कुत्तेके समान वहाँ गया। पार्वतीजीको सोया हुआ उन दोनों असुरोंके प्राणरहित विस्तृत आकारवाले | देखकर वह मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुआ कि जबतक शरीरोंके गिरनेसे आश्रम, वृक्ष, पर्वत तथा घर विध्वस्त | ये गिरिजा सोती रहती हैं, उसी बीच मैं इस शिशुको उठा हो गये। तब शिवके गण उनके शरीरोंके टुकड़े-टुकड़े | ले जाऊँगा। वह शीघ्र ही पलंगके ऊपर चढ़ गया और करके बाहर फेंकनेके लिये ले गये॥ ११-१२॥ | बालकको अपने मुखमें पकड़कर शीघ्र ही पलंगसे नीचे उस समय पार्वती अत्यन्त भयभीत हो गयीं, उन्होंने | कूदा। उस समय बालक रोने लगा॥ २२-२३१/२ ॥ शीघ्र ही बालकको गोदमें ले लिया और वे पुत्रके प्रति | उसी समय पार्वतीजी नींदसे जग पड़ीं, उन्होंने वात्सल्यभावके कारण स्नेहपूर्वक अपना स्तनपान कराने | विडालके मुखमें अपने बालकको देखा तो वे भयसे लगीं। उसी समय पुण्यमयी ऋषिपत्नियां वहाँ आ पहुँचीं | विह्वल हो उठीं और 'दौड़ो-दौड़ो' इस प्रकारसे चिल्लाने और पार्वतीजीसे बोलीं-हे गौरी ! तुम्हारा महान् पुण्य | लगीं। दुःख तथा भयसे उनके नेत्र बन्द हो गये। उन्हें है, जिसके कारण यह विघ्न नष्ट हो गया है। इस दो | मूर्च्छा आ गयी॥ २४-२५॥ मासकी अवस्थावाले बालकने दुष्ट महान् असुरोंको मार | जबतक वह विडाल बालकके कण्ठमें दाँत चुभाता, डाला है। आगे भी तीनों लोकोंमें ऐसा कोई नहीं | उससे पहले ही बालकने उसके दोनों कानोंको अपने होगा॥ १३-१५॥ | दोनों हाथोंसे पकड़ लिया और बालस्वभाववश अपने हे माता! यह भूमि राक्षसभूमि है, अतः यहाँ | पैरोंसे उसके सिरपर आघात किया तथा उस महान् शिशुकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। गुप्त रूपसे | असुरको पलंगसे नीचे गिरा दिया। उस विडालका हृदय यहाँ रहनेवाले राक्षस तथा दूसरे मायावी असुर इस | विदीर्ण हो गया और वह बाहर जाकर उसी प्रकार गिर बालकका हरण कर सकते हैं॥ १६॥ | पड़ा, जैसे कि आँधीके द्वारा वृक्षसे थोड़ा-सा पका हुआ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे ऋषिपत्नियां | फल गिराया जाता है। उसका दुर्गन्धयुक्त रक्त भूमिपर चली गयीं, तब शिवगणोंने देवी पार्वतीसे कहा- हे | गिरने लगा॥ २६-२८॥ शिवे! आपका यह बालक तो प्रतिदिन असुरोंका वध | तब उस समय शोकसे विह्वल गिरिजाने दुर्गन्धसे करेगा, ऐसेमें हम लोगोंके द्वारा कबतक मरे हुए | बचनेके लिये अपनी नाक बन्द कर ली और वहाँ पहुँचकर असुरोंको बाहर फेंका जायगा? उसी समय मुनिगण वहाँ | उन्होंने झटसे बालकको पकड़कर प्रीतिपूर्वक अपना आ पहुँचे और उन्होंने रक्षामन्त्रोंके पाठसे उस बालकको | स्तनपान कराया। बालकके रुदनकी ध्वनि सुनकर सभी अभिमन्त्रित किया। देवीने उन्हें अनेक प्रकारके दान | सेविकाएँ वहाँ आ पहुँचीं और कौतूहलयुक्त होकर प्रत्येक दिये, फिर उन्हें प्रणामकर विदा किया॥ १७-१८१/२ ॥ | सेविका उस बालकके अंगोंको छूने लगी॥ २९-३०॥ तीसरे मासकी बात है, एक दिन जब सभी लोग | वे उस बालकके विषयमें दृढ़मति थीं कि यह अपने-अपने कार्यमें व्यस्त थे। मध्याह्नकालका समय था। | बालक अजर-अमर है। उस समय वह विडाल बारह