श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
४७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मुनिपत्नियाँ अत्यन्त चिन्तित हो उठीं और चिल्लाने लगीं | वृक्षोंको चूर-चूर करता हुआ गिर पड़ा। यह देखकर कि निश्चित ही इस विनायकने इस बच्चेको मार डाला है। | सभी स्त्रियाँ अत्यन्त भयभीत हो गयीं और वे अपने- कुछ स्त्रियाँ दौड़ती हुई उनके पास गयीं, किंतु वे उन | अपने बालकोंको लेकर शीघ्र ही उसी प्रकार दौड़ पड़ीं, दोनोंको छुड़ानेमें समर्थ नहीं हो सकीं। तदनन्तर वे सभी | जैसे कि भेड़ियोंके समूहको देखकर गायें और बकरियाँ पुरुष तथा स्त्रियाँ उन मंगलमयी पार्वतीसे कहने लगीं— | भयभीत होकर दौड़ पड़ती हैं। तदनन्तर पार्वती ने भी 'तुम इसे छुड़ा डालो। यह विनायक निश्चित ही इस | अपने पुत्रको पकड़कर उसके ऊपर मिट्टी घुमाकर उसे मुनिपुत्र को मार डालेगा।' तदनन्तर पार्वती ने विनायकसे | स्तनपान कराया और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा शान्तिकर्म कहा—'इस बालकको छोड़ दो-छोड़ दो ॥ ५४-५६ ॥ | करवाकर तथा उन्हें अनेक प्रकारके दान देकर बहुत- अगर कहीं यह मर गया तो तपोबलसे सम्पन्न | से आशीर्वाद ग्रहण किये ॥ ६०-६२ ॥ मुनिगण हमें शाप दे डालेंगे। इस ब्रह्माण्डगोलकमें | मैं तो इन असुरोंकी मायाको नहीं जानती हूँ, कितने प्राणदानसे अधिक पुण्य और कोई नहीं है। उन मुनियोंके | ही असुर मेरे बालकको मारनेके लिये आते रहते हैं, किंतु शापसे तुम्हारी महान् शक्ति लुप्त हो जायगी' ॥ ५७१/२ ॥ | वे महान् दुष्ट असुर इसके द्वारा मृत्युको प्राप्त हो जाते ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे पार्वती जब | हैं। यदि ईश्वर अनुकूल हो तो व्यक्तिको मारनेमें कौन विनायकको मना कर रही थीं, उसी समय क्षणभरमें | समर्थ हो सकता है? ॥ ६३१/२ ॥ नेत्रोंके मार्गसे उस असुरके प्राण बुद्बुदकी भाँति निकल | ब्रह्माजी बोले—देवी पार्वतीके ऐसे वचनोंको पड़े। तब सभीने उस मृत दैत्यको देखा, वह दस | सुनकर वे सभी मुनिपत्नियाँ वापस चली गयीं। तब उन योजन विस्तारवाला था ॥ ५८-५९ ॥ | शिवगणोंने उस असुरको दूर फेंक दिया और स्नान उसका मुख अत्यन्त विकराल था। वह बड़े-बड़े | करनेके अनन्तर वे अपने स्थानको चले गये ॥ ६४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालासुरके वधका वर्णन' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८४ ॥
पचासीवाँ अध्याय महर्षि मरीचिका पार्वतीपुत्रका दर्शन करनेके लिये आना, मरीचिद्वारा देवी पार्वतीसे विनायकके परब्रह्मस्वरूपका प्रतिपादन, बालककी रक्षाके लिये महर्षिका गणेशकवच बतलाना, गणेशकवचका माहात्म्य तथा उसकी उपदेश-परम्परा ब्रह्माजी बोले—विनायकके पाँचवें मासके आरम्भ | करके पार्वती ने अपनी सखियोंके सहित उनके चरणोंमें होनेपर मुनियोंके मुखसे देवी पार्वतीके महान् बलशाली | विनम्र प्रणाम किया ॥ २-३ ॥ पुत्रका समाचार सुनकर महर्षि मरीचि उसको देखनेके | उन्हें आसनपर विराजमान करके भक्ति-श्रद्धापूर्वक लिये आये ॥ १ ॥ | उनके चरणोंका प्रक्षालन किया और उस पवित्र जलका महर्षि मरीचि भूत-भविष्य तथा वर्तमान तीनों | प्रसन्नतापूर्वक पान करनेके साथ ही उससे अपने सारे कालोंके ज्ञाता थे। मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णमें | घरका भी सेचनकर उसे पवित्र किया ॥ ४ ॥ उनकी समान दृष्टि थी। वे वेद एवं शास्त्रोंके तत्त्वको | देवी पार्वती ने सोलह उपचारोंके द्वारा भगवद्बुद्धिसे जाननेवाले थे। यह अपना है, यह पराया है—इस | उनका पूजन किया और वे प्रसन्नतापूर्वक बोलीं— प्रकारकी भेददृष्टिसे वे परे थे। वे मनसे ही जगत्की | आज आपके दुर्लभ चरणोंका मुझे भाग्यवश दर्शन सृष्टि, पालन और संहार करनेमें समर्थ थे। उनका दर्शन | प्राप्त हुआ है ॥ ५ ॥
क्री०ख०-अ०८५ ] * महर्षि मरीचिका पार्वतीपुत्रका दर्शन करनेके लिये आना * ४७१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
मुनि मरीचि बोले—हे देवि! मेरा मन निरन्तर आत्मचिन्तनमें लगा रहता है, मैं कहीं आता-जाता नहीं हूँ। किंतु अकस्मात् ही आपका पुत्र मेरे ध्यानमें आ गया। इसीलिये मैं आपके पुत्रके, आपके तथा भगवान् शिवके दर्शनकी अभिलाषासे यहाँ आया हूँ॥ ६१/२॥ ब्रह्माजी बोले—महर्षि मरीचिके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर गौरी पार्वतीका मन अत्यन्त प्रसन्न हो गया और उन्होंने अपने पुत्र विनायकको उनकी गोदमें बैठा दिया। फिर वे उनसे कहने लगीं—आज आपका दर्शनकर मेरा महान् भाग्य सफल हो गया है। आज मुझे परम पुण्यकी प्राप्ति हुई है और भविष्यमें भी शुभ ही होगा॥ ७-८१/२॥ मुनि बोले—हे गौरी! आपका यह पुत्र मुझे परब्रह्मस्वरूप प्रतीत होता है। मूलाधार आदि षट्चक्रोंके भेदनमें जो योगनिष्ठ महर्षि निरन्तर संलग्न रहते हैं और मात्र वायुका सेवन करते हुए जिन परमात्माकी उपासना करते रहते हैं, वे ही आपके पुत्रके रूपमें अवतरित हुए हैं॥ ९-१०॥ सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों गुणोंके भेदसे जो ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवके नामसे तीन विग्रह धारणकर सृष्टि, पालन तथा संहार—इन तीन क्रियाओंको सम्पन्न करते हैं और जिनकी सत्तासे ही शेषनाग भी इस पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण किये रहते हैं, वे ही परमात्मा आपके पुत्ररूपमें अवतरित हुए हैं॥ ११॥ ये ही अणुरूप तथा स्थूलरूप हैं और सत्ताईस तत्त्वोंके भी कर्ता हैं। यह चराचर सम्पूर्ण जगत् इन्हींका रूप है। ये सभी प्रकारके कर्म करनेवाले हैं॥ १२॥ ये सत्ययुगमें दस भुजाओंवाले तथा सिंहपर आरूढ़ रहते हैं, तब इनका नाम 'विनायक' होता है। त्रेतायुगमें इनकी छः भुजाएँ और इनका वाहन मोर होता है। इनकी आभा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल होती है और तब इनका नाम 'मयूरेश' होता है। उस समय ये अनेकों दैत्योंका वध करते हैं। द्वापरयुगमें ये देव चार भुजाओंवाले और रक्तवर्णवाले होते हैं। इस युगमें इनका 'गजानन' यह नाम प्रसिद्ध है। कलियुगमें ये धूम्र वर्णवाले रहते हैं, इनकी दो भुजाएँ रहती हैं, ये सभी दैत्योंका वध करते
हैं और 'धूम्रकेतु' इस नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त होते हैं। हे गौरी! आपको दैत्योंसे सदा ही इनकी रक्षा करनी चाहिये॥ १३-१५१/२॥ पार्वतीजी बोलीं—हे मुनिसत्तम! यह गणेश अत्यन्त चंचल है; यह बाल्यावस्थामें ही असुरोंका संहार कर रहा है। आगे चलकर यह न जाने क्या करेगा? दैत्य अनेक प्रकारके रूपोंवाले, दुष्ट, खल स्वभाववाले और सज्जनों तथा देवताओंसे द्रोह करनेवाले हैं। अतः रक्षाके लिये इसके कण्ठमें आप कुछ बाँध दीजिये॥ १६-१७१/२॥ मुनि बोले—हे पार्वति! सत्ययुगमें आठ भुजावाले सिंहारूढ विनायकका, त्रेतायुगमें छः भुजावाले सिद्धिप्रदायक तथा मयूरवाहन विनायकका, द्वापरमें रक्त वर्णवाले सुगन्धित द्रव्यके लेपसे विभूषित चार भुजाओंवाले प्रभु गजाननका और कलियुगमें उज्ज्वल वर्णवाले, सुन्दर दो भुजाओंसे युक्त तथा सर्वदा सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाले गणेशका ध्यान करना चाहिये॥ १८-१९॥ परात्पर परमात्मा विनायक शिखाकी रक्षा करें, अति सुन्दर शरीरवाले सुमहोट्कट मस्तककी रक्षा करें॥ २०॥ कश्यपपुत्र ललाटकी रक्षा करें, महोदर भ्रूयुगोंकी रक्षा करें, भालचन्द्र दोनों नेत्रोंकी रक्षा करें और गजानन कोमल ओष्ठोंकी रक्षा करें॥ २१॥ गणक्रीड जिह्वाकी रक्षा करें, गिरिजासुत चिबुककी रक्षा करें, विनायक वाणीकी रक्षा करें तथा दुर्मुख दाँतोंकी रक्षा करें। पाशपाणि कानोंकी रक्षा करें, नासिकाकी रक्षा चिन्तितार्थ करें, गणेश मुखकी रक्षा करें एवं भगवान् गणंजय कण्ठकी रक्षा करें॥ २२-२३॥ गजस्कन्ध स्कन्धोंकी रक्षा करें, विघ्नविनाशन स्तनोंकी रक्षा करें, गणनाथ हृदयकी रक्षा करें और महान् हेरम्ब जठरकी रक्षा करें॥ २४॥ धराधर पार्श्वोंकी रक्षा करें, मंगलमय विघ्नहर पृष्ठकी रक्षा करें और महाबल वक्रतुण्ड लिंग तथा गुह्यदेशकी सदा रक्षा करें। गणक्रीड जानु तथा जंघोंकी रक्षा करें, मंगलमूर्तिमान् ऊरूकी रक्षा करें और महाबुद्धिमान् एकदन्त चरणों तथा गुल्फोंकी सदा रक्षा करें॥ २५-२६॥ क्षिप्रप्रसादन बाहुओंकी रक्षा करें, आशाप्रपूरक
४७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- हाथोंकी रक्षा करें और हाथमें कमल लिये हुए अरिनाशन अंगुलियों और नखोंकी रक्षा करें ॥ २७ ॥ विश्वव्यापी मयूरेश सभी अंगोंकी सदा रक्षा करें और जिन स्थानोंका उल्लेख नहीं किया गया है, उनकी भी रक्षा सदा धूम्रकेतु करें। आमोद आगेसे रक्षा करें, प्रमोद पीछेसे रक्षा करें, बुद्धीश पूर्वमें रक्षा करें और सिद्धिदायक आग्नेय दिशामें रक्षा करें ॥ २८-२९ ॥ उमापुत्र दक्षिण दिशामें रक्षा करें, नैर्ऋत्यकोणमें गणेश्वर रक्षा करें, विघ्नहर्ता पश्चिम दिशामें एवं गजकर्णक वायव्य दिशामें रक्षा करें ॥ ३० ॥ निधिपति उत्तर दिशामें रक्षा करें, ईशनन्दन ईशानदिशामें रक्षा करें, इलानन्दन दिवामें रक्षा करें तथा रात्रि और सन्ध्याकालोंमें विघ्नहृत् रक्षा करें। राक्षस, असुर, वेताल ग्रह, भूत, पिशाचसे और सत्त्व-रज-तम गुणोंसे स्मृतिकी पाशांकुशधर रक्षा करें ॥ ३१-३२ ॥ ज्ञान, धर्म, लक्ष्मी, लज्जा, कीर्ति, दया, कुल, शरीर, धन-धान्य, गृह, स्त्री-पुत्र तथा मित्रोंकी एवं पौत्रोंकी सर्वदा रक्षा सभी प्रकारके अस्त्र धारण करनेवाले मयूरेश करें। कपिल भेड़-बकरोंकी रक्षा करें और विकट गाय [हाथी]-घोड़ोंकी रक्षा करें ॥ ३३-३४ ॥ जो विद्वान् भूर्जपत्रमें इसे लिख करके कण्ठमें धारण करता है, उसको यक्ष, राक्षस तथा पिशाचोंसे भय नहीं होता है। जो तीनों सन्ध्या-कालोंमें इसका जप करता है, उसका शरीर हीरेकी भाँति कठोर हो जाता है। जो व्यक्ति यात्राकालमें इसका पाठ करता है, उसे निर्विघ्नतापूर्वक फल प्राप्त होता है ॥ ३५-३६ ॥ जो युद्धकालमें इसका पाठ करता है, वह निश्चितरूपसे विजय प्राप्त करता है। मारण, उच्चाटन, आकर्षण, स्तम्भन तथा मोहनादि कर्मके लिये यदि साधक इक्कीस दिनपर्यन्त प्रतिदिन सात बार इसका जप करे तो वह उन-उन वांछित फलोंको प्राप्त कर लेता है, इसमें भी संशय नहीं है। जो इक्कीस दिनतक इस मन्त्रका इक्कीस बार पाठ करता है, वह राजाके द्वारा वधके लिये आदेशप्राप्त और कारागारमें बन्द किये गये व्यक्तिको भी शीघ्र ही मुक्त करा लेता है ॥ ३७-३९ ॥ राजाके दर्शनके समय जो व्यक्ति इस मन्त्रका तीन बार पाठ करता है, वह राजाको वशमें करके मन्त्रियोंको तथा राजसभाको जीत लेता है ॥ ४० ॥ यह गणेशकवच सब प्रकारसे रक्षा करनेवाला है और सभी प्रकारकी मनोकामनाको पूर्ण करनेवाला है। इस गणेशकवचको महर्षि कश्यपने मुद्गल ऋषिसे कहा और उन्होंने महर्षि माण्डव्यसे कहा और माण्डव्यने इस सर्वसिद्धिप्रद कवचको कृपा करके मुझसे कहा है। इस शुभ कवचको श्रद्धावान्को ही देना चाहिये, भक्तिहीन व्यक्तिको कभी भी नहीं देना चाहिये। इस कवचके द्वारा इस (बालक)-की रक्षा की गयी है, इस कारणसे राक्षस, असुर, वेताल, दैत्य, दानव आदिसे होनेवाली किसी प्रकारकी भी बाधा इसे नहीं हो सकती है ॥ ४१-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गणेशकवचवर्णन' नामक पचासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८५ ॥ छियासीवाँ अध्याय गौतम आदि महर्षियोंद्वारा पार्वतीपुत्रका भूमि-उपवेशन नामक संस्कार सम्पन्न किया जाना, बालकके वधकी इच्छासे व्योमासुरका वहाँ आना, बालकद्वारा व्योमासुरका वध ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर गौरीने उन महर्षि मरीचिकी गोदसे पुत्रको उठा लिया और उन्हें नमस्कार करके तथा उनसे अनुमति लेकर वे अत्यन्त हर्षित होकर अपने भवनमें चली गयीं ॥ १ ॥ वे महर्षि भी उनसे अनुमति प्राप्तकर भगवान् शिवको प्रणामकर अपने आश्रमको गये। तदनन्तर गौरीने एक शुभ दिनमें उत्तम मुहूर्तमें गौतम आदि महर्षियोंको आमन्त्रितकर बुलाया और बालकका उपवेशन संस्कार करवाया। पार्वतीजीने उन ब्राह्मणोंको बैठाकर पहले स्वयं उन्हें प्रणाम किया, फिर बालकसे उन द्विजजनोंको प्रणाम करवाया ॥ २-३ ॥ उस समय सभी देवगण अपने हाथोंमें विविध
क्री०ख०-अ०८६ ] * महर्षियोंद्वारा पार्वतीपुत्रका भूमि-उपवेशन नामक संस्कार सम्पन्न करना * ४७३ प्रकारकी उपहार-सामग्री लेकर वहाँ आये। साथ ही शिवके गण, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी वहाँ आयीं ॥ ४ ॥ तदनन्तर गौरी उन विप्रोंसे बोलीं- हे श्रेष्ठ द्विजो ! आप सभी मुनियोंसे विचार-विमर्श करके इस बालकका उपवेशन-संस्कार सम्पन्न करें। तब वे सभी मुनि बोले- आज बृहस्पतिवार है, त्रयोदशी तिथि है और रेवती नक्षत्र है, इसलिये आज ही उपवेशन-संस्कार-सम्बन्धी महोत्सव सम्पन्न करनेयोग्य है ॥ ५-६ ॥ तदनन्तर महर्षि गृत्समदने तुरन्त भूमिपर विविध प्रकारके रत्नसमूहोंको रखकर शीघ्र ही रत्नोंके द्वारा चौकका निर्माण किया। गणेश-पूजन करनेके अनन्तर उन्होंने पुण्याहवाचन किया। तदनन्तर दिव्य वस्त्रोंसे सुसज्जित किये हुए उस चौकपर पार्वतीके पुत्रको बैठाया और फिर सौभाग्यशालिनी स्त्रियोंके द्वारा बड़े ही आदरपूर्वक उसका नीराजन करवाया। वह बालक रत्नोंके आभासमूहमें स्थित था और नाना प्रकारके अलंकारोंसे प्रकाशित हो रहा था ॥ ७-९॥ उस समय दिव्य वाद्य बजाये जा रहे थे, तभी सभी जनोंने शिव-पार्वतीको तथा उनके पुत्रको श्रद्धाभक्तिपूर्वक विविध प्रकारकी भेंट-सामग्री प्रदान की ॥ १० ॥ तदनन्तर देवी पार्वती ने रत्न, वस्त्र तथा सुवर्ण आदि प्रदानकर ब्राह्मणोंकी पूजा की और उन सभीके द्वारा आशीर्वादके रूपमें प्राप्त अक्षतोंको उस बालकके ऊपर छोड़ा। माता भवानीने कन्याओंसहित मुनिपत्नियोंका पूजन किया। वे मुनिपत्नियां बोलीं- हे गिरिजा ! तुमसे अधिक धन्य अन्य कहीं कोई स्त्री नहीं है। इस प्रकारका सभी शुभ लक्षणोंसे समन्वित पुत्र भी कहीं किसीका नहीं है॥ ११-१२१/२॥ ब्रह्माजी बोले-वे मुनिपत्नियां इस प्रकार कह ही रही थीं कि उसी समय व्योमासुर नामक एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा। वह महान् दुष्ट व्योमासुर नाना प्रकारकी माया करनेमें पारंगत था, उसके कान आकाशतक व्याप्त थे। तीनों लोकोंमें उसके समान बलशाली कोई भी नहीं था ॥ १३-१४॥ वहाँ दरवाजेके समीप एक आमका वृक्ष था, जिसमें अनेक डालियाँ लगी थीं। वह आमका वृक्ष सैकड़ों हाथियोंके लिये भी अभेद्य था और प्रलयकालीन वायुके द्वारा भी न तोड़े जानेयोग्य था ॥ १५ ॥ वह व्योमासुर अपनी मायाके बलसे उस आमके वृक्षमें उसी प्रकार प्रविष्ट हो गया, जैसे कि किसी सीधे- सादे व्यक्तिको प्रारब्धवश भूत लग जाता है ॥ १६ ॥ प्रलयकालीन आँधीके समान उसने उस आमके वृक्षको हिला डाला। वृक्ष टूटकर कहीं गिर न जाय, इस भयसे वहाँ आये हुए मुनिगण भयभीत हो गये और कहने लगे- यह महान् वृक्ष हवाके चले बिना ही कैसे काँप रहा है? तभी उन्होंने उस वृक्षसे निकलते हुए 'कट-कट' शब्दको सुना ॥ १७-१८ ॥ सभी स्त्रियाँ, शिवगण तथा वे मुनिगण वहाँसे पलायित हो गये। पार्वती भी घबड़ाहटके मारे अपने बालकको भुलाकर स्वयं भी भाग चलीं ॥ १९ ॥ इसी बीच वह आमका वृक्ष बालकके ऊपर गिरा। तब बालकने अपने दोनों हाथोंसे उसपर आघात किया। जिससे सैकड़ों टुकड़े होकर वह वृक्ष भूमिपर गिर पड़ा। वह वृक्ष उसी प्रकार चूर्ण-चूर्ण हुआ, जैसे कि पत्थरके ऊपर रखी हुई सुपारी घनके द्वारा चोट करनेपर टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। उस समय उस वृक्षकी शाखाएँ, जो कि पल्लवोंसे समन्वित थीं, आकाशमें उड़ने लगीं ॥ २०-२१ ॥ वृक्षकी शाखाओंके गिरनेसे ऋषियोंके कुछ आश्रम भग्न हो गये। पल्लवोंसे युक्त कुछ शाखाएँ वहाँसे भाग रहे लोगोंपर भी गिरीं ॥ २२ ॥ तदनन्तर वह दुष्ट व्योमासुर अपने मुखको खोलकर रक्त वमन करता हुआ प्राणहीन होकर नीचे गिर पड़ा। गिरनेसे उसके सैकड़ों टुकड़े हो गये। तदनन्तर वे सभी लोग तथा स्त्रियाँ वहाँ आयीं उन्होंने बालकको पूर्वकी भाँति निःशंक होकर बैठा हुआ देखा ॥ २३-२४ ॥ वह सुमेरुपर्वतके समान निश्चल तथा स्वस्थ था। यह देखकर सभीको बड़ा ही विस्मय हुआ कि इस पाँच मासकी अवस्थावाले बालकने खेल-खेलमें वृक्षसहित उस महान् बल-पराक्रमशाली दैत्यको अपने हाथके आघातसे सैकड़ों टुकड़ोंमें खण्डित कर दिया ! उसी
४७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 समय हाहाकारकी ध्वनि करती हुई पार्वती दौड़ते हुए अपने पुत्रके पास आयीं ॥ २५-२६॥ वे मुनिगण उनसे कहने लगे—आपके पुत्रने दैत्यका वध कर दिया है। तब पार्वतीने अपने बालकको हिमवान् पर्वतके समान निश्चल बैठा हुआ देखा। तदनन्तर पार्वतीने बालकको उठाकर अपनी गोदमें रखकर उसे प्रसन्नतापूर्वक स्तनपान कराया और महर्षि मरीचिके वचनोंका स्मरण किया तथा महेश्वरकी प्रशंसा की ॥ २७-२८ ॥ भगवान् जिसकी सदा रक्षा करते हैं, उसे जो मारनेकी इच्छा करता है, निश्चय ही वह उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जैसे दीपकके पास जानेवाला पतंगा नष्ट हो जाता है ॥ २९ ॥ तदनन्तर सभी मुनिगण तथा स्त्रियाँ अपने-अपने स्थानोंको चले गये। इसके बाद कुछ गण वहाँ आये और पार्वतीके पुत्रको सुरक्षित देखकर कहने लगे कि माता आप अत्यन्त धन्य हैं, जो कि आपका यह पुत्र असुरसे बच गया। निश्चित ही दुष्ट लोग ही विनष्ट होते हैं। साधु पुरुष कभी भी कोई कष्ट नहीं प्राप्त करते ॥ ३०-३१॥ तदनन्तर पार्वतीने उन सभी गणों तथा स्त्रियोंको भी शर्करा प्रदानकर जानेकी आज्ञा प्रदान की। प्रसन्न होकर पार्वती अपने पुत्रको लेकर अपने भवनमें चली गयीं ॥ ३२ ॥ जो भक्तिमान् पुरुष इस पवित्र आख्यानका श्रवण करता है, उसे कभी कहीं कोई भी बाधा नहीं प्राप्त होती और वह सर्वत्र निर्भय होकर रहता है ॥ ३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकका भूमि-उपवेशन-वर्णन' नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८६ ॥ सतासीवाँ अध्याय बालक विनायकद्वारा शतमाहिषा नामक राक्षसी और कमठासुरका वध, इस आख्यानके श्रवण और श्रावणका माहात्म्य ब्रह्माजी बोले—व्योमासुरकी बहन उसकी मृत्युके दुःखद समाचारसे अत्यन्त दुखी हो गयी। वह अमावस्याके दिन सायंकालके समय उत्पन्न हुई थी। उत्पन्न होते ही वह भूखसे अत्यन्त व्याकुल हो गयी। उसने उसी समय सौ महान् बलशाली भैंसोंको खा डाला था। उसके बाल अत्यन्त विकराल थे और ओष्ठ अत्यन्त लम्बे थे। उसकी नाक ताड़ वृक्षके समान लम्बी थी और उसका मुख एक विशाल गुफाके समान था ॥ १-२ ॥ उसके दाँत हलके समान मोटे एवं लम्बे, नेत्र कूपके समान अत्यन्त गहरे थे तथा बड़े-बड़े कानोंके द्वारा वह आच्छादित थी। उसके स्तन अतिदीर्घ थे, स्वरूप महाभयावह था और उस दुष्टाके केश भूतलका स्पर्श करते थे ॥ ३ ॥ उसके बाहु विशाल थे। नाभि अत्यन्त गहरी थी। उसकी त्वचा मगरमच्छके समान कर्कश थी। उत्पन्न होते ही सौ भैंसे खा जानेके कारण उस समय लोगोंने उस दुष्ट मनोभाववाली राक्षसीका 'शतमाहिषा' यह सार्थक नाम रखा। अपने बन्धुओंका हित करनेवाली वह शतमाहिषा अपने भाईका वध करनेवालेको मारनेकी दृष्टिसे वहाँ आयी ॥ ४-५ ॥ उस समय वह अत्यन्त सुरूपवान्, मनोहर तथा सुलक्षण अंगोंवाली बनकर आयी। उसने अनेक आभूषण धारण कर रखे थे। उसका वर्ण गौर था, अवस्था उसकी सोलह वर्षकी-सी थी, सोलह शृंगार करके वह अपने कटाक्षद्वारा सबको मोहित कर रही थी। इस प्रकारकी सुन्दर युवती बनकर वह शतमाहिषा मनमें दूषित भाव रखकर पार्वतीके शुभ भवनमें गयी ॥ ६-७ ॥ वहाँ पहुँचते ही सबसे पहले उसने देवी पार्वतीको विनयपूर्वक प्रणाम किया और बड़े-ही आदरभावसे वह उनसे कहने लगी कि आज मैं धन्य हो गयी, कृतार्थ हो गयी। आज मैंने अपना अभीष्ट फल प्राप्त कर लिया है, जो कि मैं जगन्माता, सर्वदेवमयी, कल्याणी, सबके
क्री०ख०-अ०८७ ] * विनायकद्वारा शतमाहिषा और कमठासुरका वध * ४७५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
४७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
क्री०ख०-अ०८८ ] * आठवें मासमें बालक गुणेशद्वारा दैत्योंके वधका आख्यान * ४७७ उस कमठासुरने गिरते समय वहाँके वनों, आश्रमों और नाना प्रकारके वृक्षोंको एकाएक तोड़ डाला। इसके पश्चात् माता पार्वतीने प्रसन्न होकर अपने पुत्रको स्तनपान कराया। वे अपने मनमें सोचने लगीं कि नाना प्रकारकी माया करनेवाले असुरोंकी मायाको जाना नहीं जा सकता। भगवान् त्रिलोचन शंकरकी कृपासे मैंने अपने पुत्रको पुनः प्राप्त किया है॥ ५२-५३॥ जो कि इसने यमराजसे भी अधिक बलशाली कमठासुरको मार डाला। उसी समय देवी पार्वतीकी सखियाँ और उनके गण वहाँ आ पहुँचे और वे बालककी कुशल पूछने लगे ॥ ५४॥ देवी गौरीने उनको प्रसन्नतापूर्वक बतलाया कि सब कुशलसे है। तब गणोंने उस असुर कमठके टुकड़े- टुकड़े करके उन्हें बहुत दूर ले जाकर छोड़ दिया ॥ ५५ ॥ उस समय देवगणोंने उस बालकपर फूलोंकी वर्षा की। जो इस श्रेष्ठ आख्यानको सुनेगा अथवा सुनायेगा वह सभी प्रकारके अरिष्टोंसे मुक्त हो जायगा और अपनी सभी मनोभिलषित कामनाओंको प्राप्त कर लेगा ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कमठासुरके वधका वर्णन' नामक सतासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८७ ॥ अठासीवाँ अध्याय आठवें मासमें बालक गुणेशद्वारा किये गये तल्पासुर एवं दुन्दुभि नामक दैत्योंके वधका आख्यान व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन् ! आपके मुखारविन्दसे मैंने बालक गुणेशके द्वारा किये गये अद्भुत चरित्रोंको सुना, वे [श्रवण करनेसे] सब प्रकारके पापोंको दूर करनेवाले हैं ॥ १ ॥ तथापि हे सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ ! मेरी सुननेकी इच्छा अभी भी पूर्ण नहीं हुई है, अतः आप बालक गुणेशके चरित्रके विषयमें मुझे पुनः आदरपूर्वक बतायें ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! आप पुनः गुणेशकी कथाको सावधान होकर सुनें। इस कथाका श्रवण सभी पापोंका विनाश करनेवाला और धर्म तथा मोक्षको प्रदान करनेवाला है। बालक गुणेशके आठवें मासकी बात है। एक दिन ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालमें देवी पार्वती जब अपने भवनमें ग्रीष्मसे अत्यन्त पीड़ित हो गयीं तो वे पुष्पवाटिका में चली गयीं ॥ ३-४ ॥ वह वाटिका अशोक, चन्दन, कटहल, आम्र, बहेड़ा, मालती, चम्पक, जाती, चिंचडी, नीम तथा पारिजात वृक्षोंकी सघन छायासे आच्छादित थी। वहाँ एक रमणीय सरोवर था, जिसमें कमल खिले हुए थे और उस सरोवरका जल अत्यन्त सुन्दर तथा शीतल था। वहाँ बने हुए एक श्रेष्ठ पलंगपर सखीके द्वारा लाये गये शुभ बिस्तरमें वे गिरिजा अपने बालक गुणेशको लेकर निःशंक होकर सो गयीं ॥ ५-७॥ उस समय पार्वतीकी सखियाँ उन्हें अश्मा (रत्नादि)- से जटिल मूठवाले चाँवरसे पंखा झल रही थीं। जब वे गहरी निद्रामें सो गयीं, तब उसी समय महान् बलशाली दैत्य, जो तल्पासुर नामसे विख्यात था, वह वायुका रूप धारणकर वहाँ आया और शय्याके भीतर प्रविष्ट होकर उस शय्याको लेकर आकाशमें उड़ चला ॥ ८-९ ॥ उस तल्पासुरके शब्दसे पार्वतीकी वे दोनों सखियाँ भयभीत हो भूमिपर गिर पड़ीं और इधर शय्यापर स्थित देवी पार्वती बहुत जोर-जोरसे चिल्लाने लगीं ॥ १०॥ आकाशमें स्थित होकर ही वे पार्वती क्रन्दन करते हुए कहने लगीं- हे शंकर ! दौड़ो ! दौड़ो। हे देव! मैंने कौन-सा [आपका] अपकार किया है, क्यों आप मेरी उपेक्षा कर रहे हैं? ॥ ११ ॥ यह तल्पासुर नामक दैत्य बहुत बलवान् है, यह आकाशको चीरता हुआ तेजीसे दौड़ रहा है। आप तो सब प्रकारसे समर्थ हैं, फिर पराये हाथमें गयी हुई अपनी भार्याकी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं ? ॥ १२ ॥ इस पुत्रके साथ सम्बन्ध होनेसे मुझे नाना प्रकारके
४७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दुःख उठाने पड़े हैं। क्या इस दैत्यके हाथों अपने पुत्रसहित मेरी मृत्यु लिखी है ? यह अगर उत्पन्न ही नहीं होता, तो इस प्रकारका बन्धन मुझे कैसे प्राप्त होता ? ॥ १३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-माता पार्वतीके इस प्रकारके विलापको सुनकर उमापुत्र वे महामनस्वी बालक गुणेश उस समय बादलोंकी भाँति दिशाओंको गुँजाते हुए बार-बार उच्च स्वरमें गर्जना करने लगे। उस गर्जनासे समुद्र, वन तथा खानोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी कम्पित हो उठी ॥ १४-१५ ॥ उस समय जब प्रमथगणों आदिने देवी पार्वतीको वहाँ नहीं देखा, तो वे शोक करने लगे। तदनन्तर बालक गुणेशने अपने चरणोंके प्रहारसे उस शय्यापर प्रहार किया। उस ध्वनिसे सभी प्राणी एकाएक भयभीत-से हो गये। आकाश मानो सैकड़ों भागोंमें विभक्त हो गया। उनके पादाघातसे वह शय्या टुकड़े-टुकड़े होकर भूमिपर गिर पड़ी। तब वह तल्पासुर दीख पड़ा तो बालक गुणेशने उसे पकड़ लिया और एक हाथसे उन्होंने लीलापूर्वक अपनी माताको इस प्रकार पकड़ लिया, जैसे कि चातक पक्षी मेघसे छूटी हुई जलकी बूँदको अपनी चोंचद्वारा सहसा पकड़ लेता है ॥ १६-१८१/२ ॥ बालक गुणेशने माताको अपने कन्धेपर बैठा लिया और बायें हाथसे तल्पासुरकी चोटी पकड़कर बड़े वेगसे सहसा उसे भूमिपर पटक दिया। फिर वे एक योगीकी भाँति पद्मासन लगाकर उस दैत्य तल्पासुरकी देहके ऊपर बैठ गये ॥ १९-२० ॥ बड़े वेगसे बलपूर्वक मसल दिया गया वह दैत्य दूर आकाशसे भूमिपर गिर पड़ा, मुँहसे बार-बार रक्त वमन करते हुए उस दैत्य तल्पासुरने प्राण त्याग दिये। लोगोंने देखा कि वह दुष्ट दैत्य इक्कीस योजन विस्तारवाला है। वह वृक्षों, पत्थरों, आश्रमों तथा घरोंको चूर-चूर करता हुआ गिरा ॥ २१-२२ ॥ तभी गणों तथा सखियोंने उस बालकको देखा तो वे कहने लगीं-हे गौरी ! तुम्हारा यह बलवान् बालक कुशलसे है और प्रसन्न होकर खेल कर रहा है ॥ २३ ॥ उस समय देवी पार्वती भ्रान्तिवश आकाश, पृथ्वी तथा अपने बालकके विषयमें कुछ भी नहीं जान पा रही थीं। तब मुनिजनोंने उनसे कहा- हे सती ! आप सावधान मनवाली हो जाइये। आपके बालकने विशाल रूप धारणकर उस दैत्य तल्पासुरका वध कर डाला है। हे शुभे ! आप अपनी आँखें खोलकर अपने बालकको पहले-जैसी स्थितिमें देखिये, जो कि कुशलसे है और मंगलकारी है ॥ २४-२५ ॥ ब्रह्माजी बोले-उन मुनिजनोंके कथनसे वे पार्वती सचेत हो उठीं और तब उन्होंने उस दैत्यको तथा बालक गुणेशको देखा ॥ २५१/२ ॥ गौरी बोलीं- क्या मैं कुछ विपरीत देख रही थी कि बालकने मुझे उठा रखा है। अथवा क्या सचमुच इस बालकने इक्कीस योजनवाले इस महान् दैत्यका वध कर डाला है। मुझे जीवनदान प्रदान करनेवाला यह बालक अपने मातृ-ऋणसे उऋण हो गया है ॥ २६-२७ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने बालकको ले लिया और शान्तिकर्म करवाया। [ब्राह्मणोंको] अनेक दान प्रदान किये और फिर अपने बालकको स्तनपान कराया ॥ २८ ॥ इस [दैत्यवधरूप] कौतुकको देखकर वहाँ उपस्थित सभी जनोंने बालककी प्रशंसा की और वे अत्यन्त प्रसन्नतासे भर गये। इसी समय एक दूसरे महान् असुरने बड़ा भयंकर शब्द किया ॥ २९ ॥ उसकी शब्दध्वनि दुन्दुभिवाद्यके समान थी, इसलिये वह दुन्दुभि नामसे ही विख्यात भी था। उसकी हथेलीके आघातसे पृथ्वी चूर-चूर हो जाती थी ॥ ३० ॥ उसके गगनचुम्बी विशाल शरीरसे भगवान् सूर्य ढक जाते थे। उसने [किसी] शिवगणके बालकका रूप धारणकर गौरीके बालक गुणेशको पुकारते हुए कहा- यहाँ आओ, आज हम दोनों मिलकर खेल करते हैं। तब वे बालक गुणेश भी उसके पास चले आये। तब उस बालकरूप दैत्यने पार्वतीपुत्र गुणेशको अपनी गोदमें बिठा लिया और उन्हें विषभरा एक फल दिया ॥ ३१-३२ ॥
क्री०ख०-अ०८९ ] * दसवें तथा ग्यारहवें मासकी अवस्थामें गुणेशद्वारा दैत्योंके वधकी कथा * ४७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 फल देकर वह बालक गणेशसे बोला—खाओ- | तरहसे टूट गया। इधर बालक गुणेशने भी उसी क्षण खाओ, इस फलको शीघ्र ही खाओ। मैं इस फलको | बलपूर्वक उसके सिरको खींचा, जिसके कारण कण्ठनालसे बहुत दूरसे लाया हूँ, यह फल जन्म, मृत्यु और | पृथक् होकर उसका सिर बालक गुणेशके हाथमें आ वृद्धावस्थाका हरण करनेवाला है॥ ३३॥ | गया। उसी क्षण सारी भूमि रक्तसे सन गयी। उस दैत्यके बालक गुणेशने उसके दुष्ट मनोभावको जानते हुए | सिरको कमलकी भाँति हाथमें लेकर गिरिजापुत्र गुणेश वह फल ले लिया और उसे खा भी लिया, पुनः उन्होंने | उससे खेलने लगे॥ ३९-४१॥ निडर होकर दूसरा फल भी उस दैत्यसे माँगा ॥ ३४॥ | बालक गुणेशके सभी अंग भी रक्तसे लथपथ हो ब्रह्माजी बोले- भगवान् शिवकी इच्छासे अमृत | गये, यह देखकर गणोंने माता पार्वतीको यह समाचार भी विष हो जाता है और विष भी अमृत हो जाता है। | सुनाया। वहाँ जाकर उन्होंने पुत्रको देखा और पुत्रकी तदनन्तर वे गुणेश उसके वक्षःस्थलको पकड़कर उसी | वैसी स्थिति देखकर उन्होंने बालकके हाथसे उस दैत्यके क्षण उठ खड़े हुए। उन्होंने उसके दोनों घुटनोंपर अपने | सिरको दूर फेंक दिया और वस्त्रसे बालकको पोंछा। फिर पैर रख दिये और दोनों हाथोंसे उसकी चोटीको पकड़ | उसे स्नान कराया, स्वयं भी स्नान किया और प्रसन्नतापूर्वक लिया। फिर उन्होंने अपने हाथोंसे उसकी दाढ़ी पकड़कर | बालक गुणेशको स्तनपान कराया॥ ४२-४३॥ लीलापूर्वक उसे झुला डाला ॥ ३५-३६॥ | तदनन्तर उनकी सखियाँ तथा गण वहाँ आये और फिर वे पृथ्वीके समस्त भारको धारणकर उसके | उन्होंने बालककी कुशल पूछी। वे बोलीं शिवभक्तिके जानु-भागमें खड़े होकर नाचने लगे। पीड़ित होकर वह | कारण यह बालक अत्यन्त कुशलसे है॥ ४४॥ दैत्य कहने लगा-मेरे जानुदेशसे नीचे उतरो ॥ ३७॥ | महर्षि मरीचिद्वारा किये गये रक्षाविधानके कारण तुम्हारे बोझसे तथा तुम्हारे द्वारा नाच करनेसे मेरे | भी मेरा बालक कुशलसे है। तदनन्तर उन गणोंने उस शरीरमें अत्यन्त पीड़ा हो रही है, अरे गिरिजाके पुत्र ! | दुष्ट दानवको ले जाकर दूर फेंक दिया ॥ ४५ ॥ मुझे छोड़ दो-छोड़ दो, मैं अपने घरको चला जाऊँगा ॥ ३८॥ | तब अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर सभी गण तथा ब्रह्माजी बोले- उस दैत्यके द्वारा इस प्रकार | सखियाँ अपने-अपने घरोंको गये। पार्वती भी अत्यन्त प्रार्थना किये जानेपर भी बालक गुणेशने उसे नहीं छोड़ा। | हर्षयुक्त होकर बालक गुणेशको लेकर अपने भवनमें तब वह दैत्य जोर लगाकर उठा तो उसका शरीर पूरी | प्रविष्ट हुईं ॥ ४६ ॥ ॥ इस प्रकार गणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'मंचकासुरका वध' नामक अठासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८८ ॥ नवासीवाँ अध्याय दसवें मास तथा ग्यारहवें मासकी अवस्थामें बालक गुणेशद्वारा किये गये आजगरासुर तथा शलभासुर नामक दैत्योंके वधकी कथा ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी !] जब बालक | बोल भी रहे थे। कभी वे लुढ़क जाते थे। कभी नाचने गुणेशका दसवाँ मास चल रहा था। उस समय एक | लगते थे, तो कभी माता पार्वतीको देखकर रोने लगते दिनकी बात है, जब भगवान् सूर्यका उदय होनेके बाद | और उनके पीछे लग जाते और कभी सहसा भगवान् तीन मुहूर्तका समय व्यतीत हो गया था। तब पार्वतीपुत्र | शिवके पीछे चलने लगते। इस प्रकारकी आनन्ददायिनी गुणेश कभी पेटके बल रेंगते हुए और कभी पैरोंसे चलते | क्रीडा करते हुए अपने बालकको देखकर उस समय हुए क्रीडा कर रहे थे और कुछ-कुछ अस्पष्ट वाणीमें | पार्वती अत्यन्त हर्षित हो उठीं ॥ १-३॥
४८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] इसी समय बालक गुणेशने आजगर नामक एक दैत्यको देखा। वह दैत्य अपने नेत्रोंसे आगकी चिनगारियाँ बरसा रहा था। उसका शरीर वज्रसारके समान कठोर था। वह अपनी जिह्वा लटकाये हुए था। उसका शरीर बहुत विशाल था। वह ऐसा दिखायी पड़ रहा था, मानो महान् पर्वतको निगल रहा हो। वह एक बहुत बड़े वृक्षके नीचे बैठा हुआ था और अपनी दोनों जिह्वाओंको बार-बार लपलपा रहा था ॥ ४-५ ॥ बालक गुणेशने बालस्वभाववश रेंगते हुए जाकर उस अजगरको पकड़ लिया। तब उस अजगरने सहसा उन्हें शीघ्र ही अपने मुखके अन्दर भर लिया। उनके मुखके अन्दर प्रविष्ट होते ही उस वायुभक्षी अजगरने अपने दोनों ओठोंको मिला लिया ॥ ६१/२ ॥ जब गौरीने आँगनमें बालक गुणेशको नहीं देखा तो उनका मन अत्यन्त व्याकुल हो गया। वे कहने लगीं—मेरा बालक अभी-अभी यहींपर खेल रहा था, फिर किसने उसका हरण कर लिया और किसीने मार तो नहीं डाला ? वे अत्यन्त शोक करने लगीं और दुःखसे परम आर्त होकर वे अपने सिरको पीटने लगीं ॥ ७-८ ॥ उस समय गणोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और कहा हे माता ! आप निराश न हों। उस बालकका प्रभाव सबको विदित ही है, वह सैकड़ों गुना अधिक बलवान् है। उस अजगरके उदरमें प्रविष्ट हुए वे बालक गुणेश बढ़ने लगे, जिससे उस दैत्यकी साँस रुकने लगी। तब वह अजगर अपनी पूँछके अन्तिम भागको हिलाने डुलाने लगा। तदनन्तर उस अजगरकी प्राणवायु रक्तके साथ दोनों नेत्रोंसे बाहर निकल गयी। तब अम्बिकापुत्र गुणेश उसकी देहको चीरते हुए बाहर निकल आये ॥ ९-११ ॥ उस दैत्य अजगरके रक्तसे सने हुए अंगवाले उन गुणेशको देखकर यह लग रहा था कि क्या यह खिला हुआ पलाशका वृक्ष तो नहीं है? तदनन्तर गणोंने अपनी अंगुलिको चाटते हुए उन बालक गुणेशको देखा और वे जोर-जोरसे चिल्लाते हुए पार्वतीसे कहने लगे कि दुष्ट अजगर दैत्यको मार करके ये बालक गुणेश उसके
[दायाँ स्तम्भ] मुखसे बाहर निकल आये हैं ॥ १२-१३ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन (गणों)-की बात सुनते ही तत्काल पार्वतीने बालक गुणेशको उठा लिया। जल्दीसे स्नान कराया और उन्हें प्यार करते हुए स्तनपान कराया ॥ १४ ॥ अरे वत्स ! तुम कहाँ चले गये थे ? तुम्हें देखे बिना मुझे तो एक क्षणका समय भी एक वर्षके समान लगता था। तदनन्तर उन्होंने सौ योजन विस्तारवाले अजगरको देखा। वह बड़ा ही दुष्ट था। उसका मुख बड़ा ही भयानक था। वह बहुत-सा रक्त वमन कर रहा था और अनेक वृक्षसमूहों तथा घरोंको गिराते हुए जमीनपर गिरा था ॥ १५-१६ ॥ गौरी बोलीं—इस स्थानपर अभी न जाने कितने दैत्य और राक्षस होंगे। इस बालकके पराक्रमसे कितने ही राक्षस मृत्युको प्राप्त हो चुके हैं। तदनन्तर उन सभी गणोंने उस महान् असुरको दूर ले जाकर फेंक दिया ॥ १७१/२॥ तदनन्तर ग्यारहवें मासकी बात है। देवी पार्वती अपने द्वारपर गयी हुई थीं। वहाँ वे अपनी सखियोंके साथ बालक गुणेशकी बहुत-सी क्रीडाओंको देख रही थीं। वह बालक किसी सखीका मुख चूम रहा था और किसीसे अपना चुम्बन करा भी रहा था ॥ १८-१९ ॥ किसी सखीके पीछे जाकर स्वयं अपने हाथोंसे उसकी दोनों आँखोंको बन्द कर दे रहा था और किसी दूसरे बालककी माताके पास जाकर बलपूर्वक उसके स्तनोंका पान कर ले रहा था। अपना मुख वस्त्रसे ढककर किन्हीं दूसरी स्त्रियोंको डरा दे रहा था। वह गुणेश उनके मुख, केश तथा नासिका और आभूषणोंको खींच दे रहा था। वह अपने तथा पराये जनोंको देखकर तोतली वाणीमें बोल रहा था ॥ २०-२११/२ ॥ इसी समय शलभासुर नामक एक दुष्ट दानव वहाँ आया। वह ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अपराजेय था। उसके स्कन्ध पर्वतके समान ऊँचे थे। उसका विशाल सिर आकाशको भी फोड़ देनेवाला था। वह बादलकी भाँति नीले वर्णका था। उसके नेत्र जपापुष्पके
क्री०ख०-अ०९० ] * बालक गुणेशके द्वारा बारहवें मासमें दैत्योंका वध * ४८१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 समान लाल रंगके थे। उसके सींग बादलोंको स्पर्श | अपने बालक गुणेशसे बोलीं—हे पुत्र! किसी भी जीवकी करनेमें समर्थ थे। वह तीनों लोकोंको ग्रसता हुआ-सा | हत्या नहीं करनी चाहिये, इस प्राणीको तुम छोड़ दो। उस बालक गुणेशके समीपमें आया ॥ २२-२४ ॥ | तब भी बालक गुणेशने हठ करके बलपूर्वक उस वह जहाँ-जहाँ जाता था, उसे पकड़नेके लिये बालक | असुरको पत्थरपर पटक डाला ॥ २९-३० ॥ गुणेश भी वहीं-वहीं जाते थे। इस प्रकारसे महान् वेगशाली | उस समय उसके सौ टुकड़े हो गये और वह वे दोनों बहुत समयतक इधर-उधर घूमते रहे। तदनन्तर | आकाशको गर्जनासे गुँजाता और घरों तथा तोरणोंको बालक गुणेश जब थक गये, तब वे बहुत वेगसे दौड़ते हुए | गिराता हुआ भूमिपर गिर पड़ा ॥ ३१ ॥ उस असुरके पास गये और उन्होंने उस महान् बलशाली | उसका शरीर दस योजन विस्तारवाला हो गया। उस शलभासुरको एकाएक पकड़ लिया ॥ २५-२६ ॥ | समय उसके मुखसे बहुत-सारा रक्त बह चला। वह बहुत- वह अपने दोनों पंखोंको उसी प्रकार फड़फड़ाने | से आश्रमों तथा वृक्षोंको चूर-चूर करते हुए गिरा। तब लगा, जैसे कि किसी मनुष्यके द्वारा हाथमें पकड़ा हुआ | माता अपने पुत्रको पकड़कर वहाँसे ले गयी और उस बाज पक्षी अपने पंख फड़फड़ाने लगता है। वह | बालकको गोदमें बैठाकर अपना स्तनपान कराया तथा शलभासुर अपने पैरोंके प्रहारसे बालकको पीड़ित करने | भोजन कराया। उस बालक गुणेशको तथा उस प्रकारके लगा। उस समय वह असुर अपनी विकराल आँखोंको | विस्तृत शरीरवाले मरे हुए दैत्यको देखकर उन पर्वतराजपुत्री फाड़-फाड़कर उस शिशु गुणेशको देखने लगा। वह | पार्वतीसे सखियाँ कहने लगीं—बहुत अच्छा हुआ, बहुत बालक गुणेश उसको छोड़ दे रहा था, फिर पकड़ ले | अच्छा हुआ। तदुपरान्त पार्वतीने अपने भवनमें प्रवेश किया रहा था ॥ २७-२८ ॥ | और वे सखियाँ भी प्रसन्नचित्त होकर अपने-अपने घरोंको वह उसे अपनी माताको दिखाता था और फिर | गयीं। देवी पार्वतीकी आज्ञामें रहनेवाले गणोंने उस दैत्यको धरतीपर पटक दे रहा था। उसको देखकर दयाके | दूर ले जाकर फेंक दिया। उस समय देवगणोंने उस बालक वशीभूत हो पार्वती उस समय कठोर हुए मनवाले उस | गुणेशके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा की ॥ ३२-३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शलभासुरके वधका वर्णन' नामक नवासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८९ ॥ ন্দ্ৰ नब्बेवाँ अध्याय बालक गुणेशके द्वारा बारहवें मासमें नूपुर तथा अविपुत्र नामक दैत्योंका वध ब्रह्माजी बोले— बारहवें मासकी बात है। एक | शब्दोंका उच्चारण करते हुए नृत्य करने लगे ॥ २-३ ॥ दिन देवी पार्वती विविध अलंकरणोंसे अलंकृत करके | बालक गुणेशके उस प्रकारके शब्दको सुनकर अपने अद्भुत पुत्र बालक गुणेशको गोदमें लेकर अपनी | भगवान् शिव भी नृत्य करनेके लिये वहाँ आ पहुँचे। सखियोंके साथ बैठी हुई थीं ॥ १ ॥ | भगवान् शिवको नृत्य करते हुए देखकर श्रीविष्णु स्वयं उस समय गुणेशकी आभा करोड़ों सूर्योंकी प्रभासे | भी नृत्य करने लगे। तदनन्तर इन्द्र आदि सभी देवता भी सम्पन्न थी और वे करोड़ों आभूषणोंसे विभूषित थे। उस | नृत्यकी अभिलाषासे वहाँ आ पहुँचे। वह बालक जिस समय माताको पुत्रके नृत्यके दर्शनकी महान् उत्कण्ठा | प्रकारसे नृत्य कर रहा था, उसी प्रकारसे वे सब भी हुई। अन्य बालकों तथा भगवान् शिवकी भी नृत्य- | नाचने लगे ॥ ४-५ ॥ दर्शनकी इच्छा जानकर वे गिरिजापुत्र गुणेश 'थेयि थेयि' | वह गुणेश जिस भावको प्रकट कर रहा था, वे
४८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- सभी भी वैसा ही भाव प्रदर्शित करने लगे। सभी मनुष्य, पशु, वृक्ष, यक्ष, राक्षस, पन्नग, मुनिजन, मनुगण, राजालोग, चौदहों भुवन और इक्कीस स्वर्गोंके निवासी तथा सभी चेतन और अचेतन प्राणी उस बालक गुणेशके प्रभावसे नृत्य करने लगे। उस गुणेशकी इच्छाके अनुसार भूतलके समस्त प्राणी, मुनिजनोंकी पत्नियाँ, देवताओंकी पत्नियाँ भी उन गिरिकन्या पार्वतीके साथ नृत्य करने लगीं ॥ ६-८॥ हे मुनिवर व्यासजी ! उस समय नूपुरोंकी ध्वनिसे, छोटी-छोटी घण्टियोंके शब्दोंसे तथा पैरोंके आघातकी थापसे दिशाएँ एवं विदिशाएँ और आकाश तथा पर्वत भी निनादित हो उठे। धरती, शेषनाग, सूर्य, चन्द्र तथा तारागण कम्पित हो उठे ॥ ९-१० ॥ तब नृत्यकी अत्यन्त पराकाष्ठा देखकर देवी पार्वतीने और आगे नृत्य न करनेकी आज्ञा प्रदान की, तब भी बालक गुणेशने गौरीद्वारा कहे गये वचनका पालन नहीं किया ॥ ११ ॥ उसी समयकी बात है, नूपुर नामक महान् दैत्य वहाँ आया। उसका शरीर काले रंगका और अत्यन्त कठोर था। उसके पैर पातालतक लम्बे थे और उसका सुदृढ़ मस्तक आकाशको छूनेवाला था ॥ १२ ॥ वह दुष्ट राक्षस अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करके शिशु गुणेशके नूपुरोंके अन्दर प्रविष्ट हो गया। बालक गुणेशने भी उस अत्यन्त बलवान् दैत्यको शीघ्र ही अपनी मायासे उसी प्रकार बाँध लिया, जैसे कि मदस्रावी चार दाँतोंवाले हाथीको जंजीरोंसे बाँध दिया जाता है। तभी पर्वतराजपुत्री पार्वतीने अपने बालक उस गुणेशको पुनः गोदमें ले लिया ॥ १३-१४॥ उस समय उस गुणेशके भारसे वे पार्वती उसी प्रकार पीड़ित हुईं, जैसे कि पृथिवीका ही भार गोदमें आ गया हो। तब गौरी कहने लगीं- तुम अभी-अभी इतने भारी कैसे हो गये हो ? अतः तुम मेरी गोदसे उतर जाओ, अरे बालक ! तुम्हारे भारके कारण तो मेरे प्राण ही निकल जायँगे ! ॥ १५-१६ ॥ ब्रह्माजी बोले- माताके ये वचन कि 'वह भारसे अत्यन्त पीड़ित हो रही है' सुनकर बालक गुणेश माताकी गोदसे उतर गये और उन्होंने बलपूर्वक अपने दोनों पैरोंको जोरसे झटका मारा ॥ १७ ॥ फलस्वरूप वह दैत्य नूपुरसे निकलकर पक्षीकी भाँति आकाशमें चक्कर काटने लगा। उसके विस्तृत शरीरसे सूर्यके ढक जानेके कारण सम्पूर्ण पृथ्वीमें अन्धकार छा गया ॥ १८ ॥ अकस्मात् वह दुष्ट दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़ा और उसके सौ टुकड़े हो गये। यह देखकर सभी मुनिगण तथा देवता परम आनन्दमें निमग्न हो गये और वे उन बालरूपी अविनाशी परमात्माकी स्तुति करने लगे ॥ १९१/२ ॥ देवता तथा ऋषि बोले- हे देव ! हम लोग आपके विविध स्वरूपों, आपके तेज तथा दैत्यों और दानवोंका विनाश करनेवाली आपकी अनेकों प्रकारकी लीलामयी मायाको नहीं जानते हैं। आपने सूर्यमण्डलको आच्छादित कर देनेवाले दैत्य नूपुरको अपने चरणोंसे झटक दिया। वह आकाशमें बार-बार चक्कर काटता हुआ पुनः पृथ्वीपर गिरकर सौ टुकड़े हो गया। गिरते समय उसने अनेक प्राणिसमूहों, वृक्षों, आश्रमों तथा पर्वतोंको विनष्ट कर डाला। आपको नृत्य करते देखकर अन्य सभी लोग भी बादमें नृत्य करने लगे ॥ २०-२२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उन सभीने विश्वरूपी उन बालक गुणेशकी पूजा की। नृत्योत्सवके पूर्ण हो जानेके अनन्तर देवी पार्वतीने गौतम आदि महर्षियोंको विदा किया और वे बालक गुणेशको गोदमें लेकर दुलार करती हुईं उन्हें अपना स्तनपान कराने लगीं ॥ २३-२४॥ फिर उन्होंने सभी स्त्रियोंको विदाकर अपने भवनमें प्रवेश किया। कुछ दिनोंके बादकी बात है, एक दिन वे गुणेश मुनिबालकोंके साथ घरसे बाहर क्रीडा करनेके लिये गये और लीलापूर्वक क्रीडा करने लगे। उन सभी बालकोंने दो-दोका जोड़ा बनाकर अनेक प्रकारसे बहुत बार परस्पर मल्लयुद्ध किया ॥ २५-२६॥ वे परस्पर चोटी पकड़कर एक-दूसरेको गिराने
क्री०ख०-अ०९० ] * बालक गुणेशके द्वारा बारहवें मासमें दैत्योंका वध * ४८३ लगे। वे कभी एक-दूसरेके सिर-में-सिर भिड़ाकर, कभी घुटनों-से-घुटना टकराकर, कभी कोहनी-से-कोहनीमें मारकर तो कभी पैरसे दूसरेके पैरमें चोट मार [करके क्रीडा कर] रहे थे। वे कभी एक-दूसरेकी पीठपर चढ़ जाते, तो कभी कन्धेपर चढ़ जाते ॥ २७-२८ ॥ वे बालक कभी-कभी नियत समयके लिये हाथ फैलाकर दौड़ लगाते और कभी मुट्ठीमें धूलि भरकर एक-दूसरेपर फेंकने लगते। वे परस्पर कभी एक-दूसरेके पेटमें लातसे मार रहे थे, तो कभी सिरपर मार रहे थे। कुछ बालक गन्ध, पुष्प तथा अक्षत आदिके द्वारा उन गुणेशका पूजन कर रहे थे ॥ २९-३० ॥ कुछ बालक उन गुणेशको अपने आश्रममें ले जाकर अन्न आदिका भोजन करा रहे थे। कोई उनके चरणयुगलमें प्रणाम करके सुन्दर माला चढ़ा रहे थे। उसी समय सिन्धुदैत्यद्वारा भेजा हुआ भेड़के बच्चेका रूप धारणकर एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा, जिसे देखकर हाथमें दण्ड धारण करनेवाले भयानक यमराज भी भयभीत हो जाते थे ॥ ३१-३२ ॥ तीखी धारसे युक्त नखोंवाला वह बलशाली भेड़ा अपने पराक्रमसे शत्रुओंका वध कर देता था। उसने सभीको जीतकर अपने बाहुदेशमें विजयपत्र बाँध रखा था। उसकी आँखें बहुत बड़ी-बड़ी थीं। सींग उसके बहुत विशाल थे। बड़े-बड़े पर्वतोंको वह चूर-चूर कर डालता था। वह भेड़रूप दुष्ट दैत्य अपनी पूँछके आघातसे प्राणियोंको मार डालता था ॥ ३३-३४ ॥ वह अपने सींगोंके आघातसे वृक्षों तथा पर्वतोंको उखाड़ डालता था। वह बलवान् भेड़ा मनुष्योंका पीछा करता हुआ बलपूर्वक उन्हें मार डालता था ॥ ३५ ॥ वह महान् असुर पार्वतीके पुत्र गुणेशको मारनेके लिये आया। वह पीछेसे दौड़कर जबतक उसको मारता, उससे पहले ही बालक गुणेशने अपने हाथोंसे उसके सींग पकड़ लिये और उसकी पीठपर वे उसी प्रकार चढ़ गये, जैसे घोड़ेकी पीठपर कोई बालक चढ़कर बैठ जाता है ॥ ३६-३७ ॥ उस समय कुछ मुनिबालक उस दैत्य भेड़केी पूँछ पकड़कर खींचने लगे और कुछ लाठियों तथा डण्डोंसे उस महान् दैत्यको पीटने लगे ॥ ३८ ॥ किंतु उस दैत्यने उन सबकी अवहेलना करते हुए उन्हें शीघ्र ही पूँछके आघातसे आहत किया। तब वे पूँछके आघातसे पीड़ित होकर भूमिपर गिर पड़े ॥ ३९ ॥ उस दैत्यके वैसे पराक्रमको देखकर बालक गुणेश उसकी पीठसे उतर गये और उसे पकड़कर देरतक घुमाकर सहसा उसकी पीठमें प्रहार किया। जिससे वह असुर हजार टुकड़ोंमें खण्डित होकर सहसा मर गया, मरते समय उसके द्वारा किये गये शब्दसे तीनों लोक भयभीत हो उठे ॥ ४०-४१ ॥ वह अपने विकृत मुखको फैलाकर उस मुखसे रक्त बहाने लगा। तदनन्तर वे मुनियोंके बालक पर्वतपुत्री पार्वतीसे कहने लगे-भेड़ेके रूपमें स्थित इस महान् असुरको, जो हमको मारनेके लिये आ रहा था, उसे इस बलशाली बालकने खेल-खेलमें ही मार डाला है ॥ ४२-४३ ॥ ब्रह्माजी बोले-तब देवी पार्वतीने मरे हुए महादैत्य तथा अपने पुत्र गुणेशको देखा तो वे परम आश्चर्य करने लगीं और फिर वे बालक गुणेशको अपने भवनमें ले गयीं। वहाँ ले जाकर उन्होंने उसके सिरके ऊपर जलके साथ दही तथा भात घुमाकर उसे घरसे बहुत दूर ले जाकर फेंका तथा बालकको स्तनपान कराया ॥ ४४-४५ ॥ गणोंने दैत्यके शरीरके उन टुकड़ोंको दूर ले जाकर फेंक दिया। उस समय मुनिगणों, मुनिपत्नियों, मुनिबालकों तथा अन्य स्त्रियोंने पार्वतीके पुत्रकी प्रशंसा की। देवताओंने बालक गुणेशपर पुष्पोंकी वर्षा की। ब्राह्मणोंने उसे आशीर्वाद प्रदान किया और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'नूपुर तथा अविपुत्र नामक दैत्योंके वधका वर्णन' नामक नब्बेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९० ॥
इक्यानबेवाँ अध्याय
४८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इक्यानबेवाँ अध्याय बालक गुणेशद्वारा कूट तथा मत्स्य आदि रूप धारण करनेवाले दैत्योंके वधकी लीला-कथा ब्रह्माजी बोले—गुणेशके दूसरे वर्षकी अवस्थाकी | देखनेमात्रसे मरे हुए उस कूट नामक दैत्यको भूमिपर बात है, बालक गुणेश असंख्य बालकोंके साथ वाटिकामें | गिरा दिया॥ ९-१०॥ क्रीड़ा कर रहे थे, वह वाटिका विविध प्रकारके वृक्षों | उस दैत्यके गिरनेसे पाँच योजन विस्तारवाली वह तथा लताओंसे व्याप्त थी॥ १॥ | वाटिका चूर-चूर हो गयी। यह दृश्य वहाँ उपस्थित सभी वे गुणेश खजूर तथा कटहलके फलोंको स्वयं खा | नगरवासियोंने देखा। कुछ लोग भयभीत होकर भाग गये भी रहे थे और बलशाली होनेसे बहुत-से फलोंको | थे। बालक गुणेशने सभी जलचर जीवोंको जिला दिया गिराकर उन बालकोंको भी दे रहे थे॥ २॥ | और उस सरोवरको विषसे रहित कर दिया। सभी उसी समय कूट नामक एक महान् दैत्य उन | नगरनिवासी अपने-अपने बालकोंको लेकर अपने-अपने बालकोंके पानी पीनेका समय जानकर वहाँ आया। वह | घर चले आये॥ ११-१२॥ दैत्य अत्यन्त दुष्ट, कपटी एवं मायावी था। उस दुर्बुद्धि | सभीने पार्वतीके पुत्र उन गुणेशकी प्रशंसा की, दैत्यने उन सब बालकोंको मारनेकी इच्छासे सरोवरके | किंतु जो नास्तिक और दुष्ट थे, वे उनकी निन्दा जलमें ऐसी विषराशिको हिलाकर मिला दिया, कि | करने लगे। कुछ दूसरे लोग कहने लगे कि इसके जिसके स्पर्श करनेमात्रसे प्राणी क्षणभरमें मर जाते थे | साथ होनेसे सभी अरिष्ट विनष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर और जिन विषोंसे उठी हुई वायुसे आकाशचारी पक्षी | तीसरे वर्षकी बात है, एक दिन प्रातःकालके समय भूमिपर गिर पड़ते थे। कुछ समय बीतनेके बाद कूट | पार्वतीपुत्र गुणेश सबकी नजरोंसे बचते हुए बाहर नामक वह दैत्य उन बालकोंकी मृत्युको देखनेकी | चले गये, मुनियोंके बालक भी उनके पीछे-पीछे इच्छासे वहाँ जाकर प्रतीक्षा करने लगा॥ ३-५॥ | निकल गये॥ १३-१४॥ तदनन्तर वे बालक, जिन्हें पता नहीं था कि जलमें | एक रात-दिनतक अलग-अलग रहनेके बाद जब विष मिला हुआ है, जल पीनेके लिये वहाँ गये, वहाँ | वे पुनः परस्पर मिले तो एक-दूसरेको गले लगा लिया, उनमेंसे किसीने चुल्लूसे तथा किसीने अंजलिमें जल | उन्होंने गुणेशसे कहा—हे देव! हम सभी सर्वदा आपको लेकर पिया॥ ६॥ | रात्रिमें स्वप्नमें देखा करते हैं। हे प्रभो! आपको देखे जलमें मरी हुई मछलियोंको लेकर वे बालक जब | बिना हमें एक रात्रिका समय एक युगके समान प्रतीत बाहर आये तो विषपान करनेसे स्वयं भी मर गये। यह | होता है। इस समय आपका दर्शन करके हम सभी बहुत देखकर रक्षकने गाँवमें जाकर बालकोंकी मृत्युका समाचार | प्रसन्न हो गये हैं॥ १५-१६॥ उच्च स्वरमें सुनाया॥ ७॥ | हे महासत्त्वसम्पन्न गुणेश! आज हम सब लोग दो तब महान् हाहाकार करते हुए सभी नागरिक वहाँ | दल बनाकर सुखपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। तदनन्तर आधे आये। वे अपने हाथोंसे अपनी छाती पीट रहे थे और | बालक एक ओर हो गये और शेष आधे बालक दूसरी कुछ पत्थरोंसे अपना सिर पीट रहे थे॥ ८॥ | ओर। तब कीचड़से गोले बनाकर उनसे वे बालक पृथ्वी उस समय पुरुषों तथा स्त्रियोंका महान् कोलाहल | और आकाशको निनादित करते हुए एक-दूसरेपर प्रहार व्याप्त हो गया। उन सभीके क्रन्दनको सुनकर पार्वतीपुत्रने | करने लगे। वे आह्लादपूर्वक इस प्रकार युद्ध करते हुए भी अपने दृष्टिपातके द्वारा पुरमें रहनेवाले उन सभी | परस्पर एक-दूसरेको खींचने लगे॥ १७-१८॥ बालकोंको जीवित कर दिया और अपनी क्रूर दृष्टिद्वारा | इस प्रकार आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करते हुए दूर एक
क्री०ख०-अ०१९ ] * बालक गुणेशद्वारा दैत्योंके वधकी लीला-कथा * ४८५
[बायाँ स्तम्भ]
मुनिके आश्रममें पहुँच गये। वहाँपर विद्यमान एक योजन विस्तारवाले एक सरोवरमें जाकर वे क्रीड़ा करने लगे। पूर्वकी भाँति पुनः दो भागोंमें बँटकर अपने-अपने हाथकी अंजलिमें जल लेकर एक-दूसरेपर उछालने लगे। वे कभी जलमें गोते लगाकर, पुनः किसी दूसरेके कन्धेपर चढ़कर उसे बलपूर्वक जलमें डुबो दे रहे थे॥ १९-२०॥ उसी समयकी बात है, एक दैत्य मत्स्यका रूप धारणकर उन सभीके साथ वैसी ही क्रीड़ा करने लगा। वे बालक अपने हाथोंके आघातसे उस सरोवरके जलको छपछपाने लगे और वह भी अपनी पूँछके द्वारा उनपर जल छिड़कने लगा। उस सरोवरके कलुषित जलकी लहरें बार-बार तटपर टकरा रही थीं। सरोवरके किनारेपर स्थित पार्वतीपुत्र गुणेशको देखकर वह मत्स्य उनके समीपमें गया॥ २१-२२॥ उसने अपना मुख फैलाया और गुणेशके दोनों पैरोंको अपने मुखमें भर लिया और फिर 'दौड़ो-दौड़ो' इस प्रकारसे चिल्लाते हुए उन गुणेशको वह खींचते हुए सरोवरके गहरे जलमें ले गया॥ २३ ॥ वह मत्स्यरूपी महादैत्य उन गुणेशको लेकर बहुत समयतक जलमें निमग्न रहा। गिरिजापुत्र गुणेशको जलमें डूबा हुआ देखकर मुनियोंके बालक रोने लगे ॥ २४॥ वे अपने हथेलीके पृष्ठभागको अपने होठोंसे लगाकर हाहाकार करने लगे। कुछ बालकोंने उस सरोवरमें डुबकी भी लगायी, किंतु वहाँ उन्होंने उस बालकको नहीं देखा। पार्वतीके द्वारा पीटे जानेके भयसे भयभीत कुछ बालक भाग खड़े हुए। उनमेंसे कुछ बालकोंने पार्वतीके पास जाकर उस बालकके सरोवरमें डूबनेका समाचार उन्हें बताया कि खेल रहे हम सभी बालकोंको छोड़कर बालक गुणेशको लेकर एक मत्स्य जलमें चला गया॥ २५-२६१/२॥ ब्रह्माजी बोले- बालकोंका वचन सुनकर गौरी मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ीं। एक मुहूर्तके अनन्तर जब चेतनाको प्राप्त हुईं तो रोती हुई बाहर निकल पड़ीं। उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू निकल रहे थे, मस्तकपरसे
[दायाँ स्तम्भ]
आँचल गिर गया था॥ २७-२८॥ वे लड़खड़ाती तथा लम्बी श्वास लेती और भूमिपर गिरती हुई जा रही थीं। कुछ सखियाँ अपना काम-धाम छोड़कर शीघ्र ही उनके पीछे दौड़ पड़ीं॥ २९॥ देवी पार्वती अपनी सखियोंके साथ शीघ्र ही वहाँ पहुँच गयीं। मुनिगण भी वह समाचार पाकर सरोवरकी ओर चल पड़े ॥ ३०॥ उनमेंसे कुछने अगाध जलमें गोता लगाया, किंतु वे उमापुत्र गुणेशको खोज नहीं पाये। कुछ मुनियोंने गुणेशकी मातासे कहा- हमारे बालकोंने जलमें डुबकी लगायी, किंतु उन्होंने मत्स्यके उदरमें प्रविष्ट आपके बालकको नहीं देखा। उनके वचनोंको सुनकर गौरीने पुनः रोना आरम्भ कर दिया॥ ३१-३२॥ उमा बोलीं- उस सर्वांगसुन्दर बालकको देखे बिना मेरे प्राण निकल जायँगे। मैंने बड़े ही कष्टसे उस अत्यन्त पराक्रमी ईश्वरको प्राप्त किया है। वह समस्त चराचर जगत्का गुरु है, मायासे परे है, परम मायावी है, अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंका नायक है और विश्वकी सृष्टि करनेवाला है॥ ३३-३४॥ ऐसा कहते हुए वे अपने हाथसे बार-बार अपना माथा और वक्षःस्थल पीटने लगीं। उस प्रकारसे विलाप करती हुई उन पार्वतीको देखकर मुनिगण भी रोने लगे। तदनन्तर उन दयालु देव गुणेशने उनके कारुणिक वचन सुनकर स्वयं भी मत्स्यका रूप धारण कर लिया। तदनन्तर मत्स्यरूपधारी गुणेश और मत्स्यरूपधारी दैत्यमें परस्पर युद्ध होने लगा ॥ ३५-३६ ॥ उन दोनोंके परस्पर आघातसे जलचर जीव मरकर तटपर गिर रहे थे। वे दोनों दाँतोंसे एक-दूसरेको काट रहे थे और पूँछके आघातसे एक-दूसरेपर प्रहार कर रहे थे॥ ३७॥ वे अपने-अपने पेटसे पेटपर तथा पीठसे पीठपर मार रहे थे। इस प्रकार बहुत देरतक बलपूर्वक भयंकर युद्ध करके मत्स्यरूप धारण किये गुणेशने बड़े जोरसे अपने मुखसे उसके मुखपर आघात किया। उस प्रबल आघातसे उसका मुख फूट गया, आँखें फूट गयीं और
४८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उसका घमण्ड चूर-चूर हो गया ॥ ३८-३९ ॥ तदनन्तर वह मत्स्यरूपधारी दैत्य जलके अन्दर चला गया, मत्स्यरूपधारी उमापुत्र वे गुणेश भी उसके पीछे-पीछे जलके अन्दर चले गये। वह दैत्य जहाँ-जहाँ जाता, वे गुणेश भी वहीं-वहीं उसके पीछे जाते ॥ ४० ॥ उस दैत्यको कहीं छिपा हुआ जानकर मत्स्यरूपी गुणेशने अपनी पूँछसे उसपर प्रहार किया और वे उसकी पूँछको अपने मुखसे पकड़कर वहाँसे बाहर निकल पड़े। तदनन्तर गुणेशने उसे अपने भारसे दबाकर चूर-चूर कर दिया। अपने मुखसे रक्त बहाता हुआ और महान् चीत्कार करता हुआ वह दैत्य प्राणहीन हो गया, तब गुणेशने उसे छोड़ दिया ॥ ४१-४२ ॥ उस दैत्यके द्वारा की गयी भयंकर ध्वनिने तीनों लोकोंको प्रकम्पित कर डाला। तदनन्तर वे गुणेश जलसे बाहर आ गये। उस समय देवी पार्वती ने उनका आलिंगन किया। आनन्दमें निमग्न पार्वती ने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया और वे कहने लगीं—मुझसे पूछे बिना तुम बालकोंके साथ कहाँ चले गये थे ? ॥ ४३-४४ ॥ तुम्हारे ऊपर जो-जो भी विघ्न आता है, वह सौभाग्यवश महर्षिद्वारा किये गये रक्षा-विधानके द्वारा और जगदीश्वर भगवान् शम्भुकी कृपासे विनष्ट हो जाता है। तुम इतने चंचल क्यों हो गये हो, मैं तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ ? हे प्रिय पुत्र ! तुम्हारे वियोगमें तो मेरे प्राण ही निकल जायँगे ॥ ४५-४६ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर मुनिगणोंने कहा—हे प्रभो ! आपके बिना हम बड़े ही दुखी थे, अब इस समय आपका दर्शन प्राप्तकर हमें पहले-जैसा ही आनन्द प्राप्त हो रहा है। तदनन्तर सभी मुनियों, देवी पार्वतीकी सखियों तथा अन्य स्त्रियोंने भी अनेक प्रकारके द्रव्योंसे उनका पूजन किया, फिर गुणेशको प्रणाम करके वे सभी उनकी प्रार्थना करने लगे ॥ ४७-४८ ॥ हे देवेश्वर ! हम सब आपके शरणागत हैं, आप हमारा परित्याग न करें। इसके बाद देवी उमा बालक गुणेशको लेकर अपने श्रेष्ठ स्थानपर चली गयीं ॥ ४९ ॥ इसके साथ ही सभी गण, सखियाँ तथा मुनिजन हर्षसे निमग्न हो अपने स्थानोंको चल पड़े। उसी समय मार्गमें एक शैल नामक महाबली दूसरा दैत्य आ पहुँचा। वह दैत्य सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला, मगरमच्छके समान कठोर शरीरवाला और वज्रको भी विनष्ट कर देनेवाला था। उसकी शब्दध्वनिसे क्षणभरमें ही पर्वत विदीर्ण हो जाते थे ॥ ५०-५१ ॥ आकाशको छूता हुआ वह रास्ता रोककर सहसा खड़ा हो गया। उसका मस्तक दो योजन विस्तृत था और वह नीचेकी ओर बारह योजन लम्बा था ॥ ५२ ॥ उस दैत्य शैलके विस्तृत शरीरमें सरोवर, वृक्ष तथा लताएँ सुशोभित थीं और वहाँ सिंह, शार्दूल, हाथी, यक्ष तथा राक्षस विचरण किया करते थे ॥ ५३ ॥ इस प्रकारके उस शैल दैत्यको देखकर वे सभी मुनिगण, स्त्रियाँ आदि विह्वल हो गये और कहने लगे कि यह कौन-सा विघ्न आ खड़ा हुआ। उस समय देवी पार्वती भी उनके पास खड़ी हो गयीं और तब वे सब मुनिगण भी वहीं खड़े हो गये ॥ ५४ ॥ तदनन्तर वे मुनिगण बोले—हम अपनी स्त्रियोंको तथा सन्तानोंको कब देखेंगे? देव गुणेश अब कब यहाँ पराक्रम दिखलायेंगे ? ॥ ५५ ॥ हम लोगोंका होम तथा तर्पण-श्राद्ध आदि करनेका यह समय व्यर्थ ही चला जायगा। तब देवी गौरी उन सबसे बोलीं—आपलोग दुःख न करें। इस समय मुझे भी शंकरकी चिन्ता हो रही है ॥ ५६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन सभीके वचनोंको सुनकर अत्यन्त बुद्धिमान् गुणेशने तत्क्षण विराट्रूप धारण किया और अपने श्वासकी फूँकमात्रसे उस दैत्य शैलको दूर पछाड़ दिया, वे मुनिगण भ्रमित हो जानेके कारण गुणेशके [विराट्] स्वरूपको देख न सके ॥ ५७-५८ ॥ उस समय गुणेशके श्वासके संयोगसे वह दैत्य शैल आकाशमण्डलमें चक्कर काटने लगा। यह सब देखकर वे सभी मुनिगण आश्चर्यचकित हो गये और गुणेशकी प्रशंसा करने लगे ॥ ५९ ॥ जिस प्रकार आँधी किसी पत्तेको उड़ा डालती है,
क्री०ख०-अ०९२] * चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध * ४८७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वैसे ही वह दैत्य आकाशमें उड़कर भूमिपर गिर पड़ा। उस दैत्य शैलके हजारों टुकड़े हो गये, उसने गिरते समय अनेकों वृक्षोंको चूर-चूर कर डाला ॥ ६० ॥ तदनन्तर वे मुनिगण कहने लगे- हे गुणेश्वर ! आपको साधुवाद है, साधुवाद है। आपने हमारा अरिष्ट दूर कर दिया है, आपकी कृपासे अब हम अपने-अपने आश्रममें सुखपूर्वक रह सकेंगे और अपने-अपने नित्यकर्मोंको पूर्ववत् पुनः कर सकेंगे ॥ ६१ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर उन्हें प्रणाम करके और उनसे अनुमति लेकर तथा उनका पूजन करके वे सभी मुनिगण चले गये ॥ ६२ ॥ देवी पार्वतीने उन गुणेशको लेकर अपने भवनमें प्रवेश किया, उनकी सखियाँ तथा मुनिपत्नियां भी उनकी आज्ञा लेकर अपने घरोंको गयीं। जो मनुष्य इस आख्यानका श्रवण करता है, वह सर्वत्र सुख, दीर्घ आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य तथा सर्वत्र विजय प्राप्त करता है ॥ ६३-६४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कूटासुर, मत्स्यासुर तथा शैलासुरके वधका वर्णन' नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९१ ॥ बानबेवाँ अध्याय चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध, गुणेशद्वारा माता पार्वतीको अपने मुखके भीतर समस्त विश्वका दर्शन कराना, माताद्वारा गुणेशकी स्तुति ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] तदनन्तर किसी दिनकी बात है, जिस समय प्रातःकाल चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेश सोये हुए थे और देवी पार्वती शीघ्रतापूर्वक स्नान करके शिवलिंग-पूजा कर रही थीं ॥ १ ॥ वे अपने बायें हाथमें भगवान् शिवका पार्थिव लिंग रखकर उस श्रेष्ठ लिंगकी दाहिने हाथसे पूजा कर रही थीं। उसी समय बालक गुणेश जग गये और रोने लगे तथा स्तनपान करानेका हठ करने लगे ॥ २ ॥ तब माताने 'क्षणभर रुक जाओ-क्षणभर रुक जाओ'- इस प्रकार कहते हुए उन्हें रोका तो रुष्ट होकर बालक गुणेशने अपने हाथके प्रहारसे माताके हाथमें रखे पार्थिव लिंगको नीचे गिरा दिया ॥ ३ ॥ माताने भी अत्यन्त रुष्ट होकर बालकको हाथसे मारा। तब बालक गुणेशने भी क्रुद्ध होते हुए पुनः समीपमें आकर माताकी अंगुलिमें जोरसे दाँतसे काट लिया ॥ ४ ॥ 'मुझे छोड़ो-मुझे छोड़ो'- यह कहते हुए वे बोलीं- 'मेरे प्राण निकल जायँगे।' तब दाँत काटी हुई अंगुलिको छोड़कर बालक गुणेश दूर भाग गये ॥ ५ ॥ माता पार्वतीकी अँगुलीसे बहुत-सा रक्त भूमिपर उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे कि जोरसे चोट करनेपर मदारके वृक्षसे दूध निकलकर गिरने लगता है ॥ ६ ॥ तब माता पार्वती एक छड़ी लेकर पुत्र गुणेशको मारनेके लिये दौड़ीं। उन्होंने दौड़कर बालकको पकड़ लिया। उस समय उन्होंने बालकको भगवान् शिवके स्वरूपवाला देखा ॥ ७ ॥ उनके पाँच मुख थे, दस भुजाएँ थीं, तीन नेत्र थे, वे शेषनागसे सुशोभित थे। उन्होंने त्रिशूल, डमरु, भस्म तथा रुण्डोंकी माला धारण की हुई थी ॥ ८ ॥ वे हस्तिचर्म तथा व्याघ्रचर्म पहने हुए थे और उनके मस्तकपर चन्द्रमा सुशोभित था। यह देखकर पार्वती लज्जित हो गयीं। उन्होंने छड़ीको फेंक दिया और वे शिवा मुख नीचेकर खड़ी हो गयीं ॥ ९ ॥ उस समय वे न तो आगे बढ़ सकीं और न वापस भवनको जानेमें ही समर्थ हो पा रही थीं। उनकी चिन्ताको समझकर भगवान् गुणेश [शिवरूपको त्यागकर] पुनः बालकके स्वरूपमें हो गये ॥ १० ॥
४८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- वे मुनिबालकका रूप बनाकर मुनिबालकोंके साथ खेल खेलने लगे। जब देवी पार्वती उन्हें देखने उनके पीछे गयीं तो उनके बीच उन्होंने अपने पुत्रको नहीं देखा। उन्होंने उन मुनिबालकोंसे पूछा- मेरा बालक कहाँ चला गया ? मेरी अँगुलीमें दाँत काटकर वह चंचल बालक भाग रहा है ॥ ११-१२ ॥ वे मुनिपुत्र उनसे बोले- आपका पुत्र यहाँसे चला गया है। तब उन्हें खोजने पार्वती आगे-आगे बढ़ने लगीं। उनके बालोंकी चोटी खुल गयी थी, खोजनेके परिश्रमसे वे पसीनेसे लथपथ हो गयी थीं, इधर-उधर दौड़ती हुई उन पार्वतीके वस्त्र तथा आँचल अपने स्थानसे खिसक गये थे। माताका इस प्रकारका परिश्रम देखकर वे गुणेश अपना पहलेवाला बालकरूप धारणकर माताके पास आये, तब देवी गिरिजाने अपने हाथोंसे उन्हें दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया ॥ १३-१५ ॥ अपने आँचलसे उन्हें बाँधकर वे प्रसन्नचित्त हो अपने भवनको गयीं। वे उनसे गुस्सेसे बोलीं- अब तुम ठीकसे मेरे हाथमें आ गये हो। हे अपस्मारसे आक्रान्त व्यक्तिसे भी अधिक अस्थिर बालक ! मैं इस समय तुम्हें बहुत अधिक मारूँगी, अथवा भगवान् शंकरसे तुम्हारी शिकायत करूँगी, वे ही तुम्हें मारेंगे ॥ १६-१७ ॥ माताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर बालक गुणेश भूमिपर लोट गये और फिर अपनेको बन्धनसे मुक्त देखकर पुनः तेजीसे भाग चले ॥ १८ ॥ तब पार्वती अत्यन्त विह्वल तथा दुःखित होकर उनके पीछे फिर दौड़ पड़ीं। इसी समय कर्दमासुर नामक एक दुष्ट दानव वहाँ आया। वह ब्राह्मणका रूप धारण किये हुए था, उसने माला पहनी हुई थी, वह अपने दाहिने हाथमें जलसे भरा हुआ कमण्डलु लिये हुए था। उसका सारा शरीर भस्मसे पुता हुआ था ॥ १९-२० ॥ वह अरुणोदयकालीन सूर्यकी अरुणिम आभाके समान वस्त्र पहने हुए था। वह अत्यन्त मायावी था। वह बालकसे इस प्रकार का वचन कहने लगा- तुम किस कारणसे भाग रहे हो, मैं शीघ्र ही तुम्हारे भयका निवारण कर दूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है। मैं तुम्हें ऐसे स्थानपर ले जाऊँगा, जहाँ तुम्हारी माता तुम्हें किसी प्रकार भी जान नहीं पायेंगी। वहाँ न तो कालका कोई भय होगा और न अणुमात्र भी अन्य कोई भय होगा ॥ २१-२२ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब भयभीत बालक गुणेश उससे बोले- आप वैसा ही करें, जिससे कि मेरे माता-पिता मुझे न देख सकें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। इस प्रकार कहते हुए वे गुणेश बालस्वभाववश ज्यों ही उसके समीप में गये, त्यों ही वह दुष्ट कर्दमासुर उस कोमल बालकको उसी प्रकार निगल गया, जिस प्रकार कि पके हुए केलेके टुकड़ेको निगल लिया जाता है ॥ २३-२५ ॥ इधर पार्वती भूमिपर बालक गुणेशके चरणकमलोंके चिह्न देखती हुई आगे बढ़ती गयीं। उन्होंने सामने एक ब्राह्मणको देखा तो उससे उन्होंने अपने बालकके विषयमें पूछा- हे स्वामिन् ! क्या आपने मेरे पुत्रको यहाँसे जाते हुए देखा है? हे विप्र ! ये देखिये, भूमिपर पड़े हुए ये चरणकमलोंके चिह्न उसीके हैं ॥ २६-२७ ॥ हे द्विज ! यहाँसे दौड़ता हुआ वह न जाने कहाँ गायब हो गया ? तब बालकके वियोगसे दुखी उन पार्वतीसे वह ब्राह्मण कहने लगा ॥ २८ ॥ द्विज बोला- हे अनघे ! हे माता ! आपके बालकसे हमारा क्या प्रयोजन है? हे माता ! हम तो सब प्रकारसे उदासीन रहनेवाले और ईश्वरके ध्यानमें दत्तचित्त रहनेवाले हैं। फिर भी आप पूछ रही हैं तो हम कहते हैं कि हे शैलपुत्री ! हमने आपके पुत्रको कहीं भी नहीं देखा है, हे देवि ! क्या आपने अपने बालकको हमारे अधीन किया हुआ था ? ॥ २९-३० ॥ ब्रह्माजी बोले- उसके इस प्रकारसे कहनेपर उन शैलपुत्रीको अत्यन्त दुःखित देखकर निर्विकार गुणेश्वर उस कर्दमासुरके मुखसे बाहर प्रकट हो गये ॥ ३१ ॥ तब देवी पार्वती अपने पुत्रको पाकर उस विप्रदेहधारी कर्दमासुरसे बोलीं- आप झूठ क्यों बोलते हैं? आपके निकट ही यह पुत्र देखा गया है, निश्चित ही आपने ही इसे गायब किया है। सन्तोंका यह स्वभाव होता है कि वे प्राणोंपर संकट आ जानेपर भी कभी भी मिथ्या वचन
क्री०ख०-अ० ९२] * चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध * ४८९ नहीं बोलते॥ ३२१/२॥ ब्रह्माजी बोले—पार्वतीके इन वचनोंको सुनकर वह दैत्य विशाल शरीरवाला हो गया, उसका मस्तक आकाशको छू रहा था। उसी समय वह दैत्य बालक गुणेशको लेकर वहाँसे निकल गया। तब विलाप करती हुई वे शिवा पुत्रके पीछे-पीछे चल दीं॥ ३३-३४॥ तब बार-बार शोक करती हुई माताके दुःखको देखकर गुणेशने उस दैत्यसे भी बड़ा अपना शरीर बना लिया। उन्होंने अपने चरणोंके प्रहारसे उसके शरीरको सौ टुकड़ोंमें विदीर्ण कर डाला। गिरते हुए भी उस दैत्यके विशाल शरीरने अनेकों वृक्षोंको चूर-चूर कर दिया॥ ३५-३६॥ इस प्रकारसे उस दानवका वध करनेके अनन्तर बालक गुणेश माताके आगे खड़े हो गये। उसी समय मुनिगण, देवता तथा उन मुनियोंकी पत्नियाँ भी वहाँ आ पहुँचीं। वे सब देवी पार्वतीसे बोले—इस बालकपर कितने ही विघ्न आ रहे हैं, परंतु हे सुरेश्वरि! आपके पुण्यप्रतापके कारण वे सभी विनष्ट हो जा रहे हैं॥ ३७-३८॥ तदनन्तर उन सभीके द्वारा पूजित उस बालक गुणेशको अपनी गोदमें लेकर देवी पार्वती उन मुनिजनों और मुनिपत्नियोंके साथ मनमें अत्यन्त हर्षित होते हुए अपने भवनको गयीं। देवी शिवाने अपनी गोदसे उतारकर बालक गुणेशको आँगनमें उसी प्रकार रखा, जिस प्रकार कि प्राचीनकालमें देवताओंपर विजय प्राप्तकर गरुड़ने [कुशोंके ऊपर] अमृतको रखा था॥ ३९-४०॥ [तदनन्तर सहसा किंचित्] मूर्च्छाको प्राप्तकर वे बालक गुणेश धरतीपर बार-बार लोट लगाने लगे और अपने मुखकमलको फैलाकर बार-बार जँभाई लेने लगे। अभी-अभी इसे क्या हो गया है—ऐसा कहते हुए पार्वती दौड़कर उनके समीप गयीं तो उन्होंने उन विश्वरूपी गुणेशके मुखके भीतर सम्पूर्ण विश्वको देखा॥ ४१-४२॥ उन्होंने वहाँ सात द्वीपोंवाली पृथ्वी, नगरों, ग्रामों, वनों, खानों, पर्वतों, समुद्रों, ब्रह्मा, सूर्य, शेषनाग, विष्णु, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, मुनिजन, पक्षीसमूह, नदी, वापी, तड़ाग, चौदह मनुओं, आठ वसुओं, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, तारासमूह, चेतन तथा अचेतन सभी प्राणियों, सात पातालों तथा इक्कीस स्वर्गोंको भी देखा॥ ४३-४५॥ इस प्रकार तीनों लोकोंका मुखके अन्दर दर्शनकर उस समय देवी पार्वतीको मूर्च्छा आ गयी। वे अपनी दोनों आँखोंको बन्दकर दो मुहूर्ततक भ्रमित-सी होती रहीं॥ ४६॥ उन्होंने मन-ही-मन भगवान् शिवका स्मरण किया, इससे वे सचेत हो गयीं, तब उन्होंने पहलेकी भाँति ही अपने सामने स्थित हुए बालक गुणेशको देखा। उन गुणेशके कृपाप्रसादसे प्रसन्न मनवाली वे देवी पार्वती गुणेशकी स्तुति करने लगीं॥ ४७१/२॥ पार्वती बोलीं—[हे प्रभो!] आप ही परमात्मा हैं और आप ही चराचर जगत्के गुरु हैं। आप चिदात्मा, आनन्दघन, शाश्वत, नित्य तथा अनित्य स्वरूपवाले हैं। मैंने आपकी कुक्षिमें चौदहों भुवनोंको देखा है। इसके साथ ही सभी देवताओं, यक्षों, राक्षसों, सभी नदियों, वृक्षसमूहों—इस प्रकारसे सम्पूर्ण चराचर जगत्का दर्शन किया है, जिसका वर्णन करना मेरे लिये सम्भव नहीं है। यह देखकर मैं उस समय भ्रान्त होकर भूमिपर गिर पड़ी, फिर जब मैंने भगवान् शिवका स्मरण किया, तभी मैं सचेत हो पायी, तब मैंने एक सामान्य बालककी भाँति ही बालकरूपमें आपको देखा॥ ४८-५१॥ ब्रह्माजी बोले—वे इस प्रकार स्तुति कर ही रही थीं कि उसी समय उन्होंने अपनी माया प्रकट कर दी। तब देवी पार्वतींने प्यारसे पुचकारते हुए उन्हें अपनी गोदमें ले लिया और स्तनपान कराया॥ ५२॥ तदुपरान्त भवनमें प्रवेशकर गिरिजा अपने घरके कार्योंमें संलग्न हो गयीं। सभी मुनिगण तथा मुनिपत्नियों भी अपने-अपने घरोंको चले गये। इस आख्यानका श्रवणकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५३॥ 'विश्वरूपदर्शन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विश्वरूपदर्शन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥