भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 484, कुल 656 में से

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पृष्ठ 484

४८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- सभी भी वैसा ही भाव प्रदर्शित करने लगे। सभी मनुष्य, पशु, वृक्ष, यक्ष, राक्षस, पन्नग, मुनिजन, मनुगण, राजालोग, चौदहों भुवन और इक्कीस स्वर्गोंके निवासी तथा सभी चेतन और अचेतन प्राणी उस बालक गुणेशके प्रभावसे नृत्य करने लगे। उस गुणेशकी इच्छाके अनुसार भूतलके समस्त प्राणी, मुनिजनोंकी पत्नियाँ, देवताओंकी पत्नियाँ भी उन गिरिकन्या पार्वतीके साथ नृत्य करने लगीं ॥ ६-८॥ हे मुनिवर व्यासजी ! उस समय नूपुरोंकी ध्वनिसे, छोटी-छोटी घण्टियोंके शब्दोंसे तथा पैरोंके आघातकी थापसे दिशाएँ एवं विदिशाएँ और आकाश तथा पर्वत भी निनादित हो उठे। धरती, शेषनाग, सूर्य, चन्द्र तथा तारागण कम्पित हो उठे ॥ ९-१० ॥ तब नृत्यकी अत्यन्त पराकाष्ठा देखकर देवी पार्वतीने और आगे नृत्य न करनेकी आज्ञा प्रदान की, तब भी बालक गुणेशने गौरीद्वारा कहे गये वचनका पालन नहीं किया ॥ ११ ॥ उसी समयकी बात है, नूपुर नामक महान् दैत्य वहाँ आया। उसका शरीर काले रंगका और अत्यन्त कठोर था। उसके पैर पातालतक लम्बे थे और उसका सुदृढ़ मस्तक आकाशको छूनेवाला था ॥ १२ ॥ वह दुष्ट राक्षस अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करके शिशु गुणेशके नूपुरोंके अन्दर प्रविष्ट हो गया। बालक गुणेशने भी उस अत्यन्त बलवान् दैत्यको शीघ्र ही अपनी मायासे उसी प्रकार बाँध लिया, जैसे कि मदस्रावी चार दाँतोंवाले हाथीको जंजीरोंसे बाँध दिया जाता है। तभी पर्वतराजपुत्री पार्वतीने अपने बालक उस गुणेशको पुनः गोदमें ले लिया ॥ १३-१४॥ उस समय उस गुणेशके भारसे वे पार्वती उसी प्रकार पीड़ित हुईं, जैसे कि पृथिवीका ही भार गोदमें आ गया हो। तब गौरी कहने लगीं- तुम अभी-अभी इतने भारी कैसे हो गये हो ? अतः तुम मेरी गोदसे उतर जाओ, अरे बालक ! तुम्हारे भारके कारण तो मेरे प्राण ही निकल जायँगे ! ॥ १५-१६ ॥ ब्रह्माजी बोले- माताके ये वचन कि 'वह भारसे अत्यन्त पीड़ित हो रही है' सुनकर बालक गुणेश माताकी गोदसे उतर गये और उन्होंने बलपूर्वक अपने दोनों पैरोंको जोरसे झटका मारा ॥ १७ ॥ फलस्वरूप वह दैत्य नूपुरसे निकलकर पक्षीकी भाँति आकाशमें चक्कर काटने लगा। उसके विस्तृत शरीरसे सूर्यके ढक जानेके कारण सम्पूर्ण पृथ्वीमें अन्धकार छा गया ॥ १८ ॥ अकस्मात् वह दुष्ट दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़ा और उसके सौ टुकड़े हो गये। यह देखकर सभी मुनिगण तथा देवता परम आनन्दमें निमग्न हो गये और वे उन बालरूपी अविनाशी परमात्माकी स्तुति करने लगे ॥ १९१/२ ॥ देवता तथा ऋषि बोले- हे देव ! हम लोग आपके विविध स्वरूपों, आपके तेज तथा दैत्यों और दानवोंका विनाश करनेवाली आपकी अनेकों प्रकारकी लीलामयी मायाको नहीं जानते हैं। आपने सूर्यमण्डलको आच्छादित कर देनेवाले दैत्य नूपुरको अपने चरणोंसे झटक दिया। वह आकाशमें बार-बार चक्कर काटता हुआ पुनः पृथ्वीपर गिरकर सौ टुकड़े हो गया। गिरते समय उसने अनेक प्राणिसमूहों, वृक्षों, आश्रमों तथा पर्वतोंको विनष्ट कर डाला। आपको नृत्य करते देखकर अन्य सभी लोग भी बादमें नृत्य करने लगे ॥ २०-२२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उन सभीने विश्वरूपी उन बालक गुणेशकी पूजा की। नृत्योत्सवके पूर्ण हो जानेके अनन्तर देवी पार्वतीने गौतम आदि महर्षियोंको विदा किया और वे बालक गुणेशको गोदमें लेकर दुलार करती हुईं उन्हें अपना स्तनपान कराने लगीं ॥ २३-२४॥ फिर उन्होंने सभी स्त्रियोंको विदाकर अपने भवनमें प्रवेश किया। कुछ दिनोंके बादकी बात है, एक दिन वे गुणेश मुनिबालकोंके साथ घरसे बाहर क्रीडा करनेके लिये गये और लीलापूर्वक क्रीडा करने लगे। उन सभी बालकोंने दो-दोका जोड़ा बनाकर अनेक प्रकारसे बहुत बार परस्पर मल्लयुद्ध किया ॥ २५-२६॥ वे परस्पर चोटी पकड़कर एक-दूसरेको गिराने