भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 656 में से

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पृष्ठ 485

क्री०ख०-अ०९० ] * बालक गुणेशके द्वारा बारहवें मासमें दैत्योंका वध * ४८३ लगे। वे कभी एक-दूसरेके सिर-में-सिर भिड़ाकर, कभी घुटनों-से-घुटना टकराकर, कभी कोहनी-से-कोहनीमें मारकर तो कभी पैरसे दूसरेके पैरमें चोट मार [करके क्रीडा कर] रहे थे। वे कभी एक-दूसरेकी पीठपर चढ़ जाते, तो कभी कन्धेपर चढ़ जाते ॥ २७-२८ ॥ वे बालक कभी-कभी नियत समयके लिये हाथ फैलाकर दौड़ लगाते और कभी मुट्ठीमें धूलि भरकर एक-दूसरेपर फेंकने लगते। वे परस्पर कभी एक-दूसरेके पेटमें लातसे मार रहे थे, तो कभी सिरपर मार रहे थे। कुछ बालक गन्ध, पुष्प तथा अक्षत आदिके द्वारा उन गुणेशका पूजन कर रहे थे ॥ २९-३० ॥ कुछ बालक उन गुणेशको अपने आश्रममें ले जाकर अन्न आदिका भोजन करा रहे थे। कोई उनके चरणयुगलमें प्रणाम करके सुन्दर माला चढ़ा रहे थे। उसी समय सिन्धुदैत्यद्वारा भेजा हुआ भेड़के बच्चेका रूप धारणकर एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा, जिसे देखकर हाथमें दण्ड धारण करनेवाले भयानक यमराज भी भयभीत हो जाते थे ॥ ३१-३२ ॥ तीखी धारसे युक्त नखोंवाला वह बलशाली भेड़ा अपने पराक्रमसे शत्रुओंका वध कर देता था। उसने सभीको जीतकर अपने बाहुदेशमें विजयपत्र बाँध रखा था। उसकी आँखें बहुत बड़ी-बड़ी थीं। सींग उसके बहुत विशाल थे। बड़े-बड़े पर्वतोंको वह चूर-चूर कर डालता था। वह भेड़रूप दुष्ट दैत्य अपनी पूँछके आघातसे प्राणियोंको मार डालता था ॥ ३३-३४ ॥ वह अपने सींगोंके आघातसे वृक्षों तथा पर्वतोंको उखाड़ डालता था। वह बलवान् भेड़ा मनुष्योंका पीछा करता हुआ बलपूर्वक उन्हें मार डालता था ॥ ३५ ॥ वह महान् असुर पार्वतीके पुत्र गुणेशको मारनेके लिये आया। वह पीछेसे दौड़कर जबतक उसको मारता, उससे पहले ही बालक गुणेशने अपने हाथोंसे उसके सींग पकड़ लिये और उसकी पीठपर वे उसी प्रकार चढ़ गये, जैसे घोड़ेकी पीठपर कोई बालक चढ़कर बैठ जाता है ॥ ३६-३७ ॥ उस समय कुछ मुनिबालक उस दैत्य भेड़केी पूँछ पकड़कर खींचने लगे और कुछ लाठियों तथा डण्डोंसे उस महान् दैत्यको पीटने लगे ॥ ३८ ॥ किंतु उस दैत्यने उन सबकी अवहेलना करते हुए उन्हें शीघ्र ही पूँछके आघातसे आहत किया। तब वे पूँछके आघातसे पीड़ित होकर भूमिपर गिर पड़े ॥ ३९ ॥ उस दैत्यके वैसे पराक्रमको देखकर बालक गुणेश उसकी पीठसे उतर गये और उसे पकड़कर देरतक घुमाकर सहसा उसकी पीठमें प्रहार किया। जिससे वह असुर हजार टुकड़ोंमें खण्डित होकर सहसा मर गया, मरते समय उसके द्वारा किये गये शब्दसे तीनों लोक भयभीत हो उठे ॥ ४०-४१ ॥ वह अपने विकृत मुखको फैलाकर उस मुखसे रक्त बहाने लगा। तदनन्तर वे मुनियोंके बालक पर्वतपुत्री पार्वतीसे कहने लगे-भेड़ेके रूपमें स्थित इस महान् असुरको, जो हमको मारनेके लिये आ रहा था, उसे इस बलशाली बालकने खेल-खेलमें ही मार डाला है ॥ ४२-४३ ॥ ब्रह्माजी बोले-तब देवी पार्वतीने मरे हुए महादैत्य तथा अपने पुत्र गुणेशको देखा तो वे परम आश्चर्य करने लगीं और फिर वे बालक गुणेशको अपने भवनमें ले गयीं। वहाँ ले जाकर उन्होंने उसके सिरके ऊपर जलके साथ दही तथा भात घुमाकर उसे घरसे बहुत दूर ले जाकर फेंका तथा बालकको स्तनपान कराया ॥ ४४-४५ ॥ गणोंने दैत्यके शरीरके उन टुकड़ोंको दूर ले जाकर फेंक दिया। उस समय मुनिगणों, मुनिपत्नियों, मुनिबालकों तथा अन्य स्त्रियोंने पार्वतीके पुत्रकी प्रशंसा की। देवताओंने बालक गुणेशपर पुष्पोंकी वर्षा की। ब्राह्मणोंने उसे आशीर्वाद प्रदान किया और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'नूपुर तथा अविपुत्र नामक दैत्योंके वधका वर्णन' नामक नब्बेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९० ॥