भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 656 में से

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पृष्ठ 491

क्री०ख०-अ० ९२] * चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध * ४८९ नहीं बोलते॥ ३२१/२॥ ब्रह्माजी बोले—पार्वतीके इन वचनोंको सुनकर वह दैत्य विशाल शरीरवाला हो गया, उसका मस्तक आकाशको छू रहा था। उसी समय वह दैत्य बालक गुणेशको लेकर वहाँसे निकल गया। तब विलाप करती हुई वे शिवा पुत्रके पीछे-पीछे चल दीं॥ ३३-३४॥ तब बार-बार शोक करती हुई माताके दुःखको देखकर गुणेशने उस दैत्यसे भी बड़ा अपना शरीर बना लिया। उन्होंने अपने चरणोंके प्रहारसे उसके शरीरको सौ टुकड़ोंमें विदीर्ण कर डाला। गिरते हुए भी उस दैत्यके विशाल शरीरने अनेकों वृक्षोंको चूर-चूर कर दिया॥ ३५-३६॥ इस प्रकारसे उस दानवका वध करनेके अनन्तर बालक गुणेश माताके आगे खड़े हो गये। उसी समय मुनिगण, देवता तथा उन मुनियोंकी पत्नियाँ भी वहाँ आ पहुँचीं। वे सब देवी पार्वतीसे बोले—इस बालकपर कितने ही विघ्न आ रहे हैं, परंतु हे सुरेश्वरि! आपके पुण्यप्रतापके कारण वे सभी विनष्ट हो जा रहे हैं॥ ३७-३८॥ तदनन्तर उन सभीके द्वारा पूजित उस बालक गुणेशको अपनी गोदमें लेकर देवी पार्वती उन मुनिजनों और मुनिपत्नियोंके साथ मनमें अत्यन्त हर्षित होते हुए अपने भवनको गयीं। देवी शिवाने अपनी गोदसे उतारकर बालक गुणेशको आँगनमें उसी प्रकार रखा, जिस प्रकार कि प्राचीनकालमें देवताओंपर विजय प्राप्तकर गरुड़ने [कुशोंके ऊपर] अमृतको रखा था॥ ३९-४०॥ [तदनन्तर सहसा किंचित्] मूर्च्छाको प्राप्तकर वे बालक गुणेश धरतीपर बार-बार लोट लगाने लगे और अपने मुखकमलको फैलाकर बार-बार जँभाई लेने लगे। अभी-अभी इसे क्या हो गया है—ऐसा कहते हुए पार्वती दौड़कर उनके समीप गयीं तो उन्होंने उन विश्वरूपी गुणेशके मुखके भीतर सम्पूर्ण विश्वको देखा॥ ४१-४२॥ उन्होंने वहाँ सात द्वीपोंवाली पृथ्वी, नगरों, ग्रामों, वनों, खानों, पर्वतों, समुद्रों, ब्रह्मा, सूर्य, शेषनाग, विष्णु, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, मुनिजन, पक्षीसमूह, नदी, वापी, तड़ाग, चौदह मनुओं, आठ वसुओं, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, तारासमूह, चेतन तथा अचेतन सभी प्राणियों, सात पातालों तथा इक्कीस स्वर्गोंको भी देखा॥ ४३-४५॥ इस प्रकार तीनों लोकोंका मुखके अन्दर दर्शनकर उस समय देवी पार्वतीको मूर्च्छा आ गयी। वे अपनी दोनों आँखोंको बन्दकर दो मुहूर्ततक भ्रमित-सी होती रहीं॥ ४६॥ उन्होंने मन-ही-मन भगवान् शिवका स्मरण किया, इससे वे सचेत हो गयीं, तब उन्होंने पहलेकी भाँति ही अपने सामने स्थित हुए बालक गुणेशको देखा। उन गुणेशके कृपाप्रसादसे प्रसन्न मनवाली वे देवी पार्वती गुणेशकी स्तुति करने लगीं॥ ४७१/२॥ पार्वती बोलीं—[हे प्रभो!] आप ही परमात्मा हैं और आप ही चराचर जगत्के गुरु हैं। आप चिदात्मा, आनन्दघन, शाश्वत, नित्य तथा अनित्य स्वरूपवाले हैं। मैंने आपकी कुक्षिमें चौदहों भुवनोंको देखा है। इसके साथ ही सभी देवताओं, यक्षों, राक्षसों, सभी नदियों, वृक्षसमूहों—इस प्रकारसे सम्पूर्ण चराचर जगत्का दर्शन किया है, जिसका वर्णन करना मेरे लिये सम्भव नहीं है। यह देखकर मैं उस समय भ्रान्त होकर भूमिपर गिर पड़ी, फिर जब मैंने भगवान् शिवका स्मरण किया, तभी मैं सचेत हो पायी, तब मैंने एक सामान्य बालककी भाँति ही बालकरूपमें आपको देखा॥ ४८-५१॥ ब्रह्माजी बोले—वे इस प्रकार स्तुति कर ही रही थीं कि उसी समय उन्होंने अपनी माया प्रकट कर दी। तब देवी पार्वतींने प्यारसे पुचकारते हुए उन्हें अपनी गोदमें ले लिया और स्तनपान कराया॥ ५२॥ तदुपरान्त भवनमें प्रवेशकर गिरिजा अपने घरके कार्योंमें संलग्न हो गयीं। सभी मुनिगण तथा मुनिपत्नियों भी अपने-अपने घरोंको चले गये। इस आख्यानका श्रवणकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५३॥ 'विश्वरूपदर्शन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विश्वरूपदर्शन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥