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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

क्री०ख०-अ० ९२] * चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध * ४८९ नहीं बोलते॥ ३२१/२॥ ब्रह्माजी बोले—पार्वतीके इन वचनोंको सुनकर वह दैत्य विशाल शरीरवाला हो गया, उसका मस्तक आकाशको छू रहा था। उसी समय वह दैत्य बालक गुणेशको लेकर वहाँसे निकल गया। तब विलाप करती हुई वे शिवा पुत्रके पीछे-पीछे चल दीं॥ ३३-३४॥ तब बार-बार शोक करती हुई माताके दुःखको देखकर गुणेशने उस दैत्यसे भी बड़ा अपना शरीर बना लिया। उन्होंने अपने चरणोंके प्रहारसे उसके शरीरको सौ टुकड़ोंमें विदीर्ण कर डाला। गिरते हुए भी उस दैत्यके विशाल शरीरने अनेकों वृक्षोंको चूर-चूर कर दिया॥ ३५-३६॥ इस प्रकारसे उस दानवका वध करनेके अनन्तर बालक गुणेश माताके आगे खड़े हो गये। उसी समय मुनिगण, देवता तथा उन मुनियोंकी पत्नियाँ भी वहाँ आ पहुँचीं। वे सब देवी पार्वतीसे बोले—इस बालकपर कितने ही विघ्न आ रहे हैं, परंतु हे सुरेश्वरि! आपके पुण्यप्रतापके कारण वे सभी विनष्ट हो जा रहे हैं॥ ३७-३८॥ तदनन्तर उन सभीके द्वारा पूजित उस बालक गुणेशको अपनी गोदमें लेकर देवी पार्वती उन मुनिजनों और मुनिपत्नियोंके साथ मनमें अत्यन्त हर्षित होते हुए अपने भवनको गयीं। देवी शिवाने अपनी गोदसे उतारकर बालक गुणेशको आँगनमें उसी प्रकार रखा, जिस प्रकार कि प्राचीनकालमें देवताओंपर विजय प्राप्तकर गरुड़ने [कुशोंके ऊपर] अमृतको रखा था॥ ३९-४०॥ [तदनन्तर सहसा किंचित्] मूर्च्छाको प्राप्तकर वे बालक गुणेश धरतीपर बार-बार लोट लगाने लगे और अपने मुखकमलको फैलाकर बार-बार जँभाई लेने लगे। अभी-अभी इसे क्या हो गया है—ऐसा कहते हुए पार्वती दौड़कर उनके समीप गयीं तो उन्होंने उन विश्वरूपी गुणेशके मुखके भीतर सम्पूर्ण विश्वको देखा॥ ४१-४२॥ उन्होंने वहाँ सात द्वीपोंवाली पृथ्वी, नगरों, ग्रामों, वनों, खानों, पर्वतों, समुद्रों, ब्रह्मा, सूर्य, शेषनाग, विष्णु, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, मुनिजन, पक्षीसमूह, नदी, वापी, तड़ाग, चौदह मनुओं, आठ वसुओं, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, तारासमूह, चेतन तथा अचेतन सभी प्राणियों, सात पातालों तथा इक्कीस स्वर्गोंको भी देखा॥ ४३-४५॥ इस प्रकार तीनों लोकोंका मुखके अन्दर दर्शनकर उस समय देवी पार्वतीको मूर्च्छा आ गयी। वे अपनी दोनों आँखोंको बन्दकर दो मुहूर्ततक भ्रमित-सी होती रहीं॥ ४६॥ उन्होंने मन-ही-मन भगवान् शिवका स्मरण किया, इससे वे सचेत हो गयीं, तब उन्होंने पहलेकी भाँति ही अपने सामने स्थित हुए बालक गुणेशको देखा। उन गुणेशके कृपाप्रसादसे प्रसन्न मनवाली वे देवी पार्वती गुणेशकी स्तुति करने लगीं॥ ४७१/२॥ पार्वती बोलीं—[हे प्रभो!] आप ही परमात्मा हैं और आप ही चराचर जगत्के गुरु हैं। आप चिदात्मा, आनन्दघन, शाश्वत, नित्य तथा अनित्य स्वरूपवाले हैं। मैंने आपकी कुक्षिमें चौदहों भुवनोंको देखा है। इसके साथ ही सभी देवताओं, यक्षों, राक्षसों, सभी नदियों, वृक्षसमूहों—इस प्रकारसे सम्पूर्ण चराचर जगत्का दर्शन किया है, जिसका वर्णन करना मेरे लिये सम्भव नहीं है। यह देखकर मैं उस समय भ्रान्त होकर भूमिपर गिर पड़ी, फिर जब मैंने भगवान् शिवका स्मरण किया, तभी मैं सचेत हो पायी, तब मैंने एक सामान्य बालककी भाँति ही बालकरूपमें आपको देखा॥ ४८-५१॥ ब्रह्माजी बोले—वे इस प्रकार स्तुति कर ही रही थीं कि उसी समय उन्होंने अपनी माया प्रकट कर दी। तब देवी पार्वतींने प्यारसे पुचकारते हुए उन्हें अपनी गोदमें ले लिया और स्तनपान कराया॥ ५२॥ तदुपरान्त भवनमें प्रवेशकर गिरिजा अपने घरके कार्योंमें संलग्न हो गयीं। सभी मुनिगण तथा मुनिपत्नियों भी अपने-अपने घरोंको चले गये। इस आख्यानका श्रवणकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५३॥ 'विश्वरूपदर्शन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विश्वरूपदर्शन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥

तिरानबेवाँ अध्याय

४९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिरानबेवाँ अध्याय गुणेशके पाँचवें वर्षमें खड्गासुरका ऊँटका रूप बनाकर तथा चंचल दैत्यका छायाका रूप धारणकर गुणेशकी बालमण्डलीमें आना, गुणेश्वरद्वारा लीलापूर्वक उनका वध करना

ब्रह्माजी बोले—बालक गुणेशका जब पाँचवाँ | दैत्य बालक विजय प्राप्त कर रहे थे और देवता बने वर्ष प्रारम्भ हुआ, तब एक दिन उषाकालमें ही मुनियोंके | बालकोंकी पराजय हो रही थी। हे अंग (व्यासजी)! बालक गुणेशके घरपर आये॥ १॥ | जब इस प्रकारसे वे बालक परस्पर युद्धक्रीडा कर रहे वे बोले—हे सखा! प्रातःकालकी बेलामें क्यों सो | थे, उसी समय खड्ग नामका एक महान् असुर वहाँ रहे हो, उठो, उठ जाओ। उन्होंने देवी पार्वतीसे भी | आया, वह ऊँटका रूप धारण किये हुए था, उसकी कहा—आप अपने बालकको उठाइये॥ २॥ | विशाल आकृति आकाशको छू रही थी॥ ११-१२॥ इसपर पार्वती उनसे बोलीं—क्या तुम्हें नींद नहीं | उसकी बहुत बड़ी पूँछकी वायुसे अनेक वृक्ष- आती, तुमलोग अत्यन्त चंचल हो, रात-दिन खेल | समूह टूटकर गिर गये थे। उसके दाँत शूलके समान खेलनेमें ही लगे रहते हो। तुम निर्लज्ज बालक मूर्खतावश | नुकीले थे, उसकी जिह्वा लपलपा रही थी, वह अपने पैरोंसे सूर्योदय होनेसे पहले ही कैसे यहाँ आ गये?॥ ३ १/२॥ | दिशाओंको रौंद रहा था। वह बड़ी ही तीव्र ध्वनि करके वे बालक बोले—हे माता! आपके वचनोंसे हमें | उन गुणेश्वरकी ओर दौड़ा। उसके महान् शब्दकी प्रतिध्वनिसे कभी भी क्रोध नहीं आ सकता। क्या हम आपके बालक | सहसा दिशाएँ और विदिशाएँ गूँज उठीं॥ १३-१४॥ नहीं हैं और क्या आप हमारी माता नहीं हैं? आपके | उसे देखकर सभी मुनिबालक भयसे व्याकुल हो इस शिशुपर हम सभीका मन सदा ही लगा रहता है। | उठे और भाग चले। कुछ बालक उन गुणेशसे 'दौड़ो- हम रात-दिन निरन्तर इसे अपने सामने पाते हैं। बिना | दौड़ चलो' इस प्रकारसे कहते हुए चिल्लाने लगे॥ १५॥ इसके हमारे मनमें सन्तोष नहीं होता॥ ४-६॥ | उन बालकोंके रुदन तथा चिल्लाहटको सुनकर उन सभीके वचनोंको सुनकर उस समय वे शिशु | एकाएक ही उन गुणेश्वरने अपना शरीर अत्यन्त विशाल गुणेश जग गये और बाहर आकर उन्होंने उन बालकोंका | बना लिया और उछलकर उस ऊँटस्वरूपधारी दैत्यके परस्पर आलिंगन किया। तदनन्तर वे सभी एक-दूसरेका | सिरपर अपने मुक्केसे उसी प्रकार प्रहार किया कि जैसे हाथ पकड़कर प्रसन्नतापूर्वक घरसे बाहर निकल पड़े। | वज्रका प्रहार महान् पर्वतपर हो रहा हो। इस आघातसे फिर दो भागोंमें बँटकर नाना प्रकारकी युद्ध-सम्बन्धी | उस दुष्ट दैत्यका हृदय छिन्न-भिन्न हो गया। वह अपने चेष्टाओंके द्वारा क्रीडा करने लगे॥ ७-८॥ | मुखसे बहुत-सारा रक्त उगलता हुआ, महाभयंकर शब्द वे सभी परस्पर मस्तकसे मस्तकपर, वक्षःस्थलसे | करके पृथ्वीतलपर गिर पड़ा। वह अपने पैरों तथा वक्षःस्थलपर और बाहुओंसे बाहुओंपर प्रहार करने लगे। | गरदनको पटकने लगा और बार-बार चिल्लाते हुए कोई परस्पर जल फेंक रहा था, कोई धूल फेंक रहा था, | उसने अपने शरीरको स्थिर करके क्षणभरमें ही अपने कोई-कोई गेंद तथा मुष्टियोंसे परस्पर प्रहार कर रहे थे। | प्राण त्याग दिये॥ १६-१८ १/२॥ कोई कीचड़ फेंककर तथा कोई गोबर फेंककर परस्पर | उसका शरीर अठारह योजन लम्बा-चौड़ा था, क्रीडा कर रहे थे। कोई किसी दूसरेको झुला रहा था | गिरते हुए उसके शरीरने अनेक वृक्षसमूहोंको गिरा डाला तथा कोई किसीको खींच रहा था॥ ९-१०॥ | था और भूमिपर गिरकर उसके शरीरने इतनी धूल कोई कोलाहल कर रहे थे और कोई-कोई सींग | उछाली कि क्षणभरमें ही सारा आकाश धूलसे ढक (शृंगवाद्य) तथा बाँसुरीकी ध्वनि कर रहे थे, कुछ | गया। उसकी देहके गिरनेसे अनेक जीव-जन्तु तथा पक्षी बालक दैत्य बने हुए थे और कुछ देवता बने हुए थे। | भी गिर पड़े॥ १९-२०॥

क्री०ख०-अ०१३ ] * गुणेशके पाँचवें वर्षमें खड्गासुर दैत्यका लीलापूर्वक वध करना * ४९१ उस दैत्यको इस प्रकारसे गिरा हुआ देखकर वे सभी मुनिकुमार उस समय कहने लगे—हे पार्वतीपुत्र! बहुत अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ, आपने उस महान् दैत्यको मार डाला है। उस महान् दैत्यको देखकर तो हम सभी डरकर भाग गये थे, आप तो छोटे-से हैं, फिर आपने कैसे उस महान् दैत्यको अपने पराक्रमसे मार डाला? हम सभी अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर पुनः आपके पास आये हैं। ऐसा कहकर वे सभी बालक पूर्वकी भाँति ही परस्पर एक-दूसरेके चरणकमलोंको पकड़कर खींचते हुए पुनः क्रीड़ा करने लगे ॥ २१–२३ १/२ ॥ थोड़ी ही देरके पश्चात् उस ऊँटरूपधारी दैत्यका एक मित्र वहाँ आया, वह अपने मरे हुए मित्रका बदला लेना चाहता था, उसने छायाका रूप धारण किया था, वह महान् बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न था। उसके चरणके आघातसे शेषनागका शरीर भी काँप उठता था ॥ २४–२५ ॥ उस छायारूपधारी दैत्यका मस्तक आकाशको छू रहा था, वह दुष्ट दैत्य गुणेशके पीछे गया और उन गुणेशकी छायामें प्रविष्ट होकर उस समय उसने उन्हें गिरा दिया था। वह बड़ा ही मायावी था, महान् बलशाली था। उस समय वह अन्य सभीसे अदृश्य हो गया। इसके उपरान्त वह दैत्य नृत्य करने लगा। वह जिस प्रकार नृत्य कर रहा था, वे गुणेश भी उसी-उसी प्रकार नाच रहे थे ॥ २६–२७ ॥ उन मुनिबालकोंने जब उन गुणेशको [नाचते-नाचते] गिरता हुआ देखा तो कुछ बालक अत्यन्त दुखी हो उठे और कुछ बालक दौड़ते हुए उनके पास जाकर कहने लगे—हे नाथ! आप क्यों गिरे जा रहे हैं ? इस समय आपका वह सामर्थ्य कहाँ चला गया ? आप बार-बार क्यों अपने प्रिय मित्रोंके ऊपर गिरे जा रहे हो ? ॥ २८–२९ ॥ तदनन्तर बालक गुणेशने शीघ्र ही दसों दिशाओंमें चारों ओर देखा। फिर उन्होंने बल लगाकर आगे जानेकी चेष्टा की, किंतु वे आगे जानेमें समर्थ न हो सके। पुनः उन्होंने ध्यान लगाकर चारों ओर दृष्टि डाली, तब उन गुणेश्वरने अपनी छायामें प्रविष्ट उस दैत्यके विषयमें जाना ॥ ३०–३१ ॥ तदनन्तर उन्होंने पर्वतकी एक टूटी चट्टान उठाकर उस राक्षसके उदरपर फेंका और उसके ऊपर चढ़कर वे नृत्य करने लगे। इससे वह दैत्य मरकर चूर-चूर हो गया। अन्तिम समयमें उस दुष्ट दैत्यने अपना विशाल स्वरूप बनाया और गिरते हुए उसने अनेक वृक्षों, पर्वतों तथा प्राणियोंको चूर-चूर कर डाला ॥ ३२–३३ ॥ उसके मेद तथा रक्तसे वहाँकी पृथ्वी तथा वे गुणेश्वर भी लथपथ होकर उसी प्रकार लाल-लाल रंगके दीखने लगे, जैसे कि वसन्त-ऋतुमें पलाशका [पुष्पित] वृक्ष रक्तवर्णका हो जाता है ॥ ३४ ॥ इस प्रकार उस छायारूपी दैत्यको शीघ्र ही मारकर गुणेश लीलापूर्वक क्रीडा करने लगे। उसी समय एक महाभयंकर दैत्य वहाँ आ पहुँचा। उसके कन्धे बैलके कन्धेके समान अत्यन्त सुदृढ़ थे, उसका मुख सूअरके समान था तथा उसका उदर हाथीके समान था ॥ ३५ ॥ उस दैत्यका नाम था चंचल। वह बालकका रूप बनाकर उन बालकोंके मध्य प्रविष्ट हो गया। उसके श्वासके छोड़े जानेसे पर्वतोंकी चट्टानें भी धूलके समान उड़ जाती थीं ॥ ३६ ॥ उसके नृत्यसे पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी कम्पित हो उठती थी, उन बालकोंके बीच उसने विविध प्रकारकी क्रीड़ाएँ बड़ी ही कुशलताके साथ दिखलायीं ॥ ३७ ॥ उस महान् बलशाली तथा महामायावी दैत्यने कुछ बालकोंको जमीनपर पटक दिया। किसी मुनिबालकका पाँव पकड़कर वह खींचने लगा। किसी बालकके दोनों हाथोंको कसकर पकड़कर उसके माथेपर चोट मारी। वे सभी बालक धूपमें अपने शरीरपर मिट्टी लगा रहे थे ॥ ३८–३९ ॥ बालकोंकी देखा-देखी वह दैत्य भी अपने शरीरमें मिट्टीका लेपन उसी प्रकार करने लगा, जैसे कि कोई भाग्यशाली अपने शरीरमें चन्दनका अनुलेपन करता है। तदनन्तर उन बालकोंने मिट्टीकी गेंद बनायी और उससे खेल खेलना प्रारम्भ किया। किसी बालकद्वारा आकाशमें उछाली गयी गेंदको जो बालक अपने हाथसे पकड़ लेता था, वह उस गेंदसहित उस उछालनेवाले बालकपर घोड़ेके समान सवारी करता था ॥ ४०–४१ ॥ तदनन्तर सवारी करनेवाला वह बालक उस गेंदको Kalyana Visheshank 2021_Section_17_1_Front

४९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- बलपूर्वक जमीनपर फेंकता था। तब भूमिपर टकराकर उछलती हुई उस गेंदको कोई दूसरा बालक अथवा वही बालक पकड़ता था॥ ४२॥ जिसके हाथ वह गेंद लगती थी, वह उस बालकपर सवार होकर पुनः गेंदको जमीनपर फेंकता था, भूमिपर गिरी हुई उस गेंदको उठा लेनेवाला बालक उस गेंदको फेंककर किसी दूसरे बालकको मारता था॥ ४३॥ भागनेवाले उन बालकोंमेंसे जिस बालकको वह गेंद लगती थी अथवा जिसके हाथसे छू जाती थी, उसे भी वह गेंद आकाशमें उछालनी होती थी॥ ४४॥ यदि वह गेंद किसीके हाथ नहीं आती थी तो उसे पुनः वह गेंद आकाशकी ओर फेंकनी होती थी, आती हुई उस गेंदको जो हाथमें पकड़ लेता था, वह उस बालकपर आरूढ़ होकर गेंदको पूर्ववत् फेंकता था। इसी क्रममें एक बार गुणेशने गेंद आकाशमें फेंकी, जिसे चंचल नामक दैत्यने हाथसे पकड़ लिया। तब नियमानुसार वह असुर चंचल बालक गुणेशपर सवार हुआ। अपने भारसे उन देव गुणेशको दबाता हुआ वह दुष्ट दानव बोला- अरे दुष्ट बालक! तुम इन बालकोंके बीच बड़ी डींग हाँकते हो, अब मेरे भारको सहन करो॥ ४५-४७॥ वह बार-बार गेंदको उछालता था, और पुनः अपने हाथसे उसे पकड़ भी लेता था। इसी प्रकारसे उस दुष्ट दानवने दो मुहूर्ततक गेंदसे क्रीड़ा की। वहाँ उपस्थित वे सभी मुनिबालक गुणेशकी वैसी दशा देखकर हँसने लगे। तदनन्तर वे गुणेश दृढ़ पराक्रम दिखाते हुए उस दैत्यके ऊपर सवार हो गये ॥ ४८-४९॥ यह देखकर वह चंचल नामक दैत्य गुणेशको दूर ले जानेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ उतावला होकर आकाशमार्गसे चल पड़ा। अन्य बालक भूमिपर ही उसके पीछे-पीछे जाने लगे ॥ ५० ॥ वह दैत्य कभी विमानकी गतिके समान और कभी उड़ते हुए पक्षीके समान बड़ी तेजीसे उड़ रहा था। गुणेशके साथी वे बालक शोक करते हुए वापस लौट आये और अपने-अपने घरोंको चले गये। कुछ बालक वहीं ठहर गये और गुणेश्वरके वापस आनेकी प्रतीक्षा करने लगे। तदनन्तर विभु गुणेशने उस दुष्ट दानवकी नीयत मनसे जानकर एकाएक अपना भार हिमालयपर्वतके समान भारी बना लिया। उस भारके कारण वह दैत्य गिर पड़ा और गुणेश्वरसे कहने लगा - ॥ ५१-५३॥ मेरे ऊपरसे अपना महान् भार उतार लो, अन्यथा मेरे प्राण चले जायँगे। आप मुझ दीनपर दया कीजिये, मैं आपकी शरणमें हूँ। ऐसा कहता हुआ वह दैत्य मूर्च्छित हो गया। तब बालक गुणेशने उसे उसी प्रकार पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्पको पकड़ लेता है, और गुणेशने उसे बार-बार घुमाया, और उस चंचल नामक दुष्ट दानवको दूर देशमें फेंक दिया ॥ ५४-५५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'चंचल [आदि असुरों]-के वधका वर्णन' नामक तिरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९३ ॥ चौरानबेवाँ अध्याय मुनिबालकोंके साथ गुणेशका महर्षि गौतम तथा अहल्याके आश्रममें जाकर ओदन-क्रीडा करना, पार्वतीद्वारा गुणेशको बन्धनमें डालना तथा उनकी मायासे मोहित होना, महर्षि गौतमद्वारा अहल्यासे गुणेश्वरकी भगवत्ताका वर्णन ब्रह्माजी बोले- मुनियोंके जो बालक वहाँ गुणेशके आनेकी प्रतीक्षा कर रहे थे, वे सभी गुणेशके आनेपर उनके समीप गये। उनके जयकारके शब्दोंसे सम्पूर्ण आकाश-मण्डल, दिशाएँ और दिशाओंका मध्य भी गर्जन करने लगा ॥ १ ॥ वे सभी पुनः विविध प्रकारके नृत्यों तथा गीतोंसे अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ करने लगे। बालकोंके इस प्रकारसे क्रीडा करते-करते सूर्योदयके अनन्तर डेढ़ प्रहरका समय व्यतीत हो गया ॥ २ ॥ उन सभीके माता-पिता उनको ढूँढ़ते हुए जब Kalyana Visheshank 2021_Section_17_1_Back

क्री०ख०-अ०१४] * बालकोंके साथ गुणेशका महर्षि गौतमके आश्रममें जाकर ओदन-क्रीडा करना * ४१३ गाँवके मध्य किसी भी घरमें नहीं देख पाये, तब वे सभी छड़ी लेकर वहाँ उन बालकोंके पास गये, जहाँ वे सब चारों ओर गोला बनाकर तथा गुणेश्वरको बीचमें करके अनेक प्रकारकी क्रीडा कर रहे थे। उन लोगोंने स्वयं नाच रहे और दूसरे बालकोंको भी नचा रहे गुणेशकी भर्त्सना की ॥ ३-४ ॥ माता-पिता बोले-तुम्हारे साथके बिना हमारे बालक न तो स्नान करते हैं और न भोजन करते हैं। इन्होंने अपने आचार-विचार, अध्ययन, ब्राह्मणोचित कर्मों तथा विनयका भी परित्याग कर दिया है ॥ ५॥ तदुपरान्त उन गुणेशका दर्शनकर उनका क्रोध जाता रहा और वे आपसमें एक-दूसरेसे कहने लगे- इसको ताड़ित करनेकी पहले हमारी जो बुद्धि हो रही थी, वह इसे देखकर इस प्रकार न जाने कहाँ चली गयी है? यदि हम इसके माता-पिता शिव-पार्वतीसे इसके विषयमें कहते हैं, तो वे भी इसका क्या कर लेंगे ? इस बालकने तो अनेकों महान् बलशाली दैत्योंका वध कर डाला है। हे गुणेश्वर ! तुम्हारे भयसे हम कहीं दूसरे स्थानपर चले जाते हैं ॥ ६-७१/२॥ ब्रह्माजी बोले- वे लोग इस प्रकार कह ही रहे थे कि वे गुणेश्वर वहीं अन्तर्धान हो गये और फिर दूर जाकर उस स्थानपर प्रकट हुए, तब बालकोंने उन्हें देखा तो वे सभी बालक अपने माता-पिताको छोड़कर पुनः उन गुणेशके पास चले गये ॥ ८-९ ॥ खेलते-खेलते वे सभी शीघ्र ही महर्षि गौतमजीके श्रेष्ठ आश्रममें पहुँच गये। वहाँ उन्होंने मुनि गौतमको ध्यानमें स्थित देखा और उनकी भार्याको भोजन पकाते हुए देखा। उस समय वे गुणेश रसोईके मध्यस्थानमें गये और उन्होंने भातका बर्तन उठा लिया तथा उन सभीको विभाजितकर अन्न प्रदान करके वे आदरपूर्वक उनसे कहने लगे ॥ १०-११ ॥ मेरे साथ रहनेके कारण तुम सभी लोग बहुत देरतक भूखे रह गये। अब निश्चिन्ततापूर्वक भोजन कर लो, उसके बाद पुनः हमलोग क्रीडा करेंगे ॥ १२ ॥ तब महर्षि गौतमकी भार्या देवी अहल्या शीघ्र ही उन गुणेशपर गुस्सा हो गयीं और बोलीं- तुमने मेरे अन्नका स्पर्श क्यों किया ? हे चंचल बालको ! अभीतक न तो बलिवैश्वदेवकर्म किया गया है और न ही देवताओंको भोग लगाया गया है। वे मुनिश्रेष्ठ गौतम जब ध्यान पूर्णकर आयेंगे तो क्या करेंगे ? तब देवी अहल्याने उन मुनिश्रेष्ठ गौतमको ध्यानसे जगाया ॥ १३-१४ ॥ जब मुनि गौतमका ध्यान भंग हुआ तो उन्होंने क्षुधासे व्याकुल उन सभी बालकोंको भोजन करते हुए देखा। तदनन्तर वे गुणेश्वरसे बोले ॥ १५ ॥ गौतम बोले- श्रेष्ठ माता-पिताके पुत्र होकर भी आप अन्याय क्यों करते हैं? आपके अत्यन्त अद्भुत कर्मोंके विषयमें सुनकर हम इससे पूर्व आपको परात्परतर परब्रह्मस्वरूपी भगवान् मान चुके हैं, लेकिन हे गुणेश्वर ! लगता है, इस समय आप बालभावसे यह सब कर रहे हैं ॥ १६-१७ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर वे मुनि गौतम गुणेश्वरका हाथ पकड़कर पार्वतीके भवनमें आये, वे अपने हाथमें अन्नसहित उस पात्रको भी घरसे साथमें ले आये थे। गौतम बोले- हे माता ! आपका यह बालक नित्य मेरे साथ अन्याय करता है। आज मैं आपसे यही बात कहने आया हूँ, हे गौरी! अब इसके बाद मुझे क्या करना चाहिये ? यदि आप यह चाहती हैं कि मैं यहाँसे कहीं दूर रहनेके लिये चला जाऊँ, तो वैसा आप बोलें ॥ १८-१९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर मुनिके वचनोंको सुनकर पार्वती अत्यन्त रुष्ट हो गयीं, वे अपनी आँखोंसे आग बरसाती हुई छड़ीसे गुणेशको पीटने लगीं और क्रुद्ध हुई वे गौरी मुनिको प्रणामकर विनयपूर्वक उनसे कहने लगीं ॥ २०-२१ ॥ हे मुने ! इसके जन्म लेनेके समयसे ही मुझे भय लगा रहता है, मुझे राक्षसोंके द्वारा किये जानेवाले न जाने कितने ही विघ्नसमुहोंको अभी और देखना है ॥ २२ ॥ यह तो सब प्रकारसे दुष्ट और मुनियोंके पुत्रोंमें वैर उत्पन्न करनेवाला है, फिर भी स्त्रियाँ तथा मुनिश्रेष्ठ कोई भी इसकी बात बताने मेरे पास नहीं आते हैं ॥ २३ ॥ 'यह पार्वतीका पुत्र है' यह समझकर लोग इसे शाप नहीं देते हैं। तदनन्तर पार्वतीने उन महर्षिके सामने Kalyana Visheshank 2021_Section_17_2_Front

४९४ ॐ पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् ॐ [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ही पुत्र गुणेशके हाथ-पैरोंको बाँधकर और उन्हें घरके तदनन्तर पार्वती ने दरवाजा खोला और बालक भीतर डालकर उस घरके दरवाजेको दृढ़तापूर्वक बन्द गुणेशको बन्धनसे मुक्तकर वे प्रसन्नतापूर्वक उन्हें अपना कर दिया। 'ऐसा न करो-ऐसा न करो' कहते हुए मुनि स्तनपान कराने लगीं। इधर महर्षि गौतम अपने आश्रममें गौतम अपने आश्रमके लिये चले गये ॥ २४-२५ ॥ आ गये और देवताओंका पूजन करने लगे ॥ ३१ ॥ तदनन्तर वे सभी बालक उन गुणेश्वरके विषयमें महर्षिने उन सभी देवताओंको गुणेशके रूपवाला चिन्ता करने लगे कि इसका दर्शन हमें किस प्रकार और ही देखा, जो भोगसे तृप्त हो गये थे। उन्होंने सामने ही कब होगा? गिरिकन्या पार्वती ने तो कसकर दरवाजा भोगमें प्रदत्त अन्नको बिखरा हुआ भी देखा। यह बन्द करके उसे घरके भीतर बन्द कर दिया है। वे देखकर महर्षि गौतमके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ३२ ॥ बालक इस प्रकारसे बोल ही रहे थे कि उसी समय क्षणभरमें वे अपने मनमें विचार करने लगे कि मैंने दुर्बुद्धियुक्त ही वे गुणेश उन सबके बीच आ पहुँचे ॥ २६-२७ ॥ कार्य किया है। मैंने गुणेशके विषयमें सबकुछ पार्वतीको वे बालक गुणेश उस एक ही समयमें माताकी बता दिया और भोजनका पात्र भी उन्हें दिखला दिया। गोदमें तथा घरके भीतर भी दिखायी दे रहे थे। तब उन इसपर देवी पार्वती ने जगत्के कारण तथा अव्यक्त बालकोंने उनसे कहा—हे गौरी ! आपका पुत्र घरसे बाहर स्वरूपवाले उन गुणेश्वरको पीटा भी और बन्धनमें भी निकल आया है ॥ २८ ॥ डाल दिया। वे पर-से भी सदा परे हैं, जिनके तृप्त उस समय देवी पार्वती ने गुणेश्वरको घरके भीतर होनेपर महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥ ३३-३४ ॥ बँधा हुआ ही देखा और बाहर खड़े उन मुनिबालकोंको ऐसे उन गुणेशने मुनिबालकोंके साथ यहाँ आकर भी गुणेशके स्वरूपवाला ही देखा ॥ २९ ॥ भोजन किया था, उनकी मायासे मोहित हो जानेके यह देखकर पार्वती व्याकुल हो गयीं। वे जिस कारण मैं पहले उन्हें जान नहीं सका था ॥ ३५ ॥ किसीको भी गुणेश्वर समझकर अपना स्तनपान करानेके ब्रह्माजी बोले—यह सब देखकर देवी अहल्या लिये बुलाने लगीं, उस समय वे बालक पार्वतीसे मना भी अत्यन्त आश्चर्यचकित मनवाली हो गयीं और करते थे और कहते थे कि हे शिवे ! आपका पुत्र गुणेश उन्होंने दोबारा भोजन बनाया। महर्षि गौतमने भी ध्यानमें तो घरके भीतर ही स्थित है ॥ ३० ॥ स्थित होकर अपने सभी नित्यकर्मोंको पूर्ण किया ॥ ३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गौतमाश्रमगमन' नामक चौरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९४ ॥ पंचानबेवाँ अध्याय गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनके लिये पार्वतीके पास आना, विश्वकर्माका पार्वतीकी स्तुति करना, पार्वतीका उन्हें भक्तिका वर देना, विश्वकर्माद्वारा गुणेशका स्तवन और उन्हें अंकुश आदि आयुध प्रदान करना, गुणेशके द्वारा आयुधोंकी प्राप्ति कहाँसे हुई—इस जिज्ञासापर विश्वकर्माका सूर्य तथा संज्ञाकी कथा सुनाना, विश्वकर्माका प्रस्थान, उसी समय वृकासुर दैत्यका वहाँ आना, गुणेशद्वारा असुरका वध ब्रह्माजी बोले—छठे वर्षके प्रारम्भ होनेपर किसी गये। तब पार्वती ने अपने कक्षसे बाहर निकलकर उनका एक दिनकी बात है, पार्वतीके पुत्र वे गुणेश बालकोंके बहुत मान-सम्मान किया ॥ १-२ ॥ साथ कहीं बाहर गये और वहाँपर अनेक प्रकारकी उन्हें एक चित्रासनपर बैठाकर आदरपूर्वक उनकी क्रीड़ाएँ करने लगे। उनका दर्शन करनेकी इच्छासे पूजा की। उनके चरणोंका प्रक्षालनकर उन्हें गन्ध तथा देवशिल्पी विश्वकर्मा वहाँ उनके घरके भीतरकी ओर ताम्बूल प्रदान किया ॥ ३ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_17_2_Back

क्री०ख०-अ०९५] * गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनहेतु पार्वतीके पास आना * ४९५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] देवी पार्वतीके द्वारा प्राप्त आदरभावको देखकर विश्वकर्मा अत्यन्त प्रसन्न हो गये। वे देवी पार्वतीको परम श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने लगे॥ ४॥ विश्वकर्मा बोले—हे विश्वेश्वरि! आप ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अर्यमा एवं विष्णुस्वरूपा हैं, आप विश्वस्वरूपाको मैं प्रणाम करता हूँ। हे अनन्तशक्तिस्वरूपा! आपने ही इस जगत्की सृष्टि की है। आप ब्रह्मा आदि देवताओंके द्वारा अभिनन्द्य स्वरूपवाली हैं॥५॥ हे माता! आप ही रजोगुणका आश्रय लेकर विश्वकी संरचना करती हैं, सत्त्वगुणका आश्रय लेकर उसका पालन-पोषण करती हैं और आप ही पुनः तमोगुणका आश्रय लेकर उसका संहार भी करती हैं। यह त्रैगुण्यभाव आपका नित्य स्वरूप है। आपने ही समस्त दैत्योंका वध किया है। आपकी शरण ग्रहण किये हुए ब्रह्मर्षिगण अपने ज्ञानके कारण मुक्तिको प्राप्त करते हैं। आप ही विष्णुकी अतुलनीय शक्ति हैं, आप ही जगत्की कारणभूता परम मायाशक्ति हैं॥ ६-७॥ सत् तथा असत्की पराशक्ति आप ही हैं। आप ही इस चराचर जगत्की सृष्टि करनेवाली हैं। आप सभी लोगों तथा सभी देवेश्वरोंको सम्मोहित करके काष्ठा तथा कला आदि समयकी सूक्ष्म गतियोंके द्वारा उन्हें कर्मोंका भोग प्रदान करती हैं॥८॥ जिन्होंने आपकी शरण ग्रहण कर ली है, उन्हें न तो मृत्युका भय रहता है और न कभी दैत्योंसे उत्पन्न भय ही रहता है। आप पुण्यात्माजनोंके लिये लक्ष्मीरूपा

[दायाँ स्तम्भ] हैं, दुष्टात्माओंके लिये अलक्ष्मीस्वरूपा हैं और समस्त स्त्रियोंके रूपमें भी आप ही विद्यमान हैं॥ ९॥ आप तीनों लोकोंमें विद्यारूपा हैं, सूर्य तथा चन्द्रमामें आप ही प्रभाके रूपमें विद्यमान हैं। हे माता! जिन्होंने आपकी शरण ग्रहण कर ली है, वे सम्पूर्ण जगत्के आश्रय बन जाते हैं। उन्हें लेशमात्र भी विपत्ति नहीं आती॥ १०॥ हे विश्वेश्वरि! आप ही इस विश्वका संहार करती हैं और जलरूपसे आप ही इसका आप्यायन भी करती हैं। आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, विष्णु, शंकर, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी आप दुर्लभ हैं। आपकी कृपा होनेपर ही भक्तजन आपका भजन करनेमें समर्थ हो पाते हैं और अन्तमें आनन्दस्वरूप होकर स्वर्गमें निवास करते हैं। जो आपकी भक्ति नहीं करते, ऐसे जनोंपर रुष्ट होकर आप उनके वांछितोंका विनाश करती हैं। हे माता! मैंने आपकी शरण ग्रहण की है॥ ११-१२॥ हे जगन्माता! आज मेरे ये दोनों नेत्र धन्य हो गये, मेरी विद्या धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरे मातृवंश तथा पितृवंश—दोनों धन्य हो गये और मेरा कुल भी धन्य हो गया, जो कि मुझे आपके चरणयुगलोंका दर्शन प्राप्त हुआ है*॥ १३॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे स्तुति की गयी जगज्जननी देवी पार्वतीने उनसे वर माँगनेके लिये कहा। तब विश्वकर्माने जगदम्बाकी परम भक्तिका आशीर्वाद माँगा, इसपर देवीने उनसे कहा—ऐसा ही होगा॥ १४॥


[मूल संस्कृत श्लोक]

  • विश्वकर्मोवाच नमामि विश्वेश्वरि विश्वरूपे ब्रह्मेन्द्ररुद्रार्यमविष्णुरूपे। त्वया ततं विश्वमनन्तशक्ते ब्रह्मादिदेवैरभिनन्द्यरूपे॥ त्वमेव विश्वं रजसा विधत्से सत्त्वेन मातः परिपासि तच्च। त्वमेव सर्वं तमसाथ हंसि त्रैगुण्यमेतत् तव नित्यरूपम्॥ त्वया हता दैत्यगणा विमुक्तिं ब्रह्मर्षयो ज्ञानबलात्प्रपन्नाः। त्वमेव विष्णोरतुलासि शक्तिः सर्वस्य हेतुः परमासि माया॥ सतोऽसतो वापि परासि शक्तिश्चराचरं त्वं विदधासि विश्वम्। सम्मोह्य लोकान्सकलान्सुरेशान्काष्ठाकलाभिश्च ददासि भोगम्॥ ये त्वां प्रपन्ना न भयं तु तेषां मृत्योस्तथा दैत्यकृतं कदाचित्। त्वमेव लक्ष्मीः सुकृतामलक्ष्मीर्दुष्टात्मनां त्वं प्रमदास्वरूपा॥ विद्यास्वरूपासि जगत्त्रये त्वं प्रभास्वरूपा शशिसूर्ययोस्त्वम्। य आश्रितास्ते जगदाश्रयास्ते विपत्तिलेशो न च तेषु मातः॥ त्वमेव विश्वेश्वरि विश्वमेतद्धरस्त्यथाप्यायसि वारिरूपा। अनादिमध्यानिधनाप्यगम्या हरीशलोकेशसुरेश्वराणाम्॥ तेऽनुग्रहात्त्वां प्रभजन्ति भक्ता आनन्दरूपा निवसन्ति नाके। अभक्तकामान् विनिहंसि रुष्टा त्वामेव मातः शरणं प्रपन्नः॥ धन्ये ममैते नयनेऽद्य विद्या जनुश्च माता पितृवंश एव। कुलं च धन्यं चरणौ त्वदीयौ दृष्टौ यतस्ते जगदम्बिके मया॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ९५।५-१३)

४९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [श्रीगणेशपुराण- जो विश्वकर्माद्वारा किये गये इस जगदम्बास्तोत्रका पाठ करता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त करता है। वह सर्वत्र विजय, पुष्टि, विद्या, आयु, सुख तथा कल्याणको प्राप्त करता है ॥ १५ ॥ शिवा बोलीं—हे विश्वकर्मा ! हे महान् बुद्धिसे सम्पन्न ! आप सब प्रकारसे ज्ञानवान् हैं। भगवान् शिवसे मैंने आपके विषयमें जो कुछ सुना था, वह सब आज मैंने आपमें प्रत्यक्ष विद्यमान देख लिया है ॥ १६ ॥ सिन्धु दैत्यके द्वारा पीड़ित सभी देवता कारागारमें पड़े हुए हैं। भगवान् शिवका धाम कैलास भी उसके द्वारा अधिगृहीत कर लिये जानेके कारण वे शिव भी यहाँ आ गये हैं। इस दण्डकारण्य नामक स्थानपर कोई भी आप्त पुरुष नहीं दिखायी देता। बहुत समयके अनन्तर आप भलीभाँति यहाँ दृष्टिपथमें आये हैं ॥ १७-१८॥ विश्वकर्मा बोले—हे जगन्माता ! यदि पुत्र माताके पास आता है, महान् भक्त यदि अपने अभीष्ट देवके दर्शनके लिये जाता है और हे शिवे ! विद्या ग्रहण करनेकी इच्छावाला यदि गुरुके पास जाता है तो इसमें क्या आश्चर्य है ! ॥ १९ ॥ हे माता ! मैंने आपके पुत्रकी परम अद्भुत महिमाका श्रवण किया है, आप दोनोंके दर्शनोंका अभिलाषी मैं आपके पुत्रका [भी] दर्शन करनेके लिये आया हूँ ॥ २० ॥ ब्रह्माजी बोले—जब वे विश्वकर्मा और माता पार्वती इस प्रकारसे परस्पर वार्तालाप कर रहे थे कि उसी समय वे विनायक वहाँ आ पहुँचे। धूलिधूसरित देहवाले उन गुणेशकी कान्ति असंख्य चन्द्रमाओंके सदृश थी ॥ २१ ॥ उनका मुखमण्डल अत्यन्त प्रसन्न था, वे बालकोंके समूहोंसे घिरे हुए थे। उन बालकोंके मध्य वे उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे मरुद्गणोंके मध्य इन्द्र सुशोभित होते हैं। उनका दर्शनकर विश्वकर्माने उन्हें प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर सामने खड़े हो गये। उन गिरिजापुत्रको परमात्मा जानकर वे उनकी स्तुति करने लगे ॥ २२-२३ ॥ विश्वकर्मा बोले—[हे प्रभो !] आप सत्-चित् तथा आनन्दमय विग्रहवाले हैं, समस्त चर और अचर जगत्के गुरु हैं और सभी कारणोंके भी कारण परमात्मा हैं। आप गुणेश नामसे प्रसिद्ध हैं, गुणातीत हैं, सृष्टि, स्थिति तथा संहारके कारणस्वरूप हैं, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं, ईशान हैं तथा व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूपवाले हैं। आप सभी देवताओंके लिये अगम्य हैं, मुनिजनोंके हृदयकमलमें निवास करनेवाले हैं, सिद्धि तथा बुद्धिके स्वामी हैं, विविध भक्तोंको सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं, सर्वसमर्थ हैं, अभक्तोंकी कामनाओंका दमन करनेवाले हैं आपकी प्रभा हजारों सूर्योंके समान उज्ज्वल है, आप अनेक प्रकारकी शक्तियोंसे समन्वित हैं, और दैत्यों तथा दानवोंका मर्दन करनेवाले हैं। आप अनादि, अव्यय, शान्त, जरा-मरणसे रहित, ब्रह्मा-विष्णु तथा शिव—इस प्रकारसे त्रिविध विग्रह धारण करनेवाले और वेदत्रयीके मूलरूप हैं, आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २४-२८॥ ब्रह्माजी बोले—विश्वकर्माद्वारा की गयी इस प्रकारकी स्तुतिको सुनकर वे गुणेश्वर अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये, उन्होंने उन विश्वकर्माको उत्तम आसनपर बैठाकर बड़े ही आदरभावसे उनकी पूजा की। उन्होंने उनके चरणोंको प्रक्षालित करके उन्हें गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य निवेदित करके उनसे कहा ॥ २९-३० ॥ गुणेश बोले—हे विश्वकर्मा ! आप मेरे दर्शनकी अभिलाषासे यहाँ आये हैं तो बताइये कि आप मेरी प्रसन्नताके लिये कौन-सा श्रेष्ठ उपहार मेरे लिये लाये हैं ? ॥ ३१ ॥ विश्वकर्मा बोले—जो स्वात्मानन्दसे परिपूर्ण हैं, दूसरेकी अभिलाषाको पूर्ण करनेवाले हैं, सब प्रकारसे इच्छारहित हैं, सब कुछ करनेवाले हैं, सभी प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न है, मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा सोनेमें समान बुद्धि रखनेवाले हैं, कल्पवृक्षको भी तिरस्कृत कर देनेवाले हैं, कर्तुम्, अकर्तुम् तथा अन्यथाकर्तुम् समर्थ हैं, आत्माधीन हैं, सब प्रकारसे सन्तुष्ट हैं और स्वेच्छाशक्तिसे विचरण करनेवाले हैं, ऐसे आप- जैसे दिव्य महापुरुषोंके सन्तोषके लिये भला सब प्रकारसे पराधीन, सब प्रकारके सामर्थ्यसे रहित, सर्वथा

क्री०ख०-अ०१५ ] * गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनहेतु पार्वतीके पास आना * ४९७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अकिंचन मुझ-जैसे मृत्युधर्मा प्राणीके द्वारा क्या देनेयोग्य हो सकता है, फिर भी मैं अपने सामर्थ्यके अनुसार कुछ लाया हूँ॥ ३२-३४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहनेके अनन्तर विश्वकर्माने उनके समक्ष सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला एवं तीक्ष्ण धारवाला अंकुश, पद्म, हजारों सूर्योंके समान प्रभाववाला परशु तथा पाश नामक शस्त्र रखा। गुणेश्वरने उन शस्त्रोंको ग्रहण किया॥ ३५-३६॥ तब गुणेश्वरने विश्वकर्मासे कहा—हे अनघ! हे विश्वकी संरचना करनेवाले! आप इन शस्त्रोंको कहाँसे लाये हैं, अब मेरी प्रसन्नताके लिये यह मुझे बतायें॥ ३७॥ विश्वकर्मा बोले—'संज्ञा' नामसे प्रसिद्ध मेरी एक कन्या है, वह सुन्दर रूपसे सम्पन्न है, उसके मुखको देखकर चन्द्रमा भी एकाएक लज्जित हो गये थे। हे गुणेश्वर! लक्ष्मी, इन्द्रपत्नी शची, सावित्री, शारदा, अरुन्धती अथवा कामदेवकी पत्नी रति और तीनों लोकोंमें भी कोई स्त्री ऐसी नहीं है, जो उसके समान सुन्दर हो॥ ३८-३९॥ उसे मैंने स्वयं ही वेदत्रयीस्वरूप तथा त्रिदेवस्वरूप भगवान् सूर्यको पत्नीरूपमें समर्पित किया था। उस विवाहमें सांगोपांग अर्थात् वाहन, परिवारादिके साथ त्रिलोकीके सभी निवासी आये थे॥ ४०॥ वह महान् विवाह-महोत्सव आठ दिन-राततक निरन्तर चलता रहा। उस संज्ञाको देखकर क्षुभित हुए देवता लज्जासे अधोमुख हो वहाँसे चले गये थे॥ ४१॥ तदनन्तर भगवान् सविता उस संज्ञाको साथ लेकर अपने श्रेष्ठ स्थानको चले गये। उन भगवान् सूर्यके तेजसे संतप्त होकर मेरी कन्या संज्ञा अत्यन्त दुर्बल हो गयी। तदनन्तर उस संज्ञाने अपने सामर्थ्यके प्रभावसे अपनी छायाके रूपमें अपने ही समान छाया नामक एक स्त्रीकी संरचना की। फिर उसे सब कुछ समर्पितकर वह शीघ्र ही मेरे घरको आ गयी॥ ४२-४३॥ इसी प्रकारसे जब कुछ समय व्यतीत हो गया तो सूर्यने छायाकी वास्तविकताको जान लिया। 'यह संज्ञा नहीं है'—ऐसा जानकर वे सूर्य शीघ्र ही मेरे घर चले आये। तदनन्तर भयभीत संज्ञाने पुनः मुझसे कहा—हे पिता! मुझे सूर्यके हाथ न सौंपें, मैं इनके तेजको सहन करनेमें असमर्थ हूँ॥ ४४-४५॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर पिता विश्वकर्माके द्वारा धिक्कारे जानेपर वह घरसे बाहर चली गयी। वह संज्ञा अश्विनी(घोड़ी)-का रूप धारणकर गुप्त रूपसे वनमें रहने लगी॥ ४६॥ इसके पश्चात् विश्वकर्माने उस संज्ञाको घरमें कहीं भी न देखकर सूर्यसे कहा—वह संज्ञा आपके तेजको सहन करनेमें समर्थ नहीं है। वह कहाँ चली गयी, यह मैं भी नहीं जानता, किंतु उसकी प्राप्तिका उपाय मैं बताता हूँ, यदि आपके तेजका कुछ भाग कम हो जाय, तो वह संज्ञा प्रकट हो जायगी और तब आप उसके साथ विहार करें॥ ४७-४८१/२ ॥ सूर्य बोले—यदि आपका मन इस प्रकार करनेका है तो आप वैसा ही करें॥ ४९॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर विश्वकर्माने उन सूर्यको यन्त्रमें स्थापितकर उन्हें कुछ छील दिया और शीघ्र ही उनके तेजको कम कर दिया, जिससे वे कुछ सौम्य- स्वरूपवाले हो गये॥ ५०॥ तब विभु सूर्य वहाँ गये, जहाँपर संज्ञा गुप्तरूपसे निवास कर रही थी। भगवान् सूर्यने अश्वका रूप धारणकर अश्विनी बनी हुई उस संज्ञाके साथ रमण किया। तब संज्ञाने नासत्य अथवा दस्र कहे जानेवाले दो अश्विनी- कुमारोंको जन्म दिया। तदनन्तर संज्ञाको लेकर भगवान् सूर्य बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने लोकको गये॥ ५१ १/२ ॥ विश्वकर्मा बोले—हे गुणेश्वर! हे जगदीश्वर! भगवान् सूर्यके तेजका जो भाग छीलनेपर शेष रह गया था, उस अत्यन्त प्रबल तेजसे मैंने अत्यन्त शीघ्र ही आपके लिये आयुधोंका निर्माण किया, ये आयुध अत्यन्त तीक्ष्ण और कालपर भी सदा विजय दिलानेवाले हैं॥ ५२-५३॥ मैंने ये चार आयुध आपको प्रदान किये हैं, चक्र तथा गदा भगवान् विष्णुको दी है और सभी शत्रुओंका विनाश

४९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

करनेवाला त्रिशूल भगवान् शिवको प्रदान किया है ॥ ५४ ॥ गुणेश बोले—हे विश्वकर्मा! आपने बहुत अच्छा किया, जो मुझे ये शुभ आयुध प्रदान किये हैं, ये आयुध दैत्योंका नाश करनेके लिये तथा सज्जनोंके परोपकारके लिये उपयोगी सिद्ध होंगे ॥ ५५ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर उन विश्वकर्मासे उन्होंने शीघ्र ही उन आयुधोंको ग्रहण किया और उनके प्रयोगकी परीक्षा की, जिससे सम्पूर्ण पृथ्वी, पर्वत तथा वन काँप उठे। वे विभु गुणेश्वर करोड़ों सूर्योंकी कान्तिके सदृश उन शस्त्रोंसे अत्यन्त शोभाको प्राप्त हुए। तदनन्तर वे विश्वकर्मा उनकी आज्ञा लेकर और उन्हें प्रणामकर अपने स्थानको चले गये ॥ ५६-५७ ॥ वे उमाके पुत्र बालक गुणेश बालकोंसे घिरे रहकर पुनः उनके साथ क्रीड़ा करने लगे, उसी समय वहाँ एक अत्यन्त दुष्ट महादैत्य आ पहुँचा, उसका नाम था वृक। उसका मुख बड़ा ही भयंकर था, वह मदोन्मत्त, महान् बलशाली वृक मानो सबको निगलता जा रहा था। वह अपनी पूँछके आघातसे पृथ्वीको प्रकम्पित कर रहा था। उसके दाँत हलके समान बड़े तथा अत्यन्त नुकीले थे ॥ ५८-५९ ॥ उस भयंकर दैत्यको देखकर मुनिबालक भाग उठे। गुणेशने शीघ्र ही आयुधोंको ग्रहणकर उस वृकासुरको प्रताड़ित किया ॥ ६० ॥ वह दैत्य असुर अंकुशके एक ही प्रहारमात्रसे भूमिपर गिर पड़ा। वह अपने मुखसे रक्त उगल रहा था। उसने अपना असली दैत्यका रूप धारण कर लिया, गिरते समय वह वृक्षोंको चूर-चूर करता हुआ तथा अनेक जीवोंको मारता हुआ दस योजन विस्तारवाला हो गया था। तदनन्तर सूर्यास्त हो जानेके अनन्तर वे गुणेश्वर बालकोंके साथ घरको चले आये ॥ ६१-६२ ॥ उन बालकोंने देवी उमाको बताया कि आज इस गुणेशने वृक नामक असुरको अपने अंकुशके आघातसे मार डाला। वह असुर दस योजन विस्तृत शरीरवाला था। तब गिरिकन्या पार्वतीने क्रुद्ध-सी होकर उन बालकोंसे कहा—तुम लोग अपने-अपने घरोंको जाओ। पार्वतीका यह वाक्य सुनकर वे सभी बालक हँसते हुए अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ६३-६४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'वृकासुर-वधवर्णन' नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९५ ॥

छियानबेवाँ अध्याय सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न होना, यज्ञोपवीत-महोत्सवका वर्णन, उसी अन्तरालमें वहाँ आये कृतान्त तथा काल नामक दैत्योंका वध करना, महर्षि कश्यप तथा अदितिद्वारा गुणेश्वरका पूजन, देवताओंद्धारा बालक गुणेश्वरकी महिमाका प्रतिपादन

ब्रह्माजी बोले—एक दिनकी बात है, देवी पार्वती प्रसन्न भगवान् शिवसे बोलीं ॥ १/२ ॥ शिवा बोलीं—हे देवेश्वर! इस समय बालक गुणेशका सातवाँ वर्ष प्रारम्भ हो गया है, अतः किसी शुभ मुहूर्तमें बड़े ही समारोहके साथ गुणेशका उपनयन-संस्कार सम्पन्न करना चाहिये ॥ १ १/२ ॥ शिव बोले—हे भद्रे! तुमने मेरे मनकी बात जानकर बहुत अच्छी बात कही है। अब मैं इस बालकका यज्ञोपवीत-संस्कार यथोचित विधि-विधानके साथ कराऊँगा ॥ २ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—देवी पार्वतीसे इस प्रकार कहकर भगवान् शिवने महर्षि गौतमको बुलवाया और शुभ दिनमें लग्नका विचार करके संस्कारकी सामग्रीको एकत्र किया। अत्यन्त विस्तृत लग्नमण्डप तैयार किया गया, सभी ऋषियों तथा मुनियोंको आमन्त्रितकर और उन सभीका पूजनकर तथा उनकी अनुमति प्राप्तकर भगवान् शिवने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक बालक गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न किया ॥ ३–५ ॥

क्री०खं०-अ०१६ ] * सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न होना * ४९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ]

उन सभी ऋषि-मुनियोंने भगवान् शिव, देवी पार्वती तथा बालक गुणेशको अनेक प्रकारके उपहार प्रदान किये। भगवान् शिवने उन अठासी हजार ऋषि- मुनियोंको नमस्कार करके उनका यथाविधि पूजन किया और उन्हें विविध प्रकारकी भेंट प्रदान की॥ ६१/२ ॥ उसी प्रकार उन्होंने तैंतीस करोड़ देवताओं, यक्षों, किन्नरों तथा चारणोंको भी उपहार प्रदान किये। उस समय विविध वाद्योंकी ध्वनि हो रही थी, किन्नरगण गान कर रहे थे, नर्तकियोंके समूह तीव्रगतिसे नृत्य कर रहे थे और सभी लोग उस मांगलिक महोत्सवका अवलोकन कर रहे थे। ऐसे समयमें भगवान् शिवने बड़ी ही प्रसन्नताके साथ सभीको विविध उपहार तथा दान दिये ॥ ७-९॥ उन्होंने देवताओंकी स्थापना करके सभीको भोजन कराया। प्रातःकाल बटुक गुणेशको स्नान करानेके अनन्तर उनका चूडाकरण-संस्कार कराया और चार ब्राह्मणोंके साथ बटुकको भी भोजन कराकर पुनः उन्हें स्नान कराया॥ १०१/२॥ बनायी गयी वेदी तथा बटुकके मध्य उत्तम वस्त्रकी ओट लगाकर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करनेवाले मुनिजनोंके साथ उपनयनका मुहूर्त शोधित करके [भगवान् शिव] मुहूर्तके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे॥ १११/२ ॥ इसी समय वहाँ कृतान्त तथा काल नामवाले दो दैत्य आ पहुँचे। वे उन्मत्त हाथीका रूप धारण किये हुए थे, उनके गण्डस्थलसे मदरूपी जल प्रवाहित हो रहा था, वे बड़े ही सुदृढ़ शरीरवाले थे, उनके दाँत अत्यन्त तीक्ष्ण थे, उनकी लम्बायमान सूँडें आकाशसे स्पर्धा कर रही थीं। वे दोनों अपनी चिंघाड़ ध्वनिसे लोगोंको भयभीत कर रहे थे, उन दोनोंके मस्तक सिन्दूरके समान अरुण वर्णके थे, उनके पैरोंके प्रहारसे पृथ्वी तीव्र गतिसे काँप रही थी ॥ १२-१४॥ युद्ध करते हुए वे दोनों एक-दूसरेपर अपने दाँतोंसे प्रहार कर रहे थे। जिसके कारण उठी धूलसे पृथ्वी तथा आकाशका मध्य भाग ढक गया था। वे दोनों हाथी

[दायाँ स्तम्भ]

सभामण्डपके द्वारदेशमें स्थित इन्द्रके हाथी ऐरावतके समीप आ गये ॥ १५ ॥ उन्होंने अपने दाँतोंके प्रहारोंसे उस ऐरावत हाथीके अत्यन्त सुदृढ़ गण्डस्थलको भेद डाला। फलतः वह गजेन्द्र ऐरावत रक्त बहाने लगा और क्षणभरमें ही मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा ॥ १६ ॥ फिर एक मुहूर्तके बाद चेतना प्राप्तकर वह ऐरावत शीघ्र ही वहाँसे पलायित हो गया। उसके पीछे-पीछे दौड़ते हुए उन दोनों हाथियोंने अपने दाँतोंके आघातसे पुनः उसपर प्रहार किया ॥ १७ ॥ तदनन्तर वे दोनों उन्मत्त हाथी सभाके मध्यमें आ गये। उस समय उन्होंने अपनी सूँड़ोंके द्वारा उस सभा- मण्डपको उखाड़ डाला ॥ १८ ॥ वहाँ स्थित सभी लोग उन दोनों हाथियोंके कोलाहलको सुनकर उठ खड़े हुए, वे दोनों हाथी जिधर-जिधर जाते थे, वहाँ-वहाँसे देवता पलायित हो जाते थे ॥ १९ ॥ उन दोनों हाथियोंसे भयभीत होकर मुनिगण दसों दिशाओंमें भाग चले। तदनन्तर शिवगणोंने वहाँ जाकर भगवान् शिवको यह समाचार दिया कि एक विघ्न उपस्थित हो गया है॥ २० ॥ गण बोले— उन दोनों हाथियोंके भयसे भयभीत होकर इन्द्र तथा मुनियोंसहित सारी सभा भंग हो गयी है। पार्वतीजी भी अपनी सखियोंके साथ वहाँसे पलायित होकर घर आ गयीं ॥ २१ ॥ तदनन्तर बालक गुणेशने उन दोनों अत्यन्त बलशाली दैत्यरूपी हाथियोंको देखकर मेघके समान गर्जना की और शीघ्र अपने दोनों हाथोंसे उन दोनोंकी सूँड पकड़ ली। इससे वे दोनों जोरसे चिंघाड़ने लगे। गुणेशने उन दोनोंको घुमाकर एक हाथीको दूसरे हाथीके ऊपर पटक दिया ॥ २२-२३ ॥ उन दोनोंके सैकड़ों टुकड़े हो गये और वे दोनों जमीनपर गिर पड़े। उनके गिरनेसे भूमि काँप उठी और वृक्ष चूर-चूर होकर धराशायी हो गये ॥ २४ ॥

५०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] तदनन्तर गणोंने उन दोनोंके शरीरके टुकड़ोंको शीघ्र ही ले जाकर दूर फेंक दिया। उस समय माता पार्वती त्वरापूर्वक वहाँ आ पहुँचीं और उन्होंने बालकको अपनी गोदमें ले लिया ॥ २५ ॥ पार्वतीजीकी सखीने उन्हें बतलाया कि उन गजरूपी दैत्योंसे भयभीत होकर सभी देवता और मुनिगण पलायित हो गये। इस बालकने शीघ्र ही उन दोनों दानवोंको मार डाला ॥ २६ ॥ इसके पश्चात् इन्द्र आदि सभी देवताओं तथा मुनियोंने उन गुणेशसे कहा—हे स्वामिन् ! हे सभी गुणोंके निधान! आपने कपटपूर्वक हाथीका स्वरूप धारण किये हुए उन दैत्योंको अपनी लीलाद्वारा मार डाला। हे देव! वे दोनों दैत्य सभीका प्राण हरनेवाले, बड़े ही मायावी और अत्यन्त बलवान् थे ॥ २७-२८ ॥ ऐसा कहकर देवराज इन्द्रसहित सभी देवताओं और मुनिगणोंने सभामें प्रवेश किया। सभी जनोंके अपने-अपने स्थानपर बैठ जानेके अनन्तर अप्सरागणोंने नृत्य करना प्रारम्भ किया ॥ २९ ॥ विविध प्रकारके वाद्य बजने लगे। पितामह ब्रह्मा रुद्रके समीपमें गये और उनके साथ मन्त्रणा करके उन्होंने शिशु गुणेशकी कमरमें मेखला बाँधी ॥ ३० ॥ तदनन्तर बटुक गुणेशको यज्ञोपवीत धारण कराकर मृगचर्म पहनाया और होम करके [बटुकसे] अग्निमें समिधाकाष्ठ प्रदान करवाया। उसके पश्चात् विधि- विधानके साथ गायत्रीमन्त्रका वाचन करवाया ॥ ३१ ॥ तदनन्तर माता पार्वती ने भिक्षाके रूपमें बटुक गुणेशको दो वस्त्र, आभूषण, उत्तरीय वस्त्र, मोतियोंके साथ अनेक रत्न और लड्डू आदि खाद्य पदार्थ प्रदान किये। भगवान् शिवने बटुक गुणेशको त्रिशूल तथा चन्द्रमा प्रदान किया और उनके भालचन्द्र तथा शूलपाणि— ये दो सार्थक नाम रखे। तदनन्तर भगवान् विष्णुने उन्हें चक्र दिया और उन महात्मा गुणेशका 'शोचिष्केश' यह श्रेष्ठ नाम रखा ॥ ३२-३४॥ इसके पश्चात् पुरन्दर इन्द्रने उन बटुक गुणेशका

[दायाँ स्तम्भ] पूजन करके चिन्तामणि नामक मणि उनके कण्ठमें बाँधी और सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा मंगलदायक 'चिन्तामणि' यह उनका नाम रखा ॥ ३५ ॥ उसी समय कमलके आसनपर विराजमान रहनेवाले, ब्रह्माजीने उन गुणेशका पूजन करके उन्हें कमल प्रदान किया और उस भरी सभामें 'विधाता' यह नाम उनका रखा। तदनन्तर अन्य सभी देवताओंने उन गुणेश्वरका भलीभाँति पूजन किया और उन्होंने अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार उनके विविध नाम रखे ॥ ३६-३७ ॥ इसके पश्चात् देवी अदिति और महर्षि कश्यपने आदरपूर्वक उनका पूजन किया और देव गुणेश्वरने उन्हें अपने पहलेके शुभ स्वरूपका दर्शन कराया ॥ ३८ ॥ उस समय वे अपने मस्तकपर चन्द्रमाको विराजमान किये हुए थे, उनकी दस भुजाएँ थीं, वे मुकुटसे सुशोभित हो रहे थे, वे दिव्य वस्त्रों, दिव्य सुगन्धित विलेपन तथा दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ ३९ ॥ वे सिंहपर विराजमान थे, उन्होंने नागराजको अपनी करधनीके रूपमें बाँधा हुआ था। इस प्रकारके स्वरूपका दर्शन करके अदितिने उनका आलिंगन किया और वे अत्यन्त स्नेहानन्दमें निमग्न हो गयीं ॥ ४० ॥ उनके शरीरमें रोमांच हो आया। अत्यधिक प्रेमके कारण उनके कण्ठसे स्पष्ट शब्द नहीं निकल पा रहे थे, वे अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं और उनकी आँखोंसे निकलनेवाली अश्रुधारासे उनकी दृष्टि धुँधली-सी हो गयी। वे देवी अदिति परम आनन्दमें निमग्न हो गयीं। स्नेहके कारण उनके स्तनोंसे दुग्ध निकलने लगा। अदितिके समान ही महर्षि कश्यपको भी तत्क्षण ही देहका भान नहीं रहा ॥ ४१-४२ ॥ तदनन्तर उन दोनों कश्यप तथा अदितिने स्नेहके वशीभूत हो उनसे कहा—हे वत्स ! तुम्हारे वियोगमें हम दोनों अत्यन्त दुर्बल हो गये थे, किंतु अब इस समय तुम्हारे दर्शनसे हम पुनः पुष्ट शरीरवाले हो गये हैं। हे

क्री०ख०-अ०९६ ] * सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न होना * ५०१ पुत्र ! तुम हम दोनोंका परित्याग मत करो, हम दोनोंका तुम्हारे चरणोंमें अत्यन्त अनुराग है ॥ ४३ १/२ ॥ गजानन बोले- हे माता! मैंने एक बार आपको दर्शन देनेकी प्रतिज्ञा की थी, वह प्रतिज्ञा मैंने इस समय पूर्ण कर ली है, अतः अब आपको शोक नहीं करना चाहिये। मैं सभीके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विद्यमान रहता हूँ, अतः आपका और मेरा [वस्तुतः] कभी वियोग नहीं हो सकता ॥ ४४-४५ ॥ ब्रह्माजी बोले-जब वे इस प्रकार वार्ता कर ही रहे थे कि उसी बीच देवी पार्वती वहाँ आ पहुँचीं। उन दोनों कश्यप एवं अदितिका अपने बालक गुणेशपर उस प्रकारका स्नेह देखकर वे बड़े ही प्रेमपूर्वक बोलीं ॥ ४६ ॥ पार्वती बोलीं- हे अदिति! आप अब मेरा पुत्र मुझे दे दीजिये, इसे आपने बहुत देरसे पकड़ रखा है। हे पवित्र मुसकानवाली! हे सुन्दर भौंहोंवाली देवी अदिति! यह आपका पुत्र नहीं है, इसे आप ठीकसे देख लें। जब उन्होंने पुनः देखा तो उन विभु विनायकको अपने पुत्रके रूपमें ही पाया ॥ ४७ १/२ ॥ अदिति बोलीं- हे गौरी! स्वयं आप भी शीघ्र ही आगे आकर इस मेरे पुत्रको भलीभाँति देख लें ॥ ४८ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब गौरीने पुनः उन्हें अपने पुत्र गुणेशके रूपमें ही देखा। अदिति उन्हें अपना पुत्र बतलाने लगीं और पार्वती कहने लगीं कि यह मेरा पुत्र है ॥ ४९ ॥ जब उन दोनों अदिति एवं पार्वतीमें इस प्रकारका वाद-विवाद होने लगा, तो अत्यन्त विस्मित होकर देवता कहने लगे-जो देव आदि और अन्तसे रहित हैं, सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले हैं, अनन्त स्वरूपोंवाले हैं, अनन्त श्रीसे सम्पन्न हैं और अनेक प्रकारकी शक्तियोंसे समन्वित हैं, भला वे किसके पुत्र हो सकते हैं! दोनों ही देवियाँ इन गुणेश्वरकी मायासे भ्रान्त हो रही हैं ॥ ५०-५१ ॥ वे देवता बोले-जिसके ये पुत्र हैं, उसीके हाथमें इनको समर्पित किया जाय ॥ ५१ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उन विविध स्वरूप धारण करनेवाले परमेश्वर गुणेशकी ओर देखकर कुछ देवता कहने लगे कि ये विधाता ब्रह्मा हैं, कुछ कहने लगे कि ये चार भुजाधारी भगवान् विष्णु हैं, कुछ देवता कहने लगे कि ये तीन नेत्रोंवाले भगवान् शंकर हैं और कुछ देवता उन्हें वरुणदेव तथा कुछ उनको अग्निदेव बताने लगे ॥ ५२-५३ ॥ कुछ देवताओेंने उन्हें कामदेव, तो किन्होंने भूतलपर समागत सूर्य माना। कुछ देवगण उन्हें गन्धर्व, किन्नर, कुबेर तथा शेषनागके रूपमें देख रहे थे। इस प्रकार विविध रूपवाले उन गुणेशको देखकर देवगण विस्मित हो उठे ॥ ५४ ॥ तब वे देवता कहने लगे कि ये कौन हैं, इसका निश्चय करनेमें हम समर्थ नहीं हैं। आप दोनों अपनी विवेकशक्तिसे निश्चयकर इन परमपुरुषको स्वयं ही ग्रहण कर लें ॥ ५५ ॥ तदनन्तर गौरी पार्वतीने उन प्रभु अपने पुत्र गुणेशको शीघ्र ही पकड़ लिया और स्नेहपूर्वक उन्हें अपना स्तनपान कराया। यह देखकर देवी अदिति उदास हो गयीं ॥ ५६ ॥ वे कहने लगीं कि यदि ये मेरे पुत्र होते तो फिर दूसरी स्त्रीके पास क्यों जाते, मैं भ्रमित होनेके कारण दूसरेके पुत्रपर व्यर्थ ही आसक्त हुई हूँ ॥ ५७ ॥ तदनन्तर मुनिजनों और महर्षि कश्यपने उन गुणेश्वरका पूजन किया। उन्हें नमस्कारकर और उनसे आज्ञा लेकर वे सभी अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ५८ ॥ इधर देवी भवानी पार्वती भी पुत्रको लेकर हर्षित होती हुई अपने भवनमें चली आयीं। इसके पश्चात् वहाँ आये हुए अन्य सभी लोग भी अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गौरी और अदितिका विवाद' नामक छियानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९६ ॥

सत्तानबेवाँ अध्याय

५०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सत्तानबेवाँ अध्याय माता कद्रूका अपने पुत्र शेषनागके पास पातालमें जाना और विनता तथा गरुड़द्वारा हुए अपने अपमानका बदला लेनेके लिये कहना, वासुकि आदि नागों तथा गरुड़ आदि पक्षियोंका घनघोर युद्ध, नागोंद्वारा विनता और उनके पुत्रोंको बन्धनमें डालना, विनताद्वारा मुनि कश्यपको अपना दुःख निवेदित करना और कश्यपद्वारा उसे एक अभेद्य अण्डकी उत्पत्तिका आश्वासन देना मुनि व्यास बोले—[हे ब्रह्मन् !] पहले आपने मयूरेश्वर नामवाले देव विनायककी, तदनन्तर गुणेश नामसे प्रसिद्ध उन विनायककी महिमा बतायी है ॥ १ ॥ हे विश्वकी सृष्टि करनेवाले विभो ! अब यह भी मुझे बतानेकी कृपा करें कि उन विनायकने मयूरेश्वर नाम कैसे प्राप्त किया और उन्होंने कौन-सा महान् कार्य किया था ? ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे मुनिवर व्यासजी !] उन विनायकदेवने जिस प्रकार महान् कार्य किया और जैसे उन्होंने 'मयूरेश्वर' यह नाम प्राप्त किया, वह सब मैं आपको बतलाऊँगा ॥ ३ ॥ एक बारकी बात है, पातालभवनमें शेषनाग अपनी अत्यन्त तेजोमयी और सुन्दर रूपवाली थीं। उन्होंने मुक्तामणयोंसे जटिल अत्यन्त सुन्दर और शुभ उत्तरीय वस्त्र धारण किया हुआ था ॥ ५ ॥ उनके ओष्ठ विम्बाफलके समान लालवर्णके थे, उनका मुख चन्द्रमाके समान उज्ज्वल था और वे दिव्य वस्त्र एवं आभूषणोंको धारण किये हुई थीं। उन माताका दर्शन करके शेषनाग तथा वासुकि आदि जो प्रधान नाग थे, उन्होंने माताको प्रणाम किया और कहा—हे माता ! बहुत दिनोंके बाद आपका दर्शन प्राप्त हुआ है, यहाँ सभी नाग आपका निरन्तर दर्शन करना चाहते हैं, किंतु आप अत्यन्त निष्ठुर हो गयी हैं ॥ ६-७ ॥ ऐसा कह करके उन्होंने माताका हाथ पकड़ा और उन्हें पिताके लिये बनाये गये आसनपर बैठाया। अत्यन्त भक्तिभावके साथ उनका पूजन किया, तदनन्तर शेषनाग उनसे बोले ॥ ८ ॥ शेष बोले—हे माता ! आप तो उन महर्षि कश्यपकी अत्यन्त सुन्दर एवं पतिपरायणा पत्नी हैं, जो सभी विद्याओंके निधान हैं, सृष्टि-स्थिति तथा संहार करनेवाले हैं और जिनके वास्तविक स्वरूपको ब्रह्मा आदि देवता भी जाननेमें समर्थ नहीं हैं। आप भी उन्हींके समान सहसा ही शाप देने तथा कृपा करनेमें समर्थ हैं ॥ ९-१० ॥ हे माता! हम सभी आपके पुत्र हैं, जो तीनों लोकोंको ग्रास बनानेका साहस रखते हैं, फिर आप किस उद्देश्यको लेकर यहाँ चली आयी हैं ? ॥ ११ ॥ कद्रू बोलीं—हे पुत्र ! बिना प्रयोजनके कोई भी किसीके पास नहीं आता। हे आत्मज ! मैं अपने आनेका प्रयोजन बताऊँगी, तुम आदरभावसे उसका सभाके मध्यमें विराजमान थे, उस समय वे चारों ओरसे वासुकि आदि सर्पोंसे घिरे हुए थे ॥ ४ ॥ उसी समय वहाँ नागमाता कद्रू उपस्थित हुईं, वे

क्री०ख०-अ०१७] * माता कद्रूका अपने पुत्र शेषनागके पास पातालमें जाना * ५०३ श्रवण करो। हे पुत्र! विनता मेरी सौत है, जो पक्षियोंकी माता है। एक बारकी बात है कि मुझे उसे देखनेकी इच्छा हुई॥ १२-१३॥ मैं एकाएक उसके घर गयी तो उसने मेरा अपमान किया। उसने न तो मुझे बैठनेके लिये आसन दिया, और न ही कोई स्वागत-सत्कार किया॥ १४॥ पूर्व समयके वैरका स्मरण करते हुए उसने अपने पुत्र जटायुको आदेश दिया। तदनुसार जटायुने मेरी बालोंकी गूँथी हुई चोटीको खींचा और मुझे क्षणभरमें ही वस्त्ररहित कर डाला॥ १५॥ वह मुझसे बोला, अरी महादुष्टे! तुम्हारा मुख देखनेयोग्य नहीं है। पूर्वकालमें तुमने मेरी माताको अपनी दासी बनाया था, तब उस समय तुम्हारे मनमें लेशमात्र भी करुणा नहीं आयी, अरी महादुष्टे! तुम यहाँसे चली जाओ, नहीं तो मैं तुम्हारे प्राण ले लूँगा॥ १६-१७॥ हे फणीश्वर! मैं उस जटायुके वचनोंको सुनकर अत्यन्त दुखी हुई। मैंने तब अत्यन्त विलाप किया और प्राणोंका त्याग करनेका निश्चय कर लिया॥ १८॥ अत्यन्त दुखी होनेके कारण ही मैं तुम लोगोंको देखने तुम्हारे पास आयी हूँ, यदि तुम लोगोंकी मुझमें भक्ति है तो मेरी सहायता करो॥ १९॥ हे श्रेष्ठ पुत्रो! यदि तुम लोग मुझे मानते हो तो मेरी उस सपत्नी विनताका वध कर डालो, तभी मेरे हृदयमें सुख होगा॥ २०॥ ब्रह्माजी बोले—माता कद्रूके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर शेषनाग सहसा वैसे ही रोषसमन्वित हो प्रज्वलित हो उठे, जैसे कि अग्निमें घी पड़नेपर वह और भी अधिक प्रदीप्त हो उठती है। 'यदि विनताके पुत्रोंने मेरी माता कद्रूको पीड़ा पहुँचायी है, तो निश्चित ही मैं उसका बदला लूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है'॥ २१-२२॥ ऐसा कहकर उन शेषनागने वासुकि आदि प्रमुख नागोंके साथ वहाँ जानेका मन बनाया, जहाँ कि विनता रह रही थी॥ २३॥ वासुकि बोला—हे निष्पाप! करोड़ों नागोंको लेकर मैं वहाँ जाऊँगा और विनताको यहाँ ले आऊँगा। हे नागराज! आप यहाँपर स्थित रहिये॥ २४॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहनेके अनन्तर वासुकि नाग शीघ्र ही विनताके आश्रमकी ओर निकल पड़ा। असंख्य नागोंको देखकर उस समय विनता भयभीत हो उठी। उसी क्षण दुष्ट स्वभाववाले क्रूर सर्पोंने उसे चारों ओरसे लपेट लिया और वे उसे शेषनागके समीपमें ले गये। उस समय वह विनता उन नागोंसे बोली॥ २५-२६॥ विनता बोली—अरे पापिष्ठो! तुम लोग मुझे शीघ्र ही बतलाओ कि क्यों मुझे बन्धनमें डालकर ले जाना चाहते हो, मैंने तो कोई अपराध भी नहीं किया है? मेरे पुत्र गरुड़का स्वभाव तो सभी सर्पोंको विदित ही है, अतः मुझे छोड़ दो, यदि ऐसा नहीं करोगे तो मेरा वह पुत्र गरुड़ तुम्हारा संहार कर डालेगा॥ २७-२८॥ ब्रह्माजी बोले—उन सर्पोंकी धृष्टताको देखकर उसने गरुड़का स्मरण किया। वह गरुड़ भी 'माताके द्वारा मेरा स्मरण किया जा रहा है', यह जानकर पक्षियोंके साथ वहाँ चला आया॥ २९॥ गरुड़के साथ बाज पक्षी, सम्पाति तथा पक्षिश्रेष्ठ जटायु भी था, जिनके पंखोंकी हवासे तीनों लोक काँप उठे। इधर वे सभी सर्प भी विषकणोंका वमन करने लगे। उस समय नागराजों तथा पक्षियोंमें घनघोर युद्ध होने लगा॥ ३०-३१॥ तदनन्तर वे नाग जटायु, सम्पाति तथा बाज पक्षीको बन्धनमें डालकर ले गये। माताके द्वारा स्मरण किये जानेपर वह गरुड़ भी अपने पंखोंकी हवासे सम्पूर्ण जगत्‌को कँपाता हुआ तथा वृक्षों और पर्वतोंको गिराता हुआ वहाँ आ पहुँचा। उसकी गन्धको सूँघकर सभी सर्प भाग गये॥ ३२-३३॥ दूसरे सर्प गरुड़के पंखोंकी हवासे आकाशमें चक्कर काटने लगे। विनता सर्पोंके बन्धनसे मुक्त हो गयी और वह अपने स्थानपर जानेके लिये उत्सुक हो उठी। विनताको जानेके लिये उद्यत देखकर वासुकि नाग अत्यन्त क्रुद्ध हो गया और आकाशको दग्ध करता हुआ

५०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 विष उगलने लगा। यह देखकर गरुड़ने उसे अपने | बाजको बलपूर्वक ले जाकर पातालके एक विवरमें पंखोंके आघातसे जमीनपर पटक दिया॥ ३४-३५॥ | छिपाकर दृढ़तापूर्वक उस बिलको बन्द कर दिया उस समय स्वस्थ होकर विनता बड़े वेगसे अपने | है॥ ४४॥ श्रेष्ठ स्थानको निकल पड़ी। वासुकि नागका वैसा | हे मुने! उनके बिना मेरे प्राण निश्चित ही चले पराक्रम देखकर गरुडने सूक्ष्मरूप बना लिया और वह | जायेंगे। प्रभो! आप-जैसे स्वामीके होनेपर भी मैंने इतना विनताकी रक्षाके लिये गया, उसके जानेपर वासुकि नाग | दुःख प्राप्त किया है॥ ४५॥ अत्यन्त क्रुद्ध हो गया तथा उसने संसारको जलाते हुए | ब्रह्माजी बोले-प्रिया विनताके इस प्रकारके बहुत-सारा विष उगल डाला॥ ३६-३७॥ | वचनोंको सुनकर मुनि कश्यप उनसे बोले॥ ४५१/२ ॥ वह वासुकि नाग उन (जटायु आदि पक्षियों)- | मुनि बोले-हे कल्याणि! तुम चिन्ता मत करो, को बन्धनमें डालकर शीघ्र ही नागलोकको ले गया | तुम्हारा मानसिक सन्ताप दूर हो जायगा। मैं तुम्हें और उन्हें एक विवरमें छोड़ दिया। तदनन्तर उस | ऋतुदान प्रदान करूँगा, जिससे तुम्हें अन्य पुत्रकी प्राप्ति विवरके द्वारको ढककर वह माता कद्रूके पास चला | हो जायगी। अण्डके रूपमें उत्पन्न तुम्हारा वह गर्भ आया॥ ३८॥ | वज्रके द्वारा भी अभेद्य होगा, किंतु जब पार्वतीका पुत्र वासुकि नागने वह सारा वृत्तान्त माता कद्रू तथा | खेल-खेलमें उस अण्डेका भेदन कर डाले, तभी तुम्हें शेषनागको बताया। इधर विनता अपने उन पुत्रोंको | उस अण्डेमेंसे एक पुत्रकी प्राप्ति होगी॥ ४६-४७१/२ ॥ बाँधकर ले जानेका समाचार सुनकर अत्यन्त शोकमें पड़ | उसका कण्ठ नीले वर्णका होगा, वह बलवान् गयी॥ ३९॥ | होगा और दूसरे नीलकण्ठ भगवान् शिवके समान होगा। वे शीघ्र ही महर्षि कश्यपके पास गयीं और उन्हें | उसकी केवल शब्दध्वनिको सुनकर ही वे सभी सर्प प्रणामकर इस प्रकार कहने लगीं- यह एक ऐसी ही | पराजित हो जायेंगे और गुणेश भी उस नीलकण्ठ पक्षीपर विपरीत घटना हो गयी है, जो पश्चिमसे सूर्य उदय | सवार होकर पृथ्वीके भारका हरण करेंगे। तब तुम्हारे होनेके समान है॥ ४०॥ | पुत्र भी नागोंके बन्धनसे मुक्त हो जायेंगे। ऐसा कहनेके मैं घरमें स्थित थी, किंतु एकाएक ही शत्रु | अनन्तर एकान्तमें ले जाकर मुनि कश्यपने विनताको वासुकि नागने मेरा हरण कर लिया। मुझे छुड़ानेके | ऋतुदान दिया॥ ४८-५०॥ लिये बाज, जटायु और सम्पाति मेरे पीछे-पीछे आये। | इसके पश्चात् वह विनता प्राणियोंसे रहित एक उन्होंने अपने बल-पराक्रमसे उन सर्प-समूहोंको मारा, | काननमें चली गयी और यथासमय उसने एक अण्डको परंतु हे मुने! बहुत-से सर्पोंके द्वारा शीघ्र ही उन | उत्पन्न किया, जो वज्र तथा पर्वतोंके प्रहारसे भी बाज, जटायु तथा सम्पातिको पराजित कर दिये जानेपर | अभेद्य था॥ ५१॥ मैंने गरुड़का स्मरण किया। गरुड़ने वहाँ अणु (के | विनताने वृक्षके पत्तों तथा छालसे लपेटकर उस समान सूक्ष्म)-रूपमें आकर उन सभी सर्पगणोंको जीतकर | अण्डेको एक मिट्टीके पात्रमें छिपा दिया और वह उस मुझे उनके बन्धनसे मुक्त किया और वह स्वयं भी मेरे | पात्रके ऊपर उसी प्रकार बैठ गयी, जिस प्रकार कि साथ वापस आया॥ ४१-४३॥ | भूमिमें गाड़े हुए द्रव्यके ऊपर कोई अत्यन्त बलवान् सर्प तदनन्तर उस वासुकि नागने जटायु, सम्पाति तथा | बैठा रहता है॥ ५२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मयूरोपाख्यानमें अभेद्य अण्डकी उत्पत्तिका वर्णन' नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९७॥

अट्ठानबेवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०९८ ] * आठवें वर्षमें गुणेश्वरद्वारा विचित्र दैत्यका वध * ५०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अट्ठानबेवाँ अध्याय आठवें वर्षमें गुणेश्वरद्वारा विचित्र दैत्यका वध और विनताके गर्भसे उत्पन्न अण्डका भेदन, उसमेंसे मयूर नामक पक्षीका प्राकट्य, विनताद्वारा गुणेश्वरकी स्तुति, गुणेश्वरका मयूरको अपना वाहन बनाना और मयूरेश्वर नामसे प्रसिद्ध होना ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे जब गुणेश्वरका | पार्वतीके प्रमथ आदि गण, पार्वतीजी एवं उनकी सखियाँ- सातवाँ वर्ष व्यतीत हुआ और आठवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ, | ये सभी आनन्दमग्न हो गये थे। उस समय भगवान् तब वे गुणेश एक दिन उषाकालमें स्नान करनेके अनन्तर | शिवके मस्तकमें स्थित चन्द्रमा अमृत प्रवाहित करने गायत्रीमन्त्रका जप तथा चारों वेदोंका स्वाध्याय कर रहे | लगे। उस अमृतका संयोग होनेसे शिवजीके गलेमें स्थित थे। उन्होंने कस्तूरीका तिलक लगाया हुआ था, अनेक | रुण्डमालाके रुण्ड जीवित पुरुष हो गये थे। गुणेशके उस प्रकारके आभूषणोंसे वे भलीभाँति सुसज्जित थे। उन्होंने | वेदगानकी ध्वनिके श्रवणसे सभी किन्नर तथा गन्धर्व दिव्य वस्त्रोंको धारण किया हुआ था, वे दिव्य गन्ध | लज्जित हो गये थे ॥ ९-११ ॥ तथा दिव्य मालाओंसे विभूषित थे ॥ १-२ ॥ | उस समय जो स्त्रियाँ कामके उद्वेगसे सन्तप्त थीं, उसी समय तपस्वियोंके वे बालक उन गुणेश्वरके | वे शान्त हो गयी थीं और वे गुणेशकी आरती करने लगी पासमें आये, उन गुणेश्वरकी दीप्तिसे वे बालक उसी | थीं। उसी समय वहाँ एकाएक एक दैत्य आ पहुँचा, जो प्रकार कान्तिमान् हो गये, जैसे सूर्यकी दीप्तिसे बादल | बड़ी ही विचित्र आकृतिवाला था। उसकी आवाजसे उस प्रकाशित हो उठते हैं। उन मुनिबालकोंको देखकर | समय मन्दर आदि पर्वतोंकी गुफाएँ विदीर्ण हो गयी थीं, गुणेश्वरमें स्वतः ही उन बालकोंके साथ अध्ययन | वह दैत्य हलके समान दाँतोंवाला था, उसके नासाछिद्र करनेकी बुद्धि उत्पन्न हुई। उस समय विभु गुणेश्वरने उन | वापीके समान थे, वह तड़ागके समान नेत्रोंवाला था और सभीके मस्तकपर अपना हाथ रखा ॥ ३-४ ॥ | शत्रुओंका विनाश करनेवाला था ॥ १२-१३ ॥ उसके प्रभावसे तीन-चार तथा पाँच वर्षके उन | वह दैत्य एक हिंसा करनेवाले पशुका स्वरूप बालकोंको भी वेदमन्त्रोंका स्फुरण हो आया। बिना | बनाकर वहाँपर जहाँ-तहाँ भ्रमण कर रहा था। उसके किसी चेतन प्राणीके उन्हें आकाशध्वनि सुनायी पड़ी। | पाँच नेत्र थे, चार सींग थे, आठ पैर थे और चार कान तदनन्तर उन सभीने चारों वेदोंका पारायण किया। उस | थे। वह तीन मुखोंवाला था तथा उसकी दो पूँछें थीं। वेदध्वनिको सुनकर उस समय पशुओंने मुखमें रखा हुआ | वे गुणेश उसे देखकर बड़े जोरसे हँसने लगे और प्रभु ग्रास भी भक्षण करना बन्द कर दिया ॥ ५-६ ॥ | गुणेश उन शिशुओंसे बोले-अरे बालको! तुम लोग इस वे वेदका पारायण कर रहे उन बालकोंकी वेदध्वनिको | कौतुकको देखो ॥ १४-१५ ॥ सुननेमें तत्पर थे। ऋग्वेद तथा यजुर्वेद-इन दो वेदोंके | तब उन बालकोंने गुणेश्वरसे कहा-आज हमने पारायणके अनन्तर उन्होंने सामवेदका गान प्रारम्भ | इस अत्यन्त अद्भुत पशुका दर्शन किया है। तदनन्तर किया। अनेक हरिण, सिंह, शार्दूल, सर्प तथा पक्षियोंकी | वह दैत्य नृत्य करने लगा और [सहसा] ऊँचा उछलकर अनेक जातियाँ उस वेदगानके श्रवणमें अनुरक्त थीं, | वह भूमिपर गिरा ॥ १६ ॥ उनके नेत्रोंसे आनन्दाश्रु प्रवाहित होने लगे ॥ ७-८ ॥ | वह क्षणभरमें अदृश्य हो जाता था और अगले ही उस वेदगानकी ध्वनिको श्रवण करनेमें आसक्त | क्षण सामने स्थित हो जाता था। वह दृश्य एवं अदृश्य अट्ठासी हजार मुनिगण आनन्दसरोवरमें उसी प्रकार | स्वरूप धारण करने लगा। विभु गुणेशने उन बालकोंसे निमग्न होकर सो गये, मानो कि वे रातमें सोये हों। | कहा-'इसे पकड़ लो-पकड़ लो'। ऐसा कहकर वे

५०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

क्री०ख०-अ०९९] * नौवें वर्षमें गुणेश्वरका बालकोंके साथ जलक्रीडा करना * ५०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गुणेशकी स्तुति करनी प्रारम्भ की॥ ३७-३८१/२ ॥ विनता बोली-[हे प्रभो!] आप रजोगुणका आश्रय लेकर सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा हैं, सत्त्वगुणका आश्रय लेकर आप ही सृष्टिका पालन करनेवाले विष्णु हैं और तमोगुणका आश्रय लेकर सृष्टिका संहार करनेवाले शंकर भी आप ही हैं। जब आपके सगुण स्वरूपको भी यथार्थ रूपमें देवता अथवा ऋषिगण नहीं जान पाते, तो फिर चराचर जगत्‌के एकमात्र गुरु आपके निर्गुण स्वरूपको कौन जान सकता है? ॥ ३९-४०१/२॥ इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर भक्तिपरायण वह विनता उन्हें प्रणाम करते हुए बोली। [हे देव!] आप मुझे मुनि कश्यपकी भार्या विनता समझें, उन महर्षिका पुत्र यह मयूर आपका सेवक होगा॥ ४१-४२॥ मुनि कश्यपजीने पूर्वमें मुझसे कहा था कि जो तुम्हारे गर्भरूप अण्डका भेदन करेगा, वही इसका स्वामी होगा और वही तुम्हारे पुत्रोंको बन्धनसे मुक्त करायेगा- इसमें कोई संदेह नहीं है। बहुत समयतक प्रतीक्षा करनेके अनन्तर मुझे आपके चरणकमलोंका दर्शन हुआ है, कद्रूके पुत्रोंके द्वारा मेरे जटायु, बाज तथा सम्पाती नामके तीन पुत्रोंका हरण हुआ है। हे जगन्नाथ! आप मेरे उन तीनों पुत्रोंको बन्धनमुक्त करके मुझे उनका दर्शन शीघ्र करानेकी कृपा करें॥ ४३-४४१/२॥ गुणेश बोले-हे माता! आप चिन्ता न करें, मैं आपको आपके पुत्रोंका दर्शन अवश्य कराऊँगा॥ ४५॥ ब्रह्माजी बोले-विनतासे इस प्रकार कहनेके अनन्तर अत्यन्त हर्षसे समन्वित होकर गुणेश्वरने मयूरसे कहा-तुम मुझसे वर माँगो ॥ ४६ ॥ मयूर बोला-हे सर्वेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरा 'मयूर' यह नाम आपके नामके आगे लगकर संसारमें प्रसिद्धिको प्राप्त हो जाय। आप यह वर मुझे प्रदान करें और अपनी दृढ़ भक्ति भी मुझे प्राप्त करायें॥ ४७१/२॥ देव गुणेश बोले-अपने मनमें किसी भी प्रकारका लोभ न रखनेवाले तुम्हारे द्वारा बहुत ही सुन्दर और अच्छी बातें कही गयी हैं, तुम्हारा मयूर यह नाम मेरे नामके पूर्वमें लगेगा और तब 'मयूरेश्वर' मेरा यह नाम तीनों लोकोंमें विख्यात होगा और मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति होगी ॥ ४८-४९॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे वह सब सुनकर विनता अपने आश्रममें चली गयी और मयूरपर आरूढ़ होकर मयूरेश्वर गुणेश भी अपने घरको गये ॥ ५० ॥ 'मयूरेश, मयूरेश, मयूरेश'-इस प्रकारसे नामका बार-बार उच्चारण करते हुए उन मुनिबालकोंसे समन्वित होकर और सभी दिशाओंको सुशोभित करते हुए गुणेश्वर जा रहे थे। उन्होंने माता पार्वतीको प्रणामकर शीघ्र ही सम्पूर्ण वृत्तान्त उनको निवेदन कर दिया, इधर मयूरेशकी महिमाका गुणगान करते हुए मुनियोंके बालक अपने-अपने घरोंको गये। इस प्रकार इन गुणेश्वरने 'मयूरेश' यह नाम प्राप्त किया ॥ ५१-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शिखण्डिवरप्रदान' नामक अठानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९८ ॥ निन्यानबेवाँ अध्याय नौवें वर्षमें गुणेश्वरका बालकोंके साथ जलक्रीडा करना, गुणेशद्वारा अश्वरूपी दैत्यका वध, नागकन्याओंका गुणेशको नागलोक ले जाना, भगासुर नामक दैत्यके वधकी कथा ब्रह्माजी बोले-गुणेश्वरने नौवें वर्षकी अवस्थामें एक अद्भुत कार्य किया। एक बार वे अपने वाहन मयूरपर विराजमान होकर चारों हाथोंमें पाश, अंकुश, पद्म और परशु-इन चार आयुधोंको धारणकर बालकोंके साथ क्रीड़ाके लिये निकल पड़े। उस समय उन्होंने विविध अलंकार धारण किये हुए थे, वे मृगकी नाभिसे प्राप्त होनेवाली कस्तूरीका तिलक लगाये हुए थे और उन्होंने दिव्य वस्त्रोंको धारण किया हुआ था॥ १-२॥ पूर्णिमाके चन्द्रमाकी कान्तिके समान वे सुशोभित हो रहे थे, श्रीसम्पन्न वे गुणेश्वर बालकोंके द्वारा जय- जयकारके साथ स्तुत हो रहे थे। कुछ बालक उनको प्रणाम कर रहे थे और कुछ उनका छत्र और ध्वज पकड़े

५०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

हुए थे। कुछ बालक चँवर डुला रहे थे, उनके दर्शनसे बालकोंको महोत्सवकी प्रतीति हो रही थी। क्रीडा करते हुए वे सभी एक सरोवरके पास जा पहुँचे, जो पाँच योजन विस्तारवाला था ॥ ३-४॥ वह सरोवर अगाध जलवाला था और मगर, मत्स्य, कछुआ तथा मेढकोंसे समन्वित था। वह चारों ओरसे लताओं तथा वृक्षोंसे घिरा हुआ था, वहाँ नाना प्रकारके पक्षीगण रहते थे। कुछ बालक उछलकर उस सरोवरके जलमें कूद पड़े और कुछ धीरे-धीरे उस सरोवरके जलमें उतरे। उस सरोवरके तटप्रदेशपर फलोंसे लदा हुआ एक विशाल आमका वृक्ष देखकर मयूरेश उसपर चढ़ गये और अन्य बालक भी आमके फलोंको खानेकी इच्छासे उसपर चढ़े ॥ ५-६१/२ ॥ आमके फलोंके द्वारा वे बालक परस्परमें एक- दूसरेको मारते हुए इस प्रकारसे क्रीड़ा करने लगे कि किसीका अंग-भंग न हो। इस क्रीड़ामें पलायित कुछ बालक उस वृक्षकी डालियोंको तोड़ते हुए उस सरोवरके जलमें गिर रहे थे। इस प्रकार वे सब खेल खेल ही रहे थे कि एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा, वह घोड़ेका रूप बनाया हुआ था ॥ ७-८॥ उस दैत्यके पावोंके प्रहारसे पर्वत भी चूर-चूर हो जाते थे और उसके हिनहिनानेके शब्दसे तीनों लोक काँप उठते थे। वह अपनी पूँछकी चंचलतासे अनेक प्राणियोंको मार डालता था। अश्वरूपी वह दैत्य उस आमके वृक्षके तनेपर अपने कन्धेको रगड़ने लगा। उस दैत्यके [दारुण] गर्जनसे वृक्षके कम्पित हो जानेपर बालक गुणेश गिर पड़े ॥ ९-१०॥ जब गुणेश वृक्षसे सरोवरके जलमें गिर पड़े तो कुछ बालक भयभीत होकर भाग गये और वृक्षसे गिरनेसे कुछ बालकोंके सिर फूट गये, कुछ बालक जल्दी- जल्दी उस वृक्षसे उतरने लगे ॥ ११॥ जब गुणेशको जलके भीतर रहते हुए दो मुहूर्तका समय व्यतीत हो गया, तो वे सभी मुनिबालक रोने लगे। वे आपसमें कहने लगे कि हम माता उमासे क्या कहेंगे और कैसे उन्हें अपना मुख दिखलायेंगे ? ॥ १२॥

भगवान् शंकर भी क्रुद्ध होकर हमें भस्म कर डालेंगे। सरोवरके इस अगाध जलके भीतर प्रवेश करनेमें हम समर्थ नहीं हैं। वे गुणेश तो हमारे माता-पिता, पालन करनेवाले, भाई, रक्षा करनेवाले तथा सखा हैं॥ १३१/२॥ ब्रह्माजी बोले-वे बालक इस प्रकार जब शोक कर रहे थे, उसी समय मयूरेशने उस अश्वरूपी दैत्यके दोनों कान पकड़ लिये और उसे जलके भीतर खींचा। वे बलवान् प्रभु मयूरेश बलपूर्वक उस दैत्यके ऊपर आरूढ़ हो गये और अपने भारसे उस दैत्यको बार-बार जलके भीतर डुबाने लगे ॥ १४-१५ ॥ वह अश्वरूपी दैत्य अपने नेत्रोंसे तथा मुखसे बार- बार बहुत-सा जल उगलने लगा। उसके कानोंमें तथा श्वासमार्गमें जल भर गया और भीषण शब्द करते हुए उसने प्राण त्याग दिये। मयूरेशने अपने एक हाथसे पकड़कर हिला-डुलाकर उस दैत्यको जलसे बाहर फेंक दिया। यह देखकर वे सभी बालक अत्यन्त हर्षित हो गये और बार-बार नृत्य करने लगे ॥ १६-१७॥ उन्होंने उस महान् दैत्यको भूमिपर सौ टुकड़ोंमें विभक्त हुआ देखा। उन सभी बालकोंने महान् बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न उन मयूरेशकी प्रशंसा की। तदनन्तर वे सभी उन देव मयूरेशसे कहने लगे-हम आपको मृत जानकर बहुत रोने लगे, किंतु तभी हमने दैत्यको मारकर सरोवरसे बाहर आते हुए आपको देखा ॥ १८-१९॥ इसके अनन्तर वे सभी बालक उस सरोवरके जलमें प्रविष्ट होकर अपनी-अपनी अंजलिमें जल भरकर पुनः एक-दूसरेको भिगोने लगे। तदनन्तर उन सभीने एक साथ ही गणनायक मयूरेशको जलसे उसी प्रकार भिगो डाला, जैसे कि वर्षाकालमें मेघ पृथ्वी तथा पर्वतोंको भिगो डालते हैं ॥ २०१/२ ॥ अपनी छः भुजाओंके द्वारा भी जब वे मयूरेश उन बालकोंको भिगोनेमें सफल न हो सके, तब उन्होंने उन बालकोंपर अपने असंख्य हाथोंसे जल छिड़का। उस समय उस प्रकारका आश्चर्य देखकर वे सभी बालक परस्परमें एक-दूसरेसे कहने लगे ॥ २१-२२ ॥ ये छह भुजाओंवाले मयूरेश असंख्य भुजाओंवाले