भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 492, कुल 656 में से

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पृष्ठ 492

४९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिरानबेवाँ अध्याय गुणेशके पाँचवें वर्षमें खड्गासुरका ऊँटका रूप बनाकर तथा चंचल दैत्यका छायाका रूप धारणकर गुणेशकी बालमण्डलीमें आना, गुणेश्वरद्वारा लीलापूर्वक उनका वध करना

ब्रह्माजी बोले—बालक गुणेशका जब पाँचवाँ | दैत्य बालक विजय प्राप्त कर रहे थे और देवता बने वर्ष प्रारम्भ हुआ, तब एक दिन उषाकालमें ही मुनियोंके | बालकोंकी पराजय हो रही थी। हे अंग (व्यासजी)! बालक गुणेशके घरपर आये॥ १॥ | जब इस प्रकारसे वे बालक परस्पर युद्धक्रीडा कर रहे वे बोले—हे सखा! प्रातःकालकी बेलामें क्यों सो | थे, उसी समय खड्ग नामका एक महान् असुर वहाँ रहे हो, उठो, उठ जाओ। उन्होंने देवी पार्वतीसे भी | आया, वह ऊँटका रूप धारण किये हुए था, उसकी कहा—आप अपने बालकको उठाइये॥ २॥ | विशाल आकृति आकाशको छू रही थी॥ ११-१२॥ इसपर पार्वती उनसे बोलीं—क्या तुम्हें नींद नहीं | उसकी बहुत बड़ी पूँछकी वायुसे अनेक वृक्ष- आती, तुमलोग अत्यन्त चंचल हो, रात-दिन खेल | समूह टूटकर गिर गये थे। उसके दाँत शूलके समान खेलनेमें ही लगे रहते हो। तुम निर्लज्ज बालक मूर्खतावश | नुकीले थे, उसकी जिह्वा लपलपा रही थी, वह अपने पैरोंसे सूर्योदय होनेसे पहले ही कैसे यहाँ आ गये?॥ ३ १/२॥ | दिशाओंको रौंद रहा था। वह बड़ी ही तीव्र ध्वनि करके वे बालक बोले—हे माता! आपके वचनोंसे हमें | उन गुणेश्वरकी ओर दौड़ा। उसके महान् शब्दकी प्रतिध्वनिसे कभी भी क्रोध नहीं आ सकता। क्या हम आपके बालक | सहसा दिशाएँ और विदिशाएँ गूँज उठीं॥ १३-१४॥ नहीं हैं और क्या आप हमारी माता नहीं हैं? आपके | उसे देखकर सभी मुनिबालक भयसे व्याकुल हो इस शिशुपर हम सभीका मन सदा ही लगा रहता है। | उठे और भाग चले। कुछ बालक उन गुणेशसे 'दौड़ो- हम रात-दिन निरन्तर इसे अपने सामने पाते हैं। बिना | दौड़ चलो' इस प्रकारसे कहते हुए चिल्लाने लगे॥ १५॥ इसके हमारे मनमें सन्तोष नहीं होता॥ ४-६॥ | उन बालकोंके रुदन तथा चिल्लाहटको सुनकर उन सभीके वचनोंको सुनकर उस समय वे शिशु | एकाएक ही उन गुणेश्वरने अपना शरीर अत्यन्त विशाल गुणेश जग गये और बाहर आकर उन्होंने उन बालकोंका | बना लिया और उछलकर उस ऊँटस्वरूपधारी दैत्यके परस्पर आलिंगन किया। तदनन्तर वे सभी एक-दूसरेका | सिरपर अपने मुक्केसे उसी प्रकार प्रहार किया कि जैसे हाथ पकड़कर प्रसन्नतापूर्वक घरसे बाहर निकल पड़े। | वज्रका प्रहार महान् पर्वतपर हो रहा हो। इस आघातसे फिर दो भागोंमें बँटकर नाना प्रकारकी युद्ध-सम्बन्धी | उस दुष्ट दैत्यका हृदय छिन्न-भिन्न हो गया। वह अपने चेष्टाओंके द्वारा क्रीडा करने लगे॥ ७-८॥ | मुखसे बहुत-सारा रक्त उगलता हुआ, महाभयंकर शब्द वे सभी परस्पर मस्तकसे मस्तकपर, वक्षःस्थलसे | करके पृथ्वीतलपर गिर पड़ा। वह अपने पैरों तथा वक्षःस्थलपर और बाहुओंसे बाहुओंपर प्रहार करने लगे। | गरदनको पटकने लगा और बार-बार चिल्लाते हुए कोई परस्पर जल फेंक रहा था, कोई धूल फेंक रहा था, | उसने अपने शरीरको स्थिर करके क्षणभरमें ही अपने कोई-कोई गेंद तथा मुष्टियोंसे परस्पर प्रहार कर रहे थे। | प्राण त्याग दिये॥ १६-१८ १/२॥ कोई कीचड़ फेंककर तथा कोई गोबर फेंककर परस्पर | उसका शरीर अठारह योजन लम्बा-चौड़ा था, क्रीडा कर रहे थे। कोई किसी दूसरेको झुला रहा था | गिरते हुए उसके शरीरने अनेक वृक्षसमूहोंको गिरा डाला तथा कोई किसीको खींच रहा था॥ ९-१०॥ | था और भूमिपर गिरकर उसके शरीरने इतनी धूल कोई कोलाहल कर रहे थे और कोई-कोई सींग | उछाली कि क्षणभरमें ही सारा आकाश धूलसे ढक (शृंगवाद्य) तथा बाँसुरीकी ध्वनि कर रहे थे, कुछ | गया। उसकी देहके गिरनेसे अनेक जीव-जन्तु तथा पक्षी बालक दैत्य बने हुए थे और कुछ देवता बने हुए थे। | भी गिर पड़े॥ १९-२०॥