भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 493, कुल 656 में से

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पृष्ठ 493

क्री०ख०-अ०१३ ] * गुणेशके पाँचवें वर्षमें खड्गासुर दैत्यका लीलापूर्वक वध करना * ४९१ उस दैत्यको इस प्रकारसे गिरा हुआ देखकर वे सभी मुनिकुमार उस समय कहने लगे—हे पार्वतीपुत्र! बहुत अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ, आपने उस महान् दैत्यको मार डाला है। उस महान् दैत्यको देखकर तो हम सभी डरकर भाग गये थे, आप तो छोटे-से हैं, फिर आपने कैसे उस महान् दैत्यको अपने पराक्रमसे मार डाला? हम सभी अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर पुनः आपके पास आये हैं। ऐसा कहकर वे सभी बालक पूर्वकी भाँति ही परस्पर एक-दूसरेके चरणकमलोंको पकड़कर खींचते हुए पुनः क्रीड़ा करने लगे ॥ २१–२३ १/२ ॥ थोड़ी ही देरके पश्चात् उस ऊँटरूपधारी दैत्यका एक मित्र वहाँ आया, वह अपने मरे हुए मित्रका बदला लेना चाहता था, उसने छायाका रूप धारण किया था, वह महान् बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न था। उसके चरणके आघातसे शेषनागका शरीर भी काँप उठता था ॥ २४–२५ ॥ उस छायारूपधारी दैत्यका मस्तक आकाशको छू रहा था, वह दुष्ट दैत्य गुणेशके पीछे गया और उन गुणेशकी छायामें प्रविष्ट होकर उस समय उसने उन्हें गिरा दिया था। वह बड़ा ही मायावी था, महान् बलशाली था। उस समय वह अन्य सभीसे अदृश्य हो गया। इसके उपरान्त वह दैत्य नृत्य करने लगा। वह जिस प्रकार नृत्य कर रहा था, वे गुणेश भी उसी-उसी प्रकार नाच रहे थे ॥ २६–२७ ॥ उन मुनिबालकोंने जब उन गुणेशको [नाचते-नाचते] गिरता हुआ देखा तो कुछ बालक अत्यन्त दुखी हो उठे और कुछ बालक दौड़ते हुए उनके पास जाकर कहने लगे—हे नाथ! आप क्यों गिरे जा रहे हैं ? इस समय आपका वह सामर्थ्य कहाँ चला गया ? आप बार-बार क्यों अपने प्रिय मित्रोंके ऊपर गिरे जा रहे हो ? ॥ २८–२९ ॥ तदनन्तर बालक गुणेशने शीघ्र ही दसों दिशाओंमें चारों ओर देखा। फिर उन्होंने बल लगाकर आगे जानेकी चेष्टा की, किंतु वे आगे जानेमें समर्थ न हो सके। पुनः उन्होंने ध्यान लगाकर चारों ओर दृष्टि डाली, तब उन गुणेश्वरने अपनी छायामें प्रविष्ट उस दैत्यके विषयमें जाना ॥ ३०–३१ ॥ तदनन्तर उन्होंने पर्वतकी एक टूटी चट्टान उठाकर उस राक्षसके उदरपर फेंका और उसके ऊपर चढ़कर वे नृत्य करने लगे। इससे वह दैत्य मरकर चूर-चूर हो गया। अन्तिम समयमें उस दुष्ट दैत्यने अपना विशाल स्वरूप बनाया और गिरते हुए उसने अनेक वृक्षों, पर्वतों तथा प्राणियोंको चूर-चूर कर डाला ॥ ३२–३३ ॥ उसके मेद तथा रक्तसे वहाँकी पृथ्वी तथा वे गुणेश्वर भी लथपथ होकर उसी प्रकार लाल-लाल रंगके दीखने लगे, जैसे कि वसन्त-ऋतुमें पलाशका [पुष्पित] वृक्ष रक्तवर्णका हो जाता है ॥ ३४ ॥ इस प्रकार उस छायारूपी दैत्यको शीघ्र ही मारकर गुणेश लीलापूर्वक क्रीडा करने लगे। उसी समय एक महाभयंकर दैत्य वहाँ आ पहुँचा। उसके कन्धे बैलके कन्धेके समान अत्यन्त सुदृढ़ थे, उसका मुख सूअरके समान था तथा उसका उदर हाथीके समान था ॥ ३५ ॥ उस दैत्यका नाम था चंचल। वह बालकका रूप बनाकर उन बालकोंके मध्य प्रविष्ट हो गया। उसके श्वासके छोड़े जानेसे पर्वतोंकी चट्टानें भी धूलके समान उड़ जाती थीं ॥ ३६ ॥ उसके नृत्यसे पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी कम्पित हो उठती थी, उन बालकोंके बीच उसने विविध प्रकारकी क्रीड़ाएँ बड़ी ही कुशलताके साथ दिखलायीं ॥ ३७ ॥ उस महान् बलशाली तथा महामायावी दैत्यने कुछ बालकोंको जमीनपर पटक दिया। किसी मुनिबालकका पाँव पकड़कर वह खींचने लगा। किसी बालकके दोनों हाथोंको कसकर पकड़कर उसके माथेपर चोट मारी। वे सभी बालक धूपमें अपने शरीरपर मिट्टी लगा रहे थे ॥ ३८–३९ ॥ बालकोंकी देखा-देखी वह दैत्य भी अपने शरीरमें मिट्टीका लेपन उसी प्रकार करने लगा, जैसे कि कोई भाग्यशाली अपने शरीरमें चन्दनका अनुलेपन करता है। तदनन्तर उन बालकोंने मिट्टीकी गेंद बनायी और उससे खेल खेलना प्रारम्भ किया। किसी बालकद्वारा आकाशमें उछाली गयी गेंदको जो बालक अपने हाथसे पकड़ लेता था, वह उस गेंदसहित उस उछालनेवाले बालकपर घोड़ेके समान सवारी करता था ॥ ४०–४१ ॥ तदनन्तर सवारी करनेवाला वह बालक उस गेंदको Kalyana Visheshank 2021_Section_17_1_Front