भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 656 में से

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पृष्ठ 494

४९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- बलपूर्वक जमीनपर फेंकता था। तब भूमिपर टकराकर उछलती हुई उस गेंदको कोई दूसरा बालक अथवा वही बालक पकड़ता था॥ ४२॥ जिसके हाथ वह गेंद लगती थी, वह उस बालकपर सवार होकर पुनः गेंदको जमीनपर फेंकता था, भूमिपर गिरी हुई उस गेंदको उठा लेनेवाला बालक उस गेंदको फेंककर किसी दूसरे बालकको मारता था॥ ४३॥ भागनेवाले उन बालकोंमेंसे जिस बालकको वह गेंद लगती थी अथवा जिसके हाथसे छू जाती थी, उसे भी वह गेंद आकाशमें उछालनी होती थी॥ ४४॥ यदि वह गेंद किसीके हाथ नहीं आती थी तो उसे पुनः वह गेंद आकाशकी ओर फेंकनी होती थी, आती हुई उस गेंदको जो हाथमें पकड़ लेता था, वह उस बालकपर आरूढ़ होकर गेंदको पूर्ववत् फेंकता था। इसी क्रममें एक बार गुणेशने गेंद आकाशमें फेंकी, जिसे चंचल नामक दैत्यने हाथसे पकड़ लिया। तब नियमानुसार वह असुर चंचल बालक गुणेशपर सवार हुआ। अपने भारसे उन देव गुणेशको दबाता हुआ वह दुष्ट दानव बोला- अरे दुष्ट बालक! तुम इन बालकोंके बीच बड़ी डींग हाँकते हो, अब मेरे भारको सहन करो॥ ४५-४७॥ वह बार-बार गेंदको उछालता था, और पुनः अपने हाथसे उसे पकड़ भी लेता था। इसी प्रकारसे उस दुष्ट दानवने दो मुहूर्ततक गेंदसे क्रीड़ा की। वहाँ उपस्थित वे सभी मुनिबालक गुणेशकी वैसी दशा देखकर हँसने लगे। तदनन्तर वे गुणेश दृढ़ पराक्रम दिखाते हुए उस दैत्यके ऊपर सवार हो गये ॥ ४८-४९॥ यह देखकर वह चंचल नामक दैत्य गुणेशको दूर ले जानेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ उतावला होकर आकाशमार्गसे चल पड़ा। अन्य बालक भूमिपर ही उसके पीछे-पीछे जाने लगे ॥ ५० ॥ वह दैत्य कभी विमानकी गतिके समान और कभी उड़ते हुए पक्षीके समान बड़ी तेजीसे उड़ रहा था। गुणेशके साथी वे बालक शोक करते हुए वापस लौट आये और अपने-अपने घरोंको चले गये। कुछ बालक वहीं ठहर गये और गुणेश्वरके वापस आनेकी प्रतीक्षा करने लगे। तदनन्तर विभु गुणेशने उस दुष्ट दानवकी नीयत मनसे जानकर एकाएक अपना भार हिमालयपर्वतके समान भारी बना लिया। उस भारके कारण वह दैत्य गिर पड़ा और गुणेश्वरसे कहने लगा - ॥ ५१-५३॥ मेरे ऊपरसे अपना महान् भार उतार लो, अन्यथा मेरे प्राण चले जायँगे। आप मुझ दीनपर दया कीजिये, मैं आपकी शरणमें हूँ। ऐसा कहता हुआ वह दैत्य मूर्च्छित हो गया। तब बालक गुणेशने उसे उसी प्रकार पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्पको पकड़ लेता है, और गुणेशने उसे बार-बार घुमाया, और उस चंचल नामक दुष्ट दानवको दूर देशमें फेंक दिया ॥ ५४-५५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'चंचल [आदि असुरों]-के वधका वर्णन' नामक तिरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९३ ॥ चौरानबेवाँ अध्याय मुनिबालकोंके साथ गुणेशका महर्षि गौतम तथा अहल्याके आश्रममें जाकर ओदन-क्रीडा करना, पार्वतीद्वारा गुणेशको बन्धनमें डालना तथा उनकी मायासे मोहित होना, महर्षि गौतमद्वारा अहल्यासे गुणेश्वरकी भगवत्ताका वर्णन ब्रह्माजी बोले- मुनियोंके जो बालक वहाँ गुणेशके आनेकी प्रतीक्षा कर रहे थे, वे सभी गुणेशके आनेपर उनके समीप गये। उनके जयकारके शब्दोंसे सम्पूर्ण आकाश-मण्डल, दिशाएँ और दिशाओंका मध्य भी गर्जन करने लगा ॥ १ ॥ वे सभी पुनः विविध प्रकारके नृत्यों तथा गीतोंसे अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ करने लगे। बालकोंके इस प्रकारसे क्रीडा करते-करते सूर्योदयके अनन्तर डेढ़ प्रहरका समय व्यतीत हो गया ॥ २ ॥ उन सभीके माता-पिता उनको ढूँढ़ते हुए जब Kalyana Visheshank 2021_Section_17_1_Back

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