श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 495, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१४] * बालकोंके साथ गुणेशका महर्षि गौतमके आश्रममें जाकर ओदन-क्रीडा करना * ४१३ गाँवके मध्य किसी भी घरमें नहीं देख पाये, तब वे सभी छड़ी लेकर वहाँ उन बालकोंके पास गये, जहाँ वे सब चारों ओर गोला बनाकर तथा गुणेश्वरको बीचमें करके अनेक प्रकारकी क्रीडा कर रहे थे। उन लोगोंने स्वयं नाच रहे और दूसरे बालकोंको भी नचा रहे गुणेशकी भर्त्सना की ॥ ३-४ ॥ माता-पिता बोले-तुम्हारे साथके बिना हमारे बालक न तो स्नान करते हैं और न भोजन करते हैं। इन्होंने अपने आचार-विचार, अध्ययन, ब्राह्मणोचित कर्मों तथा विनयका भी परित्याग कर दिया है ॥ ५॥ तदुपरान्त उन गुणेशका दर्शनकर उनका क्रोध जाता रहा और वे आपसमें एक-दूसरेसे कहने लगे- इसको ताड़ित करनेकी पहले हमारी जो बुद्धि हो रही थी, वह इसे देखकर इस प्रकार न जाने कहाँ चली गयी है? यदि हम इसके माता-पिता शिव-पार्वतीसे इसके विषयमें कहते हैं, तो वे भी इसका क्या कर लेंगे ? इस बालकने तो अनेकों महान् बलशाली दैत्योंका वध कर डाला है। हे गुणेश्वर ! तुम्हारे भयसे हम कहीं दूसरे स्थानपर चले जाते हैं ॥ ६-७१/२॥ ब्रह्माजी बोले- वे लोग इस प्रकार कह ही रहे थे कि वे गुणेश्वर वहीं अन्तर्धान हो गये और फिर दूर जाकर उस स्थानपर प्रकट हुए, तब बालकोंने उन्हें देखा तो वे सभी बालक अपने माता-पिताको छोड़कर पुनः उन गुणेशके पास चले गये ॥ ८-९ ॥ खेलते-खेलते वे सभी शीघ्र ही महर्षि गौतमजीके श्रेष्ठ आश्रममें पहुँच गये। वहाँ उन्होंने मुनि गौतमको ध्यानमें स्थित देखा और उनकी भार्याको भोजन पकाते हुए देखा। उस समय वे गुणेश रसोईके मध्यस्थानमें गये और उन्होंने भातका बर्तन उठा लिया तथा उन सभीको विभाजितकर अन्न प्रदान करके वे आदरपूर्वक उनसे कहने लगे ॥ १०-११ ॥ मेरे साथ रहनेके कारण तुम सभी लोग बहुत देरतक भूखे रह गये। अब निश्चिन्ततापूर्वक भोजन कर लो, उसके बाद पुनः हमलोग क्रीडा करेंगे ॥ १२ ॥ तब महर्षि गौतमकी भार्या देवी अहल्या शीघ्र ही उन गुणेशपर गुस्सा हो गयीं और बोलीं- तुमने मेरे अन्नका स्पर्श क्यों किया ? हे चंचल बालको ! अभीतक न तो बलिवैश्वदेवकर्म किया गया है और न ही देवताओंको भोग लगाया गया है। वे मुनिश्रेष्ठ गौतम जब ध्यान पूर्णकर आयेंगे तो क्या करेंगे ? तब देवी अहल्याने उन मुनिश्रेष्ठ गौतमको ध्यानसे जगाया ॥ १३-१४ ॥ जब मुनि गौतमका ध्यान भंग हुआ तो उन्होंने क्षुधासे व्याकुल उन सभी बालकोंको भोजन करते हुए देखा। तदनन्तर वे गुणेश्वरसे बोले ॥ १५ ॥ गौतम बोले- श्रेष्ठ माता-पिताके पुत्र होकर भी आप अन्याय क्यों करते हैं? आपके अत्यन्त अद्भुत कर्मोंके विषयमें सुनकर हम इससे पूर्व आपको परात्परतर परब्रह्मस्वरूपी भगवान् मान चुके हैं, लेकिन हे गुणेश्वर ! लगता है, इस समय आप बालभावसे यह सब कर रहे हैं ॥ १६-१७ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर वे मुनि गौतम गुणेश्वरका हाथ पकड़कर पार्वतीके भवनमें आये, वे अपने हाथमें अन्नसहित उस पात्रको भी घरसे साथमें ले आये थे। गौतम बोले- हे माता ! आपका यह बालक नित्य मेरे साथ अन्याय करता है। आज मैं आपसे यही बात कहने आया हूँ, हे गौरी! अब इसके बाद मुझे क्या करना चाहिये ? यदि आप यह चाहती हैं कि मैं यहाँसे कहीं दूर रहनेके लिये चला जाऊँ, तो वैसा आप बोलें ॥ १८-१९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर मुनिके वचनोंको सुनकर पार्वती अत्यन्त रुष्ट हो गयीं, वे अपनी आँखोंसे आग बरसाती हुई छड़ीसे गुणेशको पीटने लगीं और क्रुद्ध हुई वे गौरी मुनिको प्रणामकर विनयपूर्वक उनसे कहने लगीं ॥ २०-२१ ॥ हे मुने ! इसके जन्म लेनेके समयसे ही मुझे भय लगा रहता है, मुझे राक्षसोंके द्वारा किये जानेवाले न जाने कितने ही विघ्नसमुहोंको अभी और देखना है ॥ २२ ॥ यह तो सब प्रकारसे दुष्ट और मुनियोंके पुत्रोंमें वैर उत्पन्न करनेवाला है, फिर भी स्त्रियाँ तथा मुनिश्रेष्ठ कोई भी इसकी बात बताने मेरे पास नहीं आते हैं ॥ २३ ॥ 'यह पार्वतीका पुत्र है' यह समझकर लोग इसे शाप नहीं देते हैं। तदनन्तर पार्वतीने उन महर्षिके सामने Kalyana Visheshank 2021_Section_17_2_Front