भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 496, कुल 656 में से

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पृष्ठ 496

४९४ ॐ पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् ॐ [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ही पुत्र गुणेशके हाथ-पैरोंको बाँधकर और उन्हें घरके तदनन्तर पार्वती ने दरवाजा खोला और बालक भीतर डालकर उस घरके दरवाजेको दृढ़तापूर्वक बन्द गुणेशको बन्धनसे मुक्तकर वे प्रसन्नतापूर्वक उन्हें अपना कर दिया। 'ऐसा न करो-ऐसा न करो' कहते हुए मुनि स्तनपान कराने लगीं। इधर महर्षि गौतम अपने आश्रममें गौतम अपने आश्रमके लिये चले गये ॥ २४-२५ ॥ आ गये और देवताओंका पूजन करने लगे ॥ ३१ ॥ तदनन्तर वे सभी बालक उन गुणेश्वरके विषयमें महर्षिने उन सभी देवताओंको गुणेशके रूपवाला चिन्ता करने लगे कि इसका दर्शन हमें किस प्रकार और ही देखा, जो भोगसे तृप्त हो गये थे। उन्होंने सामने ही कब होगा? गिरिकन्या पार्वती ने तो कसकर दरवाजा भोगमें प्रदत्त अन्नको बिखरा हुआ भी देखा। यह बन्द करके उसे घरके भीतर बन्द कर दिया है। वे देखकर महर्षि गौतमके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ३२ ॥ बालक इस प्रकारसे बोल ही रहे थे कि उसी समय क्षणभरमें वे अपने मनमें विचार करने लगे कि मैंने दुर्बुद्धियुक्त ही वे गुणेश उन सबके बीच आ पहुँचे ॥ २६-२७ ॥ कार्य किया है। मैंने गुणेशके विषयमें सबकुछ पार्वतीको वे बालक गुणेश उस एक ही समयमें माताकी बता दिया और भोजनका पात्र भी उन्हें दिखला दिया। गोदमें तथा घरके भीतर भी दिखायी दे रहे थे। तब उन इसपर देवी पार्वती ने जगत्के कारण तथा अव्यक्त बालकोंने उनसे कहा—हे गौरी ! आपका पुत्र घरसे बाहर स्वरूपवाले उन गुणेश्वरको पीटा भी और बन्धनमें भी निकल आया है ॥ २८ ॥ डाल दिया। वे पर-से भी सदा परे हैं, जिनके तृप्त उस समय देवी पार्वती ने गुणेश्वरको घरके भीतर होनेपर महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥ ३३-३४ ॥ बँधा हुआ ही देखा और बाहर खड़े उन मुनिबालकोंको ऐसे उन गुणेशने मुनिबालकोंके साथ यहाँ आकर भी गुणेशके स्वरूपवाला ही देखा ॥ २९ ॥ भोजन किया था, उनकी मायासे मोहित हो जानेके यह देखकर पार्वती व्याकुल हो गयीं। वे जिस कारण मैं पहले उन्हें जान नहीं सका था ॥ ३५ ॥ किसीको भी गुणेश्वर समझकर अपना स्तनपान करानेके ब्रह्माजी बोले—यह सब देखकर देवी अहल्या लिये बुलाने लगीं, उस समय वे बालक पार्वतीसे मना भी अत्यन्त आश्चर्यचकित मनवाली हो गयीं और करते थे और कहते थे कि हे शिवे ! आपका पुत्र गुणेश उन्होंने दोबारा भोजन बनाया। महर्षि गौतमने भी ध्यानमें तो घरके भीतर ही स्थित है ॥ ३० ॥ स्थित होकर अपने सभी नित्यकर्मोंको पूर्ण किया ॥ ३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गौतमाश्रमगमन' नामक चौरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९४ ॥ पंचानबेवाँ अध्याय गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनके लिये पार्वतीके पास आना, विश्वकर्माका पार्वतीकी स्तुति करना, पार्वतीका उन्हें भक्तिका वर देना, विश्वकर्माद्वारा गुणेशका स्तवन और उन्हें अंकुश आदि आयुध प्रदान करना, गुणेशके द्वारा आयुधोंकी प्राप्ति कहाँसे हुई—इस जिज्ञासापर विश्वकर्माका सूर्य तथा संज्ञाकी कथा सुनाना, विश्वकर्माका प्रस्थान, उसी समय वृकासुर दैत्यका वहाँ आना, गुणेशद्वारा असुरका वध ब्रह्माजी बोले—छठे वर्षके प्रारम्भ होनेपर किसी गये। तब पार्वती ने अपने कक्षसे बाहर निकलकर उनका एक दिनकी बात है, पार्वतीके पुत्र वे गुणेश बालकोंके बहुत मान-सम्मान किया ॥ १-२ ॥ साथ कहीं बाहर गये और वहाँपर अनेक प्रकारकी उन्हें एक चित्रासनपर बैठाकर आदरपूर्वक उनकी क्रीड़ाएँ करने लगे। उनका दर्शन करनेकी इच्छासे पूजा की। उनके चरणोंका प्रक्षालनकर उन्हें गन्ध तथा देवशिल्पी विश्वकर्मा वहाँ उनके घरके भीतरकी ओर ताम्बूल प्रदान किया ॥ ३ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_17_2_Back