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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 656 में से

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पृष्ठ 497

क्री०ख०-अ०९५] * गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनहेतु पार्वतीके पास आना * ४९५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] देवी पार्वतीके द्वारा प्राप्त आदरभावको देखकर विश्वकर्मा अत्यन्त प्रसन्न हो गये। वे देवी पार्वतीको परम श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने लगे॥ ४॥ विश्वकर्मा बोले—हे विश्वेश्वरि! आप ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अर्यमा एवं विष्णुस्वरूपा हैं, आप विश्वस्वरूपाको मैं प्रणाम करता हूँ। हे अनन्तशक्तिस्वरूपा! आपने ही इस जगत्की सृष्टि की है। आप ब्रह्मा आदि देवताओंके द्वारा अभिनन्द्य स्वरूपवाली हैं॥५॥ हे माता! आप ही रजोगुणका आश्रय लेकर विश्वकी संरचना करती हैं, सत्त्वगुणका आश्रय लेकर उसका पालन-पोषण करती हैं और आप ही पुनः तमोगुणका आश्रय लेकर उसका संहार भी करती हैं। यह त्रैगुण्यभाव आपका नित्य स्वरूप है। आपने ही समस्त दैत्योंका वध किया है। आपकी शरण ग्रहण किये हुए ब्रह्मर्षिगण अपने ज्ञानके कारण मुक्तिको प्राप्त करते हैं। आप ही विष्णुकी अतुलनीय शक्ति हैं, आप ही जगत्की कारणभूता परम मायाशक्ति हैं॥ ६-७॥ सत् तथा असत्की पराशक्ति आप ही हैं। आप ही इस चराचर जगत्की सृष्टि करनेवाली हैं। आप सभी लोगों तथा सभी देवेश्वरोंको सम्मोहित करके काष्ठा तथा कला आदि समयकी सूक्ष्म गतियोंके द्वारा उन्हें कर्मोंका भोग प्रदान करती हैं॥८॥ जिन्होंने आपकी शरण ग्रहण कर ली है, उन्हें न तो मृत्युका भय रहता है और न कभी दैत्योंसे उत्पन्न भय ही रहता है। आप पुण्यात्माजनोंके लिये लक्ष्मीरूपा

[दायाँ स्तम्भ] हैं, दुष्टात्माओंके लिये अलक्ष्मीस्वरूपा हैं और समस्त स्त्रियोंके रूपमें भी आप ही विद्यमान हैं॥ ९॥ आप तीनों लोकोंमें विद्यारूपा हैं, सूर्य तथा चन्द्रमामें आप ही प्रभाके रूपमें विद्यमान हैं। हे माता! जिन्होंने आपकी शरण ग्रहण कर ली है, वे सम्पूर्ण जगत्के आश्रय बन जाते हैं। उन्हें लेशमात्र भी विपत्ति नहीं आती॥ १०॥ हे विश्वेश्वरि! आप ही इस विश्वका संहार करती हैं और जलरूपसे आप ही इसका आप्यायन भी करती हैं। आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, विष्णु, शंकर, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी आप दुर्लभ हैं। आपकी कृपा होनेपर ही भक्तजन आपका भजन करनेमें समर्थ हो पाते हैं और अन्तमें आनन्दस्वरूप होकर स्वर्गमें निवास करते हैं। जो आपकी भक्ति नहीं करते, ऐसे जनोंपर रुष्ट होकर आप उनके वांछितोंका विनाश करती हैं। हे माता! मैंने आपकी शरण ग्रहण की है॥ ११-१२॥ हे जगन्माता! आज मेरे ये दोनों नेत्र धन्य हो गये, मेरी विद्या धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरे मातृवंश तथा पितृवंश—दोनों धन्य हो गये और मेरा कुल भी धन्य हो गया, जो कि मुझे आपके चरणयुगलोंका दर्शन प्राप्त हुआ है*॥ १३॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे स्तुति की गयी जगज्जननी देवी पार्वतीने उनसे वर माँगनेके लिये कहा। तब विश्वकर्माने जगदम्बाकी परम भक्तिका आशीर्वाद माँगा, इसपर देवीने उनसे कहा—ऐसा ही होगा॥ १४॥


[मूल संस्कृत श्लोक]

  • विश्वकर्मोवाच नमामि विश्वेश्वरि विश्वरूपे ब्रह्मेन्द्ररुद्रार्यमविष्णुरूपे। त्वया ततं विश्वमनन्तशक्ते ब्रह्मादिदेवैरभिनन्द्यरूपे॥ त्वमेव विश्वं रजसा विधत्से सत्त्वेन मातः परिपासि तच्च। त्वमेव सर्वं तमसाथ हंसि त्रैगुण्यमेतत् तव नित्यरूपम्॥ त्वया हता दैत्यगणा विमुक्तिं ब्रह्मर्षयो ज्ञानबलात्प्रपन्नाः। त्वमेव विष्णोरतुलासि शक्तिः सर्वस्य हेतुः परमासि माया॥ सतोऽसतो वापि परासि शक्तिश्चराचरं त्वं विदधासि विश्वम्। सम्मोह्य लोकान्सकलान्सुरेशान्काष्ठाकलाभिश्च ददासि भोगम्॥ ये त्वां प्रपन्ना न भयं तु तेषां मृत्योस्तथा दैत्यकृतं कदाचित्। त्वमेव लक्ष्मीः सुकृतामलक्ष्मीर्दुष्टात्मनां त्वं प्रमदास्वरूपा॥ विद्यास्वरूपासि जगत्त्रये त्वं प्रभास्वरूपा शशिसूर्ययोस्त्वम्। य आश्रितास्ते जगदाश्रयास्ते विपत्तिलेशो न च तेषु मातः॥ त्वमेव विश्वेश्वरि विश्वमेतद्धरस्त्यथाप्यायसि वारिरूपा। अनादिमध्यानिधनाप्यगम्या हरीशलोकेशसुरेश्वराणाम्॥ तेऽनुग्रहात्त्वां प्रभजन्ति भक्ता आनन्दरूपा निवसन्ति नाके। अभक्तकामान् विनिहंसि रुष्टा त्वामेव मातः शरणं प्रपन्नः॥ धन्ये ममैते नयनेऽद्य विद्या जनुश्च माता पितृवंश एव। कुलं च धन्यं चरणौ त्वदीयौ दृष्टौ यतस्ते जगदम्बिके मया॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ९५।५-१३)