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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 656 में से

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पृष्ठ 498

४९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [श्रीगणेशपुराण- जो विश्वकर्माद्वारा किये गये इस जगदम्बास्तोत्रका पाठ करता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त करता है। वह सर्वत्र विजय, पुष्टि, विद्या, आयु, सुख तथा कल्याणको प्राप्त करता है ॥ १५ ॥ शिवा बोलीं—हे विश्वकर्मा ! हे महान् बुद्धिसे सम्पन्न ! आप सब प्रकारसे ज्ञानवान् हैं। भगवान् शिवसे मैंने आपके विषयमें जो कुछ सुना था, वह सब आज मैंने आपमें प्रत्यक्ष विद्यमान देख लिया है ॥ १६ ॥ सिन्धु दैत्यके द्वारा पीड़ित सभी देवता कारागारमें पड़े हुए हैं। भगवान् शिवका धाम कैलास भी उसके द्वारा अधिगृहीत कर लिये जानेके कारण वे शिव भी यहाँ आ गये हैं। इस दण्डकारण्य नामक स्थानपर कोई भी आप्त पुरुष नहीं दिखायी देता। बहुत समयके अनन्तर आप भलीभाँति यहाँ दृष्टिपथमें आये हैं ॥ १७-१८॥ विश्वकर्मा बोले—हे जगन्माता ! यदि पुत्र माताके पास आता है, महान् भक्त यदि अपने अभीष्ट देवके दर्शनके लिये जाता है और हे शिवे ! विद्या ग्रहण करनेकी इच्छावाला यदि गुरुके पास जाता है तो इसमें क्या आश्चर्य है ! ॥ १९ ॥ हे माता ! मैंने आपके पुत्रकी परम अद्भुत महिमाका श्रवण किया है, आप दोनोंके दर्शनोंका अभिलाषी मैं आपके पुत्रका [भी] दर्शन करनेके लिये आया हूँ ॥ २० ॥ ब्रह्माजी बोले—जब वे विश्वकर्मा और माता पार्वती इस प्रकारसे परस्पर वार्तालाप कर रहे थे कि उसी समय वे विनायक वहाँ आ पहुँचे। धूलिधूसरित देहवाले उन गुणेशकी कान्ति असंख्य चन्द्रमाओंके सदृश थी ॥ २१ ॥ उनका मुखमण्डल अत्यन्त प्रसन्न था, वे बालकोंके समूहोंसे घिरे हुए थे। उन बालकोंके मध्य वे उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे मरुद्गणोंके मध्य इन्द्र सुशोभित होते हैं। उनका दर्शनकर विश्वकर्माने उन्हें प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर सामने खड़े हो गये। उन गिरिजापुत्रको परमात्मा जानकर वे उनकी स्तुति करने लगे ॥ २२-२३ ॥ विश्वकर्मा बोले—[हे प्रभो !] आप सत्-चित् तथा आनन्दमय विग्रहवाले हैं, समस्त चर और अचर जगत्के गुरु हैं और सभी कारणोंके भी कारण परमात्मा हैं। आप गुणेश नामसे प्रसिद्ध हैं, गुणातीत हैं, सृष्टि, स्थिति तथा संहारके कारणस्वरूप हैं, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं, ईशान हैं तथा व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूपवाले हैं। आप सभी देवताओंके लिये अगम्य हैं, मुनिजनोंके हृदयकमलमें निवास करनेवाले हैं, सिद्धि तथा बुद्धिके स्वामी हैं, विविध भक्तोंको सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं, सर्वसमर्थ हैं, अभक्तोंकी कामनाओंका दमन करनेवाले हैं आपकी प्रभा हजारों सूर्योंके समान उज्ज्वल है, आप अनेक प्रकारकी शक्तियोंसे समन्वित हैं, और दैत्यों तथा दानवोंका मर्दन करनेवाले हैं। आप अनादि, अव्यय, शान्त, जरा-मरणसे रहित, ब्रह्मा-विष्णु तथा शिव—इस प्रकारसे त्रिविध विग्रह धारण करनेवाले और वेदत्रयीके मूलरूप हैं, आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २४-२८॥ ब्रह्माजी बोले—विश्वकर्माद्वारा की गयी इस प्रकारकी स्तुतिको सुनकर वे गुणेश्वर अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये, उन्होंने उन विश्वकर्माको उत्तम आसनपर बैठाकर बड़े ही आदरभावसे उनकी पूजा की। उन्होंने उनके चरणोंको प्रक्षालित करके उन्हें गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य निवेदित करके उनसे कहा ॥ २९-३० ॥ गुणेश बोले—हे विश्वकर्मा ! आप मेरे दर्शनकी अभिलाषासे यहाँ आये हैं तो बताइये कि आप मेरी प्रसन्नताके लिये कौन-सा श्रेष्ठ उपहार मेरे लिये लाये हैं ? ॥ ३१ ॥ विश्वकर्मा बोले—जो स्वात्मानन्दसे परिपूर्ण हैं, दूसरेकी अभिलाषाको पूर्ण करनेवाले हैं, सब प्रकारसे इच्छारहित हैं, सब कुछ करनेवाले हैं, सभी प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न है, मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा सोनेमें समान बुद्धि रखनेवाले हैं, कल्पवृक्षको भी तिरस्कृत कर देनेवाले हैं, कर्तुम्, अकर्तुम् तथा अन्यथाकर्तुम् समर्थ हैं, आत्माधीन हैं, सब प्रकारसे सन्तुष्ट हैं और स्वेच्छाशक्तिसे विचरण करनेवाले हैं, ऐसे आप- जैसे दिव्य महापुरुषोंके सन्तोषके लिये भला सब प्रकारसे पराधीन, सब प्रकारके सामर्थ्यसे रहित, सर्वथा