भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 499, कुल 656 में से

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पृष्ठ 499

क्री०ख०-अ०१५ ] * गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनहेतु पार्वतीके पास आना * ४९७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अकिंचन मुझ-जैसे मृत्युधर्मा प्राणीके द्वारा क्या देनेयोग्य हो सकता है, फिर भी मैं अपने सामर्थ्यके अनुसार कुछ लाया हूँ॥ ३२-३४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहनेके अनन्तर विश्वकर्माने उनके समक्ष सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला एवं तीक्ष्ण धारवाला अंकुश, पद्म, हजारों सूर्योंके समान प्रभाववाला परशु तथा पाश नामक शस्त्र रखा। गुणेश्वरने उन शस्त्रोंको ग्रहण किया॥ ३५-३६॥ तब गुणेश्वरने विश्वकर्मासे कहा—हे अनघ! हे विश्वकी संरचना करनेवाले! आप इन शस्त्रोंको कहाँसे लाये हैं, अब मेरी प्रसन्नताके लिये यह मुझे बतायें॥ ३७॥ विश्वकर्मा बोले—'संज्ञा' नामसे प्रसिद्ध मेरी एक कन्या है, वह सुन्दर रूपसे सम्पन्न है, उसके मुखको देखकर चन्द्रमा भी एकाएक लज्जित हो गये थे। हे गुणेश्वर! लक्ष्मी, इन्द्रपत्नी शची, सावित्री, शारदा, अरुन्धती अथवा कामदेवकी पत्नी रति और तीनों लोकोंमें भी कोई स्त्री ऐसी नहीं है, जो उसके समान सुन्दर हो॥ ३८-३९॥ उसे मैंने स्वयं ही वेदत्रयीस्वरूप तथा त्रिदेवस्वरूप भगवान् सूर्यको पत्नीरूपमें समर्पित किया था। उस विवाहमें सांगोपांग अर्थात् वाहन, परिवारादिके साथ त्रिलोकीके सभी निवासी आये थे॥ ४०॥ वह महान् विवाह-महोत्सव आठ दिन-राततक निरन्तर चलता रहा। उस संज्ञाको देखकर क्षुभित हुए देवता लज्जासे अधोमुख हो वहाँसे चले गये थे॥ ४१॥ तदनन्तर भगवान् सविता उस संज्ञाको साथ लेकर अपने श्रेष्ठ स्थानको चले गये। उन भगवान् सूर्यके तेजसे संतप्त होकर मेरी कन्या संज्ञा अत्यन्त दुर्बल हो गयी। तदनन्तर उस संज्ञाने अपने सामर्थ्यके प्रभावसे अपनी छायाके रूपमें अपने ही समान छाया नामक एक स्त्रीकी संरचना की। फिर उसे सब कुछ समर्पितकर वह शीघ्र ही मेरे घरको आ गयी॥ ४२-४३॥ इसी प्रकारसे जब कुछ समय व्यतीत हो गया तो सूर्यने छायाकी वास्तविकताको जान लिया। 'यह संज्ञा नहीं है'—ऐसा जानकर वे सूर्य शीघ्र ही मेरे घर चले आये। तदनन्तर भयभीत संज्ञाने पुनः मुझसे कहा—हे पिता! मुझे सूर्यके हाथ न सौंपें, मैं इनके तेजको सहन करनेमें असमर्थ हूँ॥ ४४-४५॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर पिता विश्वकर्माके द्वारा धिक्कारे जानेपर वह घरसे बाहर चली गयी। वह संज्ञा अश्विनी(घोड़ी)-का रूप धारणकर गुप्त रूपसे वनमें रहने लगी॥ ४६॥ इसके पश्चात् विश्वकर्माने उस संज्ञाको घरमें कहीं भी न देखकर सूर्यसे कहा—वह संज्ञा आपके तेजको सहन करनेमें समर्थ नहीं है। वह कहाँ चली गयी, यह मैं भी नहीं जानता, किंतु उसकी प्राप्तिका उपाय मैं बताता हूँ, यदि आपके तेजका कुछ भाग कम हो जाय, तो वह संज्ञा प्रकट हो जायगी और तब आप उसके साथ विहार करें॥ ४७-४८१/२ ॥ सूर्य बोले—यदि आपका मन इस प्रकार करनेका है तो आप वैसा ही करें॥ ४९॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर विश्वकर्माने उन सूर्यको यन्त्रमें स्थापितकर उन्हें कुछ छील दिया और शीघ्र ही उनके तेजको कम कर दिया, जिससे वे कुछ सौम्य- स्वरूपवाले हो गये॥ ५०॥ तब विभु सूर्य वहाँ गये, जहाँपर संज्ञा गुप्तरूपसे निवास कर रही थी। भगवान् सूर्यने अश्वका रूप धारणकर अश्विनी बनी हुई उस संज्ञाके साथ रमण किया। तब संज्ञाने नासत्य अथवा दस्र कहे जानेवाले दो अश्विनी- कुमारोंको जन्म दिया। तदनन्तर संज्ञाको लेकर भगवान् सूर्य बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने लोकको गये॥ ५१ १/२ ॥ विश्वकर्मा बोले—हे गुणेश्वर! हे जगदीश्वर! भगवान् सूर्यके तेजका जो भाग छीलनेपर शेष रह गया था, उस अत्यन्त प्रबल तेजसे मैंने अत्यन्त शीघ्र ही आपके लिये आयुधोंका निर्माण किया, ये आयुध अत्यन्त तीक्ष्ण और कालपर भी सदा विजय दिलानेवाले हैं॥ ५२-५३॥ मैंने ये चार आयुध आपको प्रदान किये हैं, चक्र तथा गदा भगवान् विष्णुको दी है और सभी शत्रुओंका विनाश