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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 500, कुल 656 में से

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पृष्ठ 500

४९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

करनेवाला त्रिशूल भगवान् शिवको प्रदान किया है ॥ ५४ ॥ गुणेश बोले—हे विश्वकर्मा! आपने बहुत अच्छा किया, जो मुझे ये शुभ आयुध प्रदान किये हैं, ये आयुध दैत्योंका नाश करनेके लिये तथा सज्जनोंके परोपकारके लिये उपयोगी सिद्ध होंगे ॥ ५५ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर उन विश्वकर्मासे उन्होंने शीघ्र ही उन आयुधोंको ग्रहण किया और उनके प्रयोगकी परीक्षा की, जिससे सम्पूर्ण पृथ्वी, पर्वत तथा वन काँप उठे। वे विभु गुणेश्वर करोड़ों सूर्योंकी कान्तिके सदृश उन शस्त्रोंसे अत्यन्त शोभाको प्राप्त हुए। तदनन्तर वे विश्वकर्मा उनकी आज्ञा लेकर और उन्हें प्रणामकर अपने स्थानको चले गये ॥ ५६-५७ ॥ वे उमाके पुत्र बालक गुणेश बालकोंसे घिरे रहकर पुनः उनके साथ क्रीड़ा करने लगे, उसी समय वहाँ एक अत्यन्त दुष्ट महादैत्य आ पहुँचा, उसका नाम था वृक। उसका मुख बड़ा ही भयंकर था, वह मदोन्मत्त, महान् बलशाली वृक मानो सबको निगलता जा रहा था। वह अपनी पूँछके आघातसे पृथ्वीको प्रकम्पित कर रहा था। उसके दाँत हलके समान बड़े तथा अत्यन्त नुकीले थे ॥ ५८-५९ ॥ उस भयंकर दैत्यको देखकर मुनिबालक भाग उठे। गुणेशने शीघ्र ही आयुधोंको ग्रहणकर उस वृकासुरको प्रताड़ित किया ॥ ६० ॥ वह दैत्य असुर अंकुशके एक ही प्रहारमात्रसे भूमिपर गिर पड़ा। वह अपने मुखसे रक्त उगल रहा था। उसने अपना असली दैत्यका रूप धारण कर लिया, गिरते समय वह वृक्षोंको चूर-चूर करता हुआ तथा अनेक जीवोंको मारता हुआ दस योजन विस्तारवाला हो गया था। तदनन्तर सूर्यास्त हो जानेके अनन्तर वे गुणेश्वर बालकोंके साथ घरको चले आये ॥ ६१-६२ ॥ उन बालकोंने देवी उमाको बताया कि आज इस गुणेशने वृक नामक असुरको अपने अंकुशके आघातसे मार डाला। वह असुर दस योजन विस्तृत शरीरवाला था। तब गिरिकन्या पार्वतीने क्रुद्ध-सी होकर उन बालकोंसे कहा—तुम लोग अपने-अपने घरोंको जाओ। पार्वतीका यह वाक्य सुनकर वे सभी बालक हँसते हुए अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ६३-६४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'वृकासुर-वधवर्णन' नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९५ ॥

छियानबेवाँ अध्याय सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न होना, यज्ञोपवीत-महोत्सवका वर्णन, उसी अन्तरालमें वहाँ आये कृतान्त तथा काल नामक दैत्योंका वध करना, महर्षि कश्यप तथा अदितिद्वारा गुणेश्वरका पूजन, देवताओंद्धारा बालक गुणेश्वरकी महिमाका प्रतिपादन

ब्रह्माजी बोले—एक दिनकी बात है, देवी पार्वती प्रसन्न भगवान् शिवसे बोलीं ॥ १/२ ॥ शिवा बोलीं—हे देवेश्वर! इस समय बालक गुणेशका सातवाँ वर्ष प्रारम्भ हो गया है, अतः किसी शुभ मुहूर्तमें बड़े ही समारोहके साथ गुणेशका उपनयन-संस्कार सम्पन्न करना चाहिये ॥ १ १/२ ॥ शिव बोले—हे भद्रे! तुमने मेरे मनकी बात जानकर बहुत अच्छी बात कही है। अब मैं इस बालकका यज्ञोपवीत-संस्कार यथोचित विधि-विधानके साथ कराऊँगा ॥ २ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—देवी पार्वतीसे इस प्रकार कहकर भगवान् शिवने महर्षि गौतमको बुलवाया और शुभ दिनमें लग्नका विचार करके संस्कारकी सामग्रीको एकत्र किया। अत्यन्त विस्तृत लग्नमण्डप तैयार किया गया, सभी ऋषियों तथा मुनियोंको आमन्त्रितकर और उन सभीका पूजनकर तथा उनकी अनुमति प्राप्तकर भगवान् शिवने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक बालक गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न किया ॥ ३–५ ॥