श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 501, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०खं०-अ०१६ ] * सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न होना * ४९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
उन सभी ऋषि-मुनियोंने भगवान् शिव, देवी पार्वती तथा बालक गुणेशको अनेक प्रकारके उपहार प्रदान किये। भगवान् शिवने उन अठासी हजार ऋषि- मुनियोंको नमस्कार करके उनका यथाविधि पूजन किया और उन्हें विविध प्रकारकी भेंट प्रदान की॥ ६१/२ ॥ उसी प्रकार उन्होंने तैंतीस करोड़ देवताओं, यक्षों, किन्नरों तथा चारणोंको भी उपहार प्रदान किये। उस समय विविध वाद्योंकी ध्वनि हो रही थी, किन्नरगण गान कर रहे थे, नर्तकियोंके समूह तीव्रगतिसे नृत्य कर रहे थे और सभी लोग उस मांगलिक महोत्सवका अवलोकन कर रहे थे। ऐसे समयमें भगवान् शिवने बड़ी ही प्रसन्नताके साथ सभीको विविध उपहार तथा दान दिये ॥ ७-९॥ उन्होंने देवताओंकी स्थापना करके सभीको भोजन कराया। प्रातःकाल बटुक गुणेशको स्नान करानेके अनन्तर उनका चूडाकरण-संस्कार कराया और चार ब्राह्मणोंके साथ बटुकको भी भोजन कराकर पुनः उन्हें स्नान कराया॥ १०१/२॥ बनायी गयी वेदी तथा बटुकके मध्य उत्तम वस्त्रकी ओट लगाकर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करनेवाले मुनिजनोंके साथ उपनयनका मुहूर्त शोधित करके [भगवान् शिव] मुहूर्तके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे॥ १११/२ ॥ इसी समय वहाँ कृतान्त तथा काल नामवाले दो दैत्य आ पहुँचे। वे उन्मत्त हाथीका रूप धारण किये हुए थे, उनके गण्डस्थलसे मदरूपी जल प्रवाहित हो रहा था, वे बड़े ही सुदृढ़ शरीरवाले थे, उनके दाँत अत्यन्त तीक्ष्ण थे, उनकी लम्बायमान सूँडें आकाशसे स्पर्धा कर रही थीं। वे दोनों अपनी चिंघाड़ ध्वनिसे लोगोंको भयभीत कर रहे थे, उन दोनोंके मस्तक सिन्दूरके समान अरुण वर्णके थे, उनके पैरोंके प्रहारसे पृथ्वी तीव्र गतिसे काँप रही थी ॥ १२-१४॥ युद्ध करते हुए वे दोनों एक-दूसरेपर अपने दाँतोंसे प्रहार कर रहे थे। जिसके कारण उठी धूलसे पृथ्वी तथा आकाशका मध्य भाग ढक गया था। वे दोनों हाथी
[दायाँ स्तम्भ]
सभामण्डपके द्वारदेशमें स्थित इन्द्रके हाथी ऐरावतके समीप आ गये ॥ १५ ॥ उन्होंने अपने दाँतोंके प्रहारोंसे उस ऐरावत हाथीके अत्यन्त सुदृढ़ गण्डस्थलको भेद डाला। फलतः वह गजेन्द्र ऐरावत रक्त बहाने लगा और क्षणभरमें ही मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा ॥ १६ ॥ फिर एक मुहूर्तके बाद चेतना प्राप्तकर वह ऐरावत शीघ्र ही वहाँसे पलायित हो गया। उसके पीछे-पीछे दौड़ते हुए उन दोनों हाथियोंने अपने दाँतोंके आघातसे पुनः उसपर प्रहार किया ॥ १७ ॥ तदनन्तर वे दोनों उन्मत्त हाथी सभाके मध्यमें आ गये। उस समय उन्होंने अपनी सूँड़ोंके द्वारा उस सभा- मण्डपको उखाड़ डाला ॥ १८ ॥ वहाँ स्थित सभी लोग उन दोनों हाथियोंके कोलाहलको सुनकर उठ खड़े हुए, वे दोनों हाथी जिधर-जिधर जाते थे, वहाँ-वहाँसे देवता पलायित हो जाते थे ॥ १९ ॥ उन दोनों हाथियोंसे भयभीत होकर मुनिगण दसों दिशाओंमें भाग चले। तदनन्तर शिवगणोंने वहाँ जाकर भगवान् शिवको यह समाचार दिया कि एक विघ्न उपस्थित हो गया है॥ २० ॥ गण बोले— उन दोनों हाथियोंके भयसे भयभीत होकर इन्द्र तथा मुनियोंसहित सारी सभा भंग हो गयी है। पार्वतीजी भी अपनी सखियोंके साथ वहाँसे पलायित होकर घर आ गयीं ॥ २१ ॥ तदनन्तर बालक गुणेशने उन दोनों अत्यन्त बलशाली दैत्यरूपी हाथियोंको देखकर मेघके समान गर्जना की और शीघ्र अपने दोनों हाथोंसे उन दोनोंकी सूँड पकड़ ली। इससे वे दोनों जोरसे चिंघाड़ने लगे। गुणेशने उन दोनोंको घुमाकर एक हाथीको दूसरे हाथीके ऊपर पटक दिया ॥ २२-२३ ॥ उन दोनोंके सैकड़ों टुकड़े हो गये और वे दोनों जमीनपर गिर पड़े। उनके गिरनेसे भूमि काँप उठी और वृक्ष चूर-चूर होकर धराशायी हो गये ॥ २४ ॥