श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 502, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] तदनन्तर गणोंने उन दोनोंके शरीरके टुकड़ोंको शीघ्र ही ले जाकर दूर फेंक दिया। उस समय माता पार्वती त्वरापूर्वक वहाँ आ पहुँचीं और उन्होंने बालकको अपनी गोदमें ले लिया ॥ २५ ॥ पार्वतीजीकी सखीने उन्हें बतलाया कि उन गजरूपी दैत्योंसे भयभीत होकर सभी देवता और मुनिगण पलायित हो गये। इस बालकने शीघ्र ही उन दोनों दानवोंको मार डाला ॥ २६ ॥ इसके पश्चात् इन्द्र आदि सभी देवताओं तथा मुनियोंने उन गुणेशसे कहा—हे स्वामिन् ! हे सभी गुणोंके निधान! आपने कपटपूर्वक हाथीका स्वरूप धारण किये हुए उन दैत्योंको अपनी लीलाद्वारा मार डाला। हे देव! वे दोनों दैत्य सभीका प्राण हरनेवाले, बड़े ही मायावी और अत्यन्त बलवान् थे ॥ २७-२८ ॥ ऐसा कहकर देवराज इन्द्रसहित सभी देवताओं और मुनिगणोंने सभामें प्रवेश किया। सभी जनोंके अपने-अपने स्थानपर बैठ जानेके अनन्तर अप्सरागणोंने नृत्य करना प्रारम्भ किया ॥ २९ ॥ विविध प्रकारके वाद्य बजने लगे। पितामह ब्रह्मा रुद्रके समीपमें गये और उनके साथ मन्त्रणा करके उन्होंने शिशु गुणेशकी कमरमें मेखला बाँधी ॥ ३० ॥ तदनन्तर बटुक गुणेशको यज्ञोपवीत धारण कराकर मृगचर्म पहनाया और होम करके [बटुकसे] अग्निमें समिधाकाष्ठ प्रदान करवाया। उसके पश्चात् विधि- विधानके साथ गायत्रीमन्त्रका वाचन करवाया ॥ ३१ ॥ तदनन्तर माता पार्वती ने भिक्षाके रूपमें बटुक गुणेशको दो वस्त्र, आभूषण, उत्तरीय वस्त्र, मोतियोंके साथ अनेक रत्न और लड्डू आदि खाद्य पदार्थ प्रदान किये। भगवान् शिवने बटुक गुणेशको त्रिशूल तथा चन्द्रमा प्रदान किया और उनके भालचन्द्र तथा शूलपाणि— ये दो सार्थक नाम रखे। तदनन्तर भगवान् विष्णुने उन्हें चक्र दिया और उन महात्मा गुणेशका 'शोचिष्केश' यह श्रेष्ठ नाम रखा ॥ ३२-३४॥ इसके पश्चात् पुरन्दर इन्द्रने उन बटुक गुणेशका
[दायाँ स्तम्भ] पूजन करके चिन्तामणि नामक मणि उनके कण्ठमें बाँधी और सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा मंगलदायक 'चिन्तामणि' यह उनका नाम रखा ॥ ३५ ॥ उसी समय कमलके आसनपर विराजमान रहनेवाले, ब्रह्माजीने उन गुणेशका पूजन करके उन्हें कमल प्रदान किया और उस भरी सभामें 'विधाता' यह नाम उनका रखा। तदनन्तर अन्य सभी देवताओंने उन गुणेश्वरका भलीभाँति पूजन किया और उन्होंने अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार उनके विविध नाम रखे ॥ ३६-३७ ॥ इसके पश्चात् देवी अदिति और महर्षि कश्यपने आदरपूर्वक उनका पूजन किया और देव गुणेश्वरने उन्हें अपने पहलेके शुभ स्वरूपका दर्शन कराया ॥ ३८ ॥ उस समय वे अपने मस्तकपर चन्द्रमाको विराजमान किये हुए थे, उनकी दस भुजाएँ थीं, वे मुकुटसे सुशोभित हो रहे थे, वे दिव्य वस्त्रों, दिव्य सुगन्धित विलेपन तथा दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ ३९ ॥ वे सिंहपर विराजमान थे, उन्होंने नागराजको अपनी करधनीके रूपमें बाँधा हुआ था। इस प्रकारके स्वरूपका दर्शन करके अदितिने उनका आलिंगन किया और वे अत्यन्त स्नेहानन्दमें निमग्न हो गयीं ॥ ४० ॥ उनके शरीरमें रोमांच हो आया। अत्यधिक प्रेमके कारण उनके कण्ठसे स्पष्ट शब्द नहीं निकल पा रहे थे, वे अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं और उनकी आँखोंसे निकलनेवाली अश्रुधारासे उनकी दृष्टि धुँधली-सी हो गयी। वे देवी अदिति परम आनन्दमें निमग्न हो गयीं। स्नेहके कारण उनके स्तनोंसे दुग्ध निकलने लगा। अदितिके समान ही महर्षि कश्यपको भी तत्क्षण ही देहका भान नहीं रहा ॥ ४१-४२ ॥ तदनन्तर उन दोनों कश्यप तथा अदितिने स्नेहके वशीभूत हो उनसे कहा—हे वत्स ! तुम्हारे वियोगमें हम दोनों अत्यन्त दुर्बल हो गये थे, किंतु अब इस समय तुम्हारे दर्शनसे हम पुनः पुष्ट शरीरवाले हो गये हैं। हे