भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 503, कुल 656 में से

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पृष्ठ 503

क्री०ख०-अ०९६ ] * सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न होना * ५०१ पुत्र ! तुम हम दोनोंका परित्याग मत करो, हम दोनोंका तुम्हारे चरणोंमें अत्यन्त अनुराग है ॥ ४३ १/२ ॥ गजानन बोले- हे माता! मैंने एक बार आपको दर्शन देनेकी प्रतिज्ञा की थी, वह प्रतिज्ञा मैंने इस समय पूर्ण कर ली है, अतः अब आपको शोक नहीं करना चाहिये। मैं सभीके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विद्यमान रहता हूँ, अतः आपका और मेरा [वस्तुतः] कभी वियोग नहीं हो सकता ॥ ४४-४५ ॥ ब्रह्माजी बोले-जब वे इस प्रकार वार्ता कर ही रहे थे कि उसी बीच देवी पार्वती वहाँ आ पहुँचीं। उन दोनों कश्यप एवं अदितिका अपने बालक गुणेशपर उस प्रकारका स्नेह देखकर वे बड़े ही प्रेमपूर्वक बोलीं ॥ ४६ ॥ पार्वती बोलीं- हे अदिति! आप अब मेरा पुत्र मुझे दे दीजिये, इसे आपने बहुत देरसे पकड़ रखा है। हे पवित्र मुसकानवाली! हे सुन्दर भौंहोंवाली देवी अदिति! यह आपका पुत्र नहीं है, इसे आप ठीकसे देख लें। जब उन्होंने पुनः देखा तो उन विभु विनायकको अपने पुत्रके रूपमें ही पाया ॥ ४७ १/२ ॥ अदिति बोलीं- हे गौरी! स्वयं आप भी शीघ्र ही आगे आकर इस मेरे पुत्रको भलीभाँति देख लें ॥ ४८ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब गौरीने पुनः उन्हें अपने पुत्र गुणेशके रूपमें ही देखा। अदिति उन्हें अपना पुत्र बतलाने लगीं और पार्वती कहने लगीं कि यह मेरा पुत्र है ॥ ४९ ॥ जब उन दोनों अदिति एवं पार्वतीमें इस प्रकारका वाद-विवाद होने लगा, तो अत्यन्त विस्मित होकर देवता कहने लगे-जो देव आदि और अन्तसे रहित हैं, सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले हैं, अनन्त स्वरूपोंवाले हैं, अनन्त श्रीसे सम्पन्न हैं और अनेक प्रकारकी शक्तियोंसे समन्वित हैं, भला वे किसके पुत्र हो सकते हैं! दोनों ही देवियाँ इन गुणेश्वरकी मायासे भ्रान्त हो रही हैं ॥ ५०-५१ ॥ वे देवता बोले-जिसके ये पुत्र हैं, उसीके हाथमें इनको समर्पित किया जाय ॥ ५१ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उन विविध स्वरूप धारण करनेवाले परमेश्वर गुणेशकी ओर देखकर कुछ देवता कहने लगे कि ये विधाता ब्रह्मा हैं, कुछ कहने लगे कि ये चार भुजाधारी भगवान् विष्णु हैं, कुछ देवता कहने लगे कि ये तीन नेत्रोंवाले भगवान् शंकर हैं और कुछ देवता उन्हें वरुणदेव तथा कुछ उनको अग्निदेव बताने लगे ॥ ५२-५३ ॥ कुछ देवताओेंने उन्हें कामदेव, तो किन्होंने भूतलपर समागत सूर्य माना। कुछ देवगण उन्हें गन्धर्व, किन्नर, कुबेर तथा शेषनागके रूपमें देख रहे थे। इस प्रकार विविध रूपवाले उन गुणेशको देखकर देवगण विस्मित हो उठे ॥ ५४ ॥ तब वे देवता कहने लगे कि ये कौन हैं, इसका निश्चय करनेमें हम समर्थ नहीं हैं। आप दोनों अपनी विवेकशक्तिसे निश्चयकर इन परमपुरुषको स्वयं ही ग्रहण कर लें ॥ ५५ ॥ तदनन्तर गौरी पार्वतीने उन प्रभु अपने पुत्र गुणेशको शीघ्र ही पकड़ लिया और स्नेहपूर्वक उन्हें अपना स्तनपान कराया। यह देखकर देवी अदिति उदास हो गयीं ॥ ५६ ॥ वे कहने लगीं कि यदि ये मेरे पुत्र होते तो फिर दूसरी स्त्रीके पास क्यों जाते, मैं भ्रमित होनेके कारण दूसरेके पुत्रपर व्यर्थ ही आसक्त हुई हूँ ॥ ५७ ॥ तदनन्तर मुनिजनों और महर्षि कश्यपने उन गुणेश्वरका पूजन किया। उन्हें नमस्कारकर और उनसे आज्ञा लेकर वे सभी अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ५८ ॥ इधर देवी भवानी पार्वती भी पुत्रको लेकर हर्षित होती हुई अपने भवनमें चली आयीं। इसके पश्चात् वहाँ आये हुए अन्य सभी लोग भी अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गौरी और अदितिका विवाद' नामक छियानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९६ ॥