श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
क्री०ख०-अ०९५] * गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनहेतु पार्वतीके पास आना * ४९५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] देवी पार्वतीके द्वारा प्राप्त आदरभावको देखकर विश्वकर्मा अत्यन्त प्रसन्न हो गये। वे देवी पार्वतीको परम श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने लगे॥ ४॥ विश्वकर्मा बोले—हे विश्वेश्वरि! आप ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अर्यमा एवं विष्णुस्वरूपा हैं, आप विश्वस्वरूपाको मैं प्रणाम करता हूँ। हे अनन्तशक्तिस्वरूपा! आपने ही इस जगत्की सृष्टि की है। आप ब्रह्मा आदि देवताओंके द्वारा अभिनन्द्य स्वरूपवाली हैं॥५॥ हे माता! आप ही रजोगुणका आश्रय लेकर विश्वकी संरचना करती हैं, सत्त्वगुणका आश्रय लेकर उसका पालन-पोषण करती हैं और आप ही पुनः तमोगुणका आश्रय लेकर उसका संहार भी करती हैं। यह त्रैगुण्यभाव आपका नित्य स्वरूप है। आपने ही समस्त दैत्योंका वध किया है। आपकी शरण ग्रहण किये हुए ब्रह्मर्षिगण अपने ज्ञानके कारण मुक्तिको प्राप्त करते हैं। आप ही विष्णुकी अतुलनीय शक्ति हैं, आप ही जगत्की कारणभूता परम मायाशक्ति हैं॥ ६-७॥ सत् तथा असत्की पराशक्ति आप ही हैं। आप ही इस चराचर जगत्की सृष्टि करनेवाली हैं। आप सभी लोगों तथा सभी देवेश्वरोंको सम्मोहित करके काष्ठा तथा कला आदि समयकी सूक्ष्म गतियोंके द्वारा उन्हें कर्मोंका भोग प्रदान करती हैं॥८॥ जिन्होंने आपकी शरण ग्रहण कर ली है, उन्हें न तो मृत्युका भय रहता है और न कभी दैत्योंसे उत्पन्न भय ही रहता है। आप पुण्यात्माजनोंके लिये लक्ष्मीरूपा
[दायाँ स्तम्भ] हैं, दुष्टात्माओंके लिये अलक्ष्मीस्वरूपा हैं और समस्त स्त्रियोंके रूपमें भी आप ही विद्यमान हैं॥ ९॥ आप तीनों लोकोंमें विद्यारूपा हैं, सूर्य तथा चन्द्रमामें आप ही प्रभाके रूपमें विद्यमान हैं। हे माता! जिन्होंने आपकी शरण ग्रहण कर ली है, वे सम्पूर्ण जगत्के आश्रय बन जाते हैं। उन्हें लेशमात्र भी विपत्ति नहीं आती॥ १०॥ हे विश्वेश्वरि! आप ही इस विश्वका संहार करती हैं और जलरूपसे आप ही इसका आप्यायन भी करती हैं। आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, विष्णु, शंकर, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी आप दुर्लभ हैं। आपकी कृपा होनेपर ही भक्तजन आपका भजन करनेमें समर्थ हो पाते हैं और अन्तमें आनन्दस्वरूप होकर स्वर्गमें निवास करते हैं। जो आपकी भक्ति नहीं करते, ऐसे जनोंपर रुष्ट होकर आप उनके वांछितोंका विनाश करती हैं। हे माता! मैंने आपकी शरण ग्रहण की है॥ ११-१२॥ हे जगन्माता! आज मेरे ये दोनों नेत्र धन्य हो गये, मेरी विद्या धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरे मातृवंश तथा पितृवंश—दोनों धन्य हो गये और मेरा कुल भी धन्य हो गया, जो कि मुझे आपके चरणयुगलोंका दर्शन प्राप्त हुआ है*॥ १३॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे स्तुति की गयी जगज्जननी देवी पार्वतीने उनसे वर माँगनेके लिये कहा। तब विश्वकर्माने जगदम्बाकी परम भक्तिका आशीर्वाद माँगा, इसपर देवीने उनसे कहा—ऐसा ही होगा॥ १४॥
[मूल संस्कृत श्लोक]
- विश्वकर्मोवाच नमामि विश्वेश्वरि विश्वरूपे ब्रह्मेन्द्ररुद्रार्यमविष्णुरूपे। त्वया ततं विश्वमनन्तशक्ते ब्रह्मादिदेवैरभिनन्द्यरूपे॥ त्वमेव विश्वं रजसा विधत्से सत्त्वेन मातः परिपासि तच्च। त्वमेव सर्वं तमसाथ हंसि त्रैगुण्यमेतत् तव नित्यरूपम्॥ त्वया हता दैत्यगणा विमुक्तिं ब्रह्मर्षयो ज्ञानबलात्प्रपन्नाः। त्वमेव विष्णोरतुलासि शक्तिः सर्वस्य हेतुः परमासि माया॥ सतोऽसतो वापि परासि शक्तिश्चराचरं त्वं विदधासि विश्वम्। सम्मोह्य लोकान्सकलान्सुरेशान्काष्ठाकलाभिश्च ददासि भोगम्॥ ये त्वां प्रपन्ना न भयं तु तेषां मृत्योस्तथा दैत्यकृतं कदाचित्। त्वमेव लक्ष्मीः सुकृतामलक्ष्मीर्दुष्टात्मनां त्वं प्रमदास्वरूपा॥ विद्यास्वरूपासि जगत्त्रये त्वं प्रभास्वरूपा शशिसूर्ययोस्त्वम्। य आश्रितास्ते जगदाश्रयास्ते विपत्तिलेशो न च तेषु मातः॥ त्वमेव विश्वेश्वरि विश्वमेतद्धरस्त्यथाप्यायसि वारिरूपा। अनादिमध्यानिधनाप्यगम्या हरीशलोकेशसुरेश्वराणाम्॥ तेऽनुग्रहात्त्वां प्रभजन्ति भक्ता आनन्दरूपा निवसन्ति नाके। अभक्तकामान् विनिहंसि रुष्टा त्वामेव मातः शरणं प्रपन्नः॥ धन्ये ममैते नयनेऽद्य विद्या जनुश्च माता पितृवंश एव। कुलं च धन्यं चरणौ त्वदीयौ दृष्टौ यतस्ते जगदम्बिके मया॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ९५।५-१३)
४९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [श्रीगणेशपुराण- जो विश्वकर्माद्वारा किये गये इस जगदम्बास्तोत्रका पाठ करता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त करता है। वह सर्वत्र विजय, पुष्टि, विद्या, आयु, सुख तथा कल्याणको प्राप्त करता है ॥ १५ ॥ शिवा बोलीं—हे विश्वकर्मा ! हे महान् बुद्धिसे सम्पन्न ! आप सब प्रकारसे ज्ञानवान् हैं। भगवान् शिवसे मैंने आपके विषयमें जो कुछ सुना था, वह सब आज मैंने आपमें प्रत्यक्ष विद्यमान देख लिया है ॥ १६ ॥ सिन्धु दैत्यके द्वारा पीड़ित सभी देवता कारागारमें पड़े हुए हैं। भगवान् शिवका धाम कैलास भी उसके द्वारा अधिगृहीत कर लिये जानेके कारण वे शिव भी यहाँ आ गये हैं। इस दण्डकारण्य नामक स्थानपर कोई भी आप्त पुरुष नहीं दिखायी देता। बहुत समयके अनन्तर आप भलीभाँति यहाँ दृष्टिपथमें आये हैं ॥ १७-१८॥ विश्वकर्मा बोले—हे जगन्माता ! यदि पुत्र माताके पास आता है, महान् भक्त यदि अपने अभीष्ट देवके दर्शनके लिये जाता है और हे शिवे ! विद्या ग्रहण करनेकी इच्छावाला यदि गुरुके पास जाता है तो इसमें क्या आश्चर्य है ! ॥ १९ ॥ हे माता ! मैंने आपके पुत्रकी परम अद्भुत महिमाका श्रवण किया है, आप दोनोंके दर्शनोंका अभिलाषी मैं आपके पुत्रका [भी] दर्शन करनेके लिये आया हूँ ॥ २० ॥ ब्रह्माजी बोले—जब वे विश्वकर्मा और माता पार्वती इस प्रकारसे परस्पर वार्तालाप कर रहे थे कि उसी समय वे विनायक वहाँ आ पहुँचे। धूलिधूसरित देहवाले उन गुणेशकी कान्ति असंख्य चन्द्रमाओंके सदृश थी ॥ २१ ॥ उनका मुखमण्डल अत्यन्त प्रसन्न था, वे बालकोंके समूहोंसे घिरे हुए थे। उन बालकोंके मध्य वे उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे मरुद्गणोंके मध्य इन्द्र सुशोभित होते हैं। उनका दर्शनकर विश्वकर्माने उन्हें प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर सामने खड़े हो गये। उन गिरिजापुत्रको परमात्मा जानकर वे उनकी स्तुति करने लगे ॥ २२-२३ ॥ विश्वकर्मा बोले—[हे प्रभो !] आप सत्-चित् तथा आनन्दमय विग्रहवाले हैं, समस्त चर और अचर जगत्के गुरु हैं और सभी कारणोंके भी कारण परमात्मा हैं। आप गुणेश नामसे प्रसिद्ध हैं, गुणातीत हैं, सृष्टि, स्थिति तथा संहारके कारणस्वरूप हैं, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं, ईशान हैं तथा व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूपवाले हैं। आप सभी देवताओंके लिये अगम्य हैं, मुनिजनोंके हृदयकमलमें निवास करनेवाले हैं, सिद्धि तथा बुद्धिके स्वामी हैं, विविध भक्तोंको सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं, सर्वसमर्थ हैं, अभक्तोंकी कामनाओंका दमन करनेवाले हैं आपकी प्रभा हजारों सूर्योंके समान उज्ज्वल है, आप अनेक प्रकारकी शक्तियोंसे समन्वित हैं, और दैत्यों तथा दानवोंका मर्दन करनेवाले हैं। आप अनादि, अव्यय, शान्त, जरा-मरणसे रहित, ब्रह्मा-विष्णु तथा शिव—इस प्रकारसे त्रिविध विग्रह धारण करनेवाले और वेदत्रयीके मूलरूप हैं, आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २४-२८॥ ब्रह्माजी बोले—विश्वकर्माद्वारा की गयी इस प्रकारकी स्तुतिको सुनकर वे गुणेश्वर अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये, उन्होंने उन विश्वकर्माको उत्तम आसनपर बैठाकर बड़े ही आदरभावसे उनकी पूजा की। उन्होंने उनके चरणोंको प्रक्षालित करके उन्हें गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य निवेदित करके उनसे कहा ॥ २९-३० ॥ गुणेश बोले—हे विश्वकर्मा ! आप मेरे दर्शनकी अभिलाषासे यहाँ आये हैं तो बताइये कि आप मेरी प्रसन्नताके लिये कौन-सा श्रेष्ठ उपहार मेरे लिये लाये हैं ? ॥ ३१ ॥ विश्वकर्मा बोले—जो स्वात्मानन्दसे परिपूर्ण हैं, दूसरेकी अभिलाषाको पूर्ण करनेवाले हैं, सब प्रकारसे इच्छारहित हैं, सब कुछ करनेवाले हैं, सभी प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न है, मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा सोनेमें समान बुद्धि रखनेवाले हैं, कल्पवृक्षको भी तिरस्कृत कर देनेवाले हैं, कर्तुम्, अकर्तुम् तथा अन्यथाकर्तुम् समर्थ हैं, आत्माधीन हैं, सब प्रकारसे सन्तुष्ट हैं और स्वेच्छाशक्तिसे विचरण करनेवाले हैं, ऐसे आप- जैसे दिव्य महापुरुषोंके सन्तोषके लिये भला सब प्रकारसे पराधीन, सब प्रकारके सामर्थ्यसे रहित, सर्वथा
क्री०ख०-अ०१५ ] * गुणेशके छठे वर्षमें विश्वकर्माका उनके दर्शनहेतु पार्वतीके पास आना * ४९७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अकिंचन मुझ-जैसे मृत्युधर्मा प्राणीके द्वारा क्या देनेयोग्य हो सकता है, फिर भी मैं अपने सामर्थ्यके अनुसार कुछ लाया हूँ॥ ३२-३४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहनेके अनन्तर विश्वकर्माने उनके समक्ष सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला एवं तीक्ष्ण धारवाला अंकुश, पद्म, हजारों सूर्योंके समान प्रभाववाला परशु तथा पाश नामक शस्त्र रखा। गुणेश्वरने उन शस्त्रोंको ग्रहण किया॥ ३५-३६॥ तब गुणेश्वरने विश्वकर्मासे कहा—हे अनघ! हे विश्वकी संरचना करनेवाले! आप इन शस्त्रोंको कहाँसे लाये हैं, अब मेरी प्रसन्नताके लिये यह मुझे बतायें॥ ३७॥ विश्वकर्मा बोले—'संज्ञा' नामसे प्रसिद्ध मेरी एक कन्या है, वह सुन्दर रूपसे सम्पन्न है, उसके मुखको देखकर चन्द्रमा भी एकाएक लज्जित हो गये थे। हे गुणेश्वर! लक्ष्मी, इन्द्रपत्नी शची, सावित्री, शारदा, अरुन्धती अथवा कामदेवकी पत्नी रति और तीनों लोकोंमें भी कोई स्त्री ऐसी नहीं है, जो उसके समान सुन्दर हो॥ ३८-३९॥ उसे मैंने स्वयं ही वेदत्रयीस्वरूप तथा त्रिदेवस्वरूप भगवान् सूर्यको पत्नीरूपमें समर्पित किया था। उस विवाहमें सांगोपांग अर्थात् वाहन, परिवारादिके साथ त्रिलोकीके सभी निवासी आये थे॥ ४०॥ वह महान् विवाह-महोत्सव आठ दिन-राततक निरन्तर चलता रहा। उस संज्ञाको देखकर क्षुभित हुए देवता लज्जासे अधोमुख हो वहाँसे चले गये थे॥ ४१॥ तदनन्तर भगवान् सविता उस संज्ञाको साथ लेकर अपने श्रेष्ठ स्थानको चले गये। उन भगवान् सूर्यके तेजसे संतप्त होकर मेरी कन्या संज्ञा अत्यन्त दुर्बल हो गयी। तदनन्तर उस संज्ञाने अपने सामर्थ्यके प्रभावसे अपनी छायाके रूपमें अपने ही समान छाया नामक एक स्त्रीकी संरचना की। फिर उसे सब कुछ समर्पितकर वह शीघ्र ही मेरे घरको आ गयी॥ ४२-४३॥ इसी प्रकारसे जब कुछ समय व्यतीत हो गया तो सूर्यने छायाकी वास्तविकताको जान लिया। 'यह संज्ञा नहीं है'—ऐसा जानकर वे सूर्य शीघ्र ही मेरे घर चले आये। तदनन्तर भयभीत संज्ञाने पुनः मुझसे कहा—हे पिता! मुझे सूर्यके हाथ न सौंपें, मैं इनके तेजको सहन करनेमें असमर्थ हूँ॥ ४४-४५॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर पिता विश्वकर्माके द्वारा धिक्कारे जानेपर वह घरसे बाहर चली गयी। वह संज्ञा अश्विनी(घोड़ी)-का रूप धारणकर गुप्त रूपसे वनमें रहने लगी॥ ४६॥ इसके पश्चात् विश्वकर्माने उस संज्ञाको घरमें कहीं भी न देखकर सूर्यसे कहा—वह संज्ञा आपके तेजको सहन करनेमें समर्थ नहीं है। वह कहाँ चली गयी, यह मैं भी नहीं जानता, किंतु उसकी प्राप्तिका उपाय मैं बताता हूँ, यदि आपके तेजका कुछ भाग कम हो जाय, तो वह संज्ञा प्रकट हो जायगी और तब आप उसके साथ विहार करें॥ ४७-४८१/२ ॥ सूर्य बोले—यदि आपका मन इस प्रकार करनेका है तो आप वैसा ही करें॥ ४९॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर विश्वकर्माने उन सूर्यको यन्त्रमें स्थापितकर उन्हें कुछ छील दिया और शीघ्र ही उनके तेजको कम कर दिया, जिससे वे कुछ सौम्य- स्वरूपवाले हो गये॥ ५०॥ तब विभु सूर्य वहाँ गये, जहाँपर संज्ञा गुप्तरूपसे निवास कर रही थी। भगवान् सूर्यने अश्वका रूप धारणकर अश्विनी बनी हुई उस संज्ञाके साथ रमण किया। तब संज्ञाने नासत्य अथवा दस्र कहे जानेवाले दो अश्विनी- कुमारोंको जन्म दिया। तदनन्तर संज्ञाको लेकर भगवान् सूर्य बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने लोकको गये॥ ५१ १/२ ॥ विश्वकर्मा बोले—हे गुणेश्वर! हे जगदीश्वर! भगवान् सूर्यके तेजका जो भाग छीलनेपर शेष रह गया था, उस अत्यन्त प्रबल तेजसे मैंने अत्यन्त शीघ्र ही आपके लिये आयुधोंका निर्माण किया, ये आयुध अत्यन्त तीक्ष्ण और कालपर भी सदा विजय दिलानेवाले हैं॥ ५२-५३॥ मैंने ये चार आयुध आपको प्रदान किये हैं, चक्र तथा गदा भगवान् विष्णुको दी है और सभी शत्रुओंका विनाश
४९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
करनेवाला त्रिशूल भगवान् शिवको प्रदान किया है ॥ ५४ ॥ गुणेश बोले—हे विश्वकर्मा! आपने बहुत अच्छा किया, जो मुझे ये शुभ आयुध प्रदान किये हैं, ये आयुध दैत्योंका नाश करनेके लिये तथा सज्जनोंके परोपकारके लिये उपयोगी सिद्ध होंगे ॥ ५५ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर उन विश्वकर्मासे उन्होंने शीघ्र ही उन आयुधोंको ग्रहण किया और उनके प्रयोगकी परीक्षा की, जिससे सम्पूर्ण पृथ्वी, पर्वत तथा वन काँप उठे। वे विभु गुणेश्वर करोड़ों सूर्योंकी कान्तिके सदृश उन शस्त्रोंसे अत्यन्त शोभाको प्राप्त हुए। तदनन्तर वे विश्वकर्मा उनकी आज्ञा लेकर और उन्हें प्रणामकर अपने स्थानको चले गये ॥ ५६-५७ ॥ वे उमाके पुत्र बालक गुणेश बालकोंसे घिरे रहकर पुनः उनके साथ क्रीड़ा करने लगे, उसी समय वहाँ एक अत्यन्त दुष्ट महादैत्य आ पहुँचा, उसका नाम था वृक। उसका मुख बड़ा ही भयंकर था, वह मदोन्मत्त, महान् बलशाली वृक मानो सबको निगलता जा रहा था। वह अपनी पूँछके आघातसे पृथ्वीको प्रकम्पित कर रहा था। उसके दाँत हलके समान बड़े तथा अत्यन्त नुकीले थे ॥ ५८-५९ ॥ उस भयंकर दैत्यको देखकर मुनिबालक भाग उठे। गुणेशने शीघ्र ही आयुधोंको ग्रहणकर उस वृकासुरको प्रताड़ित किया ॥ ६० ॥ वह दैत्य असुर अंकुशके एक ही प्रहारमात्रसे भूमिपर गिर पड़ा। वह अपने मुखसे रक्त उगल रहा था। उसने अपना असली दैत्यका रूप धारण कर लिया, गिरते समय वह वृक्षोंको चूर-चूर करता हुआ तथा अनेक जीवोंको मारता हुआ दस योजन विस्तारवाला हो गया था। तदनन्तर सूर्यास्त हो जानेके अनन्तर वे गुणेश्वर बालकोंके साथ घरको चले आये ॥ ६१-६२ ॥ उन बालकोंने देवी उमाको बताया कि आज इस गुणेशने वृक नामक असुरको अपने अंकुशके आघातसे मार डाला। वह असुर दस योजन विस्तृत शरीरवाला था। तब गिरिकन्या पार्वतीने क्रुद्ध-सी होकर उन बालकोंसे कहा—तुम लोग अपने-अपने घरोंको जाओ। पार्वतीका यह वाक्य सुनकर वे सभी बालक हँसते हुए अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ६३-६४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'वृकासुर-वधवर्णन' नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९५ ॥
छियानबेवाँ अध्याय सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न होना, यज्ञोपवीत-महोत्सवका वर्णन, उसी अन्तरालमें वहाँ आये कृतान्त तथा काल नामक दैत्योंका वध करना, महर्षि कश्यप तथा अदितिद्वारा गुणेश्वरका पूजन, देवताओंद्धारा बालक गुणेश्वरकी महिमाका प्रतिपादन
ब्रह्माजी बोले—एक दिनकी बात है, देवी पार्वती प्रसन्न भगवान् शिवसे बोलीं ॥ १/२ ॥ शिवा बोलीं—हे देवेश्वर! इस समय बालक गुणेशका सातवाँ वर्ष प्रारम्भ हो गया है, अतः किसी शुभ मुहूर्तमें बड़े ही समारोहके साथ गुणेशका उपनयन-संस्कार सम्पन्न करना चाहिये ॥ १ १/२ ॥ शिव बोले—हे भद्रे! तुमने मेरे मनकी बात जानकर बहुत अच्छी बात कही है। अब मैं इस बालकका यज्ञोपवीत-संस्कार यथोचित विधि-विधानके साथ कराऊँगा ॥ २ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—देवी पार्वतीसे इस प्रकार कहकर भगवान् शिवने महर्षि गौतमको बुलवाया और शुभ दिनमें लग्नका विचार करके संस्कारकी सामग्रीको एकत्र किया। अत्यन्त विस्तृत लग्नमण्डप तैयार किया गया, सभी ऋषियों तथा मुनियोंको आमन्त्रितकर और उन सभीका पूजनकर तथा उनकी अनुमति प्राप्तकर भगवान् शिवने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक बालक गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न किया ॥ ३–५ ॥
क्री०खं०-अ०१६ ] * सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न होना * ४९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
उन सभी ऋषि-मुनियोंने भगवान् शिव, देवी पार्वती तथा बालक गुणेशको अनेक प्रकारके उपहार प्रदान किये। भगवान् शिवने उन अठासी हजार ऋषि- मुनियोंको नमस्कार करके उनका यथाविधि पूजन किया और उन्हें विविध प्रकारकी भेंट प्रदान की॥ ६१/२ ॥ उसी प्रकार उन्होंने तैंतीस करोड़ देवताओं, यक्षों, किन्नरों तथा चारणोंको भी उपहार प्रदान किये। उस समय विविध वाद्योंकी ध्वनि हो रही थी, किन्नरगण गान कर रहे थे, नर्तकियोंके समूह तीव्रगतिसे नृत्य कर रहे थे और सभी लोग उस मांगलिक महोत्सवका अवलोकन कर रहे थे। ऐसे समयमें भगवान् शिवने बड़ी ही प्रसन्नताके साथ सभीको विविध उपहार तथा दान दिये ॥ ७-९॥ उन्होंने देवताओंकी स्थापना करके सभीको भोजन कराया। प्रातःकाल बटुक गुणेशको स्नान करानेके अनन्तर उनका चूडाकरण-संस्कार कराया और चार ब्राह्मणोंके साथ बटुकको भी भोजन कराकर पुनः उन्हें स्नान कराया॥ १०१/२॥ बनायी गयी वेदी तथा बटुकके मध्य उत्तम वस्त्रकी ओट लगाकर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करनेवाले मुनिजनोंके साथ उपनयनका मुहूर्त शोधित करके [भगवान् शिव] मुहूर्तके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे॥ १११/२ ॥ इसी समय वहाँ कृतान्त तथा काल नामवाले दो दैत्य आ पहुँचे। वे उन्मत्त हाथीका रूप धारण किये हुए थे, उनके गण्डस्थलसे मदरूपी जल प्रवाहित हो रहा था, वे बड़े ही सुदृढ़ शरीरवाले थे, उनके दाँत अत्यन्त तीक्ष्ण थे, उनकी लम्बायमान सूँडें आकाशसे स्पर्धा कर रही थीं। वे दोनों अपनी चिंघाड़ ध्वनिसे लोगोंको भयभीत कर रहे थे, उन दोनोंके मस्तक सिन्दूरके समान अरुण वर्णके थे, उनके पैरोंके प्रहारसे पृथ्वी तीव्र गतिसे काँप रही थी ॥ १२-१४॥ युद्ध करते हुए वे दोनों एक-दूसरेपर अपने दाँतोंसे प्रहार कर रहे थे। जिसके कारण उठी धूलसे पृथ्वी तथा आकाशका मध्य भाग ढक गया था। वे दोनों हाथी
[दायाँ स्तम्भ]
सभामण्डपके द्वारदेशमें स्थित इन्द्रके हाथी ऐरावतके समीप आ गये ॥ १५ ॥ उन्होंने अपने दाँतोंके प्रहारोंसे उस ऐरावत हाथीके अत्यन्त सुदृढ़ गण्डस्थलको भेद डाला। फलतः वह गजेन्द्र ऐरावत रक्त बहाने लगा और क्षणभरमें ही मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा ॥ १६ ॥ फिर एक मुहूर्तके बाद चेतना प्राप्तकर वह ऐरावत शीघ्र ही वहाँसे पलायित हो गया। उसके पीछे-पीछे दौड़ते हुए उन दोनों हाथियोंने अपने दाँतोंके आघातसे पुनः उसपर प्रहार किया ॥ १७ ॥ तदनन्तर वे दोनों उन्मत्त हाथी सभाके मध्यमें आ गये। उस समय उन्होंने अपनी सूँड़ोंके द्वारा उस सभा- मण्डपको उखाड़ डाला ॥ १८ ॥ वहाँ स्थित सभी लोग उन दोनों हाथियोंके कोलाहलको सुनकर उठ खड़े हुए, वे दोनों हाथी जिधर-जिधर जाते थे, वहाँ-वहाँसे देवता पलायित हो जाते थे ॥ १९ ॥ उन दोनों हाथियोंसे भयभीत होकर मुनिगण दसों दिशाओंमें भाग चले। तदनन्तर शिवगणोंने वहाँ जाकर भगवान् शिवको यह समाचार दिया कि एक विघ्न उपस्थित हो गया है॥ २० ॥ गण बोले— उन दोनों हाथियोंके भयसे भयभीत होकर इन्द्र तथा मुनियोंसहित सारी सभा भंग हो गयी है। पार्वतीजी भी अपनी सखियोंके साथ वहाँसे पलायित होकर घर आ गयीं ॥ २१ ॥ तदनन्तर बालक गुणेशने उन दोनों अत्यन्त बलशाली दैत्यरूपी हाथियोंको देखकर मेघके समान गर्जना की और शीघ्र अपने दोनों हाथोंसे उन दोनोंकी सूँड पकड़ ली। इससे वे दोनों जोरसे चिंघाड़ने लगे। गुणेशने उन दोनोंको घुमाकर एक हाथीको दूसरे हाथीके ऊपर पटक दिया ॥ २२-२३ ॥ उन दोनोंके सैकड़ों टुकड़े हो गये और वे दोनों जमीनपर गिर पड़े। उनके गिरनेसे भूमि काँप उठी और वृक्ष चूर-चूर होकर धराशायी हो गये ॥ २४ ॥
५०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] तदनन्तर गणोंने उन दोनोंके शरीरके टुकड़ोंको शीघ्र ही ले जाकर दूर फेंक दिया। उस समय माता पार्वती त्वरापूर्वक वहाँ आ पहुँचीं और उन्होंने बालकको अपनी गोदमें ले लिया ॥ २५ ॥ पार्वतीजीकी सखीने उन्हें बतलाया कि उन गजरूपी दैत्योंसे भयभीत होकर सभी देवता और मुनिगण पलायित हो गये। इस बालकने शीघ्र ही उन दोनों दानवोंको मार डाला ॥ २६ ॥ इसके पश्चात् इन्द्र आदि सभी देवताओं तथा मुनियोंने उन गुणेशसे कहा—हे स्वामिन् ! हे सभी गुणोंके निधान! आपने कपटपूर्वक हाथीका स्वरूप धारण किये हुए उन दैत्योंको अपनी लीलाद्वारा मार डाला। हे देव! वे दोनों दैत्य सभीका प्राण हरनेवाले, बड़े ही मायावी और अत्यन्त बलवान् थे ॥ २७-२८ ॥ ऐसा कहकर देवराज इन्द्रसहित सभी देवताओं और मुनिगणोंने सभामें प्रवेश किया। सभी जनोंके अपने-अपने स्थानपर बैठ जानेके अनन्तर अप्सरागणोंने नृत्य करना प्रारम्भ किया ॥ २९ ॥ विविध प्रकारके वाद्य बजने लगे। पितामह ब्रह्मा रुद्रके समीपमें गये और उनके साथ मन्त्रणा करके उन्होंने शिशु गुणेशकी कमरमें मेखला बाँधी ॥ ३० ॥ तदनन्तर बटुक गुणेशको यज्ञोपवीत धारण कराकर मृगचर्म पहनाया और होम करके [बटुकसे] अग्निमें समिधाकाष्ठ प्रदान करवाया। उसके पश्चात् विधि- विधानके साथ गायत्रीमन्त्रका वाचन करवाया ॥ ३१ ॥ तदनन्तर माता पार्वती ने भिक्षाके रूपमें बटुक गुणेशको दो वस्त्र, आभूषण, उत्तरीय वस्त्र, मोतियोंके साथ अनेक रत्न और लड्डू आदि खाद्य पदार्थ प्रदान किये। भगवान् शिवने बटुक गुणेशको त्रिशूल तथा चन्द्रमा प्रदान किया और उनके भालचन्द्र तथा शूलपाणि— ये दो सार्थक नाम रखे। तदनन्तर भगवान् विष्णुने उन्हें चक्र दिया और उन महात्मा गुणेशका 'शोचिष्केश' यह श्रेष्ठ नाम रखा ॥ ३२-३४॥ इसके पश्चात् पुरन्दर इन्द्रने उन बटुक गुणेशका
[दायाँ स्तम्भ] पूजन करके चिन्तामणि नामक मणि उनके कण्ठमें बाँधी और सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा मंगलदायक 'चिन्तामणि' यह उनका नाम रखा ॥ ३५ ॥ उसी समय कमलके आसनपर विराजमान रहनेवाले, ब्रह्माजीने उन गुणेशका पूजन करके उन्हें कमल प्रदान किया और उस भरी सभामें 'विधाता' यह नाम उनका रखा। तदनन्तर अन्य सभी देवताओंने उन गुणेश्वरका भलीभाँति पूजन किया और उन्होंने अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार उनके विविध नाम रखे ॥ ३६-३७ ॥ इसके पश्चात् देवी अदिति और महर्षि कश्यपने आदरपूर्वक उनका पूजन किया और देव गुणेश्वरने उन्हें अपने पहलेके शुभ स्वरूपका दर्शन कराया ॥ ३८ ॥ उस समय वे अपने मस्तकपर चन्द्रमाको विराजमान किये हुए थे, उनकी दस भुजाएँ थीं, वे मुकुटसे सुशोभित हो रहे थे, वे दिव्य वस्त्रों, दिव्य सुगन्धित विलेपन तथा दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ ३९ ॥ वे सिंहपर विराजमान थे, उन्होंने नागराजको अपनी करधनीके रूपमें बाँधा हुआ था। इस प्रकारके स्वरूपका दर्शन करके अदितिने उनका आलिंगन किया और वे अत्यन्त स्नेहानन्दमें निमग्न हो गयीं ॥ ४० ॥ उनके शरीरमें रोमांच हो आया। अत्यधिक प्रेमके कारण उनके कण्ठसे स्पष्ट शब्द नहीं निकल पा रहे थे, वे अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं और उनकी आँखोंसे निकलनेवाली अश्रुधारासे उनकी दृष्टि धुँधली-सी हो गयी। वे देवी अदिति परम आनन्दमें निमग्न हो गयीं। स्नेहके कारण उनके स्तनोंसे दुग्ध निकलने लगा। अदितिके समान ही महर्षि कश्यपको भी तत्क्षण ही देहका भान नहीं रहा ॥ ४१-४२ ॥ तदनन्तर उन दोनों कश्यप तथा अदितिने स्नेहके वशीभूत हो उनसे कहा—हे वत्स ! तुम्हारे वियोगमें हम दोनों अत्यन्त दुर्बल हो गये थे, किंतु अब इस समय तुम्हारे दर्शनसे हम पुनः पुष्ट शरीरवाले हो गये हैं। हे
क्री०ख०-अ०९६ ] * सातवें वर्षमें गुणेशका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न होना * ५०१ पुत्र ! तुम हम दोनोंका परित्याग मत करो, हम दोनोंका तुम्हारे चरणोंमें अत्यन्त अनुराग है ॥ ४३ १/२ ॥ गजानन बोले- हे माता! मैंने एक बार आपको दर्शन देनेकी प्रतिज्ञा की थी, वह प्रतिज्ञा मैंने इस समय पूर्ण कर ली है, अतः अब आपको शोक नहीं करना चाहिये। मैं सभीके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विद्यमान रहता हूँ, अतः आपका और मेरा [वस्तुतः] कभी वियोग नहीं हो सकता ॥ ४४-४५ ॥ ब्रह्माजी बोले-जब वे इस प्रकार वार्ता कर ही रहे थे कि उसी बीच देवी पार्वती वहाँ आ पहुँचीं। उन दोनों कश्यप एवं अदितिका अपने बालक गुणेशपर उस प्रकारका स्नेह देखकर वे बड़े ही प्रेमपूर्वक बोलीं ॥ ४६ ॥ पार्वती बोलीं- हे अदिति! आप अब मेरा पुत्र मुझे दे दीजिये, इसे आपने बहुत देरसे पकड़ रखा है। हे पवित्र मुसकानवाली! हे सुन्दर भौंहोंवाली देवी अदिति! यह आपका पुत्र नहीं है, इसे आप ठीकसे देख लें। जब उन्होंने पुनः देखा तो उन विभु विनायकको अपने पुत्रके रूपमें ही पाया ॥ ४७ १/२ ॥ अदिति बोलीं- हे गौरी! स्वयं आप भी शीघ्र ही आगे आकर इस मेरे पुत्रको भलीभाँति देख लें ॥ ४८ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब गौरीने पुनः उन्हें अपने पुत्र गुणेशके रूपमें ही देखा। अदिति उन्हें अपना पुत्र बतलाने लगीं और पार्वती कहने लगीं कि यह मेरा पुत्र है ॥ ४९ ॥ जब उन दोनों अदिति एवं पार्वतीमें इस प्रकारका वाद-विवाद होने लगा, तो अत्यन्त विस्मित होकर देवता कहने लगे-जो देव आदि और अन्तसे रहित हैं, सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले हैं, अनन्त स्वरूपोंवाले हैं, अनन्त श्रीसे सम्पन्न हैं और अनेक प्रकारकी शक्तियोंसे समन्वित हैं, भला वे किसके पुत्र हो सकते हैं! दोनों ही देवियाँ इन गुणेश्वरकी मायासे भ्रान्त हो रही हैं ॥ ५०-५१ ॥ वे देवता बोले-जिसके ये पुत्र हैं, उसीके हाथमें इनको समर्पित किया जाय ॥ ५१ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उन विविध स्वरूप धारण करनेवाले परमेश्वर गुणेशकी ओर देखकर कुछ देवता कहने लगे कि ये विधाता ब्रह्मा हैं, कुछ कहने लगे कि ये चार भुजाधारी भगवान् विष्णु हैं, कुछ देवता कहने लगे कि ये तीन नेत्रोंवाले भगवान् शंकर हैं और कुछ देवता उन्हें वरुणदेव तथा कुछ उनको अग्निदेव बताने लगे ॥ ५२-५३ ॥ कुछ देवताओेंने उन्हें कामदेव, तो किन्होंने भूतलपर समागत सूर्य माना। कुछ देवगण उन्हें गन्धर्व, किन्नर, कुबेर तथा शेषनागके रूपमें देख रहे थे। इस प्रकार विविध रूपवाले उन गुणेशको देखकर देवगण विस्मित हो उठे ॥ ५४ ॥ तब वे देवता कहने लगे कि ये कौन हैं, इसका निश्चय करनेमें हम समर्थ नहीं हैं। आप दोनों अपनी विवेकशक्तिसे निश्चयकर इन परमपुरुषको स्वयं ही ग्रहण कर लें ॥ ५५ ॥ तदनन्तर गौरी पार्वतीने उन प्रभु अपने पुत्र गुणेशको शीघ्र ही पकड़ लिया और स्नेहपूर्वक उन्हें अपना स्तनपान कराया। यह देखकर देवी अदिति उदास हो गयीं ॥ ५६ ॥ वे कहने लगीं कि यदि ये मेरे पुत्र होते तो फिर दूसरी स्त्रीके पास क्यों जाते, मैं भ्रमित होनेके कारण दूसरेके पुत्रपर व्यर्थ ही आसक्त हुई हूँ ॥ ५७ ॥ तदनन्तर मुनिजनों और महर्षि कश्यपने उन गुणेश्वरका पूजन किया। उन्हें नमस्कारकर और उनसे आज्ञा लेकर वे सभी अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ५८ ॥ इधर देवी भवानी पार्वती भी पुत्रको लेकर हर्षित होती हुई अपने भवनमें चली आयीं। इसके पश्चात् वहाँ आये हुए अन्य सभी लोग भी अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गौरी और अदितिका विवाद' नामक छियानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९६ ॥
सत्तानबेवाँ अध्याय
५०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सत्तानबेवाँ अध्याय माता कद्रूका अपने पुत्र शेषनागके पास पातालमें जाना और विनता तथा गरुड़द्वारा हुए अपने अपमानका बदला लेनेके लिये कहना, वासुकि आदि नागों तथा गरुड़ आदि पक्षियोंका घनघोर युद्ध, नागोंद्वारा विनता और उनके पुत्रोंको बन्धनमें डालना, विनताद्वारा मुनि कश्यपको अपना दुःख निवेदित करना और कश्यपद्वारा उसे एक अभेद्य अण्डकी उत्पत्तिका आश्वासन देना मुनि व्यास बोले—[हे ब्रह्मन् !] पहले आपने मयूरेश्वर नामवाले देव विनायककी, तदनन्तर गुणेश नामसे प्रसिद्ध उन विनायककी महिमा बतायी है ॥ १ ॥ हे विश्वकी सृष्टि करनेवाले विभो ! अब यह भी मुझे बतानेकी कृपा करें कि उन विनायकने मयूरेश्वर नाम कैसे प्राप्त किया और उन्होंने कौन-सा महान् कार्य किया था ? ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे मुनिवर व्यासजी !] उन विनायकदेवने जिस प्रकार महान् कार्य किया और जैसे उन्होंने 'मयूरेश्वर' यह नाम प्राप्त किया, वह सब मैं आपको बतलाऊँगा ॥ ३ ॥ एक बारकी बात है, पातालभवनमें शेषनाग अपनी अत्यन्त तेजोमयी और सुन्दर रूपवाली थीं। उन्होंने मुक्तामणयोंसे जटिल अत्यन्त सुन्दर और शुभ उत्तरीय वस्त्र धारण किया हुआ था ॥ ५ ॥ उनके ओष्ठ विम्बाफलके समान लालवर्णके थे, उनका मुख चन्द्रमाके समान उज्ज्वल था और वे दिव्य वस्त्र एवं आभूषणोंको धारण किये हुई थीं। उन माताका दर्शन करके शेषनाग तथा वासुकि आदि जो प्रधान नाग थे, उन्होंने माताको प्रणाम किया और कहा—हे माता ! बहुत दिनोंके बाद आपका दर्शन प्राप्त हुआ है, यहाँ सभी नाग आपका निरन्तर दर्शन करना चाहते हैं, किंतु आप अत्यन्त निष्ठुर हो गयी हैं ॥ ६-७ ॥ ऐसा कह करके उन्होंने माताका हाथ पकड़ा और उन्हें पिताके लिये बनाये गये आसनपर बैठाया। अत्यन्त भक्तिभावके साथ उनका पूजन किया, तदनन्तर शेषनाग उनसे बोले ॥ ८ ॥ शेष बोले—हे माता ! आप तो उन महर्षि कश्यपकी अत्यन्त सुन्दर एवं पतिपरायणा पत्नी हैं, जो सभी विद्याओंके निधान हैं, सृष्टि-स्थिति तथा संहार करनेवाले हैं और जिनके वास्तविक स्वरूपको ब्रह्मा आदि देवता भी जाननेमें समर्थ नहीं हैं। आप भी उन्हींके समान सहसा ही शाप देने तथा कृपा करनेमें समर्थ हैं ॥ ९-१० ॥ हे माता! हम सभी आपके पुत्र हैं, जो तीनों लोकोंको ग्रास बनानेका साहस रखते हैं, फिर आप किस उद्देश्यको लेकर यहाँ चली आयी हैं ? ॥ ११ ॥ कद्रू बोलीं—हे पुत्र ! बिना प्रयोजनके कोई भी किसीके पास नहीं आता। हे आत्मज ! मैं अपने आनेका प्रयोजन बताऊँगी, तुम आदरभावसे उसका सभाके मध्यमें विराजमान थे, उस समय वे चारों ओरसे वासुकि आदि सर्पोंसे घिरे हुए थे ॥ ४ ॥ उसी समय वहाँ नागमाता कद्रू उपस्थित हुईं, वे
क्री०ख०-अ०१७] * माता कद्रूका अपने पुत्र शेषनागके पास पातालमें जाना * ५०३ श्रवण करो। हे पुत्र! विनता मेरी सौत है, जो पक्षियोंकी माता है। एक बारकी बात है कि मुझे उसे देखनेकी इच्छा हुई॥ १२-१३॥ मैं एकाएक उसके घर गयी तो उसने मेरा अपमान किया। उसने न तो मुझे बैठनेके लिये आसन दिया, और न ही कोई स्वागत-सत्कार किया॥ १४॥ पूर्व समयके वैरका स्मरण करते हुए उसने अपने पुत्र जटायुको आदेश दिया। तदनुसार जटायुने मेरी बालोंकी गूँथी हुई चोटीको खींचा और मुझे क्षणभरमें ही वस्त्ररहित कर डाला॥ १५॥ वह मुझसे बोला, अरी महादुष्टे! तुम्हारा मुख देखनेयोग्य नहीं है। पूर्वकालमें तुमने मेरी माताको अपनी दासी बनाया था, तब उस समय तुम्हारे मनमें लेशमात्र भी करुणा नहीं आयी, अरी महादुष्टे! तुम यहाँसे चली जाओ, नहीं तो मैं तुम्हारे प्राण ले लूँगा॥ १६-१७॥ हे फणीश्वर! मैं उस जटायुके वचनोंको सुनकर अत्यन्त दुखी हुई। मैंने तब अत्यन्त विलाप किया और प्राणोंका त्याग करनेका निश्चय कर लिया॥ १८॥ अत्यन्त दुखी होनेके कारण ही मैं तुम लोगोंको देखने तुम्हारे पास आयी हूँ, यदि तुम लोगोंकी मुझमें भक्ति है तो मेरी सहायता करो॥ १९॥ हे श्रेष्ठ पुत्रो! यदि तुम लोग मुझे मानते हो तो मेरी उस सपत्नी विनताका वध कर डालो, तभी मेरे हृदयमें सुख होगा॥ २०॥ ब्रह्माजी बोले—माता कद्रूके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर शेषनाग सहसा वैसे ही रोषसमन्वित हो प्रज्वलित हो उठे, जैसे कि अग्निमें घी पड़नेपर वह और भी अधिक प्रदीप्त हो उठती है। 'यदि विनताके पुत्रोंने मेरी माता कद्रूको पीड़ा पहुँचायी है, तो निश्चित ही मैं उसका बदला लूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है'॥ २१-२२॥ ऐसा कहकर उन शेषनागने वासुकि आदि प्रमुख नागोंके साथ वहाँ जानेका मन बनाया, जहाँ कि विनता रह रही थी॥ २३॥ वासुकि बोला—हे निष्पाप! करोड़ों नागोंको लेकर मैं वहाँ जाऊँगा और विनताको यहाँ ले आऊँगा। हे नागराज! आप यहाँपर स्थित रहिये॥ २४॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहनेके अनन्तर वासुकि नाग शीघ्र ही विनताके आश्रमकी ओर निकल पड़ा। असंख्य नागोंको देखकर उस समय विनता भयभीत हो उठी। उसी क्षण दुष्ट स्वभाववाले क्रूर सर्पोंने उसे चारों ओरसे लपेट लिया और वे उसे शेषनागके समीपमें ले गये। उस समय वह विनता उन नागोंसे बोली॥ २५-२६॥ विनता बोली—अरे पापिष्ठो! तुम लोग मुझे शीघ्र ही बतलाओ कि क्यों मुझे बन्धनमें डालकर ले जाना चाहते हो, मैंने तो कोई अपराध भी नहीं किया है? मेरे पुत्र गरुड़का स्वभाव तो सभी सर्पोंको विदित ही है, अतः मुझे छोड़ दो, यदि ऐसा नहीं करोगे तो मेरा वह पुत्र गरुड़ तुम्हारा संहार कर डालेगा॥ २७-२८॥ ब्रह्माजी बोले—उन सर्पोंकी धृष्टताको देखकर उसने गरुड़का स्मरण किया। वह गरुड़ भी 'माताके द्वारा मेरा स्मरण किया जा रहा है', यह जानकर पक्षियोंके साथ वहाँ चला आया॥ २९॥ गरुड़के साथ बाज पक्षी, सम्पाति तथा पक्षिश्रेष्ठ जटायु भी था, जिनके पंखोंकी हवासे तीनों लोक काँप उठे। इधर वे सभी सर्प भी विषकणोंका वमन करने लगे। उस समय नागराजों तथा पक्षियोंमें घनघोर युद्ध होने लगा॥ ३०-३१॥ तदनन्तर वे नाग जटायु, सम्पाति तथा बाज पक्षीको बन्धनमें डालकर ले गये। माताके द्वारा स्मरण किये जानेपर वह गरुड़ भी अपने पंखोंकी हवासे सम्पूर्ण जगत्को कँपाता हुआ तथा वृक्षों और पर्वतोंको गिराता हुआ वहाँ आ पहुँचा। उसकी गन्धको सूँघकर सभी सर्प भाग गये॥ ३२-३३॥ दूसरे सर्प गरुड़के पंखोंकी हवासे आकाशमें चक्कर काटने लगे। विनता सर्पोंके बन्धनसे मुक्त हो गयी और वह अपने स्थानपर जानेके लिये उत्सुक हो उठी। विनताको जानेके लिये उद्यत देखकर वासुकि नाग अत्यन्त क्रुद्ध हो गया और आकाशको दग्ध करता हुआ
५०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 विष उगलने लगा। यह देखकर गरुड़ने उसे अपने | बाजको बलपूर्वक ले जाकर पातालके एक विवरमें पंखोंके आघातसे जमीनपर पटक दिया॥ ३४-३५॥ | छिपाकर दृढ़तापूर्वक उस बिलको बन्द कर दिया उस समय स्वस्थ होकर विनता बड़े वेगसे अपने | है॥ ४४॥ श्रेष्ठ स्थानको निकल पड़ी। वासुकि नागका वैसा | हे मुने! उनके बिना मेरे प्राण निश्चित ही चले पराक्रम देखकर गरुडने सूक्ष्मरूप बना लिया और वह | जायेंगे। प्रभो! आप-जैसे स्वामीके होनेपर भी मैंने इतना विनताकी रक्षाके लिये गया, उसके जानेपर वासुकि नाग | दुःख प्राप्त किया है॥ ४५॥ अत्यन्त क्रुद्ध हो गया तथा उसने संसारको जलाते हुए | ब्रह्माजी बोले-प्रिया विनताके इस प्रकारके बहुत-सारा विष उगल डाला॥ ३६-३७॥ | वचनोंको सुनकर मुनि कश्यप उनसे बोले॥ ४५१/२ ॥ वह वासुकि नाग उन (जटायु आदि पक्षियों)- | मुनि बोले-हे कल्याणि! तुम चिन्ता मत करो, को बन्धनमें डालकर शीघ्र ही नागलोकको ले गया | तुम्हारा मानसिक सन्ताप दूर हो जायगा। मैं तुम्हें और उन्हें एक विवरमें छोड़ दिया। तदनन्तर उस | ऋतुदान प्रदान करूँगा, जिससे तुम्हें अन्य पुत्रकी प्राप्ति विवरके द्वारको ढककर वह माता कद्रूके पास चला | हो जायगी। अण्डके रूपमें उत्पन्न तुम्हारा वह गर्भ आया॥ ३८॥ | वज्रके द्वारा भी अभेद्य होगा, किंतु जब पार्वतीका पुत्र वासुकि नागने वह सारा वृत्तान्त माता कद्रू तथा | खेल-खेलमें उस अण्डेका भेदन कर डाले, तभी तुम्हें शेषनागको बताया। इधर विनता अपने उन पुत्रोंको | उस अण्डेमेंसे एक पुत्रकी प्राप्ति होगी॥ ४६-४७१/२ ॥ बाँधकर ले जानेका समाचार सुनकर अत्यन्त शोकमें पड़ | उसका कण्ठ नीले वर्णका होगा, वह बलवान् गयी॥ ३९॥ | होगा और दूसरे नीलकण्ठ भगवान् शिवके समान होगा। वे शीघ्र ही महर्षि कश्यपके पास गयीं और उन्हें | उसकी केवल शब्दध्वनिको सुनकर ही वे सभी सर्प प्रणामकर इस प्रकार कहने लगीं- यह एक ऐसी ही | पराजित हो जायेंगे और गुणेश भी उस नीलकण्ठ पक्षीपर विपरीत घटना हो गयी है, जो पश्चिमसे सूर्य उदय | सवार होकर पृथ्वीके भारका हरण करेंगे। तब तुम्हारे होनेके समान है॥ ४०॥ | पुत्र भी नागोंके बन्धनसे मुक्त हो जायेंगे। ऐसा कहनेके मैं घरमें स्थित थी, किंतु एकाएक ही शत्रु | अनन्तर एकान्तमें ले जाकर मुनि कश्यपने विनताको वासुकि नागने मेरा हरण कर लिया। मुझे छुड़ानेके | ऋतुदान दिया॥ ४८-५०॥ लिये बाज, जटायु और सम्पाति मेरे पीछे-पीछे आये। | इसके पश्चात् वह विनता प्राणियोंसे रहित एक उन्होंने अपने बल-पराक्रमसे उन सर्प-समूहोंको मारा, | काननमें चली गयी और यथासमय उसने एक अण्डको परंतु हे मुने! बहुत-से सर्पोंके द्वारा शीघ्र ही उन | उत्पन्न किया, जो वज्र तथा पर्वतोंके प्रहारसे भी बाज, जटायु तथा सम्पातिको पराजित कर दिये जानेपर | अभेद्य था॥ ५१॥ मैंने गरुड़का स्मरण किया। गरुड़ने वहाँ अणु (के | विनताने वृक्षके पत्तों तथा छालसे लपेटकर उस समान सूक्ष्म)-रूपमें आकर उन सभी सर्पगणोंको जीतकर | अण्डेको एक मिट्टीके पात्रमें छिपा दिया और वह उस मुझे उनके बन्धनसे मुक्त किया और वह स्वयं भी मेरे | पात्रके ऊपर उसी प्रकार बैठ गयी, जिस प्रकार कि साथ वापस आया॥ ४१-४३॥ | भूमिमें गाड़े हुए द्रव्यके ऊपर कोई अत्यन्त बलवान् सर्प तदनन्तर उस वासुकि नागने जटायु, सम्पाति तथा | बैठा रहता है॥ ५२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मयूरोपाख्यानमें अभेद्य अण्डकी उत्पत्तिका वर्णन' नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९७॥
अट्ठानबेवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०९८ ] * आठवें वर्षमें गुणेश्वरद्वारा विचित्र दैत्यका वध * ५०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अट्ठानबेवाँ अध्याय आठवें वर्षमें गुणेश्वरद्वारा विचित्र दैत्यका वध और विनताके गर्भसे उत्पन्न अण्डका भेदन, उसमेंसे मयूर नामक पक्षीका प्राकट्य, विनताद्वारा गुणेश्वरकी स्तुति, गुणेश्वरका मयूरको अपना वाहन बनाना और मयूरेश्वर नामसे प्रसिद्ध होना ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे जब गुणेश्वरका | पार्वतीके प्रमथ आदि गण, पार्वतीजी एवं उनकी सखियाँ- सातवाँ वर्ष व्यतीत हुआ और आठवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ, | ये सभी आनन्दमग्न हो गये थे। उस समय भगवान् तब वे गुणेश एक दिन उषाकालमें स्नान करनेके अनन्तर | शिवके मस्तकमें स्थित चन्द्रमा अमृत प्रवाहित करने गायत्रीमन्त्रका जप तथा चारों वेदोंका स्वाध्याय कर रहे | लगे। उस अमृतका संयोग होनेसे शिवजीके गलेमें स्थित थे। उन्होंने कस्तूरीका तिलक लगाया हुआ था, अनेक | रुण्डमालाके रुण्ड जीवित पुरुष हो गये थे। गुणेशके उस प्रकारके आभूषणोंसे वे भलीभाँति सुसज्जित थे। उन्होंने | वेदगानकी ध्वनिके श्रवणसे सभी किन्नर तथा गन्धर्व दिव्य वस्त्रोंको धारण किया हुआ था, वे दिव्य गन्ध | लज्जित हो गये थे ॥ ९-११ ॥ तथा दिव्य मालाओंसे विभूषित थे ॥ १-२ ॥ | उस समय जो स्त्रियाँ कामके उद्वेगसे सन्तप्त थीं, उसी समय तपस्वियोंके वे बालक उन गुणेश्वरके | वे शान्त हो गयी थीं और वे गुणेशकी आरती करने लगी पासमें आये, उन गुणेश्वरकी दीप्तिसे वे बालक उसी | थीं। उसी समय वहाँ एकाएक एक दैत्य आ पहुँचा, जो प्रकार कान्तिमान् हो गये, जैसे सूर्यकी दीप्तिसे बादल | बड़ी ही विचित्र आकृतिवाला था। उसकी आवाजसे उस प्रकाशित हो उठते हैं। उन मुनिबालकोंको देखकर | समय मन्दर आदि पर्वतोंकी गुफाएँ विदीर्ण हो गयी थीं, गुणेश्वरमें स्वतः ही उन बालकोंके साथ अध्ययन | वह दैत्य हलके समान दाँतोंवाला था, उसके नासाछिद्र करनेकी बुद्धि उत्पन्न हुई। उस समय विभु गुणेश्वरने उन | वापीके समान थे, वह तड़ागके समान नेत्रोंवाला था और सभीके मस्तकपर अपना हाथ रखा ॥ ३-४ ॥ | शत्रुओंका विनाश करनेवाला था ॥ १२-१३ ॥ उसके प्रभावसे तीन-चार तथा पाँच वर्षके उन | वह दैत्य एक हिंसा करनेवाले पशुका स्वरूप बालकोंको भी वेदमन्त्रोंका स्फुरण हो आया। बिना | बनाकर वहाँपर जहाँ-तहाँ भ्रमण कर रहा था। उसके किसी चेतन प्राणीके उन्हें आकाशध्वनि सुनायी पड़ी। | पाँच नेत्र थे, चार सींग थे, आठ पैर थे और चार कान तदनन्तर उन सभीने चारों वेदोंका पारायण किया। उस | थे। वह तीन मुखोंवाला था तथा उसकी दो पूँछें थीं। वेदध्वनिको सुनकर उस समय पशुओंने मुखमें रखा हुआ | वे गुणेश उसे देखकर बड़े जोरसे हँसने लगे और प्रभु ग्रास भी भक्षण करना बन्द कर दिया ॥ ५-६ ॥ | गुणेश उन शिशुओंसे बोले-अरे बालको! तुम लोग इस वे वेदका पारायण कर रहे उन बालकोंकी वेदध्वनिको | कौतुकको देखो ॥ १४-१५ ॥ सुननेमें तत्पर थे। ऋग्वेद तथा यजुर्वेद-इन दो वेदोंके | तब उन बालकोंने गुणेश्वरसे कहा-आज हमने पारायणके अनन्तर उन्होंने सामवेदका गान प्रारम्भ | इस अत्यन्त अद्भुत पशुका दर्शन किया है। तदनन्तर किया। अनेक हरिण, सिंह, शार्दूल, सर्प तथा पक्षियोंकी | वह दैत्य नृत्य करने लगा और [सहसा] ऊँचा उछलकर अनेक जातियाँ उस वेदगानके श्रवणमें अनुरक्त थीं, | वह भूमिपर गिरा ॥ १६ ॥ उनके नेत्रोंसे आनन्दाश्रु प्रवाहित होने लगे ॥ ७-८ ॥ | वह क्षणभरमें अदृश्य हो जाता था और अगले ही उस वेदगानकी ध्वनिको श्रवण करनेमें आसक्त | क्षण सामने स्थित हो जाता था। वह दृश्य एवं अदृश्य अट्ठासी हजार मुनिगण आनन्दसरोवरमें उसी प्रकार | स्वरूप धारण करने लगा। विभु गुणेशने उन बालकोंसे निमग्न होकर सो गये, मानो कि वे रातमें सोये हों। | कहा-'इसे पकड़ लो-पकड़ लो'। ऐसा कहकर वे
५०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
क्री०ख०-अ०९९] * नौवें वर्षमें गुणेश्वरका बालकोंके साथ जलक्रीडा करना * ५०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गुणेशकी स्तुति करनी प्रारम्भ की॥ ३७-३८१/२ ॥ विनता बोली-[हे प्रभो!] आप रजोगुणका आश्रय लेकर सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा हैं, सत्त्वगुणका आश्रय लेकर आप ही सृष्टिका पालन करनेवाले विष्णु हैं और तमोगुणका आश्रय लेकर सृष्टिका संहार करनेवाले शंकर भी आप ही हैं। जब आपके सगुण स्वरूपको भी यथार्थ रूपमें देवता अथवा ऋषिगण नहीं जान पाते, तो फिर चराचर जगत्के एकमात्र गुरु आपके निर्गुण स्वरूपको कौन जान सकता है? ॥ ३९-४०१/२॥ इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर भक्तिपरायण वह विनता उन्हें प्रणाम करते हुए बोली। [हे देव!] आप मुझे मुनि कश्यपकी भार्या विनता समझें, उन महर्षिका पुत्र यह मयूर आपका सेवक होगा॥ ४१-४२॥ मुनि कश्यपजीने पूर्वमें मुझसे कहा था कि जो तुम्हारे गर्भरूप अण्डका भेदन करेगा, वही इसका स्वामी होगा और वही तुम्हारे पुत्रोंको बन्धनसे मुक्त करायेगा- इसमें कोई संदेह नहीं है। बहुत समयतक प्रतीक्षा करनेके अनन्तर मुझे आपके चरणकमलोंका दर्शन हुआ है, कद्रूके पुत्रोंके द्वारा मेरे जटायु, बाज तथा सम्पाती नामके तीन पुत्रोंका हरण हुआ है। हे जगन्नाथ! आप मेरे उन तीनों पुत्रोंको बन्धनमुक्त करके मुझे उनका दर्शन शीघ्र करानेकी कृपा करें॥ ४३-४४१/२॥ गुणेश बोले-हे माता! आप चिन्ता न करें, मैं आपको आपके पुत्रोंका दर्शन अवश्य कराऊँगा॥ ४५॥ ब्रह्माजी बोले-विनतासे इस प्रकार कहनेके अनन्तर अत्यन्त हर्षसे समन्वित होकर गुणेश्वरने मयूरसे कहा-तुम मुझसे वर माँगो ॥ ४६ ॥ मयूर बोला-हे सर्वेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरा 'मयूर' यह नाम आपके नामके आगे लगकर संसारमें प्रसिद्धिको प्राप्त हो जाय। आप यह वर मुझे प्रदान करें और अपनी दृढ़ भक्ति भी मुझे प्राप्त करायें॥ ४७१/२॥ देव गुणेश बोले-अपने मनमें किसी भी प्रकारका लोभ न रखनेवाले तुम्हारे द्वारा बहुत ही सुन्दर और अच्छी बातें कही गयी हैं, तुम्हारा मयूर यह नाम मेरे नामके पूर्वमें लगेगा और तब 'मयूरेश्वर' मेरा यह नाम तीनों लोकोंमें विख्यात होगा और मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति होगी ॥ ४८-४९॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे वह सब सुनकर विनता अपने आश्रममें चली गयी और मयूरपर आरूढ़ होकर मयूरेश्वर गुणेश भी अपने घरको गये ॥ ५० ॥ 'मयूरेश, मयूरेश, मयूरेश'-इस प्रकारसे नामका बार-बार उच्चारण करते हुए उन मुनिबालकोंसे समन्वित होकर और सभी दिशाओंको सुशोभित करते हुए गुणेश्वर जा रहे थे। उन्होंने माता पार्वतीको प्रणामकर शीघ्र ही सम्पूर्ण वृत्तान्त उनको निवेदन कर दिया, इधर मयूरेशकी महिमाका गुणगान करते हुए मुनियोंके बालक अपने-अपने घरोंको गये। इस प्रकार इन गुणेश्वरने 'मयूरेश' यह नाम प्राप्त किया ॥ ५१-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शिखण्डिवरप्रदान' नामक अठानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९८ ॥ निन्यानबेवाँ अध्याय नौवें वर्षमें गुणेश्वरका बालकोंके साथ जलक्रीडा करना, गुणेशद्वारा अश्वरूपी दैत्यका वध, नागकन्याओंका गुणेशको नागलोक ले जाना, भगासुर नामक दैत्यके वधकी कथा ब्रह्माजी बोले-गुणेश्वरने नौवें वर्षकी अवस्थामें एक अद्भुत कार्य किया। एक बार वे अपने वाहन मयूरपर विराजमान होकर चारों हाथोंमें पाश, अंकुश, पद्म और परशु-इन चार आयुधोंको धारणकर बालकोंके साथ क्रीड़ाके लिये निकल पड़े। उस समय उन्होंने विविध अलंकार धारण किये हुए थे, वे मृगकी नाभिसे प्राप्त होनेवाली कस्तूरीका तिलक लगाये हुए थे और उन्होंने दिव्य वस्त्रोंको धारण किया हुआ था॥ १-२॥ पूर्णिमाके चन्द्रमाकी कान्तिके समान वे सुशोभित हो रहे थे, श्रीसम्पन्न वे गुणेश्वर बालकोंके द्वारा जय- जयकारके साथ स्तुत हो रहे थे। कुछ बालक उनको प्रणाम कर रहे थे और कुछ उनका छत्र और ध्वज पकड़े
५०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
हुए थे। कुछ बालक चँवर डुला रहे थे, उनके दर्शनसे बालकोंको महोत्सवकी प्रतीति हो रही थी। क्रीडा करते हुए वे सभी एक सरोवरके पास जा पहुँचे, जो पाँच योजन विस्तारवाला था ॥ ३-४॥ वह सरोवर अगाध जलवाला था और मगर, मत्स्य, कछुआ तथा मेढकोंसे समन्वित था। वह चारों ओरसे लताओं तथा वृक्षोंसे घिरा हुआ था, वहाँ नाना प्रकारके पक्षीगण रहते थे। कुछ बालक उछलकर उस सरोवरके जलमें कूद पड़े और कुछ धीरे-धीरे उस सरोवरके जलमें उतरे। उस सरोवरके तटप्रदेशपर फलोंसे लदा हुआ एक विशाल आमका वृक्ष देखकर मयूरेश उसपर चढ़ गये और अन्य बालक भी आमके फलोंको खानेकी इच्छासे उसपर चढ़े ॥ ५-६१/२ ॥ आमके फलोंके द्वारा वे बालक परस्परमें एक- दूसरेको मारते हुए इस प्रकारसे क्रीड़ा करने लगे कि किसीका अंग-भंग न हो। इस क्रीड़ामें पलायित कुछ बालक उस वृक्षकी डालियोंको तोड़ते हुए उस सरोवरके जलमें गिर रहे थे। इस प्रकार वे सब खेल खेल ही रहे थे कि एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा, वह घोड़ेका रूप बनाया हुआ था ॥ ७-८॥ उस दैत्यके पावोंके प्रहारसे पर्वत भी चूर-चूर हो जाते थे और उसके हिनहिनानेके शब्दसे तीनों लोक काँप उठते थे। वह अपनी पूँछकी चंचलतासे अनेक प्राणियोंको मार डालता था। अश्वरूपी वह दैत्य उस आमके वृक्षके तनेपर अपने कन्धेको रगड़ने लगा। उस दैत्यके [दारुण] गर्जनसे वृक्षके कम्पित हो जानेपर बालक गुणेश गिर पड़े ॥ ९-१०॥ जब गुणेश वृक्षसे सरोवरके जलमें गिर पड़े तो कुछ बालक भयभीत होकर भाग गये और वृक्षसे गिरनेसे कुछ बालकोंके सिर फूट गये, कुछ बालक जल्दी- जल्दी उस वृक्षसे उतरने लगे ॥ ११॥ जब गुणेशको जलके भीतर रहते हुए दो मुहूर्तका समय व्यतीत हो गया, तो वे सभी मुनिबालक रोने लगे। वे आपसमें कहने लगे कि हम माता उमासे क्या कहेंगे और कैसे उन्हें अपना मुख दिखलायेंगे ? ॥ १२॥
भगवान् शंकर भी क्रुद्ध होकर हमें भस्म कर डालेंगे। सरोवरके इस अगाध जलके भीतर प्रवेश करनेमें हम समर्थ नहीं हैं। वे गुणेश तो हमारे माता-पिता, पालन करनेवाले, भाई, रक्षा करनेवाले तथा सखा हैं॥ १३१/२॥ ब्रह्माजी बोले-वे बालक इस प्रकार जब शोक कर रहे थे, उसी समय मयूरेशने उस अश्वरूपी दैत्यके दोनों कान पकड़ लिये और उसे जलके भीतर खींचा। वे बलवान् प्रभु मयूरेश बलपूर्वक उस दैत्यके ऊपर आरूढ़ हो गये और अपने भारसे उस दैत्यको बार-बार जलके भीतर डुबाने लगे ॥ १४-१५ ॥ वह अश्वरूपी दैत्य अपने नेत्रोंसे तथा मुखसे बार- बार बहुत-सा जल उगलने लगा। उसके कानोंमें तथा श्वासमार्गमें जल भर गया और भीषण शब्द करते हुए उसने प्राण त्याग दिये। मयूरेशने अपने एक हाथसे पकड़कर हिला-डुलाकर उस दैत्यको जलसे बाहर फेंक दिया। यह देखकर वे सभी बालक अत्यन्त हर्षित हो गये और बार-बार नृत्य करने लगे ॥ १६-१७॥ उन्होंने उस महान् दैत्यको भूमिपर सौ टुकड़ोंमें विभक्त हुआ देखा। उन सभी बालकोंने महान् बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न उन मयूरेशकी प्रशंसा की। तदनन्तर वे सभी उन देव मयूरेशसे कहने लगे-हम आपको मृत जानकर बहुत रोने लगे, किंतु तभी हमने दैत्यको मारकर सरोवरसे बाहर आते हुए आपको देखा ॥ १८-१९॥ इसके अनन्तर वे सभी बालक उस सरोवरके जलमें प्रविष्ट होकर अपनी-अपनी अंजलिमें जल भरकर पुनः एक-दूसरेको भिगोने लगे। तदनन्तर उन सभीने एक साथ ही गणनायक मयूरेशको जलसे उसी प्रकार भिगो डाला, जैसे कि वर्षाकालमें मेघ पृथ्वी तथा पर्वतोंको भिगो डालते हैं ॥ २०१/२ ॥ अपनी छः भुजाओंके द्वारा भी जब वे मयूरेश उन बालकोंको भिगोनेमें सफल न हो सके, तब उन्होंने उन बालकोंपर अपने असंख्य हाथोंसे जल छिड़का। उस समय उस प्रकारका आश्चर्य देखकर वे सभी बालक परस्परमें एक-दूसरेसे कहने लगे ॥ २१-२२ ॥ ये छह भुजाओंवाले मयूरेश असंख्य भुजाओंवाले
क्री०ख०-अ०१९ ] * नौवें वर्षमें गुणेश्वरका बालकोंके साथ जलक्रीडा करना * ५०९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] कैसे हो गये, तदनन्तर कुछ निराश-से हुए वे मुनियोंके बालक उनसे कहने लगे— हे प्रभो ! कहाँ तो हम दो हाथ- वाले और कहाँ आप बल तथा ओजसे सम्पन्न असंख्य भुजाओंवाले भुवनेश्वर। पुनः वे सभी कुछ रुष्ट-से होकर उन मयूरेशके ऊपर जल फेंकने लगे ॥ २३-२४ ॥ तदनन्तर अनन्त स्वरूप धारण करनेवाले वे गणनायक मयूरेश अपने तेजके प्रभावसे एक-एक बालकके सामने छः भुजावाला होकर उन सभीको जलसे सींचने लगे। दूसरे ही क्षण वे मयूरपर आरूढ़ होकर चार आयुधोंवाले रूपमें दिखायी दिये। तब उन बालकोंने दोनों हाथ जोड़कर उन देव गुणेश्वरको प्रणाम किया ॥ २५-२६ ॥ तदनन्तर उन्होंने उन गुणेश्वरके मुखके भीतर सभी स्वर्गोंसे समन्वित विश्वको देखा। इसके साथ ही गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, नदियों, समुद्रों, वृक्षों और देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसे युक्त समस्त चराचर विश्वका दर्शन किया। इस प्रकारका दृश्य देखकर वे बालक भयसे व्याकुल हो उठे और उन प्रभुकी इस प्रकार प्रार्थना करने लगे ॥ २७-२८ ॥ बालक बोले— हे अखिल विश्वके स्वामी ! इस समय हम न अपनेको जान पा रहे हैं और न किसी दूसरेको ही जान पा रहे हैं, हे विभो ! हमपर कृपा करके आप एक रूपवाले हो जायँ ॥ २९ ॥ ब्रह्माजी बोले— उन सबकी इस प्रकारकी प्रार्थनाको सुनकर वे प्रभु अपने पूर्ववत् स्वरूपमें हो गये। इसी समयकी बात है, वहाँ कुछ नागकन्याएँ क्रीड़ा करने लगीं। जिनको देख लेनेमात्रसे आठ प्रकारकी नायिकाएँ अत्यन्त लज्जित हो उठती थीं और जिनके नेत्रोंको देखकर हरिणियाँ अत्यन्त लज्जित होकर भाग जाती थीं ॥ ३०-३१ ॥ उनका शरीर अतिसुन्दर था, वे सभी प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित थीं, वे मयूरेशको देखकर कामाग्निसे जलती हुई अत्यन्त विह्वल हो उठीं ॥ ३२ ॥ वे सभी नागकन्याएँ एक साथ कहने लगीं कि यदि ये हमारे स्वामी हो जाते तो हमारा जन्म लेना सफल हो जाता, हमारा जीवन सफल हो जाता और हमारी
[दायाँ स्तम्भ] तरुणावस्था भी सफल हो जाती ॥ ३३ ॥ तब उन्होंने धैर्य धारणकर उन गुणेशसे पूछा— आपका आगमन कहाँसे हुआ है, आपके मुखमण्डलको देखकर हम लोगोंके चित्तमें अत्यन्त व्याकुलता हो उठती है। हे नरश्रेष्ठ ! आप अपने शरीरका सम्पर्क कराकर हमारे चित्तको शान्ति प्रदान कीजिये ॥ ३४ १/२ ॥ देव गुणेश बोले— मैं भगवान् शिवका पुत्र हूँ और मेरा 'मयूरेश' यह नाम विख्यात है। मुनियोंके बलवान् बालकोंने मुझे सरोवरमें डुबा दिया था, संयोगवश मुझे आपके चरणकमलोंका दर्शन हुआ है ॥ ३५-३६ ॥ वे नागकन्याएँ बोलीं— आप हमारे घरमें क्षणभर ठहरकर विश्राम करनेकी कृपा करें ॥ ३६ १/२ ॥ देव गुणेश बोले— चूँकि मेरे वियोगमें मेरी माता पार्वती अत्यन्त दुखी हो उठेंगी, अतः मैं आपके स्थानपर नहीं आऊँगा। आप सभी नागकन्याएँ वापस चली जायँ ॥ ३७ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— वे ऐसा कह ही रहे थे कि उसी समय वे नागकन्याएँ उन्हें पकड़कर अपने घरोंको ले चलीं। उस समय पुनः उन गुणेशको न देखकर वे सभी मुनिबालक शोक करने लगे ॥ ३८ १/२ ॥ बालक बोले— दयालु होनेपर भी आज वे गुणेश्वर न जाने क्यों निष्ठुर हो गये हैं? ॥ ३९ ॥ अमृतवर्षिणी किरणोंवाला चन्द्रमा कभी भी उष्णताको प्राप्त नहीं होता, अपराधी होनेपर भी पिता अपने पुत्रोंका परित्याग नहीं करता। आप कहाँ चले गये हैं, आपके बिना हमारे प्राण चले जायँगे ॥ ४० १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— इस प्रकारसे कहते हुए कुछ बालक भूमिपर गिर पड़े। कुछ अपना सिर पीटने लगे और कुछ बालक अपने आश्रमको चल पड़े। मार्गमें उन बालकोंने गुणेश्वरके चरणकमलोंका चिह्न देखा तो उन्होंने उन पदचिह्नोंको प्रणाम किया और वे रो पड़े। उसी समय उन बालकोंने एक भगासुर नामक दैत्यको देखा ॥ ४१-४२ ॥ उस दैत्यके बालोंके आघातसे आकाशमण्डलके ग्रह-नक्षत्र जमीनपर गिर जाते थे। उसके पैर सौ
५१० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
क्री०ख०-अ०१००] * नागलोकमें नागकन्याओंद्वारा मयूरेश्वरका स्वागत-सत्कार * ५११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
और न कुछ खाया ही है। अब आजके बाद तुम उस | देखकर उनका आलिंगन करनेके अनन्तर उनसे पूछा कि मयूरेश्वरके साथ कहीं नहीं जाओगे ॥ ६१ १/२ ॥ | तुमने वनमें क्या भोजन किया था? तुम्हारे वियोगसे ब्रह्माजी बोले-बालकोंको इस प्रकारसे भलीभाँति | उत्पन्न दुःखके कारण मैंने कुछ भी नहीं खाया है। हे समझाकर माताओंद्वारा अपने-अपने बालकोंका आलिंगन | वत्स ! दूधसे भरे हुए मेरे स्तनोंका पान करो और भलीभाँति किया और अत्यन्त सुखका अनुभव किया॥ ६२ ॥ | भोजन करो। तदनन्तर माताने जो-जो कहा, गुणेश्वरने उन शिवा पार्वतीने भी मयूरेशको सामने आया हुआ | सभी (बातों)-का पालन किया ॥ ६३-६४॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'बालचरितमें अश्वासुरके वधका वर्णन' नामक निन्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९९ ॥
सौवाँ अध्याय नागलोकमें नागकन्याओंद्वारा मयूरेश्वरका स्वागत-सत्कार, नागराज वासुकिको मयूरेश्वरद्वारा आभूषणके रूपमें धारण करना, सर्पों तथा मयूरका युद्ध, शेषनागको आभूषणके रूपमें धारण करना, शेषनागद्वारा मयूरेशकी स्तुति, शेषनागद्वारा सम्पाती आदिको बन्धन- मुक्त करना, मयूरेश्वरका नागलोकसे धरतीपर आना, बगासुरसे बालकोंको मुक्त कराकर वापस घरमें आना और अपनी माया दिखाना
ब्रह्माजी बोले-सम्पूर्ण विश्वके स्वामी और | वह सब आप यहाँ ग्रहण करें। आप कुछ दिनोंतक यहाँ अनेक स्वरूप धारण करनेवाले भगवान् मयूरेश अत्यन्त | ठहरनेके अनन्तर ही अपने घरको जायँ ॥ ६ ॥ सौन्दर्यसम्पन्न स्वरूपवाले थे। नागकन्याएँ उनके साथ | मयूरेश बोले-मैं तुम सबकी अभिलाषाको अवश्य आनन्दक्रीड़ा करनेके लिये उन्हें अपने घर नागलोकमें ले | पूर्ण करूँगा, परंतु मेरी माता पार्वती मेरी प्रतीक्षा कर रही गयीं और वहाँ उन्होंने बहुत विस्तारसे पूजन किया। | हैं, मेरे वियोगके कारण वे अत्यन्त दुखी हैं और कुछ भी उन्होंने सुगन्धित तैलसे उन्हें उबटन लगाकर गरम जलसे | भोजन नहीं ग्रहण कर रही हैं। तुम सब किसकी पुत्रियाँ स्नान कराया ॥ १-२ ॥ | हो, उनका दर्शन मुझे होता तो उचित होता ॥ ७ १/२ ॥ दिव्य वस्त्रों, अलंकारों तथा विविध प्रकारके | ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर नागकन्याओंद्वारा कहा चन्दनोंसे उनकी पूजाकर, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, | कि हे प्रभो! हम उन वासुकि नागकी कन्याएँ हैं, जिनके ताम्बूल तथा सुवर्ण उपचार उन्हें समर्पित किये ॥ ३ ॥ | घरमें ब्रह्मा आदि देवता तथा अन्य मुनिगण सर्वदा आते- तदनन्तर वे नागकन्याएँ दोनों हाथ जोड़कर कहने | जाते रहते हैं और जिनके विषसे उत्पन्न ज्वाला तीनों लगीं-हे प्रभो ! हम लोग धन्य हैं, जो कि आज आपके | लोकोंको दग्ध कर सकती है ॥ ८-९ ॥ उन चरणोंका हमने दर्शन किया है, जिनके दर्शनकी | ब्रह्माजी बोले-ऐसा कहनेके अनन्तर उन अभिलाषा ब्रह्मा आदि देवता भी रखते हैं ॥ ४ ॥ | गुणेश्वरको आगे करके वे कन्याएँ पिता वासुकिके पास आज यह नागलोक अत्यन्त धन्य हो गया है, हम | पहुँचीं। नागराज वासुकि अनेक नागोंसे समन्वित थे और लोगोंका जीवन जीना सफल हो गया है। आज हमारे | एक अत्यन्त प्रदीप्त रत्नमय सिंहासनपर विराजमान थे। मनके आनन्द-सरोवरमें निमग्न होनेसे उसका सन्ताप | वे करोड़ों सूर्योंकी आभासे कान्तिमान् थे, रत्नोंकी सर्वथा दूर हो गया है ॥ ५ ॥ | मालासे सुशोभित हो रहे थे, अपने सिरमें स्थित हे देव मयूरेश ! आपको जो-जो भी अभीष्ट हो, | मणिरत्नकी किरणोंसे वे समस्त दिशाओंको प्रकाशित
५९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- कर रहे थे॥ १०-११॥ उस अत्यन्त अभिमानी और महाबलशाली वासुकीको देखकर मयूरेश्वर उड़ करके उसके फणोंपर जा बैठे और फणोंपर स्थित मणिको शीघ्र ही ले लिया॥ १२॥ उस मणिके प्रकाशसे पाताललोकमें कभी कहीं कोई अन्धकार नहीं होता था। उस समय उसने अपने सिरको हिलाते हुए सातों पर्वतों, सातों समुद्रों, पातालों तथा रसातलको आन्दोलित कर डाला था। तदनन्तर मयूरेशने खेल-खेलमें ही अपने एक हाथसे उस वासुकि नागको पकड़कर अपने गलेमें बाँध लिया। इसी कारण स्वर्गलोकमें वे मयूरेश 'सर्पभूषण' इस नामसे विख्यात हुए। तदनन्तर अत्यन्त आनन्दित होते हुए विभु मयूरेश्वरने गर्जना की॥ १३-१५॥ उस भीषण गर्जनाको सुनकर तीनों लोक क्षुब्ध हो उठे। तदनन्तर सर्पगणोंने वासुकीको वापस लानेके लिये शेषनागसे कहा॥ १६॥ तब अत्यन्त क्रोधमें आविष्ट होकर उस शेषनागने अपने सभी फणोंको फैलाकर उनसे विषाग्नि उगलते हुए तीनों लोकोंको दग्ध करना प्रारम्भ कर दिया॥ १७॥ वह कहने लगा—मेरे बन्धु उस वासुकीको जीतनेमें कौन समर्थ हो सकता है? यह कहकर वह जैसे दावाग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार क्रोधके आवेशमें जलता हुआ-सा गया॥ १८॥ वह शीघ्र ही गया और उसने मयूरेशको 'ठहरो- ठहरो' इस प्रकारसे कहा। तदनन्तर नागोंके अन्य कुल भी शीघ्र ही उस शेषनागके पीछे-पीछे गये॥ १९॥ तदनन्तर उस नागसमूहको देखकर देव मयूरेश वहीं ठहर गये और उन्होंने अपने वाहन मयूरके मस्तकपर हाथ रखा और उसे सर्पोंके साथ युद्ध करनेके लिये प्रेरित किया॥ २०॥ अत्यन्त अद्भुत वह मयूर मयूरेश्वरको प्रणाम करके सर्पोंको निगलता हुआ-सा आगे बढ़ा। मयूरने अपने पंखोंको फड़फड़ाया, फड़फड़ानेकी उस हवाने बड़े-बड़े सर्पोंको उड़ाकर घुमा डाला॥ २१॥ उस मयूरने किन्हीं-किन्हीं सर्पोंका भक्षण कर लिया और दूसरे सर्पोंको चूरा-चूरा बना डाला। किन्हीं- किन्हीं अत्यन्त बलवान् सर्पोंको उसने मार डाला॥ २२॥ कुछ सर्प उसे देखते ही भयसे विह्वल होकर मृत हो गये। तदनन्तर उस मयूरका वैसा बल-पराक्रम देखकर शेषनागने विषैली श्वास-वायु छोड़ी॥ २३॥ उस विषैले श्वाससे वह मयूर मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़ा। तब वह शेषनाग क्रोधसे तीनों लोकोंको जलाता हुआ-सा मयूरेशकी ओर दौड़ा॥ २४॥ तीनों लोकोंको विषकी अग्निसे परिव्याप्त देखकर गुणेश्वरने अपना विराट् रूप बना लिया और वे उस शेषनागके फणोंके ऊपर चढ़ बैठे॥ २५॥ बालसुलभ चंचलतावश वे उछलकर दूसरे मेघके समान गर्जना करने लगे और अपने चरणोंके प्रहारसे आघात करते हुए ताली बजाकर नृत्य करने लगे॥ २६॥ मात्र एक ब्रह्माण्डके भारको सहन करनेवाला वह शेषनाग अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके भारवाले उन मयूरेशके भारसे अत्यन्त पीड़ित हो गया, भला वह कैसे उस भारको सहन कर सकता था?॥ २७॥ उन मयूरेशने उस शेषनागको अपनी कमरमें वैसे ही बाँध लिया, जैसे बालक क्रीडा करता हुआ अपनी कमरमें रस्सी बाँध लेता है। तदनन्तर युद्धकी इच्छा करनेवाले वे सभी नाग उन मयूरेशके समीपमें आये॥ २८॥ विघ्नराज मयूरेशने अपने हुंकारमात्रसे उन्हें गिरा डाला। कुछ सर्पोंको विभु मयूरेशने अपने मस्तकमें बाँध लिया और कुछको अपने कानोंमें लपेट लिया। तदनन्तर शेषनाग अत्यन्त थक गया और उसने गुणेश्वरकी स्तुति करनी प्रारम्भ की॥ २९१/२॥ शेषनाग बोला—[हे प्रभो!] आपके यथार्थ स्वरूपको न तो ब्रह्मा आदि देवता जानते हैं और न मुनिगण ही जानते हैं॥ ३०॥ आप ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं, आप ही इसकी रक्षा करते हैं और इसके संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप नाना अवतारोंको धारण करनेवाले हैं और अनेकों दैत्योंका मर्दन करनेवाले हैं॥ ३१॥ आप ही सबके साक्षी हैं, आप ही सबके अन्तर्यामी
क्री०ख०-अ०१०० ] * नागलोकमें नागकन्याओंद्वारा मयूरेश्वरका स्वागत-सत्कार * ५१३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
५१४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- कोई बालक अपने पिताके पास बैठकर वैसे ही पाठ कर रहा था, जैसे पहले करता था, कोई अपनी माताके पास आकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक दुग्धपान कर रहा था ॥ ५१ ॥ कोई बालक अपनी माताका आलिंगन कर रहा था, तो कोई पिताका। कोई अपने भाईको मारकर वैसे ही रो रहा था, मानो उसीको मारा गया हो ॥ ५२ ॥ पार्वतीने भी अपने पुत्र मयूरेशको देखकर उसका आलिंगन किया एवं प्रसन्न होकर उसे स्तनपान कराया और प्यारभरे गुस्सेसे कहने लगीं- [हे वत्स!] तुम इतनी देरीमें क्यों आये हो ? ॥ ५३ ॥ तदनन्तर देवी पार्वती मयूरेशका हाथ पकड़कर उन्हें घरके अन्दर ले गयीं। वे सभी मुनिगण भी अपने-अपने बालकोंको लेकर अपने-अपने आश्रमकी ओर गये ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बगासुरका वध' नामक सौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०० ॥ एक सौ एकवाँ अध्याय मयूरेश्वरद्वारा दसवें वर्षमें दैत्य कमलासुरकी सेनाका वध, मरे हुए सैनिकोंका मयूरेश्वरकी कृपासे मुक्ति प्राप्त करना ब्रह्माजी बोले-दसवें वर्षकी बात है, एक दिन जब भगवान् महेश्वर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उनके वामभागमें देवी गिरिजा विराजमान थीं, और वे भगवान् शिव सात करोड़ गणोंसे घिरे हुए थे तथा अपने आँगनमें नृत्य करते हुए शिशु मयूरेशको देख रहे थे, उसी समय गौतम आदि मुनिगण उनके पास आये और उन्होंने भगवान् शिवको प्रणाम किया ॥ १-२ ॥ तदनन्तर वे प्रबुद्ध मतिवाले मुनिगण महान् ओज- समन्वित भगवान् महादेवसे बोले- हे शिव ! आप मयूरेशके साथ जितने समयतक यहाँ स्थित रहेंगे, तबतक अनन्त दैत्योंका आगमन यहाँ होता रहेगा, हम लोग इस कारण अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं, अतः हे शिव ! अब आप कहीं अन्यत्र रहनेको चले जायें अथवा हे हर ! आपकी आज्ञा हो तो हम ही कहीं अन्यत्र चले जाते हैं ॥ ३-४ १/२ ॥ शिव बोले-आप लोगोंके साथ मैंने नौ वर्ष अत्यन्त सुखपूर्वक व्यतीत किये हैं। मयूरेशने आनेवाले उन विघ्नोंको भी दूर किया है, आप लोगोंके चले जानेपर हमारे यहाँ स्थित रहनेसे क्या प्रयोजन है ? अतः मैं ही किसी निरापद स्थानपर चला जाऊँगा ॥ ५-६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-भगवान् शिवके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर मुनियोंने उन्हें प्रणाम किया और वे 'देव मयूरेशकी जय हो' ऐसा कहकर अपने स्थानको चले गये। भगवान् शिव भी अपने गणोंको साथ लेकर वृषभपर आरूढ़ होकर तथा पार्वतीसे समन्वित होकर एवं मयूरपर विराजमान मयूरेशको आगे करके अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अपने [अभीष्ट] स्थानको चल पड़े। उस समय विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे समस्त आकाशमण्डल निनादित हो रहा था ॥ ७-९॥ शिवके साथ-साथ जा रहे मयूरेशके पीछे सभी मुनिगण भी [उनको विदा देनेहेतु] गये। उनकी पत्नियाँ भी स्नेहपूर्वक गद्गद कण्ठसे बोलनेवाले अपने बालकोंको साथमें लेकर गयीं। उस समय आकाशके धूलिसे आच्छादित हो जानेके कारण कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। तदनन्तर भगवान् शिवने उन सभी मुनियों एवं बालकोंसहित मुनिपत्नियोंको लौटाकर दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान किया ॥ १०-११ ॥ इसी बीचमें वहाँपर सिन्धुदैत्यके द्वारा भेजा गया महान् [योद्धा] कमलासुर सेना लेकर आ पहुँचा। वह परम मायावी असुर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवताओंसे भी अजेय था। उसे देखकर मुनिगण भाग चले ॥ १२-१३ ॥ [वे आपसमें कहने लगे-] हे मुनियो ! अरे, भगवान् शंकरका परित्याग करके तो कहीं भी नहीं रहा जा सकता। अब हम कहाँ जायें, अब तो इस दैत्यराजके द्वारा हम मारे ही गये हैं ॥ १४ ॥