श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 516, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५१४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- कोई बालक अपने पिताके पास बैठकर वैसे ही पाठ कर रहा था, जैसे पहले करता था, कोई अपनी माताके पास आकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक दुग्धपान कर रहा था ॥ ५१ ॥ कोई बालक अपनी माताका आलिंगन कर रहा था, तो कोई पिताका। कोई अपने भाईको मारकर वैसे ही रो रहा था, मानो उसीको मारा गया हो ॥ ५२ ॥ पार्वतीने भी अपने पुत्र मयूरेशको देखकर उसका आलिंगन किया एवं प्रसन्न होकर उसे स्तनपान कराया और प्यारभरे गुस्सेसे कहने लगीं- [हे वत्स!] तुम इतनी देरीमें क्यों आये हो ? ॥ ५३ ॥ तदनन्तर देवी पार्वती मयूरेशका हाथ पकड़कर उन्हें घरके अन्दर ले गयीं। वे सभी मुनिगण भी अपने-अपने बालकोंको लेकर अपने-अपने आश्रमकी ओर गये ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बगासुरका वध' नामक सौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०० ॥ एक सौ एकवाँ अध्याय मयूरेश्वरद्वारा दसवें वर्षमें दैत्य कमलासुरकी सेनाका वध, मरे हुए सैनिकोंका मयूरेश्वरकी कृपासे मुक्ति प्राप्त करना ब्रह्माजी बोले-दसवें वर्षकी बात है, एक दिन जब भगवान् महेश्वर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उनके वामभागमें देवी गिरिजा विराजमान थीं, और वे भगवान् शिव सात करोड़ गणोंसे घिरे हुए थे तथा अपने आँगनमें नृत्य करते हुए शिशु मयूरेशको देख रहे थे, उसी समय गौतम आदि मुनिगण उनके पास आये और उन्होंने भगवान् शिवको प्रणाम किया ॥ १-२ ॥ तदनन्तर वे प्रबुद्ध मतिवाले मुनिगण महान् ओज- समन्वित भगवान् महादेवसे बोले- हे शिव ! आप मयूरेशके साथ जितने समयतक यहाँ स्थित रहेंगे, तबतक अनन्त दैत्योंका आगमन यहाँ होता रहेगा, हम लोग इस कारण अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं, अतः हे शिव ! अब आप कहीं अन्यत्र रहनेको चले जायें अथवा हे हर ! आपकी आज्ञा हो तो हम ही कहीं अन्यत्र चले जाते हैं ॥ ३-४ १/२ ॥ शिव बोले-आप लोगोंके साथ मैंने नौ वर्ष अत्यन्त सुखपूर्वक व्यतीत किये हैं। मयूरेशने आनेवाले उन विघ्नोंको भी दूर किया है, आप लोगोंके चले जानेपर हमारे यहाँ स्थित रहनेसे क्या प्रयोजन है ? अतः मैं ही किसी निरापद स्थानपर चला जाऊँगा ॥ ५-६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-भगवान् शिवके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर मुनियोंने उन्हें प्रणाम किया और वे 'देव मयूरेशकी जय हो' ऐसा कहकर अपने स्थानको चले गये। भगवान् शिव भी अपने गणोंको साथ लेकर वृषभपर आरूढ़ होकर तथा पार्वतीसे समन्वित होकर एवं मयूरपर विराजमान मयूरेशको आगे करके अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अपने [अभीष्ट] स्थानको चल पड़े। उस समय विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे समस्त आकाशमण्डल निनादित हो रहा था ॥ ७-९॥ शिवके साथ-साथ जा रहे मयूरेशके पीछे सभी मुनिगण भी [उनको विदा देनेहेतु] गये। उनकी पत्नियाँ भी स्नेहपूर्वक गद्गद कण्ठसे बोलनेवाले अपने बालकोंको साथमें लेकर गयीं। उस समय आकाशके धूलिसे आच्छादित हो जानेके कारण कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। तदनन्तर भगवान् शिवने उन सभी मुनियों एवं बालकोंसहित मुनिपत्नियोंको लौटाकर दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान किया ॥ १०-११ ॥ इसी बीचमें वहाँपर सिन्धुदैत्यके द्वारा भेजा गया महान् [योद्धा] कमलासुर सेना लेकर आ पहुँचा। वह परम मायावी असुर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवताओंसे भी अजेय था। उसे देखकर मुनिगण भाग चले ॥ १२-१३ ॥ [वे आपसमें कहने लगे-] हे मुनियो ! अरे, भगवान् शंकरका परित्याग करके तो कहीं भी नहीं रहा जा सकता। अब हम कहाँ जायें, अब तो इस दैत्यराजके द्वारा हम मारे ही गये हैं ॥ १४ ॥