श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 517, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१०१ ] * मयूरेश्वरद्वारा दसवें वर्षमें दैत्य कमलासुरकी सेनाका वध * ५१५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इस प्रकार विचार करनेके उपरान्त वे सभी भयभीत मुनिगण पुनः भगवान् शंकरके समीप आ पहुँचे और उनसे कहने लगे कि हे महेश्वर ! इस दैत्यराजसे हमारी रक्षा कीजिये। आप मयूरेशके साथ सर्वदा हमारे साथ रहिये, यदि ऐसा नहीं होगा, तो आपके अनुगामी हम सभी भयभीत होते रहेंगे ॥ १५-१६॥ उन सभीने मार्गमें कमलासुरको आता हुआ देखा, उसके साथ बारह अक्षौहिणी सेना थी, उसने आकाशमण्डलको धूलिसे आच्छादित कर दिया था ॥ १७॥ उसकी सेनाके गजारोही सबसे आगे चल रहे थे। तदनन्तर रथारोही, घुड़सवार और सबसे पीछे पैदल सेना चल रही थी। उन सैनिकोंके शस्त्रोंकी चमचमाहटके सामने सूर्यका प्रकाश कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। उस समय गजारोही, अश्वारोही, रथारोही तथा पैदल सेनाके विविध प्रकारके शस्त्रोंके संघर्षणसे मिश्रित महान् कोलाहलकी ध्वनि हो रही थी ॥ १८-१९ ॥ आगे-आगे चल रहे शिवके गुप्तचर दूतोंने उस महान् दैत्यको देखा। वह महादैत्य शंखासुरका भाई था और विविध प्रकारके वस्त्राभूषणोंको धारण किये हुए था। उसने अनेकों प्रकारके आयुधोंको धारण कर रखा था। गणोंने आकर उसके विषयमें शिवको समाचार बतलाया। उसके पैरके आघातसे तत्काल कूर्म, शेष आदि कम्पित हो उठते थे ॥ २०-२१॥ आगे-आगे जा रहे मुनिगण उसे देखकर भयभीत होकर भूमिपर गिर पड़े, तदनन्तर उन्होंने मयूरेशसे कहा- हे मयूरेश ! हे महाभाग ! आप हम सबकी रक्षा किस प्रकारसे करेंगे ? ॥ २२ ॥ ब्रह्माजी बोले- उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे गुणेश्वर बोले- हे मुनिश्रेष्ठो ! भगवान् शिवके रहते हुए आप लोगोंको कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये। तदनन्तर मयूरेशने भगवान् शिवको प्रणामकर उनसे कहा ॥ २३ १/२ ॥ देव गुणेश्वर बोले- कमलासुर नामक दैत्य बहुत बड़ी सेनाके साथ आया है, यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो मैं शीघ्र ही युद्धके लिये जाऊँ ॥ २४ १/२ ॥ शिव बोले- हे पुत्र ! तुमने बहुत अच्छी बात कही है, इससे मेरे हृदयको बड़ा आनन्द हुआ है। वह दैत्यश्रेष्ठ बारह अक्षौहिणी सेनाको साथ लेकर आया हुआ है, फिर तुम अकेले क्यों जाओगे, तुम सात करोड़ गणोंसे समन्वित होकर जाओ। तुम विजय प्राप्त करो। उस महान् बलशाली शत्रुको तुम शीघ्र ही मार डालो ॥ २५-२६ १/२ ॥ देव बोले- हे स्वामिन् ! आपके कृपाप्रसादसे मैं तीनों लोकोंको दग्ध कर सकता हूँ, ऐसा मेरा विश्वास है, मैंने कितने ही दैत्योंको मार नहीं डाला है, क्या वह सब आपको ज्ञात नहीं है। फिर इस दैत्यकी गणना ही क्या है, मैं शीघ्र ही विजय प्राप्तकर वापस लौटूँगा ॥ २७-२८ ॥ ब्रह्माजी बोले- पुत्र गुणेश्वरका यह वचन सुनकर भगवान् शिवने उनका आलिंगन किया और सिरपर अपना मंगलमय हाथ रखकर हाथमें त्रिशूल धारण कराया ॥ २९ ॥ तदनन्तर भगवान् शिवने गणोंसे समन्वित अपने पुत्र मयूरेश्वरको युद्धकी आज्ञा प्रदान की। महान् जयघोषके साथ दसों दिशाओंको निनादित करते हुए विघ्नोंका विनाश करनेवाले तथा युद्ध करनेकी लालसावाले वे मयूरेश्वर प्रमथगणोंके साथ निकल पड़े। उस समय पार्वतीसहित भगवान् शिव भी वृषभपर आरूढ़ होकर युद्ध देखनेकी इच्छासे उनके पीछे-पीछे गये ॥ ३०-३१ ॥ बहुत विशाल दैत्यसेनाको देखकर मयूरेशने अपने शरीरसे बहुत बड़ी सेनाको प्रकट किया, तदनन्तर दोनों सेनाओंमें युद्ध होने लगा ॥ ३२ ॥ मयूरेशके विग्रहसे प्रकट वे वीर सैनिक साक्षात् कालके समान ही थे। वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका भक्षण करनेमें तत्पर दिखते थे। वे मेरुपर्वतके समान विशाल थे और अपने [गर्जनेकी] ध्वनिमात्रसे पर्वतशिखरको भी गिरा डालनेवाले थे। तदनन्तर भीषण युद्ध प्रारम्भ होनेपर दोनों सेनाओंके वीर परस्पर एक-दूसरेपर आघात करने लगे। उस समय सर्वत्र महान् अन्धकार छा गया। सभी दिशाएँ उठी हुई धूलिसे आच्छादित हो गयीं ॥ ३३-३४ ॥ उस समय दैत्योंको यह महान् आश्चर्य हुआ कि