श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 518, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५१६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
पहले तो यह मयूरेश अकेला ही था, फिर कैसे यह अनेक रूपवाला हो गया, निश्चित ही यह कोई परम पुरुष है और पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये यह भगवान् शिवके यहाँ अवतीर्ण हुआ है ॥ ३५१/२॥ दैत्यके स्वरूपको अत्यन्त विस्तारवाला देखकर उन प्रभु मयूरेश्वरने भी योगमायाका आश्रय लेकर सहसा ही उससे भी बड़ा अपना स्वरूप बना लिया ॥ ३६१/२॥ उस समय उन महापराक्रमी देव मयूरेशके दस हाथ थे और दसों हाथोंमें वे दस आयुध धारण किये हुए थे। तदनन्तर मयूरेश और उस दैत्यका नाना प्रकारके शस्त्रोंके प्रहारसे और नाना प्रकारकी युद्धकलाओंके द्वारा परस्पर युद्ध होने लगा ॥ ३७-३८॥ मयूरेशके साथ आये गण तथा उस दैत्यके सैनिक कभी अलग-अलग होकर और कभी समूह बनाकर परस्पर युद्ध कर रहे थे। वे कभी मुट्ठीके प्रहारसे तथा कभी दाँतोंके काटनेसे तो कभी अस्त्र-शस्त्रोंके द्वारा एक-दूसरेसे युद्ध कर रहे थे ॥ ३९ ॥ इस युद्धमें किन्हींके सिर फूट गये, किन्हींके मुख भग्न हो गये, कोई-कोई जानु तथा जंघासे रहित हो गये और कोई रणभूमिमें गिर पड़े ॥ ४० ॥ अस्त्रों तथा शस्त्रोंके घात-प्रतिघातकी ध्वनिसे दसों दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए वे योद्धा धूलके द्वारा अन्धकार छा जानेके कारण अपना तथा अपने स्वामीका नाम ले-लेकर परस्पर प्रहार कर रहे थे ॥ ४१ ॥ उस युद्धमें सिर कटे हुए धड़ अपने सामने आनेवाले अपने पक्षके तथा शत्रुपक्षके वीरोंको मार रहे थे। अन्ततः दैत्य कमलासुरकी सेनाके सैनिक पराजित होकर उस दैत्यके समीप चले गये और उन्होंने कमलासुरको बतलाया कि असंख्य दैत्य मारे जा चुके हैं और उनके रक्तकी नदियाँ प्रवाहित हो चली हैं ॥ ४२१/२॥ दैत्य बोला—इन्द्र आदि लोकपालों तथा ब्रह्मा आदि देवतागणोंको जिसने जीत लिया है, उससे युद्ध करनेमें यहाँपर कौन समर्थ हो सकता है! पृथ्वीको उलट देनेमें अन्य कौन समर्थ हो सकता है! ॥ ४३-४४॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर उस दैत्य कमलासुने अपने शस्त्रोंको लहराया, जिसके कारण सम्पूर्ण जगत् कम्पित हो उठा। क्रोधसे लाल हुए नेत्रोंवाले उस दैत्यराजने मयूरेशके उन सभी गणोंको मार गिराया, जो नाना वाहनोंपर आरूढ़ थे और विविध शस्त्रोंको धारण किये हुए थे। उसने युद्धमें उनके सिर, पैर और कमरको काट डाला था तथा हाथोंको तोड़ डाला था ॥ ४५-४६॥ उस दैत्यके इस प्रकारके उत्कट पराक्रमको देखकर मयूरेश उसके समक्ष गये। उन्होंने अपनी गर्जनासे आकाशमण्डल तथा स्वर्गको निनादित करते हुए अपने दसों शस्त्रोंसे शत्रुओंको मारा। इस कारण असंख्य दैत्य मृत्युको प्राप्त हुए और उन्होंने अत्यन्त दुर्लभ मुक्ति प्राप्त की ॥ ४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दैत्यसेनाके वधका वर्णन' नामक एक सौ एकवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०१ ॥
एक सौ दोवाँ अध्याय दैत्य कमलासुर और मयूरेश्वरके युद्धका वर्णन ब्रह्माजी बोले—अपनी बहुत-सी सेनाके नष्ट हो जानेपर दैत्यराज कमलासुर अत्यन्त क्रुद्ध हो गया और वह अश्वपर आरूढ़ होकर हाथमें तलवार लेकर मयूरेशके साथ युद्ध करनेके लिये निकल पड़ा ॥ १ ॥ उसे देखकर मयूरेश अपने वाहन मयूरपर सवार हुए, तदनन्तर उन मयूरेशको शीघ्र ही अपनी ओर आता हुआ देखकर उस दैत्यराजने दैत्यगुरु शुक्राचार्यद्वारा उपदिष्ट मन्त्रका आदरपूर्वक सौ बार जपकर उस पन्नागास्त्रको मयूरेशपर चलाया। उस समय उस पन्नागास्त्रके तेजसे सभी दिशाएँ जलने लगीं ॥ २-३॥ तदनन्तर देव मयूरेशकी सेनाके सैनिकोंको सर्पसेनाके सैनिकोंने आवेष्टित कर लिया। कुछ सैनिक मृत्युको