श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५१४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- कोई बालक अपने पिताके पास बैठकर वैसे ही पाठ कर रहा था, जैसे पहले करता था, कोई अपनी माताके पास आकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक दुग्धपान कर रहा था ॥ ५१ ॥ कोई बालक अपनी माताका आलिंगन कर रहा था, तो कोई पिताका। कोई अपने भाईको मारकर वैसे ही रो रहा था, मानो उसीको मारा गया हो ॥ ५२ ॥ पार्वतीने भी अपने पुत्र मयूरेशको देखकर उसका आलिंगन किया एवं प्रसन्न होकर उसे स्तनपान कराया और प्यारभरे गुस्सेसे कहने लगीं- [हे वत्स!] तुम इतनी देरीमें क्यों आये हो ? ॥ ५३ ॥ तदनन्तर देवी पार्वती मयूरेशका हाथ पकड़कर उन्हें घरके अन्दर ले गयीं। वे सभी मुनिगण भी अपने-अपने बालकोंको लेकर अपने-अपने आश्रमकी ओर गये ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बगासुरका वध' नामक सौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०० ॥ एक सौ एकवाँ अध्याय मयूरेश्वरद्वारा दसवें वर्षमें दैत्य कमलासुरकी सेनाका वध, मरे हुए सैनिकोंका मयूरेश्वरकी कृपासे मुक्ति प्राप्त करना ब्रह्माजी बोले-दसवें वर्षकी बात है, एक दिन जब भगवान् महेश्वर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उनके वामभागमें देवी गिरिजा विराजमान थीं, और वे भगवान् शिव सात करोड़ गणोंसे घिरे हुए थे तथा अपने आँगनमें नृत्य करते हुए शिशु मयूरेशको देख रहे थे, उसी समय गौतम आदि मुनिगण उनके पास आये और उन्होंने भगवान् शिवको प्रणाम किया ॥ १-२ ॥ तदनन्तर वे प्रबुद्ध मतिवाले मुनिगण महान् ओज- समन्वित भगवान् महादेवसे बोले- हे शिव ! आप मयूरेशके साथ जितने समयतक यहाँ स्थित रहेंगे, तबतक अनन्त दैत्योंका आगमन यहाँ होता रहेगा, हम लोग इस कारण अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं, अतः हे शिव ! अब आप कहीं अन्यत्र रहनेको चले जायें अथवा हे हर ! आपकी आज्ञा हो तो हम ही कहीं अन्यत्र चले जाते हैं ॥ ३-४ १/२ ॥ शिव बोले-आप लोगोंके साथ मैंने नौ वर्ष अत्यन्त सुखपूर्वक व्यतीत किये हैं। मयूरेशने आनेवाले उन विघ्नोंको भी दूर किया है, आप लोगोंके चले जानेपर हमारे यहाँ स्थित रहनेसे क्या प्रयोजन है ? अतः मैं ही किसी निरापद स्थानपर चला जाऊँगा ॥ ५-६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-भगवान् शिवके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर मुनियोंने उन्हें प्रणाम किया और वे 'देव मयूरेशकी जय हो' ऐसा कहकर अपने स्थानको चले गये। भगवान् शिव भी अपने गणोंको साथ लेकर वृषभपर आरूढ़ होकर तथा पार्वतीसे समन्वित होकर एवं मयूरपर विराजमान मयूरेशको आगे करके अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अपने [अभीष्ट] स्थानको चल पड़े। उस समय विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे समस्त आकाशमण्डल निनादित हो रहा था ॥ ७-९॥ शिवके साथ-साथ जा रहे मयूरेशके पीछे सभी मुनिगण भी [उनको विदा देनेहेतु] गये। उनकी पत्नियाँ भी स्नेहपूर्वक गद्गद कण्ठसे बोलनेवाले अपने बालकोंको साथमें लेकर गयीं। उस समय आकाशके धूलिसे आच्छादित हो जानेके कारण कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। तदनन्तर भगवान् शिवने उन सभी मुनियों एवं बालकोंसहित मुनिपत्नियोंको लौटाकर दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान किया ॥ १०-११ ॥ इसी बीचमें वहाँपर सिन्धुदैत्यके द्वारा भेजा गया महान् [योद्धा] कमलासुर सेना लेकर आ पहुँचा। वह परम मायावी असुर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवताओंसे भी अजेय था। उसे देखकर मुनिगण भाग चले ॥ १२-१३ ॥ [वे आपसमें कहने लगे-] हे मुनियो ! अरे, भगवान् शंकरका परित्याग करके तो कहीं भी नहीं रहा जा सकता। अब हम कहाँ जायें, अब तो इस दैत्यराजके द्वारा हम मारे ही गये हैं ॥ १४ ॥
क्री०ख०-अ०१०१ ] * मयूरेश्वरद्वारा दसवें वर्षमें दैत्य कमलासुरकी सेनाका वध * ५१५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इस प्रकार विचार करनेके उपरान्त वे सभी भयभीत मुनिगण पुनः भगवान् शंकरके समीप आ पहुँचे और उनसे कहने लगे कि हे महेश्वर ! इस दैत्यराजसे हमारी रक्षा कीजिये। आप मयूरेशके साथ सर्वदा हमारे साथ रहिये, यदि ऐसा नहीं होगा, तो आपके अनुगामी हम सभी भयभीत होते रहेंगे ॥ १५-१६॥ उन सभीने मार्गमें कमलासुरको आता हुआ देखा, उसके साथ बारह अक्षौहिणी सेना थी, उसने आकाशमण्डलको धूलिसे आच्छादित कर दिया था ॥ १७॥ उसकी सेनाके गजारोही सबसे आगे चल रहे थे। तदनन्तर रथारोही, घुड़सवार और सबसे पीछे पैदल सेना चल रही थी। उन सैनिकोंके शस्त्रोंकी चमचमाहटके सामने सूर्यका प्रकाश कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। उस समय गजारोही, अश्वारोही, रथारोही तथा पैदल सेनाके विविध प्रकारके शस्त्रोंके संघर्षणसे मिश्रित महान् कोलाहलकी ध्वनि हो रही थी ॥ १८-१९ ॥ आगे-आगे चल रहे शिवके गुप्तचर दूतोंने उस महान् दैत्यको देखा। वह महादैत्य शंखासुरका भाई था और विविध प्रकारके वस्त्राभूषणोंको धारण किये हुए था। उसने अनेकों प्रकारके आयुधोंको धारण कर रखा था। गणोंने आकर उसके विषयमें शिवको समाचार बतलाया। उसके पैरके आघातसे तत्काल कूर्म, शेष आदि कम्पित हो उठते थे ॥ २०-२१॥ आगे-आगे जा रहे मुनिगण उसे देखकर भयभीत होकर भूमिपर गिर पड़े, तदनन्तर उन्होंने मयूरेशसे कहा- हे मयूरेश ! हे महाभाग ! आप हम सबकी रक्षा किस प्रकारसे करेंगे ? ॥ २२ ॥ ब्रह्माजी बोले- उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे गुणेश्वर बोले- हे मुनिश्रेष्ठो ! भगवान् शिवके रहते हुए आप लोगोंको कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये। तदनन्तर मयूरेशने भगवान् शिवको प्रणामकर उनसे कहा ॥ २३ १/२ ॥ देव गुणेश्वर बोले- कमलासुर नामक दैत्य बहुत बड़ी सेनाके साथ आया है, यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो मैं शीघ्र ही युद्धके लिये जाऊँ ॥ २४ १/२ ॥ शिव बोले- हे पुत्र ! तुमने बहुत अच्छी बात कही है, इससे मेरे हृदयको बड़ा आनन्द हुआ है। वह दैत्यश्रेष्ठ बारह अक्षौहिणी सेनाको साथ लेकर आया हुआ है, फिर तुम अकेले क्यों जाओगे, तुम सात करोड़ गणोंसे समन्वित होकर जाओ। तुम विजय प्राप्त करो। उस महान् बलशाली शत्रुको तुम शीघ्र ही मार डालो ॥ २५-२६ १/२ ॥ देव बोले- हे स्वामिन् ! आपके कृपाप्रसादसे मैं तीनों लोकोंको दग्ध कर सकता हूँ, ऐसा मेरा विश्वास है, मैंने कितने ही दैत्योंको मार नहीं डाला है, क्या वह सब आपको ज्ञात नहीं है। फिर इस दैत्यकी गणना ही क्या है, मैं शीघ्र ही विजय प्राप्तकर वापस लौटूँगा ॥ २७-२८ ॥ ब्रह्माजी बोले- पुत्र गुणेश्वरका यह वचन सुनकर भगवान् शिवने उनका आलिंगन किया और सिरपर अपना मंगलमय हाथ रखकर हाथमें त्रिशूल धारण कराया ॥ २९ ॥ तदनन्तर भगवान् शिवने गणोंसे समन्वित अपने पुत्र मयूरेश्वरको युद्धकी आज्ञा प्रदान की। महान् जयघोषके साथ दसों दिशाओंको निनादित करते हुए विघ्नोंका विनाश करनेवाले तथा युद्ध करनेकी लालसावाले वे मयूरेश्वर प्रमथगणोंके साथ निकल पड़े। उस समय पार्वतीसहित भगवान् शिव भी वृषभपर आरूढ़ होकर युद्ध देखनेकी इच्छासे उनके पीछे-पीछे गये ॥ ३०-३१ ॥ बहुत विशाल दैत्यसेनाको देखकर मयूरेशने अपने शरीरसे बहुत बड़ी सेनाको प्रकट किया, तदनन्तर दोनों सेनाओंमें युद्ध होने लगा ॥ ३२ ॥ मयूरेशके विग्रहसे प्रकट वे वीर सैनिक साक्षात् कालके समान ही थे। वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका भक्षण करनेमें तत्पर दिखते थे। वे मेरुपर्वतके समान विशाल थे और अपने [गर्जनेकी] ध्वनिमात्रसे पर्वतशिखरको भी गिरा डालनेवाले थे। तदनन्तर भीषण युद्ध प्रारम्भ होनेपर दोनों सेनाओंके वीर परस्पर एक-दूसरेपर आघात करने लगे। उस समय सर्वत्र महान् अन्धकार छा गया। सभी दिशाएँ उठी हुई धूलिसे आच्छादित हो गयीं ॥ ३३-३४ ॥ उस समय दैत्योंको यह महान् आश्चर्य हुआ कि
५१६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
पहले तो यह मयूरेश अकेला ही था, फिर कैसे यह अनेक रूपवाला हो गया, निश्चित ही यह कोई परम पुरुष है और पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये यह भगवान् शिवके यहाँ अवतीर्ण हुआ है ॥ ३५१/२॥ दैत्यके स्वरूपको अत्यन्त विस्तारवाला देखकर उन प्रभु मयूरेश्वरने भी योगमायाका आश्रय लेकर सहसा ही उससे भी बड़ा अपना स्वरूप बना लिया ॥ ३६१/२॥ उस समय उन महापराक्रमी देव मयूरेशके दस हाथ थे और दसों हाथोंमें वे दस आयुध धारण किये हुए थे। तदनन्तर मयूरेश और उस दैत्यका नाना प्रकारके शस्त्रोंके प्रहारसे और नाना प्रकारकी युद्धकलाओंके द्वारा परस्पर युद्ध होने लगा ॥ ३७-३८॥ मयूरेशके साथ आये गण तथा उस दैत्यके सैनिक कभी अलग-अलग होकर और कभी समूह बनाकर परस्पर युद्ध कर रहे थे। वे कभी मुट्ठीके प्रहारसे तथा कभी दाँतोंके काटनेसे तो कभी अस्त्र-शस्त्रोंके द्वारा एक-दूसरेसे युद्ध कर रहे थे ॥ ३९ ॥ इस युद्धमें किन्हींके सिर फूट गये, किन्हींके मुख भग्न हो गये, कोई-कोई जानु तथा जंघासे रहित हो गये और कोई रणभूमिमें गिर पड़े ॥ ४० ॥ अस्त्रों तथा शस्त्रोंके घात-प्रतिघातकी ध्वनिसे दसों दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए वे योद्धा धूलके द्वारा अन्धकार छा जानेके कारण अपना तथा अपने स्वामीका नाम ले-लेकर परस्पर प्रहार कर रहे थे ॥ ४१ ॥ उस युद्धमें सिर कटे हुए धड़ अपने सामने आनेवाले अपने पक्षके तथा शत्रुपक्षके वीरोंको मार रहे थे। अन्ततः दैत्य कमलासुरकी सेनाके सैनिक पराजित होकर उस दैत्यके समीप चले गये और उन्होंने कमलासुरको बतलाया कि असंख्य दैत्य मारे जा चुके हैं और उनके रक्तकी नदियाँ प्रवाहित हो चली हैं ॥ ४२१/२॥ दैत्य बोला—इन्द्र आदि लोकपालों तथा ब्रह्मा आदि देवतागणोंको जिसने जीत लिया है, उससे युद्ध करनेमें यहाँपर कौन समर्थ हो सकता है! पृथ्वीको उलट देनेमें अन्य कौन समर्थ हो सकता है! ॥ ४३-४४॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर उस दैत्य कमलासुने अपने शस्त्रोंको लहराया, जिसके कारण सम्पूर्ण जगत् कम्पित हो उठा। क्रोधसे लाल हुए नेत्रोंवाले उस दैत्यराजने मयूरेशके उन सभी गणोंको मार गिराया, जो नाना वाहनोंपर आरूढ़ थे और विविध शस्त्रोंको धारण किये हुए थे। उसने युद्धमें उनके सिर, पैर और कमरको काट डाला था तथा हाथोंको तोड़ डाला था ॥ ४५-४६॥ उस दैत्यके इस प्रकारके उत्कट पराक्रमको देखकर मयूरेश उसके समक्ष गये। उन्होंने अपनी गर्जनासे आकाशमण्डल तथा स्वर्गको निनादित करते हुए अपने दसों शस्त्रोंसे शत्रुओंको मारा। इस कारण असंख्य दैत्य मृत्युको प्राप्त हुए और उन्होंने अत्यन्त दुर्लभ मुक्ति प्राप्त की ॥ ४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दैत्यसेनाके वधका वर्णन' नामक एक सौ एकवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०१ ॥
एक सौ दोवाँ अध्याय दैत्य कमलासुर और मयूरेश्वरके युद्धका वर्णन ब्रह्माजी बोले—अपनी बहुत-सी सेनाके नष्ट हो जानेपर दैत्यराज कमलासुर अत्यन्त क्रुद्ध हो गया और वह अश्वपर आरूढ़ होकर हाथमें तलवार लेकर मयूरेशके साथ युद्ध करनेके लिये निकल पड़ा ॥ १ ॥ उसे देखकर मयूरेश अपने वाहन मयूरपर सवार हुए, तदनन्तर उन मयूरेशको शीघ्र ही अपनी ओर आता हुआ देखकर उस दैत्यराजने दैत्यगुरु शुक्राचार्यद्वारा उपदिष्ट मन्त्रका आदरपूर्वक सौ बार जपकर उस पन्नागास्त्रको मयूरेशपर चलाया। उस समय उस पन्नागास्त्रके तेजसे सभी दिशाएँ जलने लगीं ॥ २-३॥ तदनन्तर देव मयूरेशकी सेनाके सैनिकोंको सर्पसेनाके सैनिकोंने आवेष्टित कर लिया। कुछ सैनिक मृत्युको
क्री०ख०-अ०१०२] * दैत्य कमलासुर और मयूरेश्वरके युद्धका वर्णन * ५१७
[बायाँ स्तम्भ]
प्राप्त हो गये, कुछ भाग चले और कुछ सैनिक भूमिपर गिर पड़े। अत्यन्त बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न उस दैत्यराज कमलासुरकी प्रशंसा करते हुए देव मयूरेशने कहा—हे दैत्यराज ! तुम बड़ी कुशलतासे युद्ध कर रहे हो, मैंने इस प्रकारका कोई योद्धा देखा नहीं है ॥ ४-५ ॥
ऐसा कहकर देव मयूरेशने शत्रु कमलासुरके ऊपर गरुडास्त्र छोड़ा, तब सर्प भाग गये और इधर मयूरेश्वरके सैनिक उठ खड़े हुए ॥ ६ ॥
तदनन्तर देव मयूरेशने चक्रास्त्र छोड़ा, जो दैत्यसेनाका संहार करनेवाला था, उस चक्रास्त्रके प्रहारसे कुछ दैत्य मर गये और किन्हींके पैर तथा मस्तक कट गये ॥ ७ ॥
किन्हींके जानु और जंघा कट गये और कुछ गुल्फके कट जानेसे भूमिपर गिर पड़े। वे 'भागो, भागो' इस प्रकारसे और 'हे माता ! हे पिता ! हे भ्राता !' इस प्रकारसे चिल्ला रहे थे ॥ ८ ॥
जिन्होंने मयूरेश्वरका दर्शन करते हुए प्राणोंको छोड़ा था, वे दैत्य मुक्तिको प्राप्त हो गये। इस प्रकारसे दैत्य कमलासुरकी सारी सेना परास्त हो गयी और तब दैत्य कमलासुर अत्यन्त क्रुद्ध होता हुआ दौड़ पड़ा ॥ ९ ॥
वह हाथमें खड्ग धारणकर अत्यन्त क्रुद्ध हो गर्जना करते हुए बड़े वेगसे गजाननकी ओर आया। उस प्रकारके शत्रुको देखकर प्रभु मयूरेशने हाथमें परशु धारण कर लिया। वे दैत्यकी ओर दौड़ पड़े और उन्होंने अत्यन्त वेगसे उस परशुको कमलासुरपर छोड़ा। उस परशु नामक आयुधने अपने तेजसे आकाश, दिशाओं तथा पक्षिसमूहोंको जलाते हुए दैत्यके हाथमें विद्यमान खड्गको बड़े वेगसे काट डाला, जिससे उस खड्गके सौ टुकड़े हो गये ॥ १०-११ १/२ ॥
खड्गके टूट जानेपर उसने एकाएक धनुषको उठा लिया और उसपर डोरी चढ़ाकर बहुतसे बाणोंका संधानकर उनसे बलपूर्वक असंख्य सैनिकोंको बींधते हुए उन बाणोंसे आकाश एवं समस्त दिशाओंको आच्छादित कर डाला। फिर वह दैत्य मेघकी ध्वनिके समान गर्जना करने लगा ॥ १२-१३ ॥
उन बाणोंके द्वारा अन्धकार छा जानेपर कोई
[दायाँ स्तम्भ]
भी कहीं भी दिखायी नहीं दे रहा था। तदनन्तर बलवान् मयूरेशने अपने बाणोंके आघातसे दैत्यद्वारा छोड़े गये बाणोंके जालका निवारणकर शीघ्र ही उस कमलासुरके घोड़ेको भूमिपर गिरा दिया। तब वह कमलासुर अन्तरिक्षमें चला गया और वहाँसे गणनायक मयूरेशसे कहने लगा— ॥ १४-१५ ॥
तुमने मेरे घोड़ेको गिरा डाला है, तो अब तुम मेरे महान् कौतुकको देखो। हे गुणेश्वर ! मैं तुम्हारे देखते-देखते तुम्हारे मोरको मार डालूँगा ॥ १६ ॥
तदनन्तर दैत्य कमलासुरने अपने दोनों तूणीरोंमें स्थित बाणोंको नीचे भूमिमें गिराया और धनुषको कानतक खींचकर उन बाणसमूहोंको मयूरेश्वरकी सेनाकी ओर चलाया। उसने मयूरेशकी सेनाके सभी सैनिकोंको मारते हुए बाणोंके जालकी इस प्रकार वर्षा की, जैसे कि वर्षाऋतुमें मेघ वर्षा करते हैं ॥ १७-१८ ॥
उस शरवर्षाके द्वारा मयूरेशकी सेनाके कुछ गणोंके शरीरके सभी अंग कट गये, कुछ देवोंने प्राणोंका त्याग कर दिया। इस प्रकारसे अपनी सेनाके वीरोंको विनष्ट होते देखकर मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने कमलासुरके बाणोंसे आविद्ध अपने वाहन मयूरको छोड़कर पाश उठाकर अपने हाथमें आदरपूर्वक ले लिया ॥ १९-२० ॥
उन्होंने आकाशको गुँजाते हुए भयंकर गर्जना की और अत्यन्त तेजस्वी उस पाशको छोड़ा। उस पाशने दैत्यगणोंको गिराते हुए शत्रुसैनिकोंको जला डाला ॥ २१ ॥
तदनन्तर वह पाश दैत्यसेनाके अधिपति कमलासुरके कण्ठमें जाकर लगा, जिससे उसका श्वास रुक गया। तब उस दैत्यने अपना दूसरा रूप बना लिया ॥ २२ ॥
उसने उसी क्षण अपने सिरसे सूर्यमण्डलको ढक दिया। अत्यन्त घोर अन्धकार छा जानेके कारण उस समय कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा रहा था ॥ २३ ॥
इसके बाद वह दैत्य अत्यन्त क्रोधाविष्ट होकर मयूरेशके सामने आ खड़ा हुआ और बोला—अरे बालक ! तुम मेरे साथ युद्ध क्यों कर रहे हो, जाओ अपनी माताके स्तनोंका पान करो ॥ २४ ॥
५१८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बालकोंके साथ खेल खेलो, नहीं तो तुम मेरे सामने | लोकोंको जला डालेगा। तथापि मैं संसारमें तुम्हारी ही मृत्युको प्राप्त हो जाओगे। मेरे तो चिल्लानेमात्रसे | कीर्तिको स्थापित करनेके लिये प्रसन्नचित्त होकर तुम्हारे तीनों लोक काँप उठते हैं॥ २५॥ | साथ युद्ध कर रहा हूँ। यदि ऐसा नहीं होता तो अभीतक मेरे द्वारा पैरको भूमिमें रख देनेमात्रसे शेषनाग भी | मैंने केवल हुंकारमात्रसे तुम्हें यमलोक पहुँचा दिया नीचेको दबने लगता है। मेरे द्वारा किये गये मुट्ठीके | होता॥ २९१/२ ॥ प्रहारमात्रसे बड़े-बड़े पर्वत चूर-चूर हो जाते हैं। मैं | ब्रह्माजी बोले—बालक मयूरेशके इन वचनोंको अपने नाखूनके अग्रभागसे ही तुम्हारे सिरको काटकर | सुनकर वह दैत्य कमलासुर क्रोधकी अग्निमें जलता रसातलमें पहुँचा दूँगा॥ २६१/२ ॥ | हुआ अत्यन्त व्याकुल हो उठा और उसने सिंहके समान ब्रह्माजी बोले—उस दुर्बुद्धि कमलासुर दैत्यके | गर्जना की, उस गर्जनाकी प्रतिध्वनिसे दिशाएँ तथा इस प्रकारके वचनोंको सुनकर गजानन बोले—तुम | विदिशाएँ निनादित हो उठीं। उस महान् शब्दसे तत्काल पिशाचकी भाँति और मद्यपान किये हुए व्यक्तिकी भाँति | अनेकों स्त्रियोंके गर्भ गिर पड़े॥ ३०-३१॥ मेरे सामने क्यों बकवास कर रहे हो, देवताओं तथा | मयूरेशकी सेनाके प्रमथ आदि बहुत-से गण ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला कभी भी विजय प्राप्त नहीं | मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। तदनन्तर दैत्य कमलासुरने कर सकता॥ २७-२८॥ | धनुषको कानतक खींचकर छोड़ा और मयूरेश तथा यदि मैं क्रुद्ध हो जाऊँगा तो मेरा वह क्रोध तीनों | उनकी सेनापर बाणोंकी भीषण वर्षा की॥ ३२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कमलासुरके साथ मयूरेशके संग्रामका वर्णन' नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०२॥ एक सौ तीनवाँ अध्याय कमलासुर और मयूरेशका भीषण युद्ध, कमलासुरके रक्तबिन्दुओंसे अनेक दैत्योंकी उत्पत्ति, देवी सिद्धि-बुद्धिकी सेनाके सैनिकोंद्वारा उन असुरोंका भक्षण, मयूरेश्वरद्वारा कमलासुरका वध और मुनिगणोंद्वारा की गयी मयूरेश्वर-स्तुति ब्रह्माजी बोले—उस दैत्य कमलासुरका वैसा | किया। तदनन्तर वह दैत्यराज कमलासुर ज्यों ही उत्कट पराक्रम देखकर देव मयूरेश अत्यन्त शीघ्रतासे | भागनेके लिये उद्यत हुआ, त्यों ही देव मयूरेशने उसकी उस दैत्यके सामने आये और बाणोंकी वर्षासे उसपर | चोटी पकड़कर पुनः उससे कहा—अरे दैत्येन्द्र! ठहर प्रहार करने लगे। दैत्य कमलासुरने भी अपने अत्यन्त | जाओ, अपने द्वारा कहे गये उन प्रगल्भ वचनोंका स्मरण शीघ्रगामी बाणोंसे मयूरेशद्वारा की गयी बाणवृष्टिको | करो और मुझसे युद्ध करो॥ ४-५॥ रोका। यह देखकर गुणोंको ग्रहण करनेवालोंमें श्रेष्ठ | तदनन्तर दैत्य कमलासुरने उन मयूरेशको जब भगवान् मयूरेश उसपर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए॥ १-२॥ | अकेला ही अपने सामने खड़ा देखा, तब वह महाबली उन्होंने उस दैत्य कमलासुरको अपने विराट् | एकाएक युद्धके लिये दौड़ पड़ा और उसने महान् गर्जना विश्वरूपका दर्शन कराया। उस समय कमलासुरने दसों | की। तब दस आयुध धारण करनेवाले देव विघ्नराजने दिशाओंमें मयूरेशको ही देखा॥ ३॥ | उस समय उससे युद्ध आरम्भ कर दिया और शस्त्रोंके तब विस्मित होकर उसने अपने नेत्रोंको बन्द कर | आघातसे उसके शरीरको भेद डाला॥ ६-७॥ लिया और अपने हृदयदेशमें भी उन मयूरेशका ही दर्शन | उस कमलासुरके शरीरका रक्तबिन्दु जहाँ गिरता
क्री०ख०-अ०१०३ ] * कमलासुर और मयूरेशका भीषण युद्ध * ५१९ था, वहीं एक दूसरा असुर उत्पन्न हो जाता था, जो उसी कमलासुरके समान रूपवाला और उसीके समान बल- पराक्रमसे सम्पन्न रहता था, इस प्रकार वहाँ असंख्य असुर उत्पन्न हो गये। विविध प्रकारके अस्त्रों तथा शस्त्रोंसे तथा बाणोंकी वर्षासे वे मयूरेशपर आघात करने लगे। तदनन्तर क्रोधाग्निमें जलते हुए देव मयूरेशको उन असुरोंने घेर लिया ॥ ८-९ ॥ उसी समय साढ़े तीन करोड़ सैनिकोंके साथ देवी सिद्धि एवं बुद्धि अत्यन्त क्रुद्ध होकर वहाँ उपस्थित हुईं और फिर युद्ध होने लगा ॥ १० ॥ सिद्धि एवं बुद्धि नामक वे दोनों देवियाँ गणराजसे कहने लगीं-क्षुधाको दूर करनेवाला भक्ष्य पदार्थ हमें प्रदान कीजिये। तब देव गणराज बोले-आप लोग दैत्योंके रक्तसे उत्पन्न उन बहुत-से असुरोंका भक्षण करें। मयूरेशके द्वारा इस प्रकार कही गयी उन देवियोंने उस समय भूतगणोंके साथ मिलकर शीघ्र ही उन सभी दैत्योंको खा डाला। देव मयूरेशने अपने खड्गसे उस दैत्य कमलासुरपर प्रहार किया तो उसके रक्तसे पुनः सैकड़ों दैत्य उत्पन्न हो गये ॥ ११-१३ ॥ तब देवियोंने तथा उनके सैनिकोंने कमलासुरके रक्तसे उत्पन्न उन सभी दैत्योंका फिर भक्षण कर लिया तथा चारों ओर प्रवाहित रक्तको भी पी डाला। तदनन्तर अत्यन्त खिन्न हुए मयूरेशने अत्यन्त शीघ्रगामी शूलको उठाकर उस दैत्य कमलासुरपर छोड़ा। वह शूल दसों दिशाओंको जलाता हुआ, पर्वतोंको चूर-चूर करता हुआ, आकाशको निनादित करता हुआ और ग्रह- नक्षत्रोंको गिराता हुआ बड़े ही वेगसे गिरा और उसने उस दैत्यके शरीरका भेदन करते हुए उस शरीरके तीन टुकड़े कर डाले ॥ १४-१५ १/२ ॥ उस कमलासुर दैत्यका कटा हुआ मस्तक भीमा नदीके दक्षिणी तटपर गिरा। उसके दोनों पैर कृष्णा नदीके उत्तरी तटपर गिरे और वक्षःस्थल वहाँपर गिरा, जहाँ गुणेश्वर खड़े थे। उस समय सभी लोग अत्यन्त प्रसन्न मनवाले हो गये और वे गुणेश्वरकी जय-जयकार करने लगे ॥ १६-१७ ॥ वे बोले- हे देव मयूरेश ! आपकी जय हो, आपने दुष्टोंका विनाश किया है। उसी समय अपने गणोंसे घिरे हुए गौरीपति भगवान् शंकर वहाँ आये ॥ १८ ॥ उनके साथमें गौतम आदि मुनिगण तथा देवी पार्वती भी थीं। उस समय सभी वाद्य बज रहे थे और आकाशसे पुष्पवृष्टि हो रही थी। तब देवी पार्वतीने मयूरेशका आलिंगनकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उन्हें अपना स्तनपान कराया और वे मुनिगण देवताओंके ईश उन मयूरेश्वरकी स्तुति करने लगे ॥ १९-२० ॥ मुनिगण बोले- लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके हृदयमें विराजमान होकर जो हृदयके आनन्दको बढ़ानेवाले हैं, रमाकान्त विष्णुके द्वारा वन्दित हैं, कमलासुरका विनाश करनेवाले हैं, देवी लक्ष्मीके द्वारा जिनके चरण सदा सेवित होते रहते हैं, उन लक्ष्मी प्रदान करनेवाले आप मयूरेशकी जय हो ॥ २१ १/२ ॥ हे ईश ! आप कमलके आसनपर विराजमान रहनेवाले ब्रह्माद्वारा सदा वन्दित होते रहते हैं, आप कमलाकर अर्थात् चन्द्रमाके समान शीतलता प्रदान करनेवाले हैं, कमलके चिह्नसे सुशोभित चरणकमलोंवाले हैं, आपके श्रेष्ठ हाथ कमलके चिह्नसे सुशोभित हैं, आप लक्ष्मीके भाई चन्द्रमाको तिलकके रूपमें धारण करनेवाले हैं, भक्तजनोंको आप लक्ष्मी प्रदान करनेवाले हैं, आप कमला लक्ष्मीके पुत्र कामदेवके शत्रु भगवान् शिवके पुत्र हैं, कमलाके पुत्र कामदेवके समान सुन्दर हैं और लक्ष्मीके पिता समुद्रसे उत्पन्न होनेवाले रत्नोंकी मालासे सुशोभित हैं, आपकी जय हो। कमलासुरके द्वारा चलाये गये बाणोंका आपने अपने कमलके द्वारा निवारण किया है, कमलाकान्त श्रीहरिके द्वारा धारित कमलके कोशकी शोभाको जीत लेनेवाले करकमलसे युक्त-आपकी जय हो ॥ २२-२५ ॥ सभी प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाले हे मयूरेश ! आप लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके हाथमें विराजमान रहनेवाले कमलकोशके समान नेत्रोंवाले हैं और सभीके हृदयरूपी कमलको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं, आपकी जय हो। हे देव ! आप अपने करकमलोंमें कमल तथा अंकुश धारण करते हैं, समस्त विघ्नोंके विनाशक हैं और अविनाशी हैं, आपकी जय हो। आपने ऐसे पापरूपी
५२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 शत्रु Host विनाश किया है, जो इन्द्र आदि देवताओंको भी | कामनाओंको पूर्ण करने लगे और समस्त विघ्नसमूहोंका भय प्रदान करनेवाला था; वज्र, चक्र आदि आयुधोंसे भी | निवारण करने लगे। तदनन्तर देवशिल्पी विश्वकर्माने अभेद्य था और जो मुनिजनोंको भी भयभीत करनेवाला | वहाँपर एक सुन्दर मन्दिरका निर्माण किया ॥ ३१-३२ ॥ था* ॥ २६-२७ १/२ ॥ | वह मन्दिर असंख्य द्वारों, असंख्य शिखरों तथा ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर | असंख्य आश्चर्योंसे समन्वित था। वहाँपर एक सुन्दर गौतम आदि महर्षियोंने उन मयूरेश्वरका पूजन किया। | नगर भी बस गया, जिसमें सभी प्रकारके लोग निवास भगवान् शिवने भी अपने दस हाथोंके द्वारा मयूरेशका | करते थे ॥ ३३ ॥ आलिंगनकर उनकी पूजा की। तदनन्तर वे मुनिगण | महर्षियोंने उस नगरका नाम मयूरेशपुर रखा और मयूरेश्वर तथा भगवान् शिवसे बोले— ॥ २८-२९ ॥ | नाना प्रकारके भवनों (आश्रमों)-में स्थित होकर मुनिजनोंने सभी देवताओंके साथ आप यहाँपर भक्तोंके | वहाँपर तपस्या की ॥ ३४ ॥ मनोरथोंको सिद्ध करते हुए तथा सभी विघ्नसमूहोंका | भगवान् शिव भी देवी पार्वती तथा गणोंके साथ निवारण करते हुए सर्वदाके लिये विराजमान रहें ॥ ३० ॥ | वहाँपर तप करने लगे। वे द्विजगण भगवान् शिवका भी इस प्रकारसे प्रार्थना किये गये लोककल्याण | ध्यान-पूजन तथा स्मरण वहाँपर करने लगे। देव मयूरेश करनेवाले वे दोनों भगवान् शंकर और देव मयूरेश्वर सभी | पहलेकी ही भाँति मुनिबालकोंके साथ [वहाँ पर] क्रीडा देवताओंके साथ वहाँपर स्थित हो गये। वे भक्तोंकी | करने लगे ॥ ३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कमलासुरके वधका वर्णन' नामक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०३ ॥ एक सौ चारवाँ अध्याय ब्रह्माजीद्वारा मयूरेशकी स्तुति, स्तुतिका माहात्म्य, 'कमण्डलुभवा' नामक नदीका प्राकट्य, मयूरेशकी मायासे ब्रह्माका मोहित होना, मयूरेशकी परीक्षाके लिये ब्रह्माद्वारा सृष्टिका तिरोधान, मयूरेशद्वारा पुनः सृष्टि कर लेना और ब्रह्माजीको अपने विश्वरूपका दर्शन कराना ब्रह्माजी बोले—हे द्विजश्रेष्ठ व्यासजी! मैं भी | और सर्वथा अचिन्त्य हैं, उन देव मयूरेशको मैं प्रणाम गुप्तरूपसे उन मयूरेश्वरका दर्शन करने गया था, वहाँ | करता हूँ। जो परसे भी परे हैं, चिदानन्दस्वरूप हैं, मैंने पार्वतीके साथ उन प्रभु मयूरेश्वरका दर्शन किया ॥ १ ॥ | निर्विकार हैं, भक्तजनोंके हृदयमें निवास करनेवाले हैं, वे स्नान करनेके अनन्तर आसनपर बैठे हुए थे और | गुणातीत हैं, और गुणमय हैं, उन मयूरेशको मैं प्रणाम सनातन परब्रह्म (गायत्रीमन्त्र)-का जप कर रहे थे। तब | करता हूँ ॥ ३-४ ॥ मैंने उन मयूरेश्वर नामवाले देवकी स्तुति की ॥ २ ॥ | जो अपनी इच्छाके अनुसार इस जगत्की सृष्टि जो पुराणपुरुष हैं, प्रसन्नतापूर्वक नाना प्रकारकी | करते हैं, उसका पालन-पोषण करते हैं और पुनः उसका क्रीडाएँ करते हैं, अनेक प्रकारकी माया रचनेवाले हैं | संहार भी कर डालते हैं, उन सब प्रकारके विघ्नोंका नाश
- कमलाकान्तहृदयहृदयानन्दवर्धन । कमलाकान्तनमित कमलासुरनाशन ॥ कमलासेवितपद जय त्वं कमलाप्रद । कमलासनवन्द्येश कमलाकरशीतल ॥ कमलाङ्कुसुपादाब्ज कमलाङ्गितसत्कर । कमलाबन्धुतिलक भक्तानां कमलाप्रद ॥ कमलासुनुरिपूज कमलासुनुसुन्दर । कमलापितुरत्नानां मालया जय शोभित ॥ कमलासुरबाणानां कमलेन निवारक । कमलाकान्तकमलकोशाजितकरपङ्कज ॥
क्री०ख०-अ०१०४ ] * ब्रह्माजीद्वारा मयूरेशकी स्तुति * ५२१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करनेवाले देव मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५ ॥ जो इन्द्र आदि देवताओंके द्वारा रात-दिन वन्दित होते रहते हैं, जो सत् तथा असत् रूप हैं और व्यक्त तथा अव्यक्त हैं, उन मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६ ॥ जो अनेकों दैत्योंका वध करनेवाले हैं, विविध प्रकारके स्वरूपोंको धारण करनेवाले हैं और नाना प्रकारके आयुधोंको धारण करते हैं, उन मयूरेशको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥ जो सभी प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न हैं, सभी रूपोंमें अभिव्यक्त हैं, सब प्रकारसे समर्थ हैं और सभी विद्याओंके उपदेष्टा हैं, उन देव मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ। जो माता पार्वतीके पुत्र हैं, भगवान् शंकरके आनन्दकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं और भक्तोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं तथा नित्य हैं, उन मयूरेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ८-९ ॥ जो मुनियोंके द्वारा ध्येय हैं, मुनियोंके द्वारा वन्दित हैं, मुनिजनोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, ऐसे उन आप समष्टि-व्यष्टिरूप मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सभी प्रकारके अज्ञानका निवारण करनेवाले हैं, सभी प्रकारका ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं, सर्वथा पवित्र हैं, सत्य एवं ज्ञानमय हैं तथा सत्यस्वरूप हैं, उन मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १०-११ ॥ जो अनेकों करोड़ ब्रह्माण्डोंके अधिनायक हैं, जगत्के ईश्वर हैं, अनन्त विभवस्वरूप हैं और विष्णुरूप हैं, उन मयूरेशको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १२ ॥ [हे देव !] आपका दर्शन प्राप्तकर मैं सर्वथा पवित्र हो गया हूँ और परमानन्दमें निमग्न हो गया हूँ। आपके द्वारा उस कमलासुर नामक दैत्यके मारे जानेपर मैं परम आश्चर्यान्वित हो गया हूँ* ॥ १३ ॥ जिस दैत्य कमलासुरने देवराज इन्द्र, यमराज, सभी देवता और लोकपालोंको बलपूर्वक जीत लिया था, जो हजारों, सैकड़ों वीरोंसे एक साथ युद्ध करनेवाला तथा असंख्य देह धारण करनेवाला था, उसे आपने युद्धमें मार गिराया है, और वह कमलासुर तीन टुकड़ोंमें विभक्त होकर तीन अलग-अलग स्थानोंपर गिरा है ॥ १४ १/२ ॥ ऐसा कहकर उन मयूरेशका मैंने पूजन किया। मैंने अपने कमण्डलुमें स्थित सभी तीर्थोंके पापनाशक एवं पवित्र जलोंसे उनका अभिषेक किया। दिव्य दो वस्त्रोंको धारण कराया, दिव्य गन्धका अनुलेपन किया, अत्यन्त शुभ दिव्य पुष्पोंसे निर्मित वनमाला उनके कण्ठमें पहनायी और सब प्रकारके मंगलोंका जनक 'वनमाली' यह सभी लोकोंमें विख्यात नाम मैंने उनका रखा ॥ १५-१७ ॥ इस प्रकारसे पूजाकी विधि सम्पन्न करनेके अनन्तर मैंने उनकी प्रदक्षिणा की। प्रदक्षिणा करते समय मेरे चरणोंकी ठोकर लगनेसे वहाँपर जो कमण्डलु था और जो नाना तीर्थोंके जलसे पूर्ण था, एकाएक उलट गया। मैं उस जलको कमण्डलुमें भरनेका प्रयत्न करने लगा, किंतु तभी वे प्रभु मयूरेश मुझसे बोले ॥ १८-१९ ॥ मयूरेश बोले- ब्रह्माजीद्वारा किया गया यह स्तोत्र सभी प्रकारके पापोंका नाश करनेवाला है। यह मनुष्योंकी
- पुराणपुरुषं देवं नानाकीडाकरं मुदा। मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदि स्थितम् । गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया । सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टुतमहर्निशम् । सदसद्व्यक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि बिभ्रतम् । नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरं विभुम् । सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ पार्वतीनन्दनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् । भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम् । समष्टिव्यष्टिरूपं त्वां मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ सर्वाज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् । सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्वरम् । अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ त्वद्दर्शनेन पूतोऽहं परमानन्दनिर्भरः । आश्चर्यं परमं प्राप्तस्तस्य दैत्यस्य मारणात् ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १०४। ३-१३)
५२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ] सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और सभी प्रकारके उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाला है॥ २०॥ हे ब्रह्मा! इस स्तोत्रका पाठ कारागृहमें गये बन्दीजनोंको सात दिन में मुक्त कर देता है। यह स्तोत्र सभी शारीरिक तथा मानसिक व्याधियोंको दूर करनेवाला तथा भोग और मोक्षको प्रदान करनेवाला है ॥ २१ ॥ हे ब्रह्मन्! आप निश्चिन्त हो जायँ, [आपके कमण्डलुसे निर्गत] यह (जलधारा) सभीको पवित्र करनेवाली और लोकमें 'कमण्डलुभवा' इस नामसे विख्यात नदी होगी ॥ २२ ॥ यह नदी अपने दर्शनसे वाचिक पापोंको, स्पर्श करनेसे मानस पापोंको तथा इसमें स्नान करनेसे यह सभी प्रकारके शारीरिक पापोंका विनाश करनेवाली होगी। यह नदी निरन्तर सेवित होनेपर मोक्ष प्रदान करेगी ॥ २३१/२॥ ब्रह्माजी बोले—उन मयूरेशके द्वारा इस प्रकारका वरदान दिये जानेपर उन सभी मुनीश्वरोंने अपनी पत्नियों तथा परिवारके साथ, सात करोड़ गणोंने तथा स्वयं मैंने [भी] उस कमण्डलुभवा नामक नदीमें स्नान किया। साथ ही उन मुनियोंने मेरे साथ वहाँपर तप किया॥ २४-२५॥ तदनन्तर मैं उन मयूरेशकी मायासे मोहित हो गया और तब मैंने बहुत जनोंसे कहा—मैं तो जगत्की सृष्टि करनेवाला, जगत्के द्वारा वन्दनीय तथा इन्द्र आदि सभी देवताओंद्वारा पूजित हूँ, फिर मैंने ग्यारह वर्षके उस बालकको क्यों प्रणाम किया? वह तो अन्य बालकोंके साथ क्रीडा कर रहा था और आचार-विचारसे रहित एक बालक था ॥ २६-२७॥ मेरे ज्ञानको धिक्कार है, मेरी महिमाको धिक्कार है और मेरे पितामहपदको भी धिक्कार है! अब मैं अपने बनाये इस सृष्टि-प्रपंचको छिपाकर स्वयं भी गोपनीय रूपसे रहूँगा ॥ २८ ॥ यदि यह मयूरेश परमात्मा होगा तो पुनः दूसरी सृष्टि कर लेगा—ऐसा मनमें निश्चय करके मैंने अपनी बनायी सृष्टिको तथा स्वयं अपनेको भी अन्तर्धान कर लिया, फिर जब गजाननने अपने मित्र बालकोंको वहाँ नहीं
[दायाँ स्तम्भ] देखा, तो वे उनके घरोंमें उन्हें देखने गये ॥ २९-३०॥ किंतु उन सभी घरोंको लोगोंसे रहित देखकर वे खिन्न हो उठे और उन्होंने जब वृक्षोंकी ओर देखा तो वहाँ वृक्षोंको भी नहीं देखा, न जन्तुओंको देखा और न पशु-पक्षियोंको ही देखा। फिर जब वे मयूरेश स्वर्गलोक गये तो उन्होंने वहाँ उन देवताओंको भी नहीं देखा। न तो गन्धर्व दिखायी पड़े और न किन्नर, यक्ष तथा पितृगण। सूर्य, चन्द्रमा भी नहीं दिखायी पड़े ॥ ३१-३२॥ उस समय अत्यन्त घना अन्धकार छा जानेके कारण कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था। तदनन्तर जब उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो उन्हें यह सब [मुझ] ब्रह्माद्वारा किया गया है, ऐसा ज्ञात हुआ ॥ ३३ ॥ तदनन्तर अखिल जगत्के आत्मरूप देव मयूरेश्वरने अपने सामर्थ्य और अपनी मायाको प्रकट किया, फिर उन्होंने अपनी लीलासे एक दूसरे ही ब्रह्माण्डकी संरचना कर डाली। तब प्रभु मयूरेशने उस ब्रह्माण्डमें स्थावर-जंगमात्मक विश्व तथा सम्पूर्ण त्रैलोक्य और मयूरेशकी पुरीको, जैसे पहले था, उसी रूपमें दिखलाया ॥ ३४-३५ ॥ उन विभु मयूरेशने बालकोंसे घिरे हुए स्वयं अपनेको, वैसे ही दूसरे ब्रह्माजीको, शंकर-पार्वती तथा उसी प्रकारसे तपस्यानुष्ठानमें निरत मुनियों, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह-नक्षत्रों, अनेक स्वर्गों, देवगणों, पृथिवी, सब प्रकारके वृक्षों, समुद्रों, नदियों तथा पातालोंको भी पहलेके समान ही दिखलाया ॥ ३६-३७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] तब उन चिदात्मा मयूरेशका दर्शनकर मुझे स्मृति प्राप्त हुई। उन मयूरेश्वरके द्वारा इस प्रकारसे अन्य सृष्टिकी संरचना देखकर तुच्छ बुद्धिका परित्याग करके मैंने उन्हें प्रणाम किया और उनसे क्षमा-याचना की ॥ ३८१/२ ॥ उस समय मैंने कला, काष्ठा, मुहूर्त आदि और दिन, पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष, कल्प आदि समयरूपी स्वरूप धारण करनेवाले तथा चराचर स्वरूपवाले और असंख्य ब्रह्माण्डोंको अपने रोमकूपोंमें धारण करके सुशोभित होनेवाले, देवता, ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, सरित् एवं
क्री०ख०-अ०१०४] * ब्रह्माजीद्वारा मयूरेशकी स्तुति * ५२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सागरस्वरूपी, मनुष्य, किन्नर, लता, वृक्ष और नाग स्वरूपवाले उन विश्वरूप मयूरेश्वरका इस प्रकार दर्शन करके उदात्त बुद्धिवाला होकर उन्हें प्रणाम किया और उनसे क्षमायाचना की॥ ३९-४११/२॥ मैंने उन मयूरेशका बार-बार दर्शन किया। उस समय वे मुकुट धारण किये हुए थे, कानोंमें कुण्डल, पैरोंमें नूपुर तथा बाहुओंमें बाजूबन्द धारणकर सुशोभित हो रहे थे। उनकी नाभिमें शेषनाग, कण्ठदेशमें वासुकि सर्प विराजमान था। वे दिव्य मालाओं और वस्त्रोंको धारण किये हुए थे॥ ४२-४३॥ वे मयूरेश दिव्य सिंहासनपर विराजमान थे, सभी देवता उनकी स्तुति कर रहे थे, वे सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो पत्नियोंसे समन्वित थे। अणिमादि अष्ट सिद्धियाँ तथा नौ निधियाँ उनकी सेवामें उपस्थित थीं ॥ ४४॥ समग्र चराचर जगत्को मैंने मयूरेशके रूपमें देखा। [जगत्के] प्रत्येक पदार्थ और स्वयं अपने-आपको भी मैंने मयूरेशके ही रूपमें अवलोकन किया ॥ ४५॥ तदनन्तर मैंने उन मयूरेश्वरको प्रणाम किया, बार- बार उनकी स्तुति-प्रार्थना की और कहा-हे देव! आपकी मायासे मोहित होकर अभिमानके वशीभूत हुए तथा आपके प्रभावको देखनेकी इच्छावाले, मुझ दीन तथा शरणमें आये हुए-के अपराधको आप क्षमा करनेकी कृपा करें। क्षणभरमें ही अनन्त ब्रह्माण्डोंकी संरचना करनेवाले आप परमात्माको बार-बार नमस्कार है॥ ४६-४७॥ मैं इस प्रकार कह ही रहा था कि उन्होंने अपनी नासिकासे श्वास लेते हुए उस श्वास-वायुके साथ मुझे अपने उदरमें प्रविष्ट करा दिया। वहाँ भी मैंने वैसे ही सम्पूर्ण विश्वको देखा, जैसा कि मैंने बाहर देखा था ॥ ४८॥ वहाँ मैंने उन देव मयूरेश्वरको भी उसी रूपमें देखा, उनके एक-एक रोमकूपमें करोड़ों-करोड़ ब्रह्माण्ड स्थित थे। सम्पूर्ण चराचर विश्वको भी उसी रूपमें देखा, जैसा कि वह भूमिमें था और जैसा द्युलोकमें था ॥ ४९॥ उनके उदरमें स्थित मैं ऐसे ही जब एक ब्रह्माण्डसे दूसरे ब्रह्माण्डमें प्रविष्ट हुआ तो वहाँ भी मैंने सम्पूर्ण चराचर जगत्को उसी रूपमें देखा। इसी प्रकार अनेकों ब्रह्माण्डोंमें प्रविष्ट होनेपर मैंने वहाँ भी सम्पूर्ण विश्वको देखा, स्वयं अपनेको भी देखा और देवदेव मयूरेशको भी देखा। तब अत्यन्त खिन्न हुआ मैं उन देवेश्वरसे बोला-मैं कहीं भी आपका अन्त नहीं देख रहा हूँ। हे प्रभो! मुझपर कृपा कीजिये, आप अपनी इस मायाको समेट लीजिये। तदनन्तर करुणाके वशीभूत हुए उन देव मयूरेशने क्षणभरमें ही अपनी सम्पूर्ण मायाका तिरोधान कर लिया ॥ ५०-५२॥ तब मैंने मयूरेशको पूर्वकी भाँति देखा, वे बालकोंसे घिरे हुए थे और क्रीडा कर रहे थे। मैं उन्हें प्रणामकर बोला-मैं आपकी मायाको जान नहीं पाया ॥ ५३॥ जैसे माता अपने बच्चेके हजारों अपराधोंको क्षमा कर देती है, वैसे ही आप भी माताके समान मेरे हजारों अपराधोंको क्षमा कर दें। तब मयूरेश मेरे सिरपर हाथ रखकर मुझसे बोले ॥ ५४॥ देव बोले-मुझमें न क्रोध है और न किसीके प्रति भेदबुद्धि ही है, यह अपना है, यह पराया है-ऐसा भ्रम भी मुझमें नहीं है। मुझे किसीसे भी किंचित् भय नहीं है और न मुझसे ही किसीको अणुमात्र भय होना चाहिये ॥ ५५॥ ब्रह्माजी बोले-उनके इस प्रकारके वचन सुनकर मैंने मयूरेशपुरमें स्थित भगवान् शिवको, माता पार्वतीको और मुनिबालकोंके साथ पार्वतीपुत्र मयूरेशको देखा ॥ ५६॥ उनसे अनुमति लेकर मैं अत्यन्त आनन्दित होता हुआ अपने स्थानको चला आया। पार्वती बालक मयूरेशको लेकर अपने स्थानपर चली गयीं और वे मुनिबालक भी अपने-अपने आश्रमोंको चले गये ॥ ५७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विश्वरूपदर्शन' नामक एक सौ चारवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०४॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_18_1_Front
एक सौ पाँचवाँ अध्याय
५२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- एक सौ पाँचवाँ अध्याय मयूरेशकी बारहवीं जन्मतिथिके महोत्सवमें विष्णुभक्त ब्राह्मण विश्वदेवका वहाँ आना, पार्वतीद्वारा उनका आतिथ्य, किंतु विश्वदेवद्वारा यह कहकर उनका आतिथ्य स्वीकार नहीं करना कि वे केवल विष्णुको ही भगवान् मानते हैं अन्यको नहीं, तब मयूरेशका अपनी मायाद्वारा उनकी भेदबुद्धिको दूर करना, इस प्रसंगमें गणेशभक्त पराशरकी कथा ब्रह्माजी बोले- भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिकी बात है, वे सभी मुनिबालक गणेशजीकी मूर्ति बनानेके लिये मिट्टी लानेहेतु गये और वहाँसे स्वयं मिट्टी ले आये। उन मुनिबालकोंने अपनी-अपनी रुचिके अनुसार नाना प्रकारकी गणेशमूर्तियोंका निर्माण किया। किसीने सिंहपर आरूढ़ मूर्ति बनायी, किसीने मयूरपर स्थित मूर्ति बनायी और किसीने मूषकपर विराजमान गणेशजीकी मूर्ति बनायी ॥ १-२॥ गणेशजीकी वे मूर्तियाँ विविध प्रकारके आयुधोंको धारण किये हुए थीं, नाना प्रकारके दिव्य अलंकारोंसे समन्वित थीं, वे चार भुजाओंवाली थीं और दिव्य गन्ध तथा दिव्य वस्त्रोंसे सुशोभित थीं, देखनेमें वे अति सुन्दर थीं। उन बालकोंने पुष्पों [से शोभित] तथा दर्पणोंकी आभासे सम्पन्न मण्डपमें उन मूर्तियोंको स्थापित करके पृथक्-पृथक् उपचारोंके द्वारा अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिके साथ उनका पूजन किया ॥ ३-४॥ उन्होंने कमलके पुष्पोंसे निर्मित अत्यन्त मनोहर मालाएँ उन्हें पहनायीं। उस समय बजती हुई तुरहीकी ध्वनिसे वह मयूरेशकी नगरी अत्यन्त हर्षित हो उठी थी। उस जन्मतिथिको जब बालक मयूरेश बारह वर्षके हुए, माता गौरीने उन्हें विधिवत् स्नान कराया और नानाविध अलंकारों तथा अन्य प्रसाधन-द्रव्योंके द्वारा उन्हें मण्डित किया, तदुपरान्त हरिद्रा, कुमकुम आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक सौभाग्यवती स्त्रियोंका पूजन करके उनको अनेक प्रकारके उपहार प्रदान किये ॥ ५-६१/२॥ उसी समय विश्वदेव नामसे प्रसिद्ध एक [ब्राह्मण-] देवता वहाँ उपस्थित हुए, वे भगवान् विष्णुका-सा रूप धारण किये हुए थे। उनका शरीर श्रीमुद्रासे सुशोभित था और शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमालासे अलंकृत था। वे कण्ठमें अत्यन्त मनोहर तुलसीमाला धारण किये हुए थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण किये हुए थे, दिव्य अनुलेप लगाया हुआ था। उन्होंने अपने हाथोंमें जलपूर्ण कमण्डलु तथा वेणुदण्ड धारण किया हुआ था॥७-९॥ घरके द्वारपर स्थित उन अतिथिसे देवी गौरीने बड़ी ही श्रद्धा-भक्तिके साथ कहा- हे ब्रह्मन्! आपका आगमन कहाँसे हुआ है, मैं आपके तेजको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हूँ ॥ १० ॥ इस प्रकारसे कहे गये वे विप्र उन गौरीसे बोले- पहले मैंने तुम्हारे विषयमें जो सुन रखा था, उस सबको आज अपनी आँखोंसे देखकर मेरा मन बहुत सन्तुष्ट हो गया है। तीर्थोंमें भ्रमण करता हुआ मैं मानसिक श्रान्तिका अनुभव कर रहा हूँ और भूखसे पीड़ित हूँ, इसीलिये आपके घर आया हूँ॥ १११/२ ॥ पार्वती बोलीं- आप आसनपर विराजमान हों और प्रसन्नमन होकर भोजन करें। तब वे विप्र वहाँ आसनपर बैठ गये ॥ १२ ॥ आसनपर बैठे हुए उन ब्राह्मणदेवके चरणोंका मयूरेशने प्रक्षालन किया और उस निर्मल तीर्थतुल्य जलको सर्वत्र छिड़ककर [अपने भवन आदिको] पवित्र किया। उनका पूजन करके उन्हें पायस तथा पक्वान्नोंको समर्पित किया। वे द्विज आचमन करनेके अनन्तर मौन तथा चिन्तामें मग्न हो गये ॥ १३-१४ ॥ यह देखकर पार्वती बोलीं- आप भोजन करें, भोजन करें। यदि यह अन्न आपके मनोन्कूल नहीं है, तो जो आपको सबसे अधिक प्रिय हो, उसे प्रदान करूँगी। अतः आप शीघ्र बतायें, भगवान् शंकरके प्रभावसे मैं वह अन्न शीघ्र ही प्रस्तुत करूँगी ॥ १५१/२ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_18_1_Back
क्री०ख०-अ०१०५] * मयूरेशकी बारहवीं जन्मतिथिके महोत्सवमें विश्वदेवका वहाँ आना * ५२५ द्विज बोले-मैं क्षीरसागरमें निवास करनेवाले शेषशायी भगवान् विष्णुका दर्शन करके ही भोजन करता हूँ और तभी पानी भी पीता हूँ, यह मेरा नित्यका नियम है, किंतु आज मोहवश वह नियम मैं भूल गया हूँ॥ १६ १/२ ॥ उमा बोलीं-हे द्विजश्रेष्ठ! आपने अपने नियमके विषयमें पहले क्यों नहीं बतलाया? हे सत्यनिष्ठाको झुठलानेवाले विप्र! भोजनपात्रको छोड़कर आप क्यों जाते हैं, इससे भगवान् शंकर क्षुब्ध होकर न जाने क्या कर बैठेंगे ॥ १७-१८॥ उसी समय मयूरेश बोल पड़े-यदि आपके हृदयमें दृढ़ भावना है, तो यहींपर आपको शीघ्र ही उन पद्मनाभ विष्णुका दर्शन हो जायगा ॥ १९ ॥ यह आपका महान् अभाग्य ही दिख रहा है कि जो आप पक्वान्न तथा पायसका परित्यागकर जा रहे हैं अथवा हे द्विज! मोहवश आप कहाँ जा रहे हैं? ॥ २० ॥ हे सुव्रत! अनेक जन्मोंकी तपस्याके परिणामस्वरूप जिन भगवतीका कृपाकटाक्ष लोकमें लोगोंको प्राप्त होता है, उन्हींके द्वारा परोसे गये अन्नका आप क्यों परित्याग कर रहे हैं? जो भगवती जगदम्बा ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी सुलभ नहीं हैं, उन्हीं शिवाका आपको साक्षात् दर्शन हुआ है, वे समस्त लोकोंकी जननी और सभी स्त्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं॥ २१-२२॥ वे परम अद्भुत हैं और सभी देवताओंकी शक्ति हैं। उनके दर्शनसे ही भगवान् विष्णुके दर्शन हो पाते हैं। अग्निका भोजन करनेवाले पक्षी चकोरको जैसे मिष्टान्न अच्छा नहीं लगता है, वैसे ही अमृतोपम देवान्न भी क्या आपको अच्छा नहीं लग रहा है? अथवा विश्वस्वरूप मेरे दर्शनसे भी आपको श्रीविष्णुके दर्शन हो सकते हैं॥ २३-२४॥ द्विज बोले-मैं लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका दास हूँ, उनके अतिरिक्त और किसीका मैं वन्दन नहीं करता, यदि आप सर्वस्वरूप हैं और यदि आपमें सामर्थ्य है तो मुझे उन अविकारी विश्वेश्वर नारायणका दर्शन कराइये ॥ २५ १/२ ॥ वे मयूरेश्वर उन विप्रका उस प्रकारका दृढ़ निश्चय जानकर अन्तर्धान हो गये और फिर दूसरे ही क्षण नारायण विष्णुके रूपमें प्रकट हो गये। उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा था, उन सर्वसामर्थ्यसम्पन्न विभुने शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे॥ २६-२७॥ विविध प्रकारके अलंकारोंसे वे मनोरम लग रहे थे। सभी अलंकारोंके धारण करनेसे वे अत्यन्त सुन्दर प्रतीत हो रहे थे। उनका वक्षःस्थल कौस्तुभमणि तथा वनमालासे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ २८ ॥ वे शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहे थे और देवी महालक्ष्मी उनके चरणकमलोंका संवाहन कर रही थीं। उन (विष्णुरूप मयूरेश)-का दर्शन करके द्विज विश्वदेवने उन्हें प्रणाम किया और उनकी पूजा की ॥ २९ ॥ वे अपने शरीरका भान भूलकर अनन्य भक्तिभावके कारण उनमें तन्मय हो गये। चिदानन्दसे परिपूर्ण होकर वे द्विजश्रेष्ठ कहने लगे। आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया। आज मेरा जीवन जीना सफल हो गया, आज यह नगरी धन्य हो गयी, आज मेरे माता तथा पिता-दोनों धन्य हो गये॥ ३०-३१॥ मयूरेश्वरके उपदेशसे तथा भवानी पार्वतीके दर्शनसे आप चराचरस्वरूप, परात्पर, सर्वान्तर्यामी एवं प्रभु विष्णुके साक्षात् दर्शन मुझे यहीं प्राप्त हुए हैं ॥ ३२ १/२ ॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुने भी अपने उस भक्तका बाहुओंमें भरकर आलिंगन किया और प्रसन्न मनवाले वे आँसुओंसे गद्गद वाणीमें कहने लगे- [हे द्विज!] आपने मेरे लिये भोगका परित्याग कर दिया, मैं आपके निश्चय तथा दृढ़ एवं अविचल भक्तिको देखकर क्षीरसागरसे यहाँ आया हूँ॥ ३३-३४ १/२ ॥ मैं अपने भक्तके मार्गके काँटोंको हवाके द्वारा उड़ाकर उस मार्गको जलसे सिंचित कर देता हूँ। भक्तकी प्यासको शान्त करनेके लिये मैं जलका रूप धारण कर लेता हूँ। भक्तोंके कष्टोंका निवारण करनेवाला मैं अनेक रूपोंको धारण कर लेता हूँ। भक्त मुझे जिस प्रकारसे प्रिय होते हैं, वह मैं आपको बतलाता हूँ॥ ३५-३६ १/२ ॥ एक बारकी बात है, भाद्रपदमासकी चतुर्थी तिथिको
५२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- मयूरेश-महोत्सव हो रहा था। भगवान् मयूरेशकी मिट्टीकी अनेकों मूर्तियाँ बनायी गयी थीं, कोई मूर्ति मयूरपर विराजमान थी, कोई मूषकपर, तो कोई सिंहपर आसीन थी। विविध प्रकारके अलंकारोंसे वे शोभा पा रही थीं, उन्हें नाना रंगोंसे सुशोभित किया गया था॥ ३७-३८॥ अनेक मुनियों तथा मुनिबालकोंके द्वारा उन मूर्तियोंका भलीभाँति पूजन किया गया। कोई उन मूर्तियोंके सामने गीत गा रहे थे तो कोई भक्तिभावसे नृत्य कर रहे थे, कोई पुराणोंका पाठ कर रहे थे, तो कोई मयूरेशकी प्रदक्षिणा करनेमें निरत थे॥ ३९१/२ ॥ उसी समयकी बात है, महात्मा वसिष्ठजीके पौत्र [और शक्तिके पुत्र], जो पराशरके नामसे विख्यात थे, वे मुनि स्वेच्छासे भ्रमण करते हुए वहाँ आये। जब वे चार वर्षकी अवस्थाके थे, तब उन्होंने भक्तिपरायण होकर मयूरेशकी एक मूर्ति बनायी॥ ४०-४१ ॥ सूखे पत्तोंसे माला बनायी और वह माला उन्हें पहनायी, कीचड़में गन्धका भाव रखकर उससे उस मूर्तिका आदरपूर्वक विलेपन किया। उन्होंने अनेक प्रकारके पत्तों तथा गीली मिट्टीसे मिष्टान्न तथा लड्डू बनाकर उन्हें भोग लगाया और उन्हीं (पत्रादि)-से दक्षिणा तथा फल भी समर्पित किये॥ ४२-४३ ॥ खेल-खेलमें ही पूजाका संकल्प लिया और अपनी जंघाको वाद्यके रूपमें धीरे-धीरे बजाया। फिर वे मुहूर्तभर मूर्तिके सम्मुख नृत्य करनेके अनन्तर 'मेरे द्वारा निवेदित इस नैवेद्यका भक्षण करो' इस प्रकारसे उस मूर्तिसे बार-बार प्रार्थना करते हुए रोने लगे। तब वह मिट्टीकी मयूरेशकी प्रतिमा सजीव हो उठी॥ ४४१/२ ॥ उन बालक पराशरने जिस-जिस प्रयोजनसे जो-जो भी वस्तुएँ उनके समक्ष रखी थीं, वे सब वैसी ही हो उठीं अर्थात् मिट्टीके बनाये गये पदार्थ चन्दन, नैवेद्य आदि यथार्थरूपमें हो गये। तदनन्तर उस सजीव प्रतिमाने उन लड्डुओं, मोदकों और पायससे समन्वित विविध पक्वान्नोंका भोग लगाया॥ ४५-४६ ॥ पराशरने उन सब मिथ्याके पदार्थों-मिट्टी, अन्न, पुष्प, फल आदि सबको सत्यरूपमें तथा उस मिट्टीकी मूर्तिको सजीव-साकार रूपमें छः भुजा धारण किये हुए देखा, फिर दूसरे ही क्षण उसे चार भुजाओंसे सुशोभित भगवान् विष्णुके रूपमें देखा। तब (पराशरकी इस कथाको सुनकर) वे (विश्वदेव) उन देवेश्वर (नारायण)-से बोले-मिट्टीका भोग लगानेका रहस्य क्या है?॥ ४७-४८१/२ ॥ विष्णुस्वरूप गुणेश बोले-मुझे श्रद्धाभक्तिसे जो कुछ भी समर्पित किया जाता है, वह अमृतरसके समान हो जाता है और श्रद्धाभक्तिसे रहित अभक्तके द्वारा अर्पित किया गया अमृत भी मेरे लिये विषके समान हो जाता है॥ ४९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-उनका इस प्रकारका वचन सुनकर विश्वदेव पुनः बोले-हे सुरेश्वर! आपका भक्त कौन है, उसका मुझे दर्शन कराइये। तदनन्तर उन विश्वदेवका हाथ पकड़कर [विष्णुरूप] मयूरेश्वर बाहर आये॥ ५०-५१ ॥ उन्होंने घर-घरमें पूजित हो रहे उन देव मयूरेश्वरका उन्हें दर्शन कराया, जो मयूरपर विराजमान थे। वहाँ भी उन विश्वदेवने अपने सहित उन मयूरेश्वरको देखा। ये मेरे स्वामी नहीं हो सकते, ऐसा निश्चय करके वे जब उस मूर्तिको छोड़कर अन्यत्र गये तो विश्वदेवने घर- घरमें नारायण विष्णुको देखा। फिर उन्होंने [विष्णुके स्थानपर] सर्वत्र गुणेश्वरको ही पूजित होते हुए देखा॥ ५२-५४॥ कहीं-कहीं उन्होंने विष्णुका स्वरूप धारण किये हुए मयूरेशका दर्शन किया। पुनः देखनेपर वह मूर्ति मयूरेशकी दिखलायी पड़ी॥ ५५॥ तदनन्तर वे मयूरेश अपनी लीला दिखाते हुए विश्वदेवका हाथ पकड़कर बाहर ले आये, किंतु वे विश्वदेव हाथ छुड़ाकर 'मेरे स्वामी ये नहीं हैं' - ऐसा कहते हुए वहाँसे चले गये॥ ५६॥ फिर प्रत्येक घरमें भ्रमण करते हुए उन्होंने विविध वाद्योंकी ध्वनि तथा नृत्य एवं गीतोंके गायनके साथ मयूरेशको पूजित होते हुए देखा॥ ५७॥ कहीं उन्होंने विष्णुरूपमें उस मूर्तिको देखा तो जब वे उसे प्रणाम करने गये तो वह मूर्ति उन्हें मयूरेशकी दिखलायी दी, जो मयूरपर आरूढ़ थी॥ ५८॥ कहींपर वह मूर्ति गरुड़पर आसीन दिखायी दी, तो Kalyana Visheshank 2021_Section_18_2_Back
क्री०ख०-अ०१०६ ] * मयूरेशद्वारा तेरहवें वर्षमें मंगल दैत्यका वध * ५२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[ऊपरी बायाँ स्तम्भ] कहींपर शेषशय्यापर विराजमान दिखायी दी। जब वे विश्वदेव अत्यन्त प्रसन्न होकर उस मूर्तिको प्रणाम करने गये तो उसी क्षण वह मूर्ति उन्हें बार-बार मयूरपर आरूढ़ दिखायी देने लगी। वे मयूरेश उन विश्वदेवको कहीं भोजन करते हुए, कहीं आनन्द-विहार करते हुए तो कहीं सोते हुए दिखायी दिये॥ ५९-६०॥ तदनन्तर खिन्नमन होकर विश्वदेव महर्षि वसिष्ठके आश्रमपर गये। उस समय उन मयूरेशने उनसे कहा- मेरे श्रेष्ठ भक्तका दर्शन करो॥ ६१॥ यह कहकर उन्होंने अपने समक्ष स्थित पराशरका दर्शन कराया। जो मिट्टीसे बने हुए उपचारोंके द्वारा उन गुणेश्वरकी पूजा कर रहे थे और उनके अभीष्ट देव उनके द्वारा नैवेद्यके रूपमें निवेदित किये गये मिट्टीके
[ऊपरी दायाँ स्तम्भ] लड्डुओंका भोग लगा रहे थे। तदनन्तर विश्वदेवने एक ही समयमें आकाशमें, जलमें तथा भूमिमें स्थित उन्हीं मयूरेश्वरको देखा॥ ६२-६३॥ वे उस मूर्तिको एक क्षणमें नारायणके रूपमें देखते तो दूसरे ही क्षण वह मूर्ति मयूरेशकी दिखलायी पड़ती। तब उन विश्वदेवने नारायण और मयूरेशमें स्थित हुई अपनी भेदबुद्धिको त्याग दिया और अपने भ्रमका भी निवारण कर लिया॥ ६४॥ फिर उन्होंने नारायण तथा मयूरेश—दोनोंमें एक बुद्धि करते हुए उन मयूरेश्वरको अत्यन्त भक्तिभावके साथ प्रणाम किया, उनकी स्तुति की और फिर उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे विश्वदेव अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अपने आश्रमको चले गये॥ ६५॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विश्वदेवकी भेदबुद्धिके निरसनका वर्णन' नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०५ ॥
एक सौ छठवाँ अध्याय मयूरेशद्वारा तेरहवें वर्षमें मंगल दैत्यका वध और शिवके ललाटपर स्थित चन्द्रमाके हरणकी लीला, मयूरेशका गणोंका स्वामी होना
[निचला बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी बोले—मयूरेशके तेरहवें वर्षकी बात है, एक दिन उन मयूरेशने निद्रामें सोये हुए अच्युत भगवान् महेश्वरको प्रणाम करनेके अनन्तर उनके सिरमें स्थित चन्द्रमाको ले लिया, उस समय कल्याणकारी भगवान् शिव अपने समस्त अंगोंमें भस्मका अंगराग लगानेसे सुशोभित हो रहे थे, उनके पाँच मुख थे, दस भुजाएँ थीं। उन्होंने गलेमें रुण्डोंकी माला धारण की हुई थी और मस्तकपर चन्द्रमाको धारण कर रखा था॥ १-२॥ तदनन्तर वे मयूरेश हँसते, नाचते और परस्पर वार्तालाप करते बालकोंसे घिरे तथा खेल करते हुए बाहर चले आये। उसी समयकी बात है, मंगल नामवाला एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा। उसका मुख अत्यन्त भयंकर था, वह वीरोंपर विजय प्राप्त करनेवाला और परम अद्भुत था॥ ३-४॥ अत्यन्त पराक्रमी वह वराहरूपी दैत्य अपनी
[निचला दायाँ स्तम्भ] दाढ़ोंसे वृक्षोंको उखाड़ देनेवाला था, वह वज्रसारके समान अपने सुदृढ़ बालोंसे आकाशको और अपने पैरोंसे धरतीको भेद देनेवाला था॥ ५॥ वह काजलके पर्वतके समान काले रंगका था, उसकी आँखें अग्निकुण्डके समान [गहरी एवं दाहक] थीं और वह वर्षाकालीन मेघोंके समान गर्जना करनेवाला था, उसे देखकर वे सभी बालक भाग पड़े॥ ६॥ वे बालक आपसमें यह कहने लगे कि इस प्रकारका सूकर कहीं देखा नहीं गया। जबतक वह दैत्य बालकोंको मारता, उससे पहले ही मयूरेशने एक हाथसे उस सूकररूप दुष्ट दानवके दाँतोंको पकड़ लिया और दूसरे हाथसे उसके नीचेके थूथनको पकड़ लिया॥ ७-८॥ तदनन्तर बालक मयूरेशने बाँसके टुकड़ेके समान उस सूकरको फाड़ डाला। तब वह दैत्य दस योजन विस्तृत अपनी पूर्व देहको धारणकर वृक्षोंको चूर-चूर
५२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
करते हुए और पृथ्वीतलको विदीर्ण करते हुए भूमिपर गिर पड़ा। तब वे बालक मयूरेशको देखकर कहने लगे—पार्वतीका पुत्र यह मयूरेश धन्य है! ॥ ९-१० ॥ इसने क्षणभरमें ही इस महान् बलशाली दैत्यको खेल-खेलमें ही मार डाला है। इसे देखकर हम तो दसों दिशाओंमें भाग खड़े हुए थे। इसने तो गिरते हुए यहाँ अनेक घरोंको चूर-चूर कर डाला ॥ १११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर भगवान् शिवने अपने मस्तकपर चन्द्रमाको नहीं देखा, तो क्रोधसे उनके नेत्र लाल हो गये। वे संसारको जलाते हुए-से क्रोधसे आविष्ट होकर अपने गणोंसे कहने लगे—तुम लोग कैसे रक्षा करते हो? मेरे मस्तकपर स्थित निर्मल चन्द्रमाका किस दैत्यके द्वारा हरण कर लिया गया है? ॥ १२-१३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तब भयसे व्याकुल होकर थर- थर काँपते हुए वे सभी गण वहाँसे भाग उठे। कुछ गण धैर्य धारणकर भगवान् शिवसे कहने लगे—हे उमापति! मयूरेश्वर नामवाले आपके पुत्र जब खेल खेलने बाहर आये तो उनके हाथमें हमने चन्द्रमाको देखा था। परंतु हे प्रभो! वे कब चन्द्रमाको ले गये, यह हम नहीं जानते ॥ १४-१६ ॥ गणोंका यह वचन सुनकर रुष्ट हुए महेश्वर बोले—तुम लोग तो भोजन करनेमें ही तत्पर रहते हो, तुम्हारे द्वारा किस प्रकारसे रक्षा की जा रही है? ॥ १७॥ चन्द्रमाको अथवा चन्द्रमाका हरण करनेवालेको यदि तुम लोग ले आते हो तो इसीमें भलाई है, अन्यथा मैं तुम सभीको यहीं भस्म कर डालूँगा, इसमें सन्देह नहीं है। तदनन्तर क्षुब्ध मनवाले वे सभी गण जल्दी-जल्दी दौड़ते हुए मयूरेशके पास पहुँचे और रुष्टमन होकर उनसे कहने लगे ॥ १८-१९॥ अरे तस्कर! या तो तुम भगवान् शिवके पास चलो या चन्द्रमाको हमें दे दो। गणोंका वचन सुनकर गणनायक मयूरेश क्रुद्ध हो उठे। वे बोले—अरे गणो! तीनों लोकोंकी जननी देवी पार्वतीके अत्यन्त प्रभावशाली पुत्र मुझ मयूरेश्वरकी दृष्टिमें तुम्हारी अथवा तुम्हारे स्वामी शिवकी कोई गणना नहीं है ॥ २०-२१॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर उनकी श्वाससे वे उसी प्रकार उड़ गये, जैसे हवाके द्वारा पत्तोंको उड़ा दिया जाता है और वे सभी दीन शिवगण शिवकी शरणमें आकर गिरे। तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर महादेवने प्रमथ आदि गणोंसे कहा कि उमाके उस छोटे-से दुष्टात्मा बालकको पकड़कर ले आओ ॥ २२-२३॥ वे गण अत्यन्त शीघ्रतासे वहाँ गये, जहाँ वे बालक मयूरेश क्रीडा कर रहे थे। उन्होंने देखा कि वे अन्य बालकोंके साथ निश्चिन्त होकर क्रीडा कर रहे हैं ॥ २४॥ अपनेको बन्धनमें डालकर ले जानेके लिये आये हुए उन गणोंको विनायक मयूरेश्वरने मोहमें डाल दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये। वे गण उन्हें चारों दिशाओंमें देखने लगे ॥ २५॥ उन्होंने घर-घर, जंगल-जंगल ढूँढ़ा, किंतु वे विनायकको कहीं नहीं देख पाये। फिर किसी स्थानपर उनको पाकर वे कहने लगे—हमारे सामने आनेके बाद तुम जा कैसे सकते हो, यदि तुम ब्रह्मलोक भी पहुँच जाओ, तो हम वहाँसे भी [पकड़कर] तुम्हें उन भगवान् शिवके पास ले चलेंगे। इस प्रकार वे मयूरेश कभी अन्तर्धान हो जाते, तो कभी प्रकट हो जाते। तब शिवगणोंको अत्यन्त खिन्न देखकर परमात्मा मयूरेश उनपर कृपा करते हुए उनके समक्ष खड़े हो गये। उन्हें भलीभाँति देखकर वे गण अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये ॥ २६-२८॥ तब उन्होंने पार्वतीपुत्र उन मयूरेशको बाँध लिया और वे उन्हें शंकरके पास ले जाने लगे, किंतु पृथ्वीके समान भारवाले उन बैठे हुए मयूरेशको वे गण उठानेमें समर्थ नहीं हो सके, यह देखकर उनके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सभी गण मिलकर भी जब किसी प्रकार भी उन्हें उठानेमें समर्थ नहीं हो सके, तब उद्यमहीन हुए वे शिवके पास आकर कहने लगे ॥ २९-३०॥ हे शंकर! हम सभी मिलकर भी उस एक अकेले मयूरेशको यहाँ लानेमें समर्थ नहीं हो पाये हैं। तदनन्तर भगवान् शिवने अपने समक्ष स्थित नन्दीको आज्ञा देकर कहा—तुम जाओ और शीघ्रतासे उस तस्कर मयूरेशको
क्री०ख०-अ०१०७] * मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षमें मुनियोंके कहनेपर पार्वतीका इन्द्रयाग करना * ५२१
यहाँ ले आओ ॥ ३११/२ ॥ नन्दी बोले- हे महेश्वर! आपकी आज्ञासे तो मैं शेषनाग, सूर्य अथवा चन्द्रमाको भी यहाँ ले आऊँ, फिर उस छोटे-से मयूरेशकी मेरे सामने क्या गणना है! ॥ ३२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-ऐसा कह करके क्रोधसे रक्त नेत्रवाले वे नन्दी तीखी सींगोंसे वृक्षों तथा पर्वतोंको गिराते हुए और आकाशको निगलते हुए-के समान वायुके वेगसे चल पड़े और वहाँ पहुँचकर उन मयूरेशसे कहने लगे-अरे! तुम शिवके पास चलो। यदि तुम स्वयं नहीं चलते हो तो मैं तुम्हें ले जाऊँगा, मैं दूसरे गणोंके समान नहीं हूँ। उनके इस प्रकार कहनेपर मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपनी आने-जानेवाली श्वासके चक्रमें उन्हें फँसा डाला अर्थात् नासिकामार्गसे अपने भीतर ले गये और फिर अत्यन्त खिन्न हुए उन नन्दीको अपने दृढ़ निःश्वासके बलसे शिवके समीप पहुँचा दिया ॥ ३३-३६ ॥ उस समय अपने पौरुषका नाना प्रकारसे बखान करनेवाले वे नन्दी अपने मुखसे रक्तका वमन करते हुए मूर्च्छित होकर दो मुहूर्ततक पृथिवीपर गिरे रहे। शिवने उन नन्दीके जानुओंके समीप मयूरेशको स्थित हुआ देखा। दिव्य वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित वे मयूरेश उस समय अत्यन्त देदीप्यमान विग्रहवाले प्रतीत हो रहे थे ॥ ३७-३८ ॥ तदनन्तर गणोंने मस्तकपर विराजमान चन्द्रमावाले भगवान् शिवको देखकर कहा-हे देव! आपके मस्तकपर तो चन्द्रमा वैसे ही विराजमान हैं, जैसे पहले थे। हे शिव! आपने व्यर्थमें ही हमें जानेकी आज्ञा प्रदान की। तब अपने मस्तकपर चन्द्रमाको स्थित देखकर भगवान् शिवने मयूरेशसे तथा गणोंसे कहा- ॥ ३९१/२ ॥ शिव बोले-वे गण, तुम मयूरेश तथा नन्दी-तुम सभी मेरी आज्ञाका पालन करनेसे थक गये हो, मेरे मस्तकपर चन्द्रमाके विद्यमान रहनेपर भी तुम सभीमें व्यर्थ ही युद्ध हुआ ॥ ४०१/२ ॥ प्रमथगण बोले- हे देवेश शंकर ! आजसे लेकर ये मयूरेश हमारे स्वामी बनें ॥ ४१ ॥ ब्रह्माजी बोले-उन गणोंसे भगवान् शिवने कहा- ऐसा ही होगा। तब वे मयूरेश गणराज हो गये। तदनन्तर वे सभी गण भगवान् शिव, गणेश एवं गणेशजननी पार्वतीको प्रणाम करके और उस प्रकारके प्रभावसे सम्पन्न देवेश मयूरेशकी प्रशंसा करके गर्जना करते हुए अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ४२-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'चन्द्रहरणलीलाका वर्णन' नामक एक सौ छठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०६ ॥
एक सौ सातवाँ अध्याय मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षमें मुनियोंके कहनेपर पार्वतीका इन्द्रयाग करना, मयूरेश्वरका कल तथा विंकल नामक दैत्योंका वध और फिर इन्द्रयागको विध्वंस करना, रुष्ट होकर इन्द्रका मयूरेशपुरवासियों तथा मयूरेशपुरीको संतप्त करना, मयूरेश्वरका सबकी रक्षा करना एवं इन्द्रका मयूरेशकी शरण ग्रहण करना ब्रह्माजी बोले-मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षकी बात है, एक दिन गौतम आदि महर्षिगण माता पार्वतीके घरमें अनेक गणोंसे समन्वित शिवके पास आये। तब माता पार्वतीने उन महर्षियोंको प्रणामकर अपने समक्ष अनेक आसनोंपर विराजमान उनका विधिपूर्वक पूजन किया और उनको अपने मनकी बात बताते हुए कहा ॥ १-२ ॥ गिरिजा बोलीं-अनेक विघ्नोंके भयसे हमने अत्यन्त श्रेष्ठ त्रिसन्ध्या नामक क्षेत्रमें रहना छोड़ दिया था, किंतु यहाँ भी मेरे इस बालकपर बहुतसे विघ्न हो रहे हैं। आपलोग यह बतानेकी कृपा करें कि किस कर्मको करनेसे विघ्न उत्पन्न नहीं होंगे अथवा रहनेके लिये कोई उत्तम स्थान बतायें, जहाँ कि विघ्न बाधित
[Header] ५३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
न कर सकें ॥ ३१/२ ॥ मुनियोंने कहा—हे देवि! इन्द्रयाग करनेपर वह सभी विघ्नोंका हरण कर देगा ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी बोले—तब पार्वतीने शीघ्र ही एक अत्यन्त विस्तृत यज्ञमण्डप बनवाया और इन्द्रको प्रसन्न करनेवाली यज्ञ-सामग्रियोंको एकत्र करवाया ॥ ५ ॥ भगवान् शम्भुसे अनुमति लेकर उन पार्वतीने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर महर्षियोंके द्वारा विधि- विधानपूर्वक इन्द्रयाग करवाया। उन महर्षियोंने देवराज इन्द्रका ध्यानकर उनका आवाहन किया। तदनन्तर उन्होंने देवी पार्वतीकी आज्ञासे साङ्ग-सपरिवार इन्द्रका तथा उनके गणोंका भी पूजन किया ॥ ६-७ ॥ उन श्रेष्ठ ऋषियोंने मन्त्रोच्चारणपूर्वक यज्ञकुण्डमें अग्निकी स्थापना की और मन्त्रजपकी संख्याके दशांश संख्यामें पायस तथा तिलोंकी आहुतियोंसे हवन किया ॥ ८ ॥ वे ऋषिगण मन्त्रके जपमें प्रारम्भमें प्रणव (ॐ) जोड़कर और अन्तमें 'नमः' जोड़कर मन्त्रजप करते थे, तथा हवनके समय उन मन्त्रोंके अन्तमें 'स्वाहा' जोड़कर हवन करते थे। वे द्विज चारों वेदोंमें पठित शान्तिमन्त्रोंका भी पाठ कर रहे थे। इसी समय जब बालक मयूरेश बालकोंके साथ क्रीडा करके यज्ञस्थलके समीप पहुँचे ही थे कि कल और विंकल नामक दो दैत्य भैंसेका रूप धारणकर उन मयूरेशके समक्ष आ पहुँचे। वे दोनों भयंकर शब्द करनेवाले, बहुत बड़ी-बड़ी सींगोंवाले और तीनों लोकोंको भय पहुँचानेवाले थे ॥ ९-११ ॥ वे दोनों महिषरूपी दैत्य अपने उठे हुए बालोंके द्वारा मेघोंको छिन्न-भिन्न कर रहे थे और अपनी पूँछके द्वारा पर्वतोंको भी विदीर्ण कर दे रहे थे। अपनी नाकमें वायुको रोककर और फिर उसे छोड़नेसे वे वृक्षोंको भी चूर-चूर कर दे रहे थे ॥ १२ ॥ वे दोनों दैत्य पार्वतीके पुत्र मयूरेशको मारनेकी इच्छासे शीघ्र ही उनके पास जा पहुँचे। वहाँ वे दोनों आपसमें ही मतवाले महान् हाथियोंके समान युद्ध करने लगे। उन दोनों महिषरूपधारी दैत्योंकी गर्जनासे आकाश उसी प्रकार गूँज उठा, जैसे कि मेघोंके गर्जनसे गर्जित होता है। वे दोनों रक्तसे लथपथ होकर क्रमशः कभी विजय प्राप्त कर रहे थे और कभी पराजित हो जा रहे थे ॥ १३-१४ ॥ उनसे भयभीत हुए वे मुनियोंके बालक उसी प्रकार भाग पड़े, जैसे कि भेड़ियेके भयसे भागते हैं। तदनन्तर गिरिजापुत्र देव मयूरेशने दूरसे ही उन महान् दैत्योंको देखा। वे यह सोचने लगे कि इन दो महान् दुष्टोंको किस उपायसे मारा जाय, तभी उन्होंने उन बालकोंके देखते-ही-देखते महिषरूपी उन दोनों महान् बलशाली दैत्योंकी पूँछ पकड़ ली और बार-बार उन्हें घुमाते हुए आकाशमें फेंक दिया। एक मुहूर्तके बाद वे वृक्षोंको विदीर्ण करते हुए पृथिवीपर गिर पड़े ॥ १५-१७ ॥ गिरनेसे हुए उनके शरीरके सैकड़ों टुकड़ोंको भेड़िया आदि जानवरोंने खा डाला। तदनन्तर वे मुनिबालक मयूरेशके समीप गये और श्रद्धाभक्तिसे उनकी स्तुति करने लगे ॥ १८ ॥ बालक बोले—जिनके तत्त्व-रहस्यको ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनिगण भी नहीं जानते हैं, उन आप सर्वान्तर्यामीको हम बालक कैसे जान सकते हैं ? ॥ १९ ॥ आपने बचपनसे ही इन करोड़ों दैत्योंका विनाश कर डाला है, आज ये दोनों दैत्य महिषका रूप धारणकर आपको मारनेके लिये आये हुए थे ॥ २० ॥ जिन असुरोंके श्वास छोड़नेमात्रसे पर्वत, वृक्ष तथा पृथ्वी कम्पित हो उठती थी, ऐसे उन महिषोंको खेल- खेलमें ही पूँछ पकड़कर आपने उन्हें चूहेकी भाँति फेंक दिया था ॥ २१ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर वे मयूरेश खेलते- खेलते यज्ञस्थलमें पहुँच गये। वहाँ हो रहे इन्द्रयज्ञको देखकर वे अत्यन्त रुष्ट हो गये और उन्होंने तत्क्षण ही यज्ञका विध्वंस कर डाला। सभी मुनिबालकोंसे घिरे हुए उन मयूरेशने इन्द्रकी मूर्ति दूर फेंककर उन सभी मुनीश्वरोंसे कहा—हे पवित्रहृदय मुनियो ! आप लोगोंद्वारा यह कौन-सा कार्य किया जा रहा है ? ॥ २२-२३ ॥ [स्वयं ही] सम्पूर्ण पदार्थोंकी अभिलाषा रखनेवाले इन्द्रके सन्तुष्ट हो जानेपर [उनके द्वारा] कौन-सी वस्तु दी जा सकती है? क्या बकरीकी प्रार्थना करनेसे
क्री०ख०-अ०१०७ ] * मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षमें मुनियोंके कहनेपर पार्वतीका इन्द्रयाग करना * ५३१ कामधेनुसे प्राप्त होनेवाला फल मिल सकता है ? ॥ २४ ॥ तदनन्तर उन मयूरेशने यज्ञाग्निको शान्त करके यज्ञकी शेष सामग्रीका स्वयं भक्षण कर लिया। उनके इस प्रकारके चांचल्यको देखकर मुनियोंके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन मुनिगणोंके हृदयमें देवी पार्वतीके प्रति विशेष भक्ति थी, इसलिये वे उन गुणेश्वरको कुछ भी उलाहना देने अथवा समझाने या क्रोध करके कुछ भी कहनेमें समर्थ नहीं हो सके ॥ २५-२६ ॥ तदनन्तर वे देवी पार्वतीको सारा वृत्तान्त निवेदनकर अपने-अपने आश्रमोंको चले गये। वे बोले—इन्द्रको यदि यह समाचार विदित होगा, तो उन क्षुब्ध मनवालेके द्वारा जो होनेवाला होगा, वह होता रहे, उससे हमें क्या प्रयोजन ! [ इधर ] अपने अपमानकी बात जानकर इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। क्रोधसे रक्त नेत्रोंवाले वे तीनों लोकोंको दग्ध करते हुए-से प्रतीत हो रहे थे। उन्होंने सभी देवताओंको बुलाया और उनसे यह श्रेष्ठ वचन कहा— ॥ २७—२८१/२ ॥ इन्द्र बोले—मुनिगणोंने बड़े ही श्रद्धाभावसे मुझे उद्देश्य करके यज्ञ प्रारम्भ किया था, किंतु गुणेशने उस यज्ञका विध्वंस कर दिया है। अब मैं आज उस गुणेशके पराक्रमको देखूँगा। मेरे क्रुद्ध हो जानेपर चराचरसहित सम्पूर्ण त्रैलोक्य नष्ट हो जायगा ॥ २९-३० ॥ देवता बोले—[ हे देव !] यदि आपकी आज्ञा हो तो हमलोग उस मयूरेशको बाँधकर क्षणभरमें यहाँ ले आते हैं ॥ ३०१/२ ॥ इन्द्र बोले—हे अग्निदेव ! मयूरेशपुरमें तुम्हारा निवास अब कभी न हो। तुम मेरी आज्ञासे मयूरेशपुरमें निवास करनेवाले लोगोंके उदरमेंसे भी निकलकर छिप जाओ। अर्थात् उदरमें जो जठराग्निरूपसे तुम रहते हो, वहाँसे भी अन्तर्धान हो जाओ ॥ ३११/२ ॥ ब्रह्मा बोले—इस प्रकारसे क्रोधाविष्ट मनवाले देवराज इन्द्रके वचन सुनकर अग्नि उस मयूरेशपुरसे तथा वहाँके निवासियोंके उदरसे भी अन्तर्धान हो गये। जब मुनियोंने वहाँ कहीं भी अग्नि नहीं देखी तो उन्होंने हवनहेतु अग्नि प्राप्त करनेके लिये अरणि-मन्थन किया ॥ ३२-३३ ॥ अग्निको प्रकट होता न देखकर उन्होंने बिना अग्निमें पकाये गये अन्नका आदरपूर्वक भक्षण किया, किंतु पेटमें अग्नि (जठराग्नि) न होनेके कारण वह अन्न पच नहीं पाया, फलस्वरूप उन्हें असह्य पीड़ा हुई ॥ ३४ ॥ तब वे मुनिगण कृपालु मयूरेशके पास गये और उन्हें प्रणाम करके कहने लगे— [हे देव !] आपके द्वारा इन्द्रयागके विध्वंस किये जानेपर इन्द्रके द्वारा बुलाये गये अग्निदेव [इस नगरसे] कहीं अन्यत्र चले गये हैं और पेटमें रहनेवाली अग्नि (जठराग्नि) भी यहाँके पुरवासियोंके उदरसे निकलकर अन्तर्धान हो गयी है ॥ ३५१/२ ॥ उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे मयूरेश प्रत्येक नगरवासीके उदरमें अग्नि बनकर स्थित हो गये, फलस्वरूप वे सभी नागरिक भूखसे व्याकुल हो गये, इसी प्रकारसे रसोईघरों तथा अग्निकुण्डोंमें भी अग्नि पहलेके समान जलने लगी ॥ ३६-३७ ॥ तदनन्तर महाबली इन्द्रने क्रुद्ध होकर उस नगरकी वायुका हरण कर लिया। प्राण, अपान आदि पाँचों प्राण-वायुओंके शरीरसे निकल जानेपर सम्पूर्ण मयूरेशनगरी प्रेतमय हो गयी। तब देव मयूरेशने पंचप्राणमय होकर उन सभी नगरनिवासियोंको जीवित कर डाला। पुनः इन्द्रने सूर्यसे कहा—आप इस मयूरेशपुरीको अपने तापसे अत्यन्त संतप्त कर दें ॥ ३८-३९ ॥ तब सूर्य बारह आदित्योंका स्वरूप धारणकर सब कुछ जलाने लगे। उन्होंने वापी, कूप, तड़ाग तथा नदियोंके जलको सुखा डाला। नगर, ग्राम, वन तथा खानोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी जल उठी। यह देखकर मयूरेश शीघ्र ही मेघ बनकर बरसने लगे ॥ ४०-४१ ॥ उन्होंने उस तापको शान्त कर दिया और मरे हुए सभी जीवोंको जीवित कर दिया। तदनन्तर हर्षमें भरे हुए सभी लोगोंने 'बहुत अच्छा-बहुत अच्छा'—ऐसा कहकर उन मयूरेशका पूजन किया ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इन्द्रने जो-जो प्रतिकूल कर्म किये थे, वे सब मयूरेशने दूर कर दिये। जब इन्द्रको यह सब मालूम हुआ तो वे मयूरेशके पास गये और उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर इन्द्रने दोनों हाथ जोड़कर उन
५३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रभु सर्वेश्वर मयूरेश्वरकी स्तुति की ॥ ४३ १/२ ॥ इन्द्रने अपने मस्तकको उनके चरणोंमें रखकर सादर उनकी प्रार्थना की ॥ ४६ ॥ इन्द्र बोले- हे विभो ! आपके यथार्थ स्वरूपको न वेद जानते हैं, न ऋषिगण जानते हैं और न ब्रह्मा आदि ब्रह्माजी बोले- उनके मनको अन्य किसी देवता ही जानते हैं। आप सर्वान्तर्यामी हैं, सर्वस्वरूप हैं संकल्पसे रहित जानकर गुणेश्वर उनसे बोले- हे भद्र ! और साक्षात् ब्रह्म हैं। आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले 'उठिये, उठिये' आप अपने पदपर सुखपूर्वक विराजमान ब्रह्मा आदि प्रजापतियोंके तथा सभी कारणोंके भी परम होइये। तदनन्तर वे शचीपति इन्द्र उन देव गुणेश कारण हैं। आप हमारे अपराधोंको क्षमा करनेकी कृपा मयूरेश्वरकी पूजा करके और उन्हें प्रणाम करके फिर करें, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ ॥ ४४-४५ १/२ ॥ उनकी प्रदक्षिणा करके प्रसन्नमन होकर अपनी नगरी ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार स्तुति करके देवराज अमरावतीको गये ॥ ४७-४८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरितके अन्तर्गत इन्द्रयज्ञके ध्वंसका वर्णन' नामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०७ ॥ एक सौ आठवाँ अध्याय पन्द्रहवें वर्षमें मयूरेश्वरद्वारा व्याघ्ररूपी दैत्यको विकृतरूपवाला बनानेकी कथा तथा यमराजके गर्वापहरणका आख्यान ब्रह्माजी बोले- पन्द्रहवें वर्षमें एक दिन मयूरेश बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न एक दैत्य वहाँ आया। उसके बालकोंके साथ पवित्र जलवाली ब्रह्मकमण्डलु महान् शब्दसे तीनों लोक कम्पित हो रहे थे। वह दुष्ट (कमण्डलुभवा) नामक नदीमें स्नान करने गये ॥ १ ॥ दैत्य व्याघ्रका रूप धारण किया हुआ था। उसकी स्नान करनेके अनन्तर शीघ्र ही अपना सन्ध्यावन्दनादि गरदनके खड़े बालोंने मेघोंको छिन्न-भिन्न कर डाला नित्यकर्म पूर्ण करके उन बालकोंने अपने हृदयमें स्थित था। वह अपने विकराल मुखको फैलाये हुए ऐसा लग गणनायकका मानस षोडश उपचारोंके द्वारा पूजन रहा था, मानो तीनों लोकोंको ग्रस डालेगा ॥ ७-८ ॥ किया। किसीने कमलके आसनपर विराजमान मयूरेशकी उसे देखकर वे सभी बालक रोते-चिल्लाते हुए तो किसीने मयूरपर आरूढ़ मयूरेशकी दिव्य सुगन्धित द्रव्यों, दिव्य वस्त्रों तथा दिव्य पुष्पोंसे पूजा की ॥ २-३ ॥ दसों दिशाओंमें भाग गये। वह दैत्य मन्दिरके द्वारका भेदनकर मयूरेशके समीप आ पहुँचा ॥ ९ ॥ गार्ग्य नामक मुनिने मन्दिरमें रत्नोंसे निर्मित आसनपर तब मयूरेश भी शार्दूलके समान रूप धारण करके विराजमान उन मयूरेश्वरका ध्यान करके उनकी पूजा क्षणभरमें ही उसके समीप आ गये, उन शार्दूलरूपधारी की। इसी बीच अकस्मात् उस मन्दिरका द्वार बन्द हो मयूरेशको देखकर वह व्याघ्ररूपी दैत्य सहसा भाग गया। जबतक वे मुनि उसे खोलते, तबतक वह द्वार और पड़ा। तब शार्दूलरूपी मयूरेश भी उसके पीछे-पीछे भी दृढ़तापूर्वक बन्द हो गया। वे मुनि उसीके अन्दर चिल्लाने भागे। इधर-उधर घूमते हुए वह व्याघ्र एक वनमें पहुँचा लगे और वे बालक भी रोने-चिल्लाने लगे ॥ ४-५ ॥ और वहाँ एक निकुंजमें छिप गया। तदनन्तर शार्दूलरूपधारी बालक बोले- हे देवेश ! आप ही हमारे माता मयूरेश एक वृक्षपर चढ़ गये और वहाँसे उस निकुंजके हैं, आप ही पिता भी हैं, द्वार बन्द करके आप अन्दर मध्यमें कूद पड़े ॥ १०-११ ॥ क्यों स्थित हैं? आप हमारे अपराधोंको क्षमा करें ॥ ६ ॥ मयूरेशने अपने दोनों हाथोंसे उसके मुखको दृढ़तापूर्वक ब्रह्माजी बोले- उसी समयकी बात है, महान् पकड़ लिया और अन्य हाथोंसे उसे खींचते हुए बाहर
क्री०ख०-अ०१०८ ] * मयूरेश्वरद्वारा व्याघ्ररूपी दैत्यको विकृतरूपवाला बनानेकी कथा * ५३३
लाकर अपने परशु नामक शस्त्रसे उसकी नासिका, उसके दोनों कान, दोनों पैर, पूँछ तथा आगेके दोनों हाथोंको काट डाला। तदनन्तर गुणेश्वरने 'अब अपना मुख नहीं दिखलाना' यह कहकर उसे छोड़ दिया ॥ १२-१३॥ तदनन्तर वह दैत्य व्याघ्ररूपको त्यागकर अपने वास्तविक दैत्यरूपमें आकर उसी प्रकारका अर्थात् नासिका आदि अंगोंके कट जानेसे विकृत स्वरूपवाला हो गया। तदुपरान्त वह दैत्य मयूरेश्वरसे बोला- तुम्हारे शरीरको भी मैं ऐसा ही छिन्न-भिन्न अंगोंवाला कर दूँगा। यह कहकर वह दैत्य अपने घरको चला गया और मयूरेश भी अपने स्थानपर चले आये। तदनन्तर वे मुनिबालक मयूरेश कहाँ चला गया-इस प्रकारसे दुखी मनसे कहते हुए उनको ढूँढ़नेके लिये इधरसे उधर घूमने लगे ॥ १४-१५॥ भ्रमण करते-करते अत्यन्त थके हुए वे बालक सुन्दर छायायुक्त एक वृक्षके नीचे लेट गये। वे कहने लगे-इसी रास्तेसे वे मयूरेश जायँगे, तब हम उनके चरणकमलका दर्शन करेंगे ॥ १६ ॥ उन बालकोंको दक्षिण दिशाकी ओर पैर करके सोया हुआ देखकर सूर्यपुत्र यमराज कुपित हो उठे। उनके नेत्र अत्यन्त लाल हो उठे। अपने क्रोधसे ब्रह्माण्डको भी निगल लेनेका साहस रखनेवाले वे यमराज उन बालकोंको बाँधकर अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर मयूरेश जब वहाँ आये तो उन्होंने वृक्षके तलपर उन बालकोंको नहीं देखा, तब वे अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये ॥ १७-१८॥ उन बालकोंसे रहित होकर वे मयूरेश्वर अत्यन्त चिन्तामग्न हो गये। उन्हें कहीं भी सुख प्राप्त नहीं हो रहा था। उसी समय वहाँ मुनिगण आ पहुँचे ॥ १९॥ मुनिगण बोले- हे देव! हम लोगोंके बालक कहाँ हैं, प्रातःकाल आप उन सभीको अपने साथ ले आये थे। इस समय आप तो आ गये हैं, अब उनके बिना हम लोगोंके प्राण निश्चित ही निकल जायँगे ॥ २०॥ ब्रह्माजी बोले- उनके ऐसा कहनेपर भी देव मयूरेश्वर उनसे तो कुछ नहीं बोले, लेकिन केवल आँखोंसे बार-बार आँसू गिराने लगे। तदनन्तर वे कुछ सोच-विचारकर भास्करपुत्र यमकी पुरीको चले गये। वहाँ यमदूतोंने अपने स्वामी यमराजको [मयूरेशके विषयमें] बताया ॥ २१ ॥ दूत बोले- हे यम! कोई युद्ध करनेकी इच्छासे यहाँ आया है, वह तीनों लोकोंका विनाश करनेवाला है, वह अत्यन्त उग्र ध्वनि कर रहा है। उसकी भुजाएँ विशाल हैं, हमारे द्वारा रोके जानेपर भी वह बलपूर्वक आ गया है॥ २२॥ ब्रह्माजी बोले- तब सिन्दूरके सदृश अरुण वर्णवाले भयानक महिषपर आरूढ़ होकर दण्डधर यमराज एकाएक मयूरेशके समीप आ गये ॥ २३ ॥ यम बोले- जिसके दण्डके आघातसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चूर-चूर हो जाता है, उस मेरे सामने एक छोटे- से बालक तुम कैसे युद्ध कर सकोगे ? ॥ २४ ॥ देव मयूरेश बोले- हे यम! तुम अपनी महिमाका वर्णन कर रहे हो, किंतु मुझे तो तुम एक दरिद्रकी भाँति प्रतीत होते हो। मेरी वक्रदृष्टि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका विनाश कर डालेगी ॥ २५ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे मयूरेश यमराजके कन्धेपर आरूढ़ हो गये और उन्होंने यमराजको उनके वाहन भैंसेके ऊपरसे नीचे गिरा दिया, और तत्क्षण ही स्वयं भी उन यमके ऊपर जा गिरे ॥ २६ ॥ उन मयूरेशका ऐसा पराक्रम देखकर यमराजने दोनों हाथ जोड़कर परम श्रद्धाभक्तिके साथ उन सुरेश्वरकी स्तुति की ॥ २७ ॥ यम बोले- [हे प्रभो !] आपके यथार्थ स्वरूपको न तो ब्रह्मा आदि देवता जानते हैं और न सनकादि महर्षि ही जानते हैं। आप परमेश्वरका वेद नेति-नेति कहकर वर्णन करते हैं ॥ २८ ॥ आप अपनी इच्छासे संसारकी सृष्टि करते हैं, उसका पालन-पोषण करते हैं और उसका संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप सभी दुष्ट दैत्योंके विनाशक हैं, यह सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। आप हमारे द्वारा अकस्मात् किये गये अपराधको क्षमा करनेकी कृपा करें ॥ २९१/२ ॥