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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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पृष्ठ 531

क्री०ख०-अ०१०७] * मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षमें मुनियोंके कहनेपर पार्वतीका इन्द्रयाग करना * ५२१

यहाँ ले आओ ॥ ३११/२ ॥ नन्दी बोले- हे महेश्वर! आपकी आज्ञासे तो मैं शेषनाग, सूर्य अथवा चन्द्रमाको भी यहाँ ले आऊँ, फिर उस छोटे-से मयूरेशकी मेरे सामने क्या गणना है! ॥ ३२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-ऐसा कह करके क्रोधसे रक्त नेत्रवाले वे नन्दी तीखी सींगोंसे वृक्षों तथा पर्वतोंको गिराते हुए और आकाशको निगलते हुए-के समान वायुके वेगसे चल पड़े और वहाँ पहुँचकर उन मयूरेशसे कहने लगे-अरे! तुम शिवके पास चलो। यदि तुम स्वयं नहीं चलते हो तो मैं तुम्हें ले जाऊँगा, मैं दूसरे गणोंके समान नहीं हूँ। उनके इस प्रकार कहनेपर मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपनी आने-जानेवाली श्वासके चक्रमें उन्हें फँसा डाला अर्थात् नासिकामार्गसे अपने भीतर ले गये और फिर अत्यन्त खिन्न हुए उन नन्दीको अपने दृढ़ निःश्वासके बलसे शिवके समीप पहुँचा दिया ॥ ३३-३६ ॥ उस समय अपने पौरुषका नाना प्रकारसे बखान करनेवाले वे नन्दी अपने मुखसे रक्तका वमन करते हुए मूर्च्छित होकर दो मुहूर्ततक पृथिवीपर गिरे रहे। शिवने उन नन्दीके जानुओंके समीप मयूरेशको स्थित हुआ देखा। दिव्य वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित वे मयूरेश उस समय अत्यन्त देदीप्यमान विग्रहवाले प्रतीत हो रहे थे ॥ ३७-३८ ॥ तदनन्तर गणोंने मस्तकपर विराजमान चन्द्रमावाले भगवान् शिवको देखकर कहा-हे देव! आपके मस्तकपर तो चन्द्रमा वैसे ही विराजमान हैं, जैसे पहले थे। हे शिव! आपने व्यर्थमें ही हमें जानेकी आज्ञा प्रदान की। तब अपने मस्तकपर चन्द्रमाको स्थित देखकर भगवान् शिवने मयूरेशसे तथा गणोंसे कहा- ॥ ३९१/२ ॥ शिव बोले-वे गण, तुम मयूरेश तथा नन्दी-तुम सभी मेरी आज्ञाका पालन करनेसे थक गये हो, मेरे मस्तकपर चन्द्रमाके विद्यमान रहनेपर भी तुम सभीमें व्यर्थ ही युद्ध हुआ ॥ ४०१/२ ॥ प्रमथगण बोले- हे देवेश शंकर ! आजसे लेकर ये मयूरेश हमारे स्वामी बनें ॥ ४१ ॥ ब्रह्माजी बोले-उन गणोंसे भगवान् शिवने कहा- ऐसा ही होगा। तब वे मयूरेश गणराज हो गये। तदनन्तर वे सभी गण भगवान् शिव, गणेश एवं गणेशजननी पार्वतीको प्रणाम करके और उस प्रकारके प्रभावसे सम्पन्न देवेश मयूरेशकी प्रशंसा करके गर्जना करते हुए अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ४२-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'चन्द्रहरणलीलाका वर्णन' नामक एक सौ छठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०६ ॥

एक सौ सातवाँ अध्याय मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षमें मुनियोंके कहनेपर पार्वतीका इन्द्रयाग करना, मयूरेश्वरका कल तथा विंकल नामक दैत्योंका वध और फिर इन्द्रयागको विध्वंस करना, रुष्ट होकर इन्द्रका मयूरेशपुरवासियों तथा मयूरेशपुरीको संतप्त करना, मयूरेश्वरका सबकी रक्षा करना एवं इन्द्रका मयूरेशकी शरण ग्रहण करना ब्रह्माजी बोले-मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षकी बात है, एक दिन गौतम आदि महर्षिगण माता पार्वतीके घरमें अनेक गणोंसे समन्वित शिवके पास आये। तब माता पार्वतीने उन महर्षियोंको प्रणामकर अपने समक्ष अनेक आसनोंपर विराजमान उनका विधिपूर्वक पूजन किया और उनको अपने मनकी बात बताते हुए कहा ॥ १-२ ॥ गिरिजा बोलीं-अनेक विघ्नोंके भयसे हमने अत्यन्त श्रेष्ठ त्रिसन्ध्या नामक क्षेत्रमें रहना छोड़ दिया था, किंतु यहाँ भी मेरे इस बालकपर बहुतसे विघ्न हो रहे हैं। आपलोग यह बतानेकी कृपा करें कि किस कर्मको करनेसे विघ्न उत्पन्न नहीं होंगे अथवा रहनेके लिये कोई उत्तम स्थान बतायें, जहाँ कि विघ्न बाधित