श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 532, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] ५३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
न कर सकें ॥ ३१/२ ॥ मुनियोंने कहा—हे देवि! इन्द्रयाग करनेपर वह सभी विघ्नोंका हरण कर देगा ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी बोले—तब पार्वतीने शीघ्र ही एक अत्यन्त विस्तृत यज्ञमण्डप बनवाया और इन्द्रको प्रसन्न करनेवाली यज्ञ-सामग्रियोंको एकत्र करवाया ॥ ५ ॥ भगवान् शम्भुसे अनुमति लेकर उन पार्वतीने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर महर्षियोंके द्वारा विधि- विधानपूर्वक इन्द्रयाग करवाया। उन महर्षियोंने देवराज इन्द्रका ध्यानकर उनका आवाहन किया। तदनन्तर उन्होंने देवी पार्वतीकी आज्ञासे साङ्ग-सपरिवार इन्द्रका तथा उनके गणोंका भी पूजन किया ॥ ६-७ ॥ उन श्रेष्ठ ऋषियोंने मन्त्रोच्चारणपूर्वक यज्ञकुण्डमें अग्निकी स्थापना की और मन्त्रजपकी संख्याके दशांश संख्यामें पायस तथा तिलोंकी आहुतियोंसे हवन किया ॥ ८ ॥ वे ऋषिगण मन्त्रके जपमें प्रारम्भमें प्रणव (ॐ) जोड़कर और अन्तमें 'नमः' जोड़कर मन्त्रजप करते थे, तथा हवनके समय उन मन्त्रोंके अन्तमें 'स्वाहा' जोड़कर हवन करते थे। वे द्विज चारों वेदोंमें पठित शान्तिमन्त्रोंका भी पाठ कर रहे थे। इसी समय जब बालक मयूरेश बालकोंके साथ क्रीडा करके यज्ञस्थलके समीप पहुँचे ही थे कि कल और विंकल नामक दो दैत्य भैंसेका रूप धारणकर उन मयूरेशके समक्ष आ पहुँचे। वे दोनों भयंकर शब्द करनेवाले, बहुत बड़ी-बड़ी सींगोंवाले और तीनों लोकोंको भय पहुँचानेवाले थे ॥ ९-११ ॥ वे दोनों महिषरूपी दैत्य अपने उठे हुए बालोंके द्वारा मेघोंको छिन्न-भिन्न कर रहे थे और अपनी पूँछके द्वारा पर्वतोंको भी विदीर्ण कर दे रहे थे। अपनी नाकमें वायुको रोककर और फिर उसे छोड़नेसे वे वृक्षोंको भी चूर-चूर कर दे रहे थे ॥ १२ ॥ वे दोनों दैत्य पार्वतीके पुत्र मयूरेशको मारनेकी इच्छासे शीघ्र ही उनके पास जा पहुँचे। वहाँ वे दोनों आपसमें ही मतवाले महान् हाथियोंके समान युद्ध करने लगे। उन दोनों महिषरूपधारी दैत्योंकी गर्जनासे आकाश उसी प्रकार गूँज उठा, जैसे कि मेघोंके गर्जनसे गर्जित होता है। वे दोनों रक्तसे लथपथ होकर क्रमशः कभी विजय प्राप्त कर रहे थे और कभी पराजित हो जा रहे थे ॥ १३-१४ ॥ उनसे भयभीत हुए वे मुनियोंके बालक उसी प्रकार भाग पड़े, जैसे कि भेड़ियेके भयसे भागते हैं। तदनन्तर गिरिजापुत्र देव मयूरेशने दूरसे ही उन महान् दैत्योंको देखा। वे यह सोचने लगे कि इन दो महान् दुष्टोंको किस उपायसे मारा जाय, तभी उन्होंने उन बालकोंके देखते-ही-देखते महिषरूपी उन दोनों महान् बलशाली दैत्योंकी पूँछ पकड़ ली और बार-बार उन्हें घुमाते हुए आकाशमें फेंक दिया। एक मुहूर्तके बाद वे वृक्षोंको विदीर्ण करते हुए पृथिवीपर गिर पड़े ॥ १५-१७ ॥ गिरनेसे हुए उनके शरीरके सैकड़ों टुकड़ोंको भेड़िया आदि जानवरोंने खा डाला। तदनन्तर वे मुनिबालक मयूरेशके समीप गये और श्रद्धाभक्तिसे उनकी स्तुति करने लगे ॥ १८ ॥ बालक बोले—जिनके तत्त्व-रहस्यको ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनिगण भी नहीं जानते हैं, उन आप सर्वान्तर्यामीको हम बालक कैसे जान सकते हैं ? ॥ १९ ॥ आपने बचपनसे ही इन करोड़ों दैत्योंका विनाश कर डाला है, आज ये दोनों दैत्य महिषका रूप धारणकर आपको मारनेके लिये आये हुए थे ॥ २० ॥ जिन असुरोंके श्वास छोड़नेमात्रसे पर्वत, वृक्ष तथा पृथ्वी कम्पित हो उठती थी, ऐसे उन महिषोंको खेल- खेलमें ही पूँछ पकड़कर आपने उन्हें चूहेकी भाँति फेंक दिया था ॥ २१ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर वे मयूरेश खेलते- खेलते यज्ञस्थलमें पहुँच गये। वहाँ हो रहे इन्द्रयज्ञको देखकर वे अत्यन्त रुष्ट हो गये और उन्होंने तत्क्षण ही यज्ञका विध्वंस कर डाला। सभी मुनिबालकोंसे घिरे हुए उन मयूरेशने इन्द्रकी मूर्ति दूर फेंककर उन सभी मुनीश्वरोंसे कहा—हे पवित्रहृदय मुनियो ! आप लोगोंद्वारा यह कौन-सा कार्य किया जा रहा है ? ॥ २२-२३ ॥ [स्वयं ही] सम्पूर्ण पदार्थोंकी अभिलाषा रखनेवाले इन्द्रके सन्तुष्ट हो जानेपर [उनके द्वारा] कौन-सी वस्तु दी जा सकती है? क्या बकरीकी प्रार्थना करनेसे