भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 533, कुल 656 में से

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पृष्ठ 533

क्री०ख०-अ०१०७ ] * मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षमें मुनियोंके कहनेपर पार्वतीका इन्द्रयाग करना * ५३१ कामधेनुसे प्राप्त होनेवाला फल मिल सकता है ? ॥ २४ ॥ तदनन्तर उन मयूरेशने यज्ञाग्निको शान्त करके यज्ञकी शेष सामग्रीका स्वयं भक्षण कर लिया। उनके इस प्रकारके चांचल्यको देखकर मुनियोंके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन मुनिगणोंके हृदयमें देवी पार्वतीके प्रति विशेष भक्ति थी, इसलिये वे उन गुणेश्वरको कुछ भी उलाहना देने अथवा समझाने या क्रोध करके कुछ भी कहनेमें समर्थ नहीं हो सके ॥ २५-२६ ॥ तदनन्तर वे देवी पार्वतीको सारा वृत्तान्त निवेदनकर अपने-अपने आश्रमोंको चले गये। वे बोले—इन्द्रको यदि यह समाचार विदित होगा, तो उन क्षुब्ध मनवालेके द्वारा जो होनेवाला होगा, वह होता रहे, उससे हमें क्या प्रयोजन ! [ इधर ] अपने अपमानकी बात जानकर इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। क्रोधसे रक्त नेत्रोंवाले वे तीनों लोकोंको दग्ध करते हुए-से प्रतीत हो रहे थे। उन्होंने सभी देवताओंको बुलाया और उनसे यह श्रेष्ठ वचन कहा— ॥ २७—२८१/२ ॥ इन्द्र बोले—मुनिगणोंने बड़े ही श्रद्धाभावसे मुझे उद्देश्य करके यज्ञ प्रारम्भ किया था, किंतु गुणेशने उस यज्ञका विध्वंस कर दिया है। अब मैं आज उस गुणेशके पराक्रमको देखूँगा। मेरे क्रुद्ध हो जानेपर चराचरसहित सम्पूर्ण त्रैलोक्य नष्ट हो जायगा ॥ २९-३० ॥ देवता बोले—[ हे देव !] यदि आपकी आज्ञा हो तो हमलोग उस मयूरेशको बाँधकर क्षणभरमें यहाँ ले आते हैं ॥ ३०१/२ ॥ इन्द्र बोले—हे अग्निदेव ! मयूरेशपुरमें तुम्हारा निवास अब कभी न हो। तुम मेरी आज्ञासे मयूरेशपुरमें निवास करनेवाले लोगोंके उदरमेंसे भी निकलकर छिप जाओ। अर्थात् उदरमें जो जठराग्निरूपसे तुम रहते हो, वहाँसे भी अन्तर्धान हो जाओ ॥ ३११/२ ॥ ब्रह्मा बोले—इस प्रकारसे क्रोधाविष्ट मनवाले देवराज इन्द्रके वचन सुनकर अग्नि उस मयूरेशपुरसे तथा वहाँके निवासियोंके उदरसे भी अन्तर्धान हो गये। जब मुनियोंने वहाँ कहीं भी अग्नि नहीं देखी तो उन्होंने हवनहेतु अग्नि प्राप्त करनेके लिये अरणि-मन्थन किया ॥ ३२-३३ ॥ अग्निको प्रकट होता न देखकर उन्होंने बिना अग्निमें पकाये गये अन्नका आदरपूर्वक भक्षण किया, किंतु पेटमें अग्नि (जठराग्नि) न होनेके कारण वह अन्न पच नहीं पाया, फलस्वरूप उन्हें असह्य पीड़ा हुई ॥ ३४ ॥ तब वे मुनिगण कृपालु मयूरेशके पास गये और उन्हें प्रणाम करके कहने लगे— [हे देव !] आपके द्वारा इन्द्रयागके विध्वंस किये जानेपर इन्द्रके द्वारा बुलाये गये अग्निदेव [इस नगरसे] कहीं अन्यत्र चले गये हैं और पेटमें रहनेवाली अग्नि (जठराग्नि) भी यहाँके पुरवासियोंके उदरसे निकलकर अन्तर्धान हो गयी है ॥ ३५१/२ ॥ उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे मयूरेश प्रत्येक नगरवासीके उदरमें अग्नि बनकर स्थित हो गये, फलस्वरूप वे सभी नागरिक भूखसे व्याकुल हो गये, इसी प्रकारसे रसोईघरों तथा अग्निकुण्डोंमें भी अग्नि पहलेके समान जलने लगी ॥ ३६-३७ ॥ तदनन्तर महाबली इन्द्रने क्रुद्ध होकर उस नगरकी वायुका हरण कर लिया। प्राण, अपान आदि पाँचों प्राण-वायुओंके शरीरसे निकल जानेपर सम्पूर्ण मयूरेशनगरी प्रेतमय हो गयी। तब देव मयूरेशने पंचप्राणमय होकर उन सभी नगरनिवासियोंको जीवित कर डाला। पुनः इन्द्रने सूर्यसे कहा—आप इस मयूरेशपुरीको अपने तापसे अत्यन्त संतप्त कर दें ॥ ३८-३९ ॥ तब सूर्य बारह आदित्योंका स्वरूप धारणकर सब कुछ जलाने लगे। उन्होंने वापी, कूप, तड़ाग तथा नदियोंके जलको सुखा डाला। नगर, ग्राम, वन तथा खानोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी जल उठी। यह देखकर मयूरेश शीघ्र ही मेघ बनकर बरसने लगे ॥ ४०-४१ ॥ उन्होंने उस तापको शान्त कर दिया और मरे हुए सभी जीवोंको जीवित कर दिया। तदनन्तर हर्षमें भरे हुए सभी लोगोंने 'बहुत अच्छा-बहुत अच्छा'—ऐसा कहकर उन मयूरेशका पूजन किया ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इन्द्रने जो-जो प्रतिकूल कर्म किये थे, वे सब मयूरेशने दूर कर दिये। जब इन्द्रको यह सब मालूम हुआ तो वे मयूरेशके पास गये और उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर इन्द्रने दोनों हाथ जोड़कर उन