श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 534, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रभु सर्वेश्वर मयूरेश्वरकी स्तुति की ॥ ४३ १/२ ॥ इन्द्रने अपने मस्तकको उनके चरणोंमें रखकर सादर उनकी प्रार्थना की ॥ ४६ ॥ इन्द्र बोले- हे विभो ! आपके यथार्थ स्वरूपको न वेद जानते हैं, न ऋषिगण जानते हैं और न ब्रह्मा आदि ब्रह्माजी बोले- उनके मनको अन्य किसी देवता ही जानते हैं। आप सर्वान्तर्यामी हैं, सर्वस्वरूप हैं संकल्पसे रहित जानकर गुणेश्वर उनसे बोले- हे भद्र ! और साक्षात् ब्रह्म हैं। आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले 'उठिये, उठिये' आप अपने पदपर सुखपूर्वक विराजमान ब्रह्मा आदि प्रजापतियोंके तथा सभी कारणोंके भी परम होइये। तदनन्तर वे शचीपति इन्द्र उन देव गुणेश कारण हैं। आप हमारे अपराधोंको क्षमा करनेकी कृपा मयूरेश्वरकी पूजा करके और उन्हें प्रणाम करके फिर करें, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ ॥ ४४-४५ १/२ ॥ उनकी प्रदक्षिणा करके प्रसन्नमन होकर अपनी नगरी ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार स्तुति करके देवराज अमरावतीको गये ॥ ४७-४८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरितके अन्तर्गत इन्द्रयज्ञके ध्वंसका वर्णन' नामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०७ ॥ एक सौ आठवाँ अध्याय पन्द्रहवें वर्षमें मयूरेश्वरद्वारा व्याघ्ररूपी दैत्यको विकृतरूपवाला बनानेकी कथा तथा यमराजके गर्वापहरणका आख्यान ब्रह्माजी बोले- पन्द्रहवें वर्षमें एक दिन मयूरेश बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न एक दैत्य वहाँ आया। उसके बालकोंके साथ पवित्र जलवाली ब्रह्मकमण्डलु महान् शब्दसे तीनों लोक कम्पित हो रहे थे। वह दुष्ट (कमण्डलुभवा) नामक नदीमें स्नान करने गये ॥ १ ॥ दैत्य व्याघ्रका रूप धारण किया हुआ था। उसकी स्नान करनेके अनन्तर शीघ्र ही अपना सन्ध्यावन्दनादि गरदनके खड़े बालोंने मेघोंको छिन्न-भिन्न कर डाला नित्यकर्म पूर्ण करके उन बालकोंने अपने हृदयमें स्थित था। वह अपने विकराल मुखको फैलाये हुए ऐसा लग गणनायकका मानस षोडश उपचारोंके द्वारा पूजन रहा था, मानो तीनों लोकोंको ग्रस डालेगा ॥ ७-८ ॥ किया। किसीने कमलके आसनपर विराजमान मयूरेशकी उसे देखकर वे सभी बालक रोते-चिल्लाते हुए तो किसीने मयूरपर आरूढ़ मयूरेशकी दिव्य सुगन्धित द्रव्यों, दिव्य वस्त्रों तथा दिव्य पुष्पोंसे पूजा की ॥ २-३ ॥ दसों दिशाओंमें भाग गये। वह दैत्य मन्दिरके द्वारका भेदनकर मयूरेशके समीप आ पहुँचा ॥ ९ ॥ गार्ग्य नामक मुनिने मन्दिरमें रत्नोंसे निर्मित आसनपर तब मयूरेश भी शार्दूलके समान रूप धारण करके विराजमान उन मयूरेश्वरका ध्यान करके उनकी पूजा क्षणभरमें ही उसके समीप आ गये, उन शार्दूलरूपधारी की। इसी बीच अकस्मात् उस मन्दिरका द्वार बन्द हो मयूरेशको देखकर वह व्याघ्ररूपी दैत्य सहसा भाग गया। जबतक वे मुनि उसे खोलते, तबतक वह द्वार और पड़ा। तब शार्दूलरूपी मयूरेश भी उसके पीछे-पीछे भी दृढ़तापूर्वक बन्द हो गया। वे मुनि उसीके अन्दर चिल्लाने भागे। इधर-उधर घूमते हुए वह व्याघ्र एक वनमें पहुँचा लगे और वे बालक भी रोने-चिल्लाने लगे ॥ ४-५ ॥ और वहाँ एक निकुंजमें छिप गया। तदनन्तर शार्दूलरूपधारी बालक बोले- हे देवेश ! आप ही हमारे माता मयूरेश एक वृक्षपर चढ़ गये और वहाँसे उस निकुंजके हैं, आप ही पिता भी हैं, द्वार बन्द करके आप अन्दर मध्यमें कूद पड़े ॥ १०-११ ॥ क्यों स्थित हैं? आप हमारे अपराधोंको क्षमा करें ॥ ६ ॥ मयूरेशने अपने दोनों हाथोंसे उसके मुखको दृढ़तापूर्वक ब्रह्माजी बोले- उसी समयकी बात है, महान् पकड़ लिया और अन्य हाथोंसे उसे खींचते हुए बाहर