श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 535, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१०८ ] * मयूरेश्वरद्वारा व्याघ्ररूपी दैत्यको विकृतरूपवाला बनानेकी कथा * ५३३
लाकर अपने परशु नामक शस्त्रसे उसकी नासिका, उसके दोनों कान, दोनों पैर, पूँछ तथा आगेके दोनों हाथोंको काट डाला। तदनन्तर गुणेश्वरने 'अब अपना मुख नहीं दिखलाना' यह कहकर उसे छोड़ दिया ॥ १२-१३॥ तदनन्तर वह दैत्य व्याघ्ररूपको त्यागकर अपने वास्तविक दैत्यरूपमें आकर उसी प्रकारका अर्थात् नासिका आदि अंगोंके कट जानेसे विकृत स्वरूपवाला हो गया। तदुपरान्त वह दैत्य मयूरेश्वरसे बोला- तुम्हारे शरीरको भी मैं ऐसा ही छिन्न-भिन्न अंगोंवाला कर दूँगा। यह कहकर वह दैत्य अपने घरको चला गया और मयूरेश भी अपने स्थानपर चले आये। तदनन्तर वे मुनिबालक मयूरेश कहाँ चला गया-इस प्रकारसे दुखी मनसे कहते हुए उनको ढूँढ़नेके लिये इधरसे उधर घूमने लगे ॥ १४-१५॥ भ्रमण करते-करते अत्यन्त थके हुए वे बालक सुन्दर छायायुक्त एक वृक्षके नीचे लेट गये। वे कहने लगे-इसी रास्तेसे वे मयूरेश जायँगे, तब हम उनके चरणकमलका दर्शन करेंगे ॥ १६ ॥ उन बालकोंको दक्षिण दिशाकी ओर पैर करके सोया हुआ देखकर सूर्यपुत्र यमराज कुपित हो उठे। उनके नेत्र अत्यन्त लाल हो उठे। अपने क्रोधसे ब्रह्माण्डको भी निगल लेनेका साहस रखनेवाले वे यमराज उन बालकोंको बाँधकर अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर मयूरेश जब वहाँ आये तो उन्होंने वृक्षके तलपर उन बालकोंको नहीं देखा, तब वे अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये ॥ १७-१८॥ उन बालकोंसे रहित होकर वे मयूरेश्वर अत्यन्त चिन्तामग्न हो गये। उन्हें कहीं भी सुख प्राप्त नहीं हो रहा था। उसी समय वहाँ मुनिगण आ पहुँचे ॥ १९॥ मुनिगण बोले- हे देव! हम लोगोंके बालक कहाँ हैं, प्रातःकाल आप उन सभीको अपने साथ ले आये थे। इस समय आप तो आ गये हैं, अब उनके बिना हम लोगोंके प्राण निश्चित ही निकल जायँगे ॥ २०॥ ब्रह्माजी बोले- उनके ऐसा कहनेपर भी देव मयूरेश्वर उनसे तो कुछ नहीं बोले, लेकिन केवल आँखोंसे बार-बार आँसू गिराने लगे। तदनन्तर वे कुछ सोच-विचारकर भास्करपुत्र यमकी पुरीको चले गये। वहाँ यमदूतोंने अपने स्वामी यमराजको [मयूरेशके विषयमें] बताया ॥ २१ ॥ दूत बोले- हे यम! कोई युद्ध करनेकी इच्छासे यहाँ आया है, वह तीनों लोकोंका विनाश करनेवाला है, वह अत्यन्त उग्र ध्वनि कर रहा है। उसकी भुजाएँ विशाल हैं, हमारे द्वारा रोके जानेपर भी वह बलपूर्वक आ गया है॥ २२॥ ब्रह्माजी बोले- तब सिन्दूरके सदृश अरुण वर्णवाले भयानक महिषपर आरूढ़ होकर दण्डधर यमराज एकाएक मयूरेशके समीप आ गये ॥ २३ ॥ यम बोले- जिसके दण्डके आघातसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चूर-चूर हो जाता है, उस मेरे सामने एक छोटे- से बालक तुम कैसे युद्ध कर सकोगे ? ॥ २४ ॥ देव मयूरेश बोले- हे यम! तुम अपनी महिमाका वर्णन कर रहे हो, किंतु मुझे तो तुम एक दरिद्रकी भाँति प्रतीत होते हो। मेरी वक्रदृष्टि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका विनाश कर डालेगी ॥ २५ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे मयूरेश यमराजके कन्धेपर आरूढ़ हो गये और उन्होंने यमराजको उनके वाहन भैंसेके ऊपरसे नीचे गिरा दिया, और तत्क्षण ही स्वयं भी उन यमके ऊपर जा गिरे ॥ २६ ॥ उन मयूरेशका ऐसा पराक्रम देखकर यमराजने दोनों हाथ जोड़कर परम श्रद्धाभक्तिके साथ उन सुरेश्वरकी स्तुति की ॥ २७ ॥ यम बोले- [हे प्रभो !] आपके यथार्थ स्वरूपको न तो ब्रह्मा आदि देवता जानते हैं और न सनकादि महर्षि ही जानते हैं। आप परमेश्वरका वेद नेति-नेति कहकर वर्णन करते हैं ॥ २८ ॥ आप अपनी इच्छासे संसारकी सृष्टि करते हैं, उसका पालन-पोषण करते हैं और उसका संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप सभी दुष्ट दैत्योंके विनाशक हैं, यह सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। आप हमारे द्वारा अकस्मात् किये गये अपराधको क्षमा करनेकी कृपा करें ॥ २९१/२ ॥