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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

क्री०ख०-अ०१०७] * मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षमें मुनियोंके कहनेपर पार्वतीका इन्द्रयाग करना * ५२१

यहाँ ले आओ ॥ ३११/२ ॥ नन्दी बोले- हे महेश्वर! आपकी आज्ञासे तो मैं शेषनाग, सूर्य अथवा चन्द्रमाको भी यहाँ ले आऊँ, फिर उस छोटे-से मयूरेशकी मेरे सामने क्या गणना है! ॥ ३२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-ऐसा कह करके क्रोधसे रक्त नेत्रवाले वे नन्दी तीखी सींगोंसे वृक्षों तथा पर्वतोंको गिराते हुए और आकाशको निगलते हुए-के समान वायुके वेगसे चल पड़े और वहाँ पहुँचकर उन मयूरेशसे कहने लगे-अरे! तुम शिवके पास चलो। यदि तुम स्वयं नहीं चलते हो तो मैं तुम्हें ले जाऊँगा, मैं दूसरे गणोंके समान नहीं हूँ। उनके इस प्रकार कहनेपर मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपनी आने-जानेवाली श्वासके चक्रमें उन्हें फँसा डाला अर्थात् नासिकामार्गसे अपने भीतर ले गये और फिर अत्यन्त खिन्न हुए उन नन्दीको अपने दृढ़ निःश्वासके बलसे शिवके समीप पहुँचा दिया ॥ ३३-३६ ॥ उस समय अपने पौरुषका नाना प्रकारसे बखान करनेवाले वे नन्दी अपने मुखसे रक्तका वमन करते हुए मूर्च्छित होकर दो मुहूर्ततक पृथिवीपर गिरे रहे। शिवने उन नन्दीके जानुओंके समीप मयूरेशको स्थित हुआ देखा। दिव्य वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित वे मयूरेश उस समय अत्यन्त देदीप्यमान विग्रहवाले प्रतीत हो रहे थे ॥ ३७-३८ ॥ तदनन्तर गणोंने मस्तकपर विराजमान चन्द्रमावाले भगवान् शिवको देखकर कहा-हे देव! आपके मस्तकपर तो चन्द्रमा वैसे ही विराजमान हैं, जैसे पहले थे। हे शिव! आपने व्यर्थमें ही हमें जानेकी आज्ञा प्रदान की। तब अपने मस्तकपर चन्द्रमाको स्थित देखकर भगवान् शिवने मयूरेशसे तथा गणोंसे कहा- ॥ ३९१/२ ॥ शिव बोले-वे गण, तुम मयूरेश तथा नन्दी-तुम सभी मेरी आज्ञाका पालन करनेसे थक गये हो, मेरे मस्तकपर चन्द्रमाके विद्यमान रहनेपर भी तुम सभीमें व्यर्थ ही युद्ध हुआ ॥ ४०१/२ ॥ प्रमथगण बोले- हे देवेश शंकर ! आजसे लेकर ये मयूरेश हमारे स्वामी बनें ॥ ४१ ॥ ब्रह्माजी बोले-उन गणोंसे भगवान् शिवने कहा- ऐसा ही होगा। तब वे मयूरेश गणराज हो गये। तदनन्तर वे सभी गण भगवान् शिव, गणेश एवं गणेशजननी पार्वतीको प्रणाम करके और उस प्रकारके प्रभावसे सम्पन्न देवेश मयूरेशकी प्रशंसा करके गर्जना करते हुए अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ४२-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'चन्द्रहरणलीलाका वर्णन' नामक एक सौ छठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०६ ॥

एक सौ सातवाँ अध्याय मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षमें मुनियोंके कहनेपर पार्वतीका इन्द्रयाग करना, मयूरेश्वरका कल तथा विंकल नामक दैत्योंका वध और फिर इन्द्रयागको विध्वंस करना, रुष्ट होकर इन्द्रका मयूरेशपुरवासियों तथा मयूरेशपुरीको संतप्त करना, मयूरेश्वरका सबकी रक्षा करना एवं इन्द्रका मयूरेशकी शरण ग्रहण करना ब्रह्माजी बोले-मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षकी बात है, एक दिन गौतम आदि महर्षिगण माता पार्वतीके घरमें अनेक गणोंसे समन्वित शिवके पास आये। तब माता पार्वतीने उन महर्षियोंको प्रणामकर अपने समक्ष अनेक आसनोंपर विराजमान उनका विधिपूर्वक पूजन किया और उनको अपने मनकी बात बताते हुए कहा ॥ १-२ ॥ गिरिजा बोलीं-अनेक विघ्नोंके भयसे हमने अत्यन्त श्रेष्ठ त्रिसन्ध्या नामक क्षेत्रमें रहना छोड़ दिया था, किंतु यहाँ भी मेरे इस बालकपर बहुतसे विघ्न हो रहे हैं। आपलोग यह बतानेकी कृपा करें कि किस कर्मको करनेसे विघ्न उत्पन्न नहीं होंगे अथवा रहनेके लिये कोई उत्तम स्थान बतायें, जहाँ कि विघ्न बाधित

[Header] ५३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

न कर सकें ॥ ३१/२ ॥ मुनियोंने कहा—हे देवि! इन्द्रयाग करनेपर वह सभी विघ्नोंका हरण कर देगा ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी बोले—तब पार्वतीने शीघ्र ही एक अत्यन्त विस्तृत यज्ञमण्डप बनवाया और इन्द्रको प्रसन्न करनेवाली यज्ञ-सामग्रियोंको एकत्र करवाया ॥ ५ ॥ भगवान् शम्भुसे अनुमति लेकर उन पार्वतीने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर महर्षियोंके द्वारा विधि- विधानपूर्वक इन्द्रयाग करवाया। उन महर्षियोंने देवराज इन्द्रका ध्यानकर उनका आवाहन किया। तदनन्तर उन्होंने देवी पार्वतीकी आज्ञासे साङ्ग-सपरिवार इन्द्रका तथा उनके गणोंका भी पूजन किया ॥ ६-७ ॥ उन श्रेष्ठ ऋषियोंने मन्त्रोच्चारणपूर्वक यज्ञकुण्डमें अग्निकी स्थापना की और मन्त्रजपकी संख्याके दशांश संख्यामें पायस तथा तिलोंकी आहुतियोंसे हवन किया ॥ ८ ॥ वे ऋषिगण मन्त्रके जपमें प्रारम्भमें प्रणव (ॐ) जोड़कर और अन्तमें 'नमः' जोड़कर मन्त्रजप करते थे, तथा हवनके समय उन मन्त्रोंके अन्तमें 'स्वाहा' जोड़कर हवन करते थे। वे द्विज चारों वेदोंमें पठित शान्तिमन्त्रोंका भी पाठ कर रहे थे। इसी समय जब बालक मयूरेश बालकोंके साथ क्रीडा करके यज्ञस्थलके समीप पहुँचे ही थे कि कल और विंकल नामक दो दैत्य भैंसेका रूप धारणकर उन मयूरेशके समक्ष आ पहुँचे। वे दोनों भयंकर शब्द करनेवाले, बहुत बड़ी-बड़ी सींगोंवाले और तीनों लोकोंको भय पहुँचानेवाले थे ॥ ९-११ ॥ वे दोनों महिषरूपी दैत्य अपने उठे हुए बालोंके द्वारा मेघोंको छिन्न-भिन्न कर रहे थे और अपनी पूँछके द्वारा पर्वतोंको भी विदीर्ण कर दे रहे थे। अपनी नाकमें वायुको रोककर और फिर उसे छोड़नेसे वे वृक्षोंको भी चूर-चूर कर दे रहे थे ॥ १२ ॥ वे दोनों दैत्य पार्वतीके पुत्र मयूरेशको मारनेकी इच्छासे शीघ्र ही उनके पास जा पहुँचे। वहाँ वे दोनों आपसमें ही मतवाले महान् हाथियोंके समान युद्ध करने लगे। उन दोनों महिषरूपधारी दैत्योंकी गर्जनासे आकाश उसी प्रकार गूँज उठा, जैसे कि मेघोंके गर्जनसे गर्जित होता है। वे दोनों रक्तसे लथपथ होकर क्रमशः कभी विजय प्राप्त कर रहे थे और कभी पराजित हो जा रहे थे ॥ १३-१४ ॥ उनसे भयभीत हुए वे मुनियोंके बालक उसी प्रकार भाग पड़े, जैसे कि भेड़ियेके भयसे भागते हैं। तदनन्तर गिरिजापुत्र देव मयूरेशने दूरसे ही उन महान् दैत्योंको देखा। वे यह सोचने लगे कि इन दो महान् दुष्टोंको किस उपायसे मारा जाय, तभी उन्होंने उन बालकोंके देखते-ही-देखते महिषरूपी उन दोनों महान् बलशाली दैत्योंकी पूँछ पकड़ ली और बार-बार उन्हें घुमाते हुए आकाशमें फेंक दिया। एक मुहूर्तके बाद वे वृक्षोंको विदीर्ण करते हुए पृथिवीपर गिर पड़े ॥ १५-१७ ॥ गिरनेसे हुए उनके शरीरके सैकड़ों टुकड़ोंको भेड़िया आदि जानवरोंने खा डाला। तदनन्तर वे मुनिबालक मयूरेशके समीप गये और श्रद्धाभक्तिसे उनकी स्तुति करने लगे ॥ १८ ॥ बालक बोले—जिनके तत्त्व-रहस्यको ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनिगण भी नहीं जानते हैं, उन आप सर्वान्तर्यामीको हम बालक कैसे जान सकते हैं ? ॥ १९ ॥ आपने बचपनसे ही इन करोड़ों दैत्योंका विनाश कर डाला है, आज ये दोनों दैत्य महिषका रूप धारणकर आपको मारनेके लिये आये हुए थे ॥ २० ॥ जिन असुरोंके श्वास छोड़नेमात्रसे पर्वत, वृक्ष तथा पृथ्‍वी कम्पित हो उठती थी, ऐसे उन महिषोंको खेल- खेलमें ही पूँछ पकड़कर आपने उन्हें चूहेकी भाँति फेंक दिया था ॥ २१ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर वे मयूरेश खेलते- खेलते यज्ञस्थलमें पहुँच गये। वहाँ हो रहे इन्द्रयज्ञको देखकर वे अत्यन्त रुष्ट हो गये और उन्होंने तत्क्षण ही यज्ञका विध्वंस कर डाला। सभी मुनिबालकोंसे घिरे हुए उन मयूरेशने इन्द्रकी मूर्ति दूर फेंककर उन सभी मुनीश्वरोंसे कहा—हे पवित्रहृदय मुनियो ! आप लोगोंद्वारा यह कौन-सा कार्य किया जा रहा है ? ॥ २२-२३ ॥ [स्वयं ही] सम्पूर्ण पदार्थोंकी अभिलाषा रखनेवाले इन्द्रके सन्तुष्ट हो जानेपर [उनके द्वारा] कौन-सी वस्तु दी जा सकती है? क्या बकरीकी प्रार्थना करनेसे

क्री०ख०-अ०१०७ ] * मयूरेश्वरके चौदहवें वर्षमें मुनियोंके कहनेपर पार्वतीका इन्द्रयाग करना * ५३१ कामधेनुसे प्राप्त होनेवाला फल मिल सकता है ? ॥ २४ ॥ तदनन्तर उन मयूरेशने यज्ञाग्निको शान्त करके यज्ञकी शेष सामग्रीका स्वयं भक्षण कर लिया। उनके इस प्रकारके चांचल्यको देखकर मुनियोंके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन मुनिगणोंके हृदयमें देवी पार्वतीके प्रति विशेष भक्ति थी, इसलिये वे उन गुणेश्वरको कुछ भी उलाहना देने अथवा समझाने या क्रोध करके कुछ भी कहनेमें समर्थ नहीं हो सके ॥ २५-२६ ॥ तदनन्तर वे देवी पार्वतीको सारा वृत्तान्त निवेदनकर अपने-अपने आश्रमोंको चले गये। वे बोले—इन्द्रको यदि यह समाचार विदित होगा, तो उन क्षुब्ध मनवालेके द्वारा जो होनेवाला होगा, वह होता रहे, उससे हमें क्या प्रयोजन ! [ इधर ] अपने अपमानकी बात जानकर इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। क्रोधसे रक्त नेत्रोंवाले वे तीनों लोकोंको दग्ध करते हुए-से प्रतीत हो रहे थे। उन्होंने सभी देवताओंको बुलाया और उनसे यह श्रेष्ठ वचन कहा— ॥ २७—२८१/२ ॥ इन्द्र बोले—मुनिगणोंने बड़े ही श्रद्धाभावसे मुझे उद्देश्य करके यज्ञ प्रारम्भ किया था, किंतु गुणेशने उस यज्ञका विध्वंस कर दिया है। अब मैं आज उस गुणेशके पराक्रमको देखूँगा। मेरे क्रुद्ध हो जानेपर चराचरसहित सम्पूर्ण त्रैलोक्य नष्ट हो जायगा ॥ २९-३० ॥ देवता बोले—[ हे देव !] यदि आपकी आज्ञा हो तो हमलोग उस मयूरेशको बाँधकर क्षणभरमें यहाँ ले आते हैं ॥ ३०१/२ ॥ इन्द्र बोले—हे अग्निदेव ! मयूरेशपुरमें तुम्हारा निवास अब कभी न हो। तुम मेरी आज्ञासे मयूरेशपुरमें निवास करनेवाले लोगोंके उदरमेंसे भी निकलकर छिप जाओ। अर्थात् उदरमें जो जठराग्निरूपसे तुम रहते हो, वहाँसे भी अन्तर्धान हो जाओ ॥ ३११/२ ॥ ब्रह्मा बोले—इस प्रकारसे क्रोधाविष्ट मनवाले देवराज इन्द्रके वचन सुनकर अग्नि उस मयूरेशपुरसे तथा वहाँके निवासियोंके उदरसे भी अन्तर्धान हो गये। जब मुनियोंने वहाँ कहीं भी अग्नि नहीं देखी तो उन्होंने हवनहेतु अग्नि प्राप्त करनेके लिये अरणि-मन्थन किया ॥ ३२-३३ ॥ अग्निको प्रकट होता न देखकर उन्होंने बिना अग्निमें पकाये गये अन्नका आदरपूर्वक भक्षण किया, किंतु पेटमें अग्नि (जठराग्नि) न होनेके कारण वह अन्न पच नहीं पाया, फलस्वरूप उन्हें असह्य पीड़ा हुई ॥ ३४ ॥ तब वे मुनिगण कृपालु मयूरेशके पास गये और उन्हें प्रणाम करके कहने लगे— [हे देव !] आपके द्वारा इन्द्रयागके विध्वंस किये जानेपर इन्द्रके द्वारा बुलाये गये अग्निदेव [इस नगरसे] कहीं अन्यत्र चले गये हैं और पेटमें रहनेवाली अग्नि (जठराग्नि) भी यहाँके पुरवासियोंके उदरसे निकलकर अन्तर्धान हो गयी है ॥ ३५१/२ ॥ उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे मयूरेश प्रत्येक नगरवासीके उदरमें अग्नि बनकर स्थित हो गये, फलस्वरूप वे सभी नागरिक भूखसे व्याकुल हो गये, इसी प्रकारसे रसोईघरों तथा अग्निकुण्डोंमें भी अग्नि पहलेके समान जलने लगी ॥ ३६-३७ ॥ तदनन्तर महाबली इन्द्रने क्रुद्ध होकर उस नगरकी वायुका हरण कर लिया। प्राण, अपान आदि पाँचों प्राण-वायुओंके शरीरसे निकल जानेपर सम्पूर्ण मयूरेशनगरी प्रेतमय हो गयी। तब देव मयूरेशने पंचप्राणमय होकर उन सभी नगरनिवासियोंको जीवित कर डाला। पुनः इन्द्रने सूर्यसे कहा—आप इस मयूरेशपुरीको अपने तापसे अत्यन्त संतप्त कर दें ॥ ३८-३९ ॥ तब सूर्य बारह आदित्योंका स्वरूप धारणकर सब कुछ जलाने लगे। उन्होंने वापी, कूप, तड़ाग तथा नदियोंके जलको सुखा डाला। नगर, ग्राम, वन तथा खानोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी जल उठी। यह देखकर मयूरेश शीघ्र ही मेघ बनकर बरसने लगे ॥ ४०-४१ ॥ उन्होंने उस तापको शान्त कर दिया और मरे हुए सभी जीवोंको जीवित कर दिया। तदनन्तर हर्षमें भरे हुए सभी लोगोंने 'बहुत अच्छा-बहुत अच्छा'—ऐसा कहकर उन मयूरेशका पूजन किया ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इन्द्रने जो-जो प्रतिकूल कर्म किये थे, वे सब मयूरेशने दूर कर दिये। जब इन्द्रको यह सब मालूम हुआ तो वे मयूरेशके पास गये और उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर इन्द्रने दोनों हाथ जोड़कर उन

५३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रभु सर्वेश्वर मयूरेश्वरकी स्तुति की ॥ ४३ १/२ ॥ इन्द्रने अपने मस्तकको उनके चरणोंमें रखकर सादर उनकी प्रार्थना की ॥ ४६ ॥ इन्द्र बोले- हे विभो ! आपके यथार्थ स्वरूपको न वेद जानते हैं, न ऋषिगण जानते हैं और न ब्रह्मा आदि ब्रह्माजी बोले- उनके मनको अन्य किसी देवता ही जानते हैं। आप सर्वान्तर्यामी हैं, सर्वस्वरूप हैं संकल्पसे रहित जानकर गुणेश्वर उनसे बोले- हे भद्र ! और साक्षात् ब्रह्म हैं। आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले 'उठिये, उठिये' आप अपने पदपर सुखपूर्वक विराजमान ब्रह्मा आदि प्रजापतियोंके तथा सभी कारणोंके भी परम होइये। तदनन्तर वे शचीपति इन्द्र उन देव गुणेश कारण हैं। आप हमारे अपराधोंको क्षमा करनेकी कृपा मयूरेश्वरकी पूजा करके और उन्हें प्रणाम करके फिर करें, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ ॥ ४४-४५ १/२ ॥ उनकी प्रदक्षिणा करके प्रसन्नमन होकर अपनी नगरी ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार स्तुति करके देवराज अमरावतीको गये ॥ ४७-४८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरितके अन्तर्गत इन्द्रयज्ञके ध्वंसका वर्णन' नामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०७ ॥ एक सौ आठवाँ अध्याय पन्द्रहवें वर्षमें मयूरेश्वरद्वारा व्याघ्ररूपी दैत्यको विकृतरूपवाला बनानेकी कथा तथा यमराजके गर्वापहरणका आख्यान ब्रह्माजी बोले- पन्द्रहवें वर्षमें एक दिन मयूरेश बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न एक दैत्य वहाँ आया। उसके बालकोंके साथ पवित्र जलवाली ब्रह्मकमण्डलु महान् शब्दसे तीनों लोक कम्पित हो रहे थे। वह दुष्ट (कमण्डलुभवा) नामक नदीमें स्नान करने गये ॥ १ ॥ दैत्य व्याघ्रका रूप धारण किया हुआ था। उसकी स्नान करनेके अनन्तर शीघ्र ही अपना सन्ध्यावन्दनादि गरदनके खड़े बालोंने मेघोंको छिन्न-भिन्न कर डाला नित्यकर्म पूर्ण करके उन बालकोंने अपने हृदयमें स्थित था। वह अपने विकराल मुखको फैलाये हुए ऐसा लग गणनायकका मानस षोडश उपचारोंके द्वारा पूजन रहा था, मानो तीनों लोकोंको ग्रस डालेगा ॥ ७-८ ॥ किया। किसीने कमलके आसनपर विराजमान मयूरेशकी उसे देखकर वे सभी बालक रोते-चिल्लाते हुए तो किसीने मयूरपर आरूढ़ मयूरेशकी दिव्य सुगन्धित द्रव्यों, दिव्य वस्त्रों तथा दिव्य पुष्पोंसे पूजा की ॥ २-३ ॥ दसों दिशाओंमें भाग गये। वह दैत्य मन्दिरके द्वारका भेदनकर मयूरेशके समीप आ पहुँचा ॥ ९ ॥ गार्ग्य नामक मुनिने मन्दिरमें रत्नोंसे निर्मित आसनपर तब मयूरेश भी शार्दूलके समान रूप धारण करके विराजमान उन मयूरेश्वरका ध्यान करके उनकी पूजा क्षणभरमें ही उसके समीप आ गये, उन शार्दूलरूपधारी की। इसी बीच अकस्मात् उस मन्दिरका द्वार बन्द हो मयूरेशको देखकर वह व्याघ्ररूपी दैत्य सहसा भाग गया। जबतक वे मुनि उसे खोलते, तबतक वह द्वार और पड़ा। तब शार्दूलरूपी मयूरेश भी उसके पीछे-पीछे भी दृढ़तापूर्वक बन्द हो गया। वे मुनि उसीके अन्दर चिल्लाने भागे। इधर-उधर घूमते हुए वह व्याघ्र एक वनमें पहुँचा लगे और वे बालक भी रोने-चिल्लाने लगे ॥ ४-५ ॥ और वहाँ एक निकुंजमें छिप गया। तदनन्तर शार्दूलरूपधारी बालक बोले- हे देवेश ! आप ही हमारे माता मयूरेश एक वृक्षपर चढ़ गये और वहाँसे उस निकुंजके हैं, आप ही पिता भी हैं, द्वार बन्द करके आप अन्दर मध्यमें कूद पड़े ॥ १०-११ ॥ क्यों स्थित हैं? आप हमारे अपराधोंको क्षमा करें ॥ ६ ॥ मयूरेशने अपने दोनों हाथोंसे उसके मुखको दृढ़तापूर्वक ब्रह्माजी बोले- उसी समयकी बात है, महान् पकड़ लिया और अन्य हाथोंसे उसे खींचते हुए बाहर

क्री०ख०-अ०१०८ ] * मयूरेश्वरद्वारा व्याघ्ररूपी दैत्यको विकृतरूपवाला बनानेकी कथा * ५३३

लाकर अपने परशु नामक शस्त्रसे उसकी नासिका, उसके दोनों कान, दोनों पैर, पूँछ तथा आगेके दोनों हाथोंको काट डाला। तदनन्तर गुणेश्वरने 'अब अपना मुख नहीं दिखलाना' यह कहकर उसे छोड़ दिया ॥ १२-१३॥ तदनन्तर वह दैत्य व्याघ्ररूपको त्यागकर अपने वास्तविक दैत्यरूपमें आकर उसी प्रकारका अर्थात् नासिका आदि अंगोंके कट जानेसे विकृत स्वरूपवाला हो गया। तदुपरान्त वह दैत्य मयूरेश्वरसे बोला- तुम्हारे शरीरको भी मैं ऐसा ही छिन्न-भिन्न अंगोंवाला कर दूँगा। यह कहकर वह दैत्य अपने घरको चला गया और मयूरेश भी अपने स्थानपर चले आये। तदनन्तर वे मुनिबालक मयूरेश कहाँ चला गया-इस प्रकारसे दुखी मनसे कहते हुए उनको ढूँढ़नेके लिये इधरसे उधर घूमने लगे ॥ १४-१५॥ भ्रमण करते-करते अत्यन्त थके हुए वे बालक सुन्दर छायायुक्त एक वृक्षके नीचे लेट गये। वे कहने लगे-इसी रास्तेसे वे मयूरेश जायँगे, तब हम उनके चरणकमलका दर्शन करेंगे ॥ १६ ॥ उन बालकोंको दक्षिण दिशाकी ओर पैर करके सोया हुआ देखकर सूर्यपुत्र यमराज कुपित हो उठे। उनके नेत्र अत्यन्त लाल हो उठे। अपने क्रोधसे ब्रह्माण्डको भी निगल लेनेका साहस रखनेवाले वे यमराज उन बालकोंको बाँधकर अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर मयूरेश जब वहाँ आये तो उन्होंने वृक्षके तलपर उन बालकोंको नहीं देखा, तब वे अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये ॥ १७-१८॥ उन बालकोंसे रहित होकर वे मयूरेश्वर अत्यन्त चिन्तामग्न हो गये। उन्हें कहीं भी सुख प्राप्त नहीं हो रहा था। उसी समय वहाँ मुनिगण आ पहुँचे ॥ १९॥ मुनिगण बोले- हे देव! हम लोगोंके बालक कहाँ हैं, प्रातःकाल आप उन सभीको अपने साथ ले आये थे। इस समय आप तो आ गये हैं, अब उनके बिना हम लोगोंके प्राण निश्चित ही निकल जायँगे ॥ २०॥ ब्रह्माजी बोले- उनके ऐसा कहनेपर भी देव मयूरेश्वर उनसे तो कुछ नहीं बोले, लेकिन केवल आँखोंसे बार-बार आँसू गिराने लगे। तदनन्तर वे कुछ सोच-विचारकर भास्करपुत्र यमकी पुरीको चले गये। वहाँ यमदूतोंने अपने स्वामी यमराजको [मयूरेशके विषयमें] बताया ॥ २१ ॥ दूत बोले- हे यम! कोई युद्ध करनेकी इच्छासे यहाँ आया है, वह तीनों लोकोंका विनाश करनेवाला है, वह अत्यन्त उग्र ध्वनि कर रहा है। उसकी भुजाएँ विशाल हैं, हमारे द्वारा रोके जानेपर भी वह बलपूर्वक आ गया है॥ २२॥ ब्रह्माजी बोले- तब सिन्दूरके सदृश अरुण वर्णवाले भयानक महिषपर आरूढ़ होकर दण्डधर यमराज एकाएक मयूरेशके समीप आ गये ॥ २३ ॥ यम बोले- जिसके दण्डके आघातसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चूर-चूर हो जाता है, उस मेरे सामने एक छोटे- से बालक तुम कैसे युद्ध कर सकोगे ? ॥ २४ ॥ देव मयूरेश बोले- हे यम! तुम अपनी महिमाका वर्णन कर रहे हो, किंतु मुझे तो तुम एक दरिद्रकी भाँति प्रतीत होते हो। मेरी वक्रदृष्टि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका विनाश कर डालेगी ॥ २५ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे मयूरेश यमराजके कन्धेपर आरूढ़ हो गये और उन्होंने यमराजको उनके वाहन भैंसेके ऊपरसे नीचे गिरा दिया, और तत्क्षण ही स्वयं भी उन यमके ऊपर जा गिरे ॥ २६ ॥ उन मयूरेशका ऐसा पराक्रम देखकर यमराजने दोनों हाथ जोड़कर परम श्रद्धाभक्तिके साथ उन सुरेश्वरकी स्तुति की ॥ २७ ॥ यम बोले- [हे प्रभो !] आपके यथार्थ स्वरूपको न तो ब्रह्मा आदि देवता जानते हैं और न सनकादि महर्षि ही जानते हैं। आप परमेश्वरका वेद नेति-नेति कहकर वर्णन करते हैं ॥ २८ ॥ आप अपनी इच्छासे संसारकी सृष्टि करते हैं, उसका पालन-पोषण करते हैं और उसका संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप सभी दुष्ट दैत्योंके विनाशक हैं, यह सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। आप हमारे द्वारा अकस्मात् किये गये अपराधको क्षमा करनेकी कृपा करें ॥ २९१/२ ॥

५३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर यमराजने वस्त्रों, रत्नों तथा फलोंद्वारा उन मयूरेशका पूजन किया। मुनिबालकोंको लाकर उन्होंने मयूरेशको समर्पित कर दिया और स्वयं वे हाथ जोड़कर आगे खड़े हो गये। प्रसन्न होकर वे सभी बालक परस्पर एक- दूसरेका आलिंगन करने लगे और बोले ॥ ३०-३१ ॥ बालक बोले-हम लोग आपके दर्शनके लिये प्रतीक्षा करते-करते जब थक गये थे, उसी समय यमराज हमें बाँधकर यमलोक ले गये। आपके दर्शनसे हम मुक्त हो गये हैं, अब हम अपने-अपने घरोंको जायँगे ॥ ३२ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर वे सभी बालक मयूरेश्वरको आगे करके मयूरेशपुरीमें स्थित अपने-अपने आश्रमको गये। वहाँ विविध प्रकारके वाद्योंकी सर्वत्र ध्वनि हो रही थी। वह नगर अनेक प्रकारके ध्वज तथा पताकाओंसे सुशोभित हो रहा था और पुष्पोंकी मालाओंसे विभूषित था। उस महान् कौतुकको देखनेके लिये यमराज भी उनके पीछे-पीछे गये ॥ ३३-३४ ॥ वहाँ उन मयूरेशके समक्ष वे सभी मुनिगण आये। उन्होंने देव मयूरेशकी पूजा-स्तुति की और बालकोंका आलिंगन किया। पहले जो मुनिगण मयूरेशपर कुपित हो उठे थे, उन सभी मुनियोंसे मयूरेशने कहा-मैं क्षणभरमें यमलोकसे इन बालकोंको ले आया हूँ ॥ ३५-३६ ॥ मुनिगण बोले-आप हमारी सर्वत्र रक्षा करते हैं, आप सर्वशक्तिमान् हैं ॥ ३६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार कहकर और उनकी आज्ञा प्राप्त करके वे सभी मुनिगण अपने आश्रमोंको चले गये। यमराज भी उन मयूरेशको प्रणाम करके बड़ी प्रसन्नताके साथ अपनी पुरीको गये। देव मयूरेश भी अपने घर पहुँचे और माता पार्वती तथा पिता भगवान् शंकरको हर्षित किया ॥ ३७-३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'यमराजके गर्वके परिहारका वर्णन' नामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०८ ॥ एक सौ नौवाँ अध्याय देवर्षि नारदसे शिव-पार्वतीका मयूरेशके विवाहके लिये कन्याके अन्वेषणके लिये कहना, देवर्षि नारदद्वारा सिद्धि एवं बुद्धि नामक कन्याओंको मयूरेशके योग्य बताना, शिव-पार्वती तथा ससैन्य मयूरेशका गण्डकी नगरकी ओर प्रस्थान, मार्गमें हेम नामक दैत्यका ससैन्य आगमन, मयूरेशकी कृपासे मुनिबालकोंद्वारा अभिमन्त्रित कुशोंसे असुर-सेनाका वध ब्रह्माजी बोले-एक बारकी बात है, भगवान् महेश्वर सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए थे, उस समय माता पार्वती उनसे बोलीं-हे महादेव ! मयूरेशकी अवस्था पन्द्रह वर्ष पार कर चुकी है, अतः अब आप उसके विवाहके विषयमें विचार कीजिये ॥ १ १/२ ॥ ये मयूरेश कामदेवसे भी अतुलनीय स्वरूपवाले हैं और इनके सभी अंग अत्यन्त सुन्दर हैं, अतः आप इनके लिये किसी सुन्दर शील-स्वभावसे सम्पन्न, सुन्दर मुखमण्डलवाली, नवयौवन-सम्पन्न, मृगके समान नेत्रोंवाली, हंसके समान चालवाली, कोयलके समान मधुर बोलनेवाली, सुन्दर नासिकावाली तथा क्षीण कटिवाली सुन्दर वधूका अन्वेषण कीजिये ॥ २-३ ॥ ब्रह्माजी बोले-पार्वतीके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे 'बहुत अच्छी बात है-बहुत अच्छी बात है'-ऐसा कहने लगे। वे अपने मनमें इस प्रकारकी सुन्दर कन्याके विषयमें सोचने लगे, किंतु उनको ऐसी कन्या कहीं नहीं दिखायी दी। अतः वे भगवान् शिव अत्यन्त चिन्तित हो उठे, तभी देवर्षि नारद वहाँ आ पहुँचे। उन्हें आसनपर बिठाकर और उनकी पूजा करके देव शिव उनसे बोले ॥ ४-५ ॥ शम्भु बोले-हे मुने ! आपके आगमनसे बड़े ही आनन्दकी प्राप्ति हुई है। हे देवर्षे ! आप बहुत दिनोंके

क्री०ख०-अ०१०९ ] * मयूरेशके विवाहके लिये कन्याका अन्वेषण * ५३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] पश्चात् आये हैं, अतः एक दिन आप यहाँ ठहरनेकी कृपा करें। हे अनघ ! हे विप्र ! आप चूँकि तीनों लोकोंमें भ्रमण करते रहते हैं, अतः अति सुन्दर शरीरवाले मेरे पुत्र मयूरेशके लिये किसी वधूकी खोज करें॥ ६-७॥ **ब्रह्माजी बोले—**उसी प्रकार माता पार्वतीने भी उनसे कहा—आप शीघ्र ही वधूके विषयमें विचार कीजिये॥ ७१/२ ॥ **नारद बोले—**हे स्वामिन्! मैं अपने कर्मके प्रति- फलस्वरूप अर्थात् दक्षशापके कारण कहीं भी एक स्थानपर दो मुहूर्तसे अधिक समयतक नहीं ठहर सकता हूँ। हे शिव! आपका यह कार्य सम्पन्न करनेके लिये ही ब्रह्माजीद्वारा प्रेषित होनेपर मैं यहाँ आया हूँ॥ ८१/२ ॥ आपके पुत्रके प्रभाव, लावण्य एवं अवस्थाको जानकर विधाता ब्रह्माजीने सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो कन्याओंको उन्हें प्रदान करनेकी अभिलाषा की है। उन दोनों कन्याओंके रूप-सौन्दर्यके सामने अनसूया तथा इन्द्रपत्नी शची भी लज्जित हो उठती हैं। उन दोनोंको देखकर सूर्यपत्नी संज्ञाने लज्जावश बड़वा (घोड़ी)-का रूप धारण कर लिया और वनमें गौतमपत्नी अहल्या शिलारूप हो गयी थी। हे हर! भगवान् विष्णुके मनको मोहित करनेवाली जालन्धरकी पत्नी वृन्दा भी जिन दोनोंको देखकर लज्जासे तुलसीवृक्ष हो गयी थी। हे पार्वती! [ऐसी उन कन्याओंके लिये] इन (मयूरेश)- के अतिरिक्त दूसरे वरोंकी बात ब्रह्माजीके हृदयमें उस समय नहीं आ सकी॥ ९-१२॥ हे देवि! इन दोनों (सिद्धि-बुद्धि एवं मयूरेश)-के समान सौन्दर्य एवं शौर्य अन्य किसी स्त्री-पुरुषमें नहीं है। उन दोनों सिद्धि एवं बुद्धिका संयोग होनेपर आपके पुत्र उसी प्रकार अत्यन्त शोभाको प्राप्त होंगे, जैसे कि रत्न एवं कांचनका संयोग होता है और जैसे मोती तथा मूँगेका संयोग अत्यन्त शोभासम्पन्न होता है॥ १३१/२ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**देवर्षि नारदजीके इस प्रकार कहनेपर वे भगवान् शिव एवं पार्वती अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ १४॥ **शिव बोले—**हे मुने! आपने हमारी मनोभिलाषाको पूर्ण करनेवाले शुभ और उचित वचन कहे हैं॥ १४१/२ ॥


[दायाँ स्तम्भ] **ब्रह्माजी बोले—**इसके अनन्तर भगवान् शिव भी तत्क्षण ही वृषपर आरूढ़ हुए और उन्होंने अर्धांगमें पार्वतीको बैठा लिया, तदनन्तर उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं तथा गौतम आदि मुनियोंको बुलाया और फिर वे सबके साथ बड़े हर्षित होते हुए निकल पड़े॥ १५-१६॥ देव मयूरेश अपने वाहन मयूरपर आरूढ़ होकर आगे-आगे चलने लगे। देवर्षि नारद अपनी तपस्याके प्रभावसे अन्तरिक्षमें होते हुए गये। सात करोड़ गण, जो नाना प्रकारके आयुधोंको धारण किये हुए थे, वे क्रीड़ा करते हुए तथा हर्षित होनेसे दसों दिशाओंको गुंजायमान करते हुए चल रहे थे॥ १७-१८॥ उस समय सभी प्रकारके वाद्य बज रहे थे। उन सबके चलनेसे उठनेवाली धूलिसे सूर्यमण्डल आच्छादित हो गया था। [उस विवाहयात्रामें] अट्ठासी हजार मुनिगण भी हर्षपूर्वक साथमें गये। जब वे सब गण्डकी नगरको जा रहे थे, तो उन्होंने मार्गमें सात करोड़ गणोंसे समन्वित राक्षसोंके सैन्यदलको देखा॥ १९-२०॥ उन राक्षसोंके मुख इतने विशाल थे कि वे आकाशको छू रहे थे। वे सभी सर्वदा कालको भी तिरस्कृत कर देनेवाले थे। जब उन निशाचरोंने मयूरेशकी सेनाके भयंकर शब्दको सुना तो वे सो करके उठे हुए निशाचर युद्ध करनेकी इच्छासे सन्नद्ध होकर निकल पड़े॥ २११/२ ॥ **राक्षस बोले—**तुम लोग किसके सैनिक हो, कहाँ जा रहे हो, तुम लोगोंका कहाँसे आगमन हुआ है? बिना अपने स्वामीकी आज्ञाके हम तुम लोगोंको नगरमें नहीं जाने देंगे॥ २२१/२ ॥ **मयूरेश बोले—**हम लोग स्वतन्त्र हैं, पराधीन नहीं हैं, दैत्यों तथा राक्षसोंका विनाश करनेवाले और सज्जनोंकी रक्षा एवं पालन करनेवाले हैं। अतः हम लोगोंको मार्ग दे दो, नहीं तो तुम लोगोंका नाश हो जायगा॥ २३१/२ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**उसी समय हेम नामक वह असुर वहाँ उपस्थित हुआ, जिसको पूर्वमें मयूरेशने नाक-कान आदि काटकर विकृत बना दिया था। वह असुर मयूरेशसे बोला—पहले तुमने मुझे अकेला पाकर [विकृत करके] वापस भेज दिया था, किंतु अब इस

५३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 समय राक्षसोंके साथ मिलकर मैं तुम्हारे प्राण ले लूँगा। कोई मर सकता है? इस प्रकार उस समय उन बालकोंने फिर वह हेम नामक असुर राक्षसोंसे बोला-इस सभी राक्षसोंको मार डाला और मयूरेश! [आपकी जय मयूरेशने बलपूर्वक अनेक दैत्योंका वध किया है, इसने हो], मयूरेश! [आपकी जय हो]-ऐसा कहते हुए वे मेरे अंगोंको काटकर मुझे भी विकृत शरीरवाला बना गर्जना करने लगे। असुरोंपर विजय पाकर वे मयूरेशके दिया है। अतः इसे शीघ्र मार डालो ॥ २४-२६ ॥ पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने मयूरेशको प्रणाम किया ब्रह्माजी बोले-उसका वैसा वचन सुनकर मयूरेश्वर और उनसे कहने लगे- ॥ ३११/२ ॥ अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और वे मुनिबालकोंसे कहने लगे- बालक बोले-हे गुणेश्वर! आपकी आज्ञा मेरी कृपाके बलसे तुमलोग इन असुरोंसे युद्ध करो ॥ २७ ॥ प्राप्तकर आपकी कृपासे हमने सभी राक्षसोंको मार तब कुशोंको हाथमें उठाकर वे मुनिबालक बड़े ही डाला है, अब आप हमें अन्य आज्ञा दें, हम उस हर्षसे युद्ध करनेके लिये उद्यत हो गये। पीछेसे देव कार्यको पूर्ण करेंगे। उस समय जो मुनि वहाँ आये मयूरेशने उनसे कहा-हे बालको! इन राक्षसोंका कुशोंके थे, वे सब यह देखकर परम आश्चर्यचकित हो गये द्वारा वध कर डालो ॥ २८ ॥ कि कुशसमूहोंके द्वारा इन बालकोंने सभी राक्षसोंको मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित किये गये उन कुशोंने मार डाला है। माता पार्वतीने वृषभसे उतरकर उन बहुतसे दैत्योंके मस्तकोंको काट डाला। मयूरेश्वरकी मयूरेशका आलिंगन किया ॥ ३२-३४ ॥ कृपासे उन राक्षसोंके शस्त्र कुण्ठित हो गये ॥ २९ ॥ भगवान् शिव भी कहने लगे-हे देव मयूरेश! मस्तक कटनेपर भी जो राक्षस पुनः उत्पन्न हो आज मैंने आपका पराक्रम देख लिया है। पहले तुमने जाते थे, उन राक्षसोंको वे मुनिपुत्र कुशोंसे पुनः मार इन दैत्योंको अपने शस्त्रोंसे मारा था। पुनः इन बालकोंने डालते थे। तब बाहु, जाँघ तथा घुटनोंसे रहित हुए वे उन्हें कुशोंसे मार डाला ॥ ३५ ॥ राक्षस खण्ड-खण्ड हो करके गिरने लगे ॥ ३० ॥ हे पार्वतीपुत्र मयूरेश! आपका प्रभाव ब्रह्मा आदि यह देखकर वे राक्षस अत्यन्त आश्चर्यचकित हो देवताओंके लिये भी अगम्य है, मैं भी यह ठीकसे नहीं उठे और यह कहने लगे कि क्या घासके तिनकोंसे भी जानता कि आप आगे क्या-क्या करनेवाले हैं? ॥ ३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सीमावर्ती चौकियोंमें नियुक्त राक्षसोंके वधका वर्णन' नामक एक सौ नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०९ ॥ एक सौ दसवाँ अध्याय सिन्धु दैत्यद्वारा गण्डकीनगरमें बन्दी बनाये गये देवताओंको मुक्त करनेके लिये मयूरेशका नन्दीश्वरको वहाँ प्रेषित करना ब्रह्माजी बोले-प्रसन्नतामें भरे हुए विजयी मयूरेश | मयूरेश अपने वाहन मयूरसे उतर पड़े और एक श्रेष्ठ सबसे आगे चल रहे थे और उनके पीछे वे मुनिबालक जा | आसनपर बैठ गये। तदनन्तर अन्य सभीको, भगवान् रहे थे, और फिर वृषभपर आसीन भगवान् शिव चल रहे | शिवको, उनके गणोंको तथा मुनीश्वरोंको बैठाकर वे थे। उनके पीछे गौतम आदि मुनिगण मयूरेशके विवाहके | मयूरेश उनसे कहने लगे, उस समय सभी प्रकारके वाद्य लग्नकी सिद्धि करनेके लिये जा रहे थे। अन्तमें [भगवान् | बज रहे थे ॥ ३-४ ॥ शिवके गण] गरजते हुए तथा दिशा-विदिशाओंको | दैत्य सिन्धुने अपने कारागारमें इन्द्र आदि सभी प्रतिध्वनित करते हुए चल रहे थे ॥ १-२ ॥ | देवताओंको बन्दी बनाकर रखा है। अतः बिना उन्हें गण्डकीनगर जब एक योजन दूर रह गया था, तब | वहाँसे छुड़ाये विवाहकार्य सम्पन्न नहीं हो सकता है ॥ ५ ॥

क्री०ख०-अ०११० ] * मयूरेशका नन्दीश्वरको गण्डकीनगर प्रेषित करना * ५३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

५३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- नन्दी बोले—संसारमें जिसपर भी आपका अनुग्रह होता है, वह महान् हो जाता है। आपने मुझे श्रेष्ठ बनाया है, अतः मैं आपके प्रयोजनको सिद्ध करूँगा॥ २७॥ आपके अनुग्रहसे मैं सम्पूर्ण पृथ्वीको भी शीघ्र ही उलट दूँगा। शेषनाग तथा सूर्यको भी आपके पास ले आऊँगा, इसमें संशय नहीं है॥ २८॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार कहनेके अनन्तर नन्दीश्वर सेना लेकर दैत्य सिन्धुके समीप गये। धैर्य धारणकर वे नन्दी मनके समान तीव्र गतिसे सिन्धुके नगरके द्वारके पास पहुँचे॥ २९॥ उस समय उन्होंने गणेश, भगवान् शिव तथा सम्पूर्ण प्रयोजनोंको सफल बनानेवाली देवी पार्वतीका ध्यान किया, फिर वे अपनी प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेके लिये पार्वतीजीसे मन-ही-मन प्रार्थना करने लगे॥ ३०॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'नन्दीश्वरके दौत्यके प्रस्तावका वर्णन' नामक एक सौ दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११०॥ एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय नन्दीश्वरका दैत्य सिन्धुकी सभामें प्रवेश करके मयूरेशका सन्देश सुनाना, किंतु दैत्य सिन्धुके द्वारा देवताओंको मुक्त करनेसे मना कर देना, नन्दीश्वरका वापस लौटकर मयूरेशको सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाना, मयूरेशद्वारा गणोंको युद्धकी आज्ञा देना ब्रह्माजी बोले—नन्दीश्वर द्वारपालद्वारा बताये जानेपर उस सिन्धुदैत्यकी अत्यन्त रमणीय सभामें गये, वहाँ सभामें विराजमान उस सिन्धु दैत्यको देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १॥ वह सिन्धुदैत्य अनेकों प्रकारके अस्त्र तथा शस्त्र हाथमें लिये हुए महान् वीरोंसे घिरा हुआ था। वह वारांगनाओंका नृत्य देखनेमें तल्लीन था। मनुष्य लोग हाथमें पंखा लेकर प्रसन्नतापूर्वक उसे झल रहे थे॥ २॥ उस समय वहाँ सभी प्रकारके बाजे बज रहे थे, जिनके नादसे सभी दिशाएँ निनादित हो रही थीं। उस सभामें उपस्थित कुछ दैत्योंने उन नन्दीश्वरको देखकर यह समझा कि साक्षात् सूर्य आये हुए हैं॥ ३॥ उन विशाल शरीरवाले तथा महान् वीरको देखकर कुछ दैत्य भयसे काँप उठे। कुछ अन्य दैत्य उन्हें डरानेके लिये बलपूर्वक भयंकर गर्जना करने लगे॥ ४॥ अपने पराक्रमके कारण निडर बने हुए नन्दीश्वर महान् धैर्यशाली होनेसे बिलकुल भी भयभीत नहीं हुए। उस दैत्य सिन्धुके द्वारा हाथसे संकेत किये गये एक उत्तम आसनपर नन्दी विराजमान हुए॥ ५॥ उन नन्दीको देखकर सभी दैत्य उसी प्रकार निष्क्रिय हो गये, जैसे कि चित्रमें अंकित पुत्तल आदिका दृश्य निष्क्रिय होता है। दैत्य सिन्धुका संकेत पाकर दूसरे बृहस्पतिके समान नन्दीश्वर कहने लगे—॥ ६॥ मैंने इससे पूर्वमें अनेकों सभाएँ देखी हैं, किंतु उनमें इस प्रकारके मूढ़जन मैंने कहीं नहीं देखे हैं। आप सभी लोग अत्यन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं और श्रीसे परम सुशोभित हैं॥ ७॥ आप सभी देखनेमें कामदेवके समान सुन्दर हैं, किंतु बुद्धिसे वैसे ही प्रतीत होते हैं, जैसे वृक होते हैं। क्योंकि सभामें जो कोई भी आये, चाहे वह साधु हो या असाधु, दुर्बल हो अथवा बलवान्; वह सम्माननीय होता है, उससे कुशल-क्षेम पूछना चाहिये—यही सनातन नीति है। मैंने ये सब बातें इस सभामें नहीं देखी हैं, इसलिये मेरे मनमें बड़ा आश्चर्य है॥ ८-९॥ ऐसी सभाके सभी सभासद् व्यर्थ हैं, सभी मन्त्रिगण व्यर्थ हैं और सभी उपस्थित नागरिकजन व्यर्थ हैं। यह न केवल राजाका धर्म है, अपितु राजसभामें उपस्थित सम्भ्रान्तजनोंका भी कर्तव्य है॥ १०॥ ब्रह्माजी बोले—नन्दीश्वरके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर दैत्यराज सिन्धु उनसे बोला—हे गुणोंके आकर

क्री०ख०-अ०११९] * नन्दीश्वरका दैत्य सिन्धुकी सभामें प्रवेश * ५३९ स्वरूप ! आपकी बुद्धि तो पद्मयोनि ब्रह्माके समान प्रतीत होती है। हे वृषेश्वर ! आप किसके द्वारा प्रेषित हैं, कहाँसे आये हैं और आपके आगमनका क्या प्रयोजन है ? आप तेजमें अग्निसदृश हैं और पराक्रममें पंचानन शिवके समान प्रतीत होते हैं ॥ ११-१२ ॥ नन्दी बोले—आप मुझे सभी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली गोमाता सुरभिका पुत्र समझें। मेरा नाम नन्दी है। मैं माता पार्वतीके स्वामी भगवान् शिवका वाहन हूँ और ब्रह्माण्डको भेद सकनेकी सामर्थ्य रखता हूँ। भगवान् शिवके भवनमें देव मयूरेशने अवतार ग्रहण किया है, वे पृथ्वीके भारका हरण करनेवाले और दुष्टोंका संहार करनेवाले हैं। वे बाल्यावस्थासे ही दैत्योंका वध करनेवाले हैं ॥ १३-१४ ॥ उन मयूरेशके पराक्रमका वर्णन करनेमें शेषनाग तथा कमलयोनि ब्रह्मा भी असमर्थ रहते हैं। समुद्र- मन्थनके द्वारा जिस प्रकारसे रत्नोंका समूह बाहर निकला, उसी प्रकार आज आप नीतिका मन्थन करके कार्यसिद्धिपर विचार करें। देव मयूरेशद्वारा आपके लिये प्रेषित अत्यन्त प्रबल आज्ञाका आप श्रवण करें ॥ १५-१६ ॥ जो कोई भी उनकी आज्ञाका उल्लंघन करता है, उसका निश्चित ही विनाश हो जाता है; क्योंकि वे ही इस चराचर जगत्‌की रचना करते हैं, इसका पालन करते हैं और इसका विनाश भी कर देते हैं ॥ १७ ॥ आपने बलपूर्वक अपने कारागारमें देवताओंको बन्दी बनाकर रखा है और उनके पदोंको स्वयं ग्रहण कर रखा है, इससे बड़े सौभाग्यकी बात और क्या हो सकती है। इस समय आप देवताओंसे वैर त्यागनेका विचार कर सकते हैं, अतः आप मेरे स्वामीकी आज्ञा मानकर सभी देवताओंको शीघ्र ही मुक्त कर दें ॥ १८-१९ ॥ त्रिपुरासुरने भगवान् शिवके साथ वैर किया था तो वह क्षणभरमें ही मारा गया। भगवान् विष्णुने स्तम्भसे प्रकट होकर हिरण्यकशिपुको मार डाला ॥ २० ॥ तारकासुरने देवताओंपर विजय प्राप्त की और उन सभी देवताओंके पदपर प्रतिष्ठित हो गया, किंतु कार्तिकेयने बलपूर्वक युद्धमें क्षणभरमें ही उसे मार डाला। अतः आप देवताओंको मुझे समर्पित करके सुखपूर्वक चिरकालतक अपने स्थानपर बने रहें ॥ २११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—नन्दीश्वरके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर दैत्यराज सिन्धु अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा। आँखें लालकर वह आँखोंसे अग्नि उगलता हुआ-सा बोल पड़ा ॥ २२१/२ ॥ सिन्धु बोला—हे वृषनन्दन ! मैंने तुम्हारी बहुत- सी चालाकी देख ली है, क्योंकि तुम प्रसंगानुकूल बात करना नहीं जानते हो, अज्ञानवश समयके अनुकूल बात न करनेवालेका वचन सर्वथा व्यर्थ हो जाता है, चाहे वह बृहस्पति ही क्यों न हो ॥ २३-२४ ॥ तुम-जैसे बालकके कहनेसे तथा तुम्हारे स्वामीके कथनानुसार मैं देवताओंको कैसे मुक्त कर सकता हूँ, जबतक कि वह भी जीत नहीं लिया जाता ॥ २५ ॥ वनमें विचरण करनेवाले तथा तृणका भक्षण करनेवाले तुम्हारे कथनका क्या प्रमाण ? तुम्हारा वह शिव कहाँ है और कहाँ उसका पुत्र है, तुम व्यर्थ ही मुझे भय दिखा रहे हो ॥ २६ ॥ यदि तुम दूत बनकर नहीं आये होते तो तुझ बैलको मैं आज ही हलमें जोत देता। हे वृष ! क्रोधके कारण यदि मेरी भृकुटियाँ टेढ़ी हो जायँगी तो तीनों लोक नष्ट हो जायँगे, फिर उन दोनों—शिव तथा मयूरेशकी क्या गणना है ! रुष्ट हुआ सियार भला सिंह अथवा हाथीका क्या बिगाड़ लेगा ? तुम उसकी कामना कर रहे हो, जो सम्भव ही नहीं है, अतः खिन्न होकर ही यहाँसे जा सकोगे ॥ २७-२८ ॥ ब्रह्माजी बोले—दैत्य सिन्धुके इस प्रकारके वचनरूपी बाणोंसे आविद्ध नन्दीश्वर क्रोध करते हुए बोले—॥ २८१/२ ॥ नन्दी बोले—अरे अधम दैत्य ! आज मैं तुम्हारी बुद्धि विपरीत ही देख रहा हूँ। तुम सन्निपात ज्वरसे व्याकुल हुए मरणासन्न व्यक्तिकी भाँति व्यर्थ ही बकवास कर रहे हो, 'पहले साम नीतिका प्रयोग करना' यह कह करके मेरे स्वामीने मुझे भेजा है ॥ २९-३० ॥ किंतु तुम्हारे सामने सामनीतिकी बातें उसी प्रकार

५४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


व्यर्थ हो गयी हैं, जैसे दुष्टको दिया हुआ उपदेश व्यर्थ हो जाता है। यदि तुमने भगवान् शिव और मयूरेशकी निन्दा की, तो समझ लो कि आजसे ही तुम्हारी आयुके क्षीण होते जानेसे तुम युद्धमें विजय नहीं प्राप्त कर सकोगे। अरे मूर्ख दैत्य ! मैं तुम्हें अभी मार डालता, किंतु मेरे स्वामीकी इस प्रकारकी आज्ञा नहीं है। स्वामीको दूतका वध नहीं करना चाहिये और दूतको भी स्वामीका वध नहीं करना चाहिये ॥ ३१-३२१/२ ॥

इस प्रकार कहकर नन्दीश्वर अपनी निःश्वास वायुके द्वारा उन दैत्योंको गिराते हुए क्रुद्ध होकर बिना उस सिन्धुदैत्यसे पूछे ही हर्षित होते हुए वहाँसे निकल पड़े और वे शीघ्र ही मयूरेशके समीप आ गये ॥ ३३-३४ ॥

देव मयूरेश्वरने दूरसे ही नन्दीको देख लिया और वे कहने लगे, नन्दी आ गया है। तदनन्तर नन्दीने आकर उन मयूरेशको प्रणाम किया और आदिसे लेकर अन्ततक समाचार उन्हें बतलाया ॥ ३५ ॥

नन्दी बोले— मैंने बहुत प्रकारसे उस दैत्यको समझाया, किंतु उसने मेरी बात स्वीकार नहीं की, उसने बहुत प्रकारसे मेरी भर्त्सना की और मैंने भी उसे धिक्कारा; किंतु जिस प्रकारसे उलटे घड़ेमें जलकी बूँद नहीं अटकती, उसी प्रकार उस दैत्यके लिये सब कुछ समझाना व्यर्थ हो गया ॥ ३६१/२ ॥

ब्रह्माजी बोले— इस प्रकारसे नन्दीश्वरकी बातें सुनकर और उनके वापस चले जानेपर उस दैत्यके मर्दनकी लालसासे मयूरेश अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। तब उन्होंने प्रमथ आदि गणोंको युद्धके लिये आज्ञा प्रदान की [और कहा-] सिन्धुदैत्यके बन्धनसे देवताओंको मुक्त करनेके लिये इस समय तुम सब उसके नगरमें युद्ध करनेके लिये अत्यन्त उत्सुक होकर भयंकर शब्दोंद्वारा गर्जना करो ॥ ३७-३९ ॥

सेनासहित उस सिन्धुदैत्यको मारकर सभी देवताओंको मुक्त करनेके लिये और अपने आश्रममें जानेके लिये त्वरा दिखानेवाले मुनियोंको भी [पौरोहित्य-सम्बन्धी दायित्वसे] मुक्त करनेके लिये तुम लोग युद्धके लिये जाओ ॥ ४० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विचारवर्णन' नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १११ ॥


एक सौ बारहवाँ अध्याय मयूरेशका गणोंकी सेनाके साथ सिन्धुदैत्यपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान, गणोंद्वारा दैत्य सिन्धुकी सेनापर आक्रमण, पराजित हो सिन्धुसेनाका पलायन, क्रुद्ध दैत्य सिन्धुका स्वयं भी युद्धके लिये प्रस्थान

ब्रह्माजी बोले— दूसरे दिनकी बात है, मयूरेश अपने वाहन मोरपर आरूढ़ होकर अपने चारों करकमलोंमें चारों आयुधोंको धारणकर मेघके समान गम्भीर, भीषण गर्जना करने लगे और युद्ध करनेकी इच्छासे निकल पड़े। तभी भगवान् शिव भी वृषपर आरूढ़ होकर गर्जना करते हुए सहसा निकल गये ॥ १-२ ॥

उनके पीछे-पीछे सात करोड़ गण युद्धके लिये सुसज्जित होकर बड़े वेगसे चल पड़े। तब नन्दीश्वर बोले कि गणोंके नायक वीरभद्रके रहते हुए, मुझ नन्दीके होते हुए और देवशत्रु असुरोंका विनाश करनेमें समर्थ प्रमथगणोंके रहते हुए एकाएक आप लोगोंको उस सिन्धुदैत्यको मारनेके लिये वहाँ नहीं जाना चाहिये। एक दिन सेवकोंका पराक्रम देख लें, तदनन्तर ही युद्धके लिये जायँ ॥ ३-४ ॥

ब्रह्माजी बोले— नन्दीश्वरकी कही गयी इस प्रकारकी वाणी सुनकर देव मयूरेश्वर बड़ी ही प्रसन्नतासे कहने लगे— अच्छी बात कही है, बहुत अच्छी बात कही है। पहले अत्यन्त बलशाली दैत्य सिन्धुके बल- पराक्रमको परख लेना चाहिये ॥ ५-६ ॥

हे नन्दी ! मैं आगे-आगे चलता हूँ, आप सब लोग पीछे-पीछे मेरे साथ चलें। तदनन्तर भूतराज, अत्यन्त वीर्यशाली, पुष्पदन्त और कोटि-कोटि संख्यामें गण उन मयूरेश्वरके

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पूर्ण एवं सटीक देवनागरी पाठ्यान्तरण (transcription) दिया गया है:

क्री०ख०-अ०११२ ] * मयूरेशका गणोंकी सेनाके साथ सिन्धुदैत्यपर आक्रमण करनेहेतु प्रस्थान * ५४१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 आगे-आगे चलने लगे। वे सभी गण बलरूपी लक्ष्मीसे सम्पन्न, देदीप्यमान, वीर और मदोन्मत्त थे ॥ ७-८ ॥ वे सभी दिशाओंके अन्ततक सर्वत्र सबको आक्रान्त करते हुए, मेघके समान अत्यन्त गम्भीर गर्जना करते हुए तथा अपने भारसे धरतीको धारण करनेवाले शेषनागके फणोंको तथा पृथ्वीको भी झुकाते हुए जा रहे थे ॥ ९ ॥ क्रोधरूपी अग्निको उगलते हुए वे सभी वीर उस गण्डकीपुरीमें पहुँचे और दस करोड़ असुरोंसे समन्वित दैत्योंके गुल्म (सीमावर्ती चौकी)-पर टूट पड़े ॥ १० ॥ तदनन्तर दोनों पक्षोंमें अस्त्र-शस्त्रोंसे, बाणसमूहोंसे, भिन्दिपालोंसे तथा परशुओंसे परस्पर अत्यन्त रोमांचकारी भीषण युद्ध होने लगा। कुछ दैत्योंके मस्तक कट गये, किसीके पैर, किसीके हाथ, किसीकी ऊरु, किसीके घुटने, किसीकी जाँघें और किसीके टखने कट गये। कुछ वीरोंके प्राण निकल गये ॥ ११-१२ ॥ वे दैत्य युद्धभूमिमें गिरकर पुनः उठ पड़ते थे और अपनी सेनाके तथा शत्रुसेनाके वीरोंसे लड़ने लगते। इस प्रकार असंख्य दैत्य गिरकर मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ १३ ॥ कुछ दैत्य भागकर वहाँसे निकल गये और कुछ दैत्योंने वीर गणोंसे घिरे हुए तथा सभाके मध्यमें बैठे हुए दैत्य सिन्धुराजको वहाँका सम्पूर्ण समाचार बताया ॥ १४॥ शस्त्रोंके आघातसे रक्तको प्रवाहित करते हुए वे दैत्य फूले हुए पलाशके वृक्षके समान लग रहे थे। कुछ दैत्य वहाँ आकर मृत्युको प्राप्त हो गये और कुछ दैत्य धैर्य धारणकर दैत्यराज सिन्धुसे कहने लगे— ॥ १५ ॥ नगरके द्वारदेशमें स्थित सैन्यसमूहके जो दस करोड़ निशाचर थे, वे शत्रुओंसे युद्ध करनेके अनन्तर मृत्युको प्राप्त हो गये हैं। पर्वतोंके पंखोंका छेदन करनेवाले इन्द्रके साथ जब युद्ध हुआ था, तब तो हमारी विजय हुई थी, हे सिन्धुराज ! आप मौन धारणकर क्यों बैठे हुए हैं, आप अपनोंके हितका कार्य करें ॥ १६-१७ ॥ शत्रुओंके द्वारा नगरके उपवनों, भवनों तथा गलियोंको जला दिया गया है। उठी हुई धूलिराशिके द्वारा अन्धकार छा जानेपर लगी हुई आगके प्रकाशमें नगरनिवासी भाग रहे हैं। कुछ लोग भोजन करते-करते तथा कुछ सोये-सोये नगरसे बाहर निकल रहे हैं। कुछ लोग अपने बालकोंको लेकर भाग रहे हैं तथा कोई परोसा हुआ भोजन छोड़कर भाग रहे हैं ॥ १८-१९ ॥ हड़बड़ाहटमें दौड़ते हुए किसीके वस्त्र सरक रहे थे, कोई ध्यानमें निमग्न था तो कोई होम कर रहे थे। उस स्थितिमें भी वे विविध प्रकारके शस्त्रोंके प्रहारसे मारे जा रहे थे। सभी दिशाओंमें अग्निकी ज्वालाओंको देखकर पुरवासी भयसे अत्यन्त व्याकुल हो गये हैं, उनको यह लग रहा है कि प्रलय उपस्थित हो गया है और सम्पूर्ण नगरी दग्ध हो रही है ॥ २०-२१ ॥ ब्रह्माजी बोले—दूतोंके मुखसे इस प्रकारका समाचार सुनकर दैत्यराज सिन्धुने मुख खोलकर जँभाई ली, तब ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो बहुत बड़े पर्वतसे निकला हुआ सिंह मृगोंका भक्षण कर रहा हो और अपनी क्रोधरूपी अग्निसे उद्दीप्त होकर मानो तीनों लोकोंको निगल रहा हो ॥ २२१/२ ॥ तदनन्तर वह दैत्यराज सिन्धु उन दूतोंसे कहने लगा—यह जो दुर्गम सेना दिखलायी पड़ रही है, इसका क्या होगा ? सिंहके आगे भला खरगोशका पराक्रम क्या कर सकेगा ? सुमेरुपर्वतको पतिंगा अथवा सियार क्या हिला सकेगा ? मुझ कालरूपका वह छोटा-सा बालक मयूरेश क्या कर लेगा ? इस प्रकार कहनेके अनन्तर उसने अपनी सिंहगर्जनासे दसों दिशाओं तथा विदिशाओंको निनादित कर डाला ॥ २३-२५ ॥ फिर वह सिन्धुदैत्य क्षणभरके लिये मौन धारणकर वैसे ही स्थित हो गया, जैसे कोई मुनि मौन धारणकर स्थित हो जाते हैं। तदनन्तर वीरगण दैत्यराज सिन्धुसे क्रोधवश मूर्च्छित-से होकर कहने लगे। [हे राजन् !] आप हमें आज्ञा प्रदान कीजिये, हम क्षणभरमें उस मयूरेशपर विजय प्राप्त कर लेंगे। आपके प्रतापसे तो हम इस समय तीनों लोकोंको वशमें कर लेंगे ॥ २६-२७ ॥ सिन्धु बोला—हे महान् वीरो ! आप लोगोंने ठीक ही कहा। मेरा भी मन उस शत्रुको देखनेके लिये उत्कण्ठित हो रहा है। अतः आप लोग उसकी सेनाके साथ युद्ध करो ॥ २८ ॥

५४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तदनन्तर वे श्रेष्ठ वीर दैत्य गर्जना करते हुए आगे | रणोन्मत्त दैत्यराज सिन्धु अपने मुख तथा आँखोंसे बढ़े। वे संख्यामें असंख्य थे, सभी वीर शस्त्रोंको धारण | क्रोधरूपी अग्निकी वर्षा करता हुआ मनकी गतिके किये हुए थे और वह सेना चतुरंगिणी थी ॥ २९ ॥ | समान वेगवाले अश्वपर सवार होकर युद्ध करनेके लिये क्रोध तथा हर्ष—दोनों भावोंसे समन्वित वह | रणभूमिमें गया ॥ ३० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'युद्धके लिये सिन्धुके प्रस्थानका वर्णन' नामक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११२ ॥

एक सौ तेरहवाँ अध्याय युद्धके लिये दैत्यराज सिन्धुकी चतुरंगिणी सेनाका प्रस्थान, मयूरेशकी सेना और दैत्यसेनाका भीषण संग्राम, सिन्धुसेनाके दो अमात्य वीर—मैत्र और कौस्तुभका वीरभद्र एवं कार्तिकेयसे युद्ध तथा दोनों अमात्य वीरोंके वधका वर्णन ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] सबसे आगे | निनादित कर दे रहे थे ॥ ६ ॥ पैदल सैनिक चल रहे थे, वे धरतीको कम्पित करते हुए | वे घोड़े स्वर्ण, अनेक प्रकारके रत्नों तथा मोतियोंकी जा रहे थे। उनके मुख बड़े ही भयंकर थे। वे सभी बड़े | मालाओंसे सुशोभित थे, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो ही पराक्रमी थे और उनके मस्तक सिन्दूरके समान अरुण | वे आकाशमें विचरण कर रहे हों। उन अश्वोंके ऊपर वर्णके थे। कुछ सैनिक कवच बाँधे हुए थे, उनके केश | महान् वीर योद्धा विराजमान थे, जो कवच धारण करनेसे खुले हुए थे। वे अत्यन्त भीषण लग रहे थे। किन्हीं- | सुशोभित हो रहे थे, उन्होंने विविध प्रकारके शस्त्र धारण किन्हीं वीरोंने अपनी कमर बाँध रखी थी, और कुछ | कर रखे थे और वे महायोद्धा शत्रुसेनाका मर्दन वीरोंने चन्दनका अनुलेपन किया हुआ था ॥ १-२ ॥ | करनेवाले थे ॥ ७ १/२ ॥ वे विविध प्रकारके शस्त्रोंको धारण किये हुए थे | घुड़सवार सेनाके पीछे रधारोही वीर सैनिक चल और अनेक प्रकारकी युद्धकलामें पारंगत थे। उन पैदल | रहे थे, जो अपने शस्त्रों तथा अस्त्रोंके द्वारा शत्रुओंका सैनिकोंके आगे [सिन्दूरादिसे अनुलिप्त] मतवाले हाथी | विनाश कर देनेवाले थे। वे रधारोही वीर युद्धमें युद्धके चल रहे थे, जो ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो नाना | मार्गका समुचित ज्ञान रखनेवाले श्रेष्ठ सारथियोंसे समन्वित प्रकारकी धातुओंसे चित्रित किये गये पर्वत हों ॥ ३ ॥ | थे और मोतियों तथा मणियोंकी एवं सुगन्धित पुष्पोंवाली उनके लम्बे-लम्बे दाँत सुशोभित हो रहे थे, वे | मालाओंको धारण किये हुए थे ॥ ८-९ ॥ अनेक प्रकारके आभूषणोंसे सुसज्जित थे, वे हाथी अपने | उनके कन्धोंपर धनुष लटक रहा था। वे तूणीर भी घण्टानादके द्वारा सभी जनोंको तत्काल ही बधिर बना | धारण किये हुए थे। उनके हाथोंमें खड्ग तथा भाले थे, दे रहे थे। वे अपनी सूँड़के प्रहारसे पर्वतों तथा वृक्षोंको | वे उस महायुद्धमें अपने शस्त्रोंसे निकलनेवाली आभाके चूर-चूर बनाते हुए चल रहे थे। उन हाथियोंके मस्तक | द्वारा लोगोंके नेत्रोंको आच्छादित कर दे रहे थे, जो कि अनेक प्रकारकी पताकाओं तथा चित्र-विचित्र ध्वजोंसे | सूर्यके तेजसे मिलकर दोगुनी अधिक देदीप्यमान हो रही सुशोभित हो रहे थे ॥ ४-५ ॥ | थी। उस समय तूर्यघोष हो रहा था और बन्दीजन उन हाथियोंके पीछे घोड़े चल रहे थे, जो अपने | दैत्यपति सिन्धुका स्तवन करते हुए कह रहे थे कि हे खुरोंके आघातसे पृथिवीको चूर्ण-चूर्ण कर दे रहे थे। वे | सिन्धु ! आपके अतिरिक्त तीनों लोकोंमें कोई दूसरा अपने हिनहिनानेके नादसे आकाश तथा दसों दिशाओंको | बलिष्ठ वीर नहीं है। आपकी सम्पत्तिसे धनद कुबेरकी

क्री०ख०-अ०११३] * युद्धके लिये दैत्यराज सिन्धुकी चतुरंगिणी सेनाका प्रस्थान * ५४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] भी सम्पत्ति समता नहीं कर सकती ॥ १०-१२ ॥ इस प्रकारसे वह सेना दसों दिशाओंको अपनी गूँजसे निनादित करती हुई आ रही थी। तब भूतराज तथा पुष्पदन्तने उस आती हुई सेनाको देखा तो भयभीत होकर भाग पड़े और मयूरेशके पास आये ॥ १३१/२ ॥ वे दोनों बोले-आपकी आज्ञासे हमने आगे जाकर सिन्धुदैत्यके नगरके द्वारपर बनी चौकीमें स्थित सेनाका संहार कर डाला और उस दैत्य सिन्धुके गण्डकी नामक नगरको भी बहुत प्रकारसे दग्ध कर दिया। तब हम दोनोंके पराक्रमको सुनकर वह दैत्यराज सिन्धु स्वयं चला आया है। उसके साथमें नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंसे सुसज्जित चतुरंगिणी सेना है। हे महाबल ! उसे देखकर हम दोनों भयभीत होकर आपके पास चले आये हैं॥ १४-१६॥ ब्रह्माजी बोले-वे दोनों अर्थात् भूतराज तथा पुष्पदन्त—इस प्रकार कह ही रहे थे कि पूर्व दिशामें सिन्धुदैत्यकी समुद्रके समान [अपरिमित] सेना आती हुई दिखायी दी, जिसका पार पाना शस्त्र धारण करनेवाले योद्धाओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है ॥ १७॥ तदनन्तर संक्षेपमें उस दैत्य सिन्धुराजके वृत्तान्तको जानकर हर्षित हुए मयूरेश नीले कण्ठवाले अपने वाहन मयूरपर आरूढ़ होकर आगे बढ़े ॥ १८ ॥ उन्होंने अपने चारों हाथोंमें चार आयुधोंको धारण कर रखा था। अपने हाथोंमें धनुष, बाण तथा तलवार लिये हुए करोड़ों गण युद्धके लिये सुसज्जित होकर वृषभपर विराजमान नीलकण्ठ भगवान् शिवको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। मुनीश्वरोंने मयूरेशकी स्तुति की और आशीर्वचन प्रदान किये ॥ १९-२० ॥ उस समय सिन्धुदैत्यकी सेना तथा मयूरेशकी सेना-दोनों सेनाओंके वाद्योंकी ध्वनिसे महान् कोलाहल होने लगा। वे दोनों सेनाएँ एक-दूसरेकी उस सैन्यसम्पदाको देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो रही थीं ॥ २१ ॥ वे मयूरेश दैत्य सिन्धुकी असंख्य सेनाको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो गये। नन्दीश्वरने पूर्वमें जो उन्हें

[दायाँ स्तम्भ] बतलाया था, वह सब उन्होंने आज प्रत्यक्ष देख लिया। तदनन्तर नन्दीश्वर मयूरेशको प्रणाम करके बार-बार गर्जना करते हुए युद्ध करनेके लिये आकाशमार्गसे चल पड़े और दैत्यसेनामें आकर उन्होंने अनेक दैत्यवीरोंके मस्तकोंको काट डाला ॥ २२-२३ ॥ उन्होंने अपने सींगोंके महान् आघातसे दैत्यराज सिन्धुके अश्वपर दृढ़ प्रहार किया और बिना क्षत-विक्षत हुए शीघ्र ही उड़ करके मयूरेशके पास चले आये ॥ २४ ॥ उस समय सभी गण अत्यन्त आश्चर्य करने लगे और 'साधु-साधु'- इस प्रकार कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर नन्दीश्वरने अपने सींगोंके प्रहारसे दैत्य सिन्धुराजके छत्रको गिरा डाला ॥ २५ ॥ घोड़ेके तथा छत्रके गिर जानेपर वह दैत्यराज सिन्धु दूसरे घोड़ेपर सवार हो गया और उसने एक अत्यन्त मूल्यवान् दूसरा छत्र धारण कर लिया। नन्दीश्वरके पराक्रमको देखकर सिन्धुदैत्यको अत्यन्त आश्चर्य हुआ। उसने अपने महान् वीरोंपर क्रोध करते हुए कहा-तुम लोगोंका बल-पराक्रम कहाँ चला गया है ? ॥ २६-२७॥ सिन्धुराजके इस प्रकारके वचन सुनकर उस दैत्यके कौस्तुभ तथा मैत्र नामवाले दो अमात्य, जो शत्रुंकी सेनाको मार गिरानेवाले थे, वे दैत्य सिन्धुको प्रणाम करके बोले-हे नाथ ! हे सिन्धु ! आप चिन्ता न करें, हम दोनों शत्रुओंका विनाश कर डालेंगे, अगर ऐसा नहीं हुआ, तो हम किसी प्रकार भी अपना मुख नहीं दिखलायेंगे। ऐसा कह करके वे दोनों चतुरंगिणी सेनाको साथ लेकर चल पड़े। ब्रह्माण्डका विदीर्ण कर डालनेमें तत्पर पैदल सैनिकोंके समूह भी उनके साथमें निकले ॥ २८-३०॥ वे रणोन्मत्त सैनिक पृथ्वीको उलट डालनेकी इच्छा रखते थे। कौस्तुभ तथा मैत्र नामक दोनों अमात्य मयूरेशके पास उन्हें गिरा डालनेकी इच्छासे गये ॥ ३१ ॥ जबतक वे दोनों अमात्य अपने बाणोंकी वर्षासे मयूरेशको आच्छादितकर उनके पास पहुँचते, उससे पहले ही वीरभद्र तथा कार्तिकेय उनसे युद्ध करने वहाँ आ पहुँचे। वे दोनों असंख्य सेनाके साथ थे और दसों दिशाओंको

५४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अपनी गर्जनासे निनादित कर रहे थे। वे दोनों महाबली वीर वीरभद्र और कार्तिकेय क्रुद्ध होकर [अनेक प्रकारके प्रहारोंसे] दैत्य सिन्धुकी सेनापर आघात करने लगे ॥ ३२-३३॥ कौस्तुभ तथा मैत्रका भी उन दोनोंके साथ युद्ध हुआ। दोनों पक्षोंके वीर परस्पर प्रहार कर रहे थे और 'सहो' 'मारो' इस प्रकारसे आपसमें कह रहे थे ॥ ३४॥ कौस्तुभ तथा मैत्रने अनेकों अस्त्रों तथा शस्त्रोंसे उन दोनों वीरभद्र और कार्तिकेयके साथ युद्ध किया। बाणसमूहोंसे, भिन्दिपालोंसे, परिघोंसे तथा मुसलोंसे दोनों पक्षोंके वीर एक-दूसरेका वध करनेकी इच्छासे युद्ध कर रहे थे। जब सभी शस्त्र टूट गये और बाण भी समाप्त हो गये तो दोनों सेनाओंके वीर आपसमें मल्लयुद्ध करने लगे और एक-दूसरेको मार डालनेतक युद्ध करते रहे। कुछ वीर प्राणोंसे रहित होनेपर भूमिपर गिर पड़े और अपने मुखसे बहुत-सा रक्त प्रवाहित करने लगे ॥ ३५-३७॥ कुछ वीर पैरसे दूसरे पक्षके वीरके पैरमें चोट पहुँचा रहे थे, तो दूसरे वीर कन्धेसे कन्धेपर वार कर रहे थे। कुछ पीठके बल पीठपर चोट पहुँचा रहे थे, तो कुछ वीर हाथसे हाथमें मार रहे थे। कुछ सैनिक अपने मस्तकसे दूसरे पक्षके सैनिकके मस्तकपर आघात कर रहे थे तो कुछ कुहनीके द्वारा कुहनीपर प्रहार कर रहे थे। कुछ वीर गिर गये थे, कुछ दूसरेके द्वारा गिराये जा रहे थे, कुछ मृत हो गये थे, कुछ अंग-भंग हो गये थे तो कुछ वीर चूर-चूर हो गये थे ॥ ३८-३९॥ किसीके कण्ठ कट गये थे, किसीकी भुजाएँ अलग हो गयी थीं और कुछ जंघा, ऊरु तथा बाहुओंसे रहित हो गये थे। इस प्रकारसे मयूरेशकी सेनाके विनष्ट हो जानेपर दैत्यराज सिन्धुकी सेना विजयी हो गयी ॥ ४० ॥ तब जय-जयकारके शब्दोंसे स्तुति किये जाते हुए और बन्दीजनोंद्वारा वाद्योंकी ध्वनि सुनाये जाते हुए मित्र [मैत्र] तथा कौस्तुभ नामक वे दोनों अमात्य दैत्येश्वर सिन्धुके पास आये ॥ ४१ ॥ इधर वीरभद्र तथा कार्तिकेय भी मयूरेशके पास चले आये। तदनन्तर सूर्यके अस्त हो जानेपर युद्ध- विराम हो गया ॥ ४२ ॥ दूसरे दिन दानवोंने देवताओंकी सेनाके साथ पुनः युद्ध किया। सिन्धुराजके वीर दैत्योंने अपने बाणोंकी वर्षासे भागती हुई उस देवसेनापर प्रहार किया ॥ ४३ ॥ तब वीरभद्र तथा कार्तिकेय पुनः युद्धके आवेशमें आ गये और गर्जना करते हुए [उस] गर्जनाके द्वारा दसों दिशाओं तथा आकाशको निनादित करने लगे। यमराजके समान वे उस शत्रुसेनाको मार रहे थे और सेनाको दग्ध कर रहे थे। उस समय महान् भयंकर अन्धकारके छा जानेपर कहीं भी कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा था ॥ ४४-४५॥ फलतः दोनों पक्षोंके वे महाबलवान् वीर अपने पक्षके तथा शत्रुसेनाके वीरोंको भी मार डाल रहे थे। तदनन्तर दैत्य सिन्धुकी सेनाके छिन्न-भिन्न हो जानेपर वीरभद्र तथा कार्तिकेयने विजयघोष किया ॥ ४६ ॥ तब दैत्य सिन्धुराजके वे दोनों अमात्य मैत्र और कौस्तुभ मरनेका निश्चय करके युद्ध करनेके लिये पुनः आ पहुँचे और उन्होंने अपने-अपने घोड़ोंको शत्रुसेनाके मध्य जानेके लिये प्रेरित किया ॥ ४७ ॥ वे दोनों बाणोंकी वर्षा करते हुए और तलवारके वारसे वीरोंको मारते हुए आगे बढ़ रहे थे। तदुपरान्त जब कार्तिकेय और वीरभद्रने शत्रुवीरोंका वैसा पराक्रम देखा, तो बहुत जोरोंसे उनपर मुष्टि-प्रहार करके शीघ्रतापूर्वक अपनी सेनामें आ गये। उस प्रहारके कारण मैत्र अपने मुखसे बहुत-सा रक्त बहाता हुआ भूमिपर गिर पड़ा ॥ ४८-४९॥ मैत्रकी वह स्थिति देखकर कौस्तुभ युद्ध करनेके लिये आगे आया और क्रोधित होकर उसने अपनी तलवारके वारसे कार्तिकेयपर प्रहार किया ॥ ५० ॥ उस प्रहारसे कार्तिकेय मूर्च्छित हो गये, तब वीरभद्रने कौस्तुभके साथ युद्ध किया। कौस्तुभने अत्यन्त रोषमें भरकर अनेक बाणोंसे वीरभद्रपर आघात किया ॥ ५१ ॥ तब वीरभद्रने भी अपनी मुष्टिकाके प्रहारसे उसे भूमिपर गिरा दिया। उस कौस्तुभके मर जानेपर महाबली वीरभद्र अत्यन्त आनन्दित हो उठे ॥ ५२ ॥ इस प्रकार मैत्र तथा कौस्तुभ-दोनों अमात्य

क्री०ख०-अ०११४] * दैत्यराज सिन्धुकी सेनाका मयूरेशकी सेनाके साथ भीषण संग्राम * ५४५ वीरोंके मारे जानेपर दैत्योंकी वह सेना पलायन कर गयी। पास उस सम्पूर्ण समाचारको बतानेके लिये गये और उन शस्त्राघातसे आहत एवं बहुत-सारा रक्त वमन करनेवाले सैनिकोंने शस्त्रोंकी आघातजनित पीड़ासे अत्यन्त पीड़ित असुर सैनिक नित्य ही मैत्र तथा कौस्तुभकी विजयकी होनेके कारण अस्पष्ट वाणीमें वह सारा वृत्तान्त उसे अभिलाषा रखनेवाले, देवताओंके शत्रु दैत्यराज सिन्धुके बतलाया॥ ५३-५४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मैत्र एवं कौस्तुभके वधका वर्णन' नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११३ ॥

एक सौ चौदहवाँ अध्याय दैत्यराज सिन्धुकी सेनाका मयूरेशकी सेनाके साथ भीषण संग्राम और सिन्धुसेनाकी पराजय

वीर बोले—[हे स्वामिन्!] नाना प्रकारके शस्त्रोंसे युद्धकी इच्छासे निकल पड़ा। वीरभद्र और षडानन असंख्य युद्ध करनेमें कुशल वे दोनों मैत्र तथा कौस्तुभ नामक वीर सेना लेकर चल पड़े। वे दोनों विविध प्रकारके शस्त्रोंको अमात्य मृत्युको प्राप्त हो गये हैं। उन दोनोंने शत्रु की सेनाके धारण किये हुए थे और युद्ध करनेमें अत्यन्त बलवान् थे। असंख्य वीरोंको रात-दिन मारा। तदनन्तर शत्रुसेनामें से दो देवसेनाके सात व्यूहों (नन्दीश्वर, पुष्पदन्त, भूतराज, विकट, दुष्ट वीर आगे उपस्थित हुए, उन दो बलशाली वीरोंने हमारी चपल, वीरभद्र और षडाननकी सेना)-को देखकर सेनाको मार गिराया और मर्दित कर डाला॥ १-२॥ दैत्यसैनिकोंने अनेकों व्यूहोंकी रचना की॥ ८-१०॥ उन दोनों वीरोंके हाथोंके प्रहारसे वे दोनों—मैत्र दैत्यसेनाके व्यूहमें गन्धासुर, मदनकान्त, वीर, ध्वज, और कौस्तुभ यमलोकको प्राप्त हुए हैं। हम लोगोंने महाकाय, शार्दूल तथा सातवें धूर्त नामक योद्धाओंके सात अनेक प्रकारकी सेनाएँ देखी हैं, किंतु उन दोनोंके समान व्यूह थे। इन सात व्यूहोंको आगे करके दैत्यसेनाने आये देवता नहीं देखे हैं॥ ३॥ हुए उन देवताओंके व्यूहोंमें स्थित वीरोंके साथ युद्ध किया। सिन्धु बोला—अरे सैनिको! जिन दोनों मैत्र और उन्होंने बाणोंकी वर्षा करके उस देवसेनाको ढक दिया कौस्तुभको देखकर समस्त प्राणियोंके प्राणोंका हरण और भालोंके अग्रभागसे उन्हें बींध डाला॥ ११-१२॥ करनेवाले यमराज भी डरते हैं, बताओ तो सही, कि वे किन्हींपर भिन्दिपालोंसे आघात किया, जिससे वे दोनों हाथोंके आघातसे कैसे मृत्युको प्राप्त हुए? अब इस पृथ्वीपर गिर पड़े। महान् बली गन्धासुरने बलपूर्वक समय सभी सैनिक मेरे बल-पराक्रमको देख लें। मैं कार्तिकेयके साथ युद्ध किया॥ १३॥ युद्धभूमिमें शत्रुके सिरको नचा डालूँगा, इसमें संशय नहीं मदनकान्तने युद्धस्थलमें वीरभद्रके साथ युद्ध किया। है। चूँकि मैं चक्रपाणिका पुत्र हूँ, अतः मैं चक्रयुद्ध नन्दीश्वर और असुर वीरराज परस्पर युद्ध करने लगे॥ १४॥ करूँगा। ऐसा कहकर वह दुष्ट अश्वपर आरूढ़ होकर ध्वजासुर और पुष्पदन्तमें विविध प्रकारके अस्त्र- मयूरेशसे युद्ध करनेके लिये चल पड़ा॥ ४-६॥ शस्त्रों तथा बाणसमूहोंसे आपसमें युद्ध होने लगा। असंख्य करोड़ वीर दैत्य, जो बड़े ही अपराजेय इसी प्रकार भूतराज तथा महाकायने आपसमें युद्ध योद्धा थे और महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे, वे किया। धूर्त और विकटने आपसमें द्वन्द्वयुद्ध किया। भगवान् शिवके पुत्र देवराज मयूरेशसे युद्ध करनेकी चपल ने रोषमें भरकर शार्दूलको मारा, जिससे वह इच्छासे दैत्य सिन्धुके आगे-आगे चलने लगे॥ ७॥ भूमिपर गिर पड़ा॥ १५-१६॥ इधर अत्यन्त बलशाली नन्दीश्वर और पुष्पदन्त भी पुनः चैतन्यको प्राप्तकर उस शार्दूलने अपने खड्गसे युद्ध करनेके लिये गये। भूतराज और विकट दस लाख चपलपर प्रहार किया, जिस कारण वह चंचल चपल योद्धाओंके साथ गये। चपल पचास हजार सेना लेकर युद्धमें महान् मूर्च्छको प्राप्त हुआ॥ १७॥

५४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 द्वन्द्वयुद्ध प्रारम्भ होनेपर दोनों देवसेना और असुरसेना | दिखायी नहीं दे रहा था ॥ २८ ॥ परस्पर युद्ध करने लगी। दोनों ओरके सैनिक शस्त्रोंके | तदनन्तर हे देवताओ ! 'हम दैत्यसेनाके सैनिक हैं, समूहों तथा बाणोंके जालसे परस्पर युद्ध करने लगे ॥ १८ ॥ | हमें मत मारो, हे असुरो ! हम देवसेनाके सैनिक हैं, हमें उस समय दोनों ओरके वीर युद्ध करते हुए एक- | मत मारो' इस प्रकार कोलाहल करते हुए दोनों सेनाके दूसरेसे कह रहे थे—'लो, मेरे प्रहारको सहन करो, मारो, | वीरोंमें परस्पर युद्ध होने लगा। युद्धभूमिमें विद्यमान डरो मत, अगर मर जाओगे तो स्वर्ग प्राप्त करोगे।' | हिंसक जन्तु, भूत, राक्षस, सियार, पतंग तथा श्येन आदि शस्त्रों तथा बाणोंके समाप्त हो जानेपर पुनः सभी | (मांसाहारी जीव) [सैनिकोंके मांस आदिके भोजनसे] सेनानी, पैरोंके प्रहार तथा मुष्टियोंसे युद्ध करने लगे और | तृप्त होकर पार्वतीपुत्र मयूरेशको अनेक आशीर्वाद देने एक-दूसरेको मारने लगे। कोई सैनिक शत्रुसैनिकके दोनों | लगे। इस प्रकारसे तीन दिन और तीन राततक लगातार पैरोंको पकड़कर उसे पटकने लगा ॥ १९-२० ॥ | वह भयंकर युद्ध होता रहा ॥ २९-३१ ॥ कोई उछलकर दूसरेपर गिरकर उसे चूर-चूर कर | दोनों सेनाएँ रात्रिके वाद्योंको बजाकर अपनी- दे रहा था। किसीने दूसरेका सिर काट लिया तो किसीने | अपनी विजयकी जयध्वनि करने लगीं। इस प्रकार युद्धमें शत्रुकी बाहें काट लीं। किसीने दूसरेके पैर तथा | गन्धासुरने सेनानी कार्तिकेयके साथ बहुत विस्तारसे युद्ध जानुओंको काट डाला, तो किसीने दूसरेके गुल्फोंको | किया। मद्यपानसे मतवाले हुए उस गन्धासुरने शस्त्रोंका काट दिया। कुछ दूसरे सैनिक आपसमें बाणोंकी वर्षा | परित्यागकर बड़े वेगसे अपनी मुष्टिकाके प्रहारसे सहसा करने लगे ॥ २१-२२ ॥ | उन कार्तिकेयपर आघात किया ॥ ३२-३३ ॥ शस्त्रोंसे आहत कोई वीर रक्त बहाते हुए भी मृत्यपर्यन्त | फलस्वरूप वे कार्तिकेय भूमिपर उसी प्रकार गिर पड़े, युद्ध करने लगा। सिर कटे हुए धड़ोंने भी युद्ध किया, वे | जैसे वज्रके प्रहारसे पर्वत गिर पड़ता है। तदनन्तर शीघ्र ही अपने पक्षके तथा शत्रुपक्षके वीरोंको मार डाल रहे थे। | चेतना प्राप्तकर कार्तिकेय उसी प्रकार दौड़ पड़े, मानो पंखोंसे कुछ दूसरे लोग वक्षःस्थल विदीर्ण हो जानेसे सहसा गिर | युक्त कोई पर्वत दौड़ रहा हो। उन्होंने अपने बारह हाथोंसे पड़ रहे थे और कुछ उस युद्धभूमिमें परस्परके आघातसे | छह श्रेष्ठ धनुषोंद्वारा बाणोंके अनेक समूहोंको छोड़ते हुए आहत होकर मृत्युको प्राप्त कर रहे थे ॥ २३-२४ ॥ | उस महान् असुर गन्धको बींध डाला ॥ ३४-३५ ॥ कुछ वीर स्वर्ग प्राप्तकर एक अप्सराकी प्राप्तिके | कार्तिकेयके द्वारा छोड़े गये उन बाणसमूहोंको लिये युद्ध कर रहे थे। वहाँपर रक्तकी नदी प्रवाहित हो | रोककर गन्धासुरने अत्यन्त वेगपूर्वक उन अनामय चली, जो वीरोंके केशरूपी सेवारसे समन्वित थी, | कार्तिकेयको अपने बाणोंद्वारा आच्छादित कर दिया ॥ ३६ ॥ खड्गरूपी मत्स्योंसे युक्त थी, ढालरूपी बड़े-बड़े कछुओंसे | कार्तिकेयने भी उन बाणोंको रोककर उस गन्धासुरका युक्त तथा कठिनतासे पार होनेवाली थी। वह नदी अत्यन्त | पैर पकड़कर अकस्मात् घुमा डाला और फिर जमीनपर भयावह थी, उसमें प्रेतरूपी काष्ठ प्रवाहित हो रहे थे और | पटक दिया। दृढ़ आघात लगनेके कारण उस गन्धासुरके वह चँवररूपी तृणोंसे समन्वित थी ॥ २५-२६ ॥ | प्राण निकल गये और उसके सौ टुकड़े हो गये। उस वह नदी वीरोंके कवचरूपी मगरमच्छोंसे अत्यन्त | गन्धासुरके मारे जानेपर उसकी सेना व्याकुल होकर दसों शोभाको प्राप्त हो रही थी, युद्धोचित उपकरणरूप | दिशाओंकी ओर भाग गयी ॥ ३७-३८ ॥ मेढकोंवाली वह वीरोंको आनन्द प्रदान करनेवाली और | उस समय उसके पीछे जाते हुए षडाननने उस कायरोंके डरको अत्यधिक बढ़ानेवाली थी ॥ २७ ॥ | सेनाकी निन्दा की। तदनन्तर सेन, क्रोधन तथा शतघ्न अत्यन्त दुःखसे पारकी जानेवाली वह नदी वीरोंके | नामक असुर युद्धके लिये आ पहुँचे ॥ ३९ ॥ मेदरूपी जलसे तथा मांसरूपी कीचड़से समन्वित थी। | उस समय उन असुरोंने महान् शब्द किया, जिससे उस समय सूर्यके अस्त हो जानेपर कहीं भी कुछ भी | ऐसा प्रतीत हुआ मानो मेघ गर्जना कर रहे हों। वे कार्तिकेयसे

क्री०ख०-अ०११५ ] * दैत्यराज सिन्धुका सुसज्जित होकर रणभूमिके लिये प्रस्थान * ५४७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बोले—अरे दुष्ट ! तुमने हमारी बहुत सारी सेनाको विनष्ट कर डाला है। अब इस समय हमारे द्वारा मारे जानेपर तुम सूर्यपुत्र यमराजके भवनको जाओ ॥ ४०१/२ ॥ तदनन्तर उन तीनोंने एक साथ ही उन कार्तिकेयको अपने बाणोंद्वारा उसी प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे बहुत-से बलवान् कुत्ते सिंहको घेर लेते हैं ॥ ४११/२ ॥ तब कार्तिकेयने अपने छहों धनुषोंसे छोड़े गये बाणोंके द्वारा उनको मारा। उन बाणोंके प्रहारसे वे मूर्च्छित तो हो गये, लेकिन मुहूर्तभरमें ही फिर उठ खड़े हुए। तब उन्होंने कार्तिकेयके गलेमें पाश डाला और वे तीनों उन्हें पशुके समान बाँधकर खींचते हुए ले गये ॥ ४२-४३ ॥ षण्मुख कार्तिकेयको राक्षसोंद्वारा ले जाया गया जानकर हिरण्यगर्भ, बलवान् श्यामल तथा रक्तलोचन नामक तीनों देवगण बड़े ही वेगसे पीछे-पीछे दौड़े, किंतु सेन, क्रोधन तथा शतघ्न नामक उन तीन असुरोंने अपनी मुष्टियोंके प्रहारसे उन देवगणोंको मारा, जिससे वे भूमिपर गिर पड़े। तदनन्तर असुर मदनकान्तने महाबलवान् वीरभद्रको अपने शस्त्रके आघातसे मारा, जिस कारण वे महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो गये। तदुपरान्त उन्होंने मूर्च्छाका परित्यागकर अपने दण्डके आघातसे उस मदनकान्तको गिरा दिया ॥ ४४-४६ ॥ उस मदनकान्तको मरा हुआ जानकर महाबलशाली असुर वीरराज उन अत्यन्त बलशाली हिरण्यगर्भ आदि तीनों देवगणोंको मारनेके लिये निकल पड़ा ॥ ४७ ॥ तदनन्तर नन्दिकेश्वरने रोष करते हुए अपनी सींगोंसे उस वीरराजपर आघात किया, जिससे वह अपने मुखसे रुधिरकी धारा बहाते हुए सौ टुकड़ोंमें विभक्त होकर भूमिपर जा गिरा। उस वीरराजको मरा हुआ देखकर शीघ्र चार श्रेष्ठ असुर नन्दीको मारनेके लिये वहाँ आये, उनके नाम थे—शार्दूल, ध्वजासुर, धूर्त तथा महाकाय। वे युद्धमें सभी देवताओंको जीतनेका सामर्थ्य रखते थे। उन असुर वीरोंने विविध प्रकारके शस्त्रोंसे उन बलवान् नन्दिकेश्वरपर प्रहार किया ॥ ४८-५० ॥ जब नन्दीश्वर गिर पड़े तो पुष्पदन्त, भूतराज, विकट तथा चपल नामक युद्धोन्मादवाले चार देवसेनापति वहाँ आये। उन चारोंने बड़े-बड़े पर्वतोंको हाथोंमें उठाकर उन असुर वीरोंके ऊपर फेंका, जिससे सभीके मस्तक फूट गये और कुछ असुर चूर-चूर हो गये ॥ ५१-५२ ॥ पर्वतोंकी चोटसे वे सभी रणभूमिमें गिर पड़े। शस्त्रोंके आघातसे पीड़ित कुछ असुर दैत्यराज सिन्धुके समीप जा पहुँचे। उन्होंने अपनी सेनाकी पराजय तथा देवताओंकी विजयका समाचार उसे बतलाया। विजयी हुई देवसेना अनेक प्रकारके वाद्योंको बजाने लगी। वे सभी देवता 'हे मयूरेश ! हे मयूरेश ! आपकी जय हो, आपकी सर्वदा विजय हो'—इस प्रकार कहते हुए हर्षित हो रहे थे और अत्यन्त आनन्दमग्न हो नृत्य कर रहे थे ॥ ५३–५५॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुसेनाका पराजय-वर्णन' नामक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११४ ॥ एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय दैत्यराज सिन्धुका सुसज्जित होकर रणभूमिके लिये प्रस्थान, सिन्धुका मयूरेशकी सेनाके वीरोंको पराजितकर मयूरेशके साथ घोर संग्राम, मयूरेशका सर्वत्र चतुर्भुजरूप दिखाना, मोहित होकर सिन्धुदैत्यका अपने भवनमें वापस आना ब्रह्माजी बोले—अपनी सेनाकी पराजयका समाचार सुनकर दैत्यराज सिन्धु अत्यन्त चिन्तित हो उठा। उसका मुखमण्डल म्लान हो गया और वह दुःखके सागरमें निमग्न हो गया। तदनन्तर सन्तप्तचित्त-से वह दैत्यराज विचार करने लगा ॥ १ १/२ ॥ सिन्धु बोला—यह विपरीत परिस्थिति कैसे उत्पन्न हो गयी, मैं इसे जान नहीं पा रहा हूँ। लोगोंसे भरे हुए ब्रह्माण्डको क्या एक चींटी ग्रसनेमें समर्थ हो सकती है ? जिस मुझ सिन्धुके आगे इन्द्र आदि देवता भी एक मच्छरके समान लगते हैं, उसी सिन्धुराजकी सेनाको शिवके एक

५४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐